दिनकर की सांस्कृतिकी : परंपरा से भविष्य तक

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Parichay Das

— परिचय दास —

दिनकर को केवल राष्ट्रकवि कह देना उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को एक सुविधाजनक परिचय में बाँध देना है। उनके भीतर जो कवि है, वह जितना ओज का कवि है, उतना ही स्मृति का; जितना इतिहास का, उतना ही मनुष्य के भीतर चलने वाले द्वंद्व का। उनकी कविता में युद्ध है तो उसके पीछे शांति की बेचैनी भी है, राष्ट्र है तो उसके भीतर मनुष्य भी है, परंपरा है तो उसके भीतर प्रश्न भी हैं। और इसी जगह से दिनकर की सांस्कृति की आरंभ होती है। यह सांस्कृति की किसी संस्कृति की सूची नहीं, संस्कृति को देखने की एक जीवंत दृष्टि है।

दिनकर के लिए संस्कृति संग्रहालय में रखी हुई वस्तु नहीं है। वह जीवन के बीच चलती हुई कोई नदी है, जिसमें पुरानी धाराएँ नई धाराओं से मिलती रहती हैं। उसमें वेद भी हैं, लोक भी; बुद्ध भी हैं, कबीर भी; राम और कृष्ण भी हैं, किसान और श्रमिक भी। संस्कृति उनके यहाँ अतीत का गौरवगान भर नहीं, वर्तमान की आत्मपरीक्षा भी है। इसलिए दिनकर जब भारतीय संस्कृति की ओर लौटते हैं तो केवल यह बताने के लिए नहीं लौटते कि भारत कितना महान था, बल्कि यह पूछने के लिए भी लौटते हैं कि उस महानता का मनुष्य आज कहाँ है।

‘संस्कृति के चार अध्याय’ इसी सांस्कृतिक बेचैनी की बड़ी अभिव्यक्ति है। इस पुस्तक को केवल इतिहास की पुस्तक की तरह पढ़ना दिनकर के साथ थोड़ा अन्याय होगा। यहाँ इतिहास एक बहाना नहीं, मनुष्य को समझने का माध्यम है। दिनकर भारतीय संस्कृति को किसी एक जाति, धर्म, भाषा या काल की निजी संपत्ति नहीं मानते। उनके लिए भारतीयता अनेक आगंतुक धाराओं के लंबे संसर्ग से बनी हुई चेतना है। आर्य और अनार्य, वैदिक और बौद्ध, हिंदू और मुस्लिम, शास्त्र और लोक, पुरातन और नवीन, इन सबके बीच जो संवाद, संघर्ष और समन्वय बना, उसी से भारतीय संस्कृति का रूप निर्मित हुआ।

दिनकर की सांस्कृतिकी का सबसे सुंदर पक्ष शायद यही है कि वे संस्कृति को रक्त की शुद्धता में नहीं, संपर्क की शक्ति में खोजते हैं। नदी अपनी पवित्रता इसलिए नहीं खोती कि उसमें दूसरी नदी आकर मिल गयी; कई बार उसका विस्तार उसी मिलन से होता है। भारतीय संस्कृति को समझने के लिए दिनकर इसी बहती हुई नदी की ओर देखते हैं। वे संस्कृति को बंद दरवाजे की तरह नहीं, खुले आँगन की तरह देखते हैं, जहाँ अनेक दिशाओं से आती हवाएँ एक-दूसरे को छूती हैं।

उनकी सांस्कृतिक दृष्टि में समन्वय कोई निष्क्रिय समझौता नहीं है। वह भीतर से बनने वाली एक नई रचना है। संस्कृतियाँ जब मिलती हैं तो केवल जोड़ नहीं बनता, कुछ नया जन्म लेता है। भाषा में नए शब्द आते हैं, संगीत में नई लय, भोजन में नए स्वाद, स्थापत्य में नए रूप और मनुष्य की कल्पना में नई संभावनाएँ। दिनकर इस सांस्कृतिक मिश्रण को भारतीय जीवन की कमजोरी नहीं, उसकी रचनात्मक शक्ति के रूप में देखते हैं।

इसीलिए उनकी सांस्कृतिकी में ‘समन्वय’ शब्द जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही ‘संघर्ष’ भी। संस्कृति केवल प्रेम से नहीं बनती। उसमें टकराव भी होते हैं, असहमति भी, सत्ता और समाज के बीच तनाव भी। दिनकर इस तनाव को छिपाते नहीं। वे भारतीय इतिहास को किसी एकरंगी चित्र में बदलने की कोशिश नहीं करते। उनके यहाँ संस्कृति की निर्मिति एक कठिन यात्रा है, जिसमें मनुष्य बार-बार अपने भीतर के अंधकार से भी गुजरता है।

दिनकर की दृष्टि का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है उनकी मनुष्य-केंद्रितता। वे संस्कृति को मनुष्य से अलग करके नहीं देखते। कोई समाज कितना पुराना है, उसके ग्रंथ कितने महान हैं, उसके स्मारक कितने विशाल हैं, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उस समाज ने मनुष्य के जीवन को कितना व्यापक, स्वतंत्र और गरिमामय बनाया। संस्कृति यदि मनुष्य को छोटा करती है तो उसके सारे गौरव के बावजूद उसमें कुछ मूलभूत कमी रह जाती है।

यहीं दिनकर की सांस्कृतिकी सामाजिक प्रश्नों से जुड़ती है। जाति, असमानता, शोषण, सत्ता, गरीबी और मनुष्य की गरिमा जैसे प्रश्न उनकी सांस्कृतिक चिंता के बाहर नहीं हैं। वे इतिहास के पन्नों पर संस्कृति खोजते हुए वर्तमान के चेहरे तक पहुँच जाते हैं। उन्हें अतीत में इसलिए रुचि नहीं कि अतीत बीत चुका है, बल्कि इसलिए कि वर्तमान की जड़ें वहीं कहीं धँसी हुई हैं। अतीत को समझना उनके लिए वर्तमान को समझने की एक विधि है।

दिनकर का अपना जीवन भी इस सांस्कृतिक दृष्टि की जमीन तैयार करता है। वे उस भारत से आते हैं जहाँ गाँव की मिट्टी, किसान का श्रम, लोकगीत, धार्मिक स्मृतियाँ, राष्ट्रीय आंदोलन, आधुनिक शिक्षा और बदलती राजनीतिक चेतना एक साथ उपस्थित थीं। उनके भीतर पुस्तकालय और खेत अलग-अलग संसार नहीं थे। इसलिए उनकी भाषा में शास्त्र की स्मृति और लोक की धड़कन साथ-साथ सुनाई देती है।

उनके गद्य में भी कविता की एक अंतर्धारा बनी रहती है। वे इतिहास की बात करते हैं तो केवल तथ्य नहीं रखते, उसके पीछे छिपे मानवीय अर्थ को पकड़ना चाहते हैं। उनका गद्य कई बार भाषण की ऊष्मा ले लेता है, पर उसकी मूल आकांक्षा केवल प्रभावित करना नहीं है। वह पाठक को किसी बड़े सांस्कृतिक प्रश्न के सामने खड़ा करना चाहता है। उनकी भाषा में तर्क है, लेकिन तर्क अकेला नहीं है; उसमें स्मृति, आवेग, कल्पना और नैतिक बेचैनी भी है।

यही कारण है कि दिनकर की सांस्कृतिकी को केवल ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ जैसे किसी एक राजनीतिक या वैचारिक खाने में रख देना उनके लेखन की बहुस्तरीयता को कम कर देता है। उनके यहाँ राष्ट्र की चिंता अवश्य है, लेकिन राष्ट्र उनके लिए केवल राज्य की सीमा नहीं है। वह भाषा, स्मृति, इतिहास, लोक और मनुष्य के सामूहिक अनुभव से बनता है। उनकी राष्ट्रीय चेतना का एक महत्वपूर्ण आधार सांस्कृतिक आत्मबोध है, पर यह आत्मबोध उन्हें अपने भीतर बंद करने के बजाय दूसरे सांस्कृतिक अनुभवों से संवाद की ओर भी ले जाता है।

दिनकर की संस्कृति-दृष्टि में भारतीयता कोई तैयार परिभाषा नहीं है। वह लगातार बनती हुई चीज है। शायद इसीलिए वे परंपरा को जड़ रूप में स्वीकार नहीं करते। उनके लिए परंपरा का अर्थ केवल पुराना होना नहीं है। पुराना इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने हमारे भीतर कुछ बचाकर रखा है, लेकिन जो बचा है उसे वर्तमान की आँख से देखना भी आवश्यक है। परंपरा तब जीवित रहती है जब वह प्रश्नों से गुजरती है।

यहाँ दिनकर की सांस्कृतिकी आधुनिकता से भी संवाद करती है। वे आधुनिकता को केवल पश्चिम से आयातित कोई बाहरी वस्तु नहीं मानते। आधुनिक होने का अर्थ उनके लिए अपनी ऐतिहासिक चेतना को छोड़ देना नहीं है। मनुष्य जब अपने अतीत को समझकर वर्तमान की समस्याओं से जूझता है, तभी आधुनिकता अर्थवान होती है। इस दृष्टि से दिनकर आधुनिकता और परंपरा के बीच किसी कृत्रिम युद्ध के पक्षधर नहीं दिखाई देते। वे दोनों के बीच एक रचनात्मक संबंध खोजते हैं।

उनकी संस्कृति-दृष्टि में शक्ति का प्रश्न भी बहुत गहरा है। ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘रश्मिरथी’ के कवि के यहाँ शक्ति केवल विजय का साधन नहीं है। शक्ति के साथ नैतिक प्रश्न जुड़ा हुआ है। मनुष्य के हाथ में शक्ति आते ही प्रश्न उठता है कि उसका उपयोग किसके लिए होगा। संस्कृति की वास्तविक परीक्षा शायद वहीं होती है जहाँ शक्ति और करुणा आमने-सामने आती हैं।

दिनकर की सांस्कृतिकी में करुणा और वीरता विरोधी तत्व नहीं हैं। वे वीरता को मनुष्य की रक्षा से जोड़ते हैं और करुणा को निष्क्रिय दुर्बलता में बदलने से बचाते हैं। उनके लिए संस्कृति में तेज भी चाहिए और ताप भी, स्मृति भी चाहिए और विवेक भी। केवल पराक्रम संस्कृति नहीं बना सकता और केवल करुणा भी पर्याप्त नहीं है। मनुष्य की संपूर्णता इन दोनों के बीच किसी गहरे संतुलन में निर्मित होती है।

इसीलिए दिनकर का कृष्ण भी केवल धार्मिक आस्था का कृष्ण नहीं है और कर्ण केवल महाभारत का पात्र नहीं। ये पात्र उनके लिए मनुष्य की जटिलताओं के प्रतीक बन जाते हैं। कृष्ण में नीति और कर्म की जटिलता है, कर्ण में जन्म, सम्मान, निष्ठा और नियति का संघर्ष। मिथक उनके यहाँ अतीत में बंद नहीं रहता, वर्तमान में उतर आता है। यही सांस्कृतिक पुनर्पाठ उनकी रचनात्मकता की एक बड़ी पहचान है।

दिनकर की सांस्कृतिकी का लोक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वे जानते हैं कि संस्कृति केवल राजाओं, विद्वानों और ग्रंथों से नहीं बनती। खेत में काम करता हुआ किसान, लोकगीत गाती हुई स्त्री, मेले में चलता हुआ जनसमुदाय, गाँव की बोली, पर्वों की स्मृति और पीढ़ियों से चले आते छोटे-छोटे संस्कार भी संस्कृति को बनाते हैं। संस्कृति का वास्तविक शरीर इन्हीं असंख्य अनाम मनुष्यों से निर्मित होता है।

इसलिए दिनकर की सांस्कृतिक चेतना में मिट्टी की गंध बनी रहती है। उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ वैभव है तो लोक की सहजता भी। वे बड़े ऐतिहासिक प्रश्न उठाते हैं, लेकिन उनका आधार अक्सर मनुष्य का साधारण जीवन होता है। शायद यही कारण है कि उनकी सांस्कृतिक चिंता केवल विद्वानों की चिंता बनकर नहीं रह जाती।

दिनकर को पढ़ते हुए एक बात बार-बार सामने आती है कि वे भारतीय संस्कृति को स्थिर वस्तु की तरह नहीं, गतिमान अनुभव की तरह देखते हैं। संस्कृति बदलती है, पर उसके भीतर कुछ दीर्घजीवी स्मृतियाँ बनी रहती हैं। वह अपने को बचाती भी है और बदलती भी है। उसके भीतर निरंतर चयन होता है। कुछ चीजें चली जाती हैं, कुछ बचती हैं, कुछ नए रूप में लौटती हैं। संस्कृति का जीवन इसी चयन और पुनर्रचना में है।

यहीं दिनकर की सांस्कृतिकी अपने सबसे मानवीय रूप में दिखाई देती है। वे अतीत को प्रणाम करके लौट नहीं आते; उससे बहस करते हैं। वे वर्तमान को स्वीकार करके संतुष्ट नहीं होते; उससे सवाल करते हैं। वे भविष्य को केवल स्वप्न नहीं बनाते; उसकी नैतिक शर्तों पर विचार करते हैं। उनकी सांस्कृतिक चेतना इसलिए स्मृतिमूलक होकर भी भविष्याभिमुख है।

दिनकर का महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने संस्कृति को केवल गंभीर विषय नहीं रहने दिया। उन्होंने उसे अनुभव की गर्मी दी। उनके यहाँ संस्कृति किताबों की अलमारी से निकलकर जीवन के आँगन में आती है। वह खेत में जाती है, संसद में जाती है, युद्धभूमि में जाती है, प्रेम में जाती है, भूख में जाती है, अपमान में जाती है और मनुष्य की गरिमा के प्रश्न पर आकर ठहर जाती है।

शायद दिनकर की सांस्कृतिकी का सार इसी ठहराव में है। संस्कृति आखिर किसके लिए है? मनुष्य के लिए। और मनुष्य भी केवल विजेता मनुष्य नहीं, बल्कि वह मनुष्य जो प्रेम करता है, हारता है, संघर्ष करता है, स्मृतियों को ढोता है, अन्याय से टकराता है और फिर भी किसी बेहतर जीवन की कल्पना करता है।

दिनकर की सांस्कृतिक दृष्टि में भारत इसलिए महान नहीं कि उसका अतीत महान था। भारत की सांस्कृतिक संभावना इसलिए बड़ी है कि वह अनेक अनुभवों को अपने भीतर ग्रहण करके बार-बार नया रूप लेने की क्षमता रखता है। इस क्षमता को बचाए रखना ही संस्कृति को बचाए रखना है।

दिनकर की सांस्कृतिकी अंततः किसी निष्कर्ष पर बंद नहीं होती। वह एक खुला हुआ सांस्कृतिक प्रश्न है। हमारी स्मृतियों में क्या बचेगा, हमारी परंपराओं में से क्या आगे जाएगा, हम दूसरों से क्या ग्रहण करेंगे, अपने भीतर से क्या छोड़ेंगे और मनुष्य को अपने सांस्कृतिक जीवन के केंद्र में कितना रख पाएँगे, यही प्रश्न उनके लेखन के भीतर लगातार ध्वनित होता है।

इस अर्थ में दिनकर केवल संस्कृति के व्याख्याकार नहीं हैं। वे संस्कृति के भीतर रहने वाले कवि हैं। उन्होंने इतिहास को कविता की आँख से देखा और कविता को इतिहास की स्मृति दी। उनके लिए संस्कृति न तो अतीत की राख है, न वर्तमान का शोर। वह मनुष्य की दीर्घ यात्रा में बची हुई ऊष्मा है, जिसे हर पीढ़ी को अपने समय की हवा में फिर से पहचानना पड़ता है।

दिनकर की सांस्कृतिकी का सबसे सुंदर पक्ष शायद यही है कि वह हमें संस्कृति पर गर्व करना नहीं, संस्कृति के प्रति सजग होना सिखाती है। गर्व कई बार आँखें बंद कर देता है; सजगता उन्हें खोलती है। दिनकर की आँखें खुली हुई आँखें हैं। वे अपने अतीत को देखते हैं, उसके वैभव को पहचानते हैं, उसकी विडंबनाओं को भी देखते हैं और फिर मनुष्य की ओर लौट आते हैं। संस्कृति की अंतिम कसौटी, उनके समूचे रचनात्मक संसार को पढ़ते हुए, यही मनुष्य है। और शायद यहीं दिनकर की सांस्कृतिकी अपनी सबसे बड़ी मानवीय चमक प्राप्त करती है।


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