
महात्मा गांधी अर्थात् भारत की सामान्यजन-चेतना, समष्टिजन-चेतना, सर्वजन-चेतना और भारत के सामाजिक जीवन की अविच्छिन्न-निरंतरता। यह ठीक है कि गांधी एक व्यक्ति थे, किन्तु व्यक्ति का क्या? व्यक्ति तो करोड़ों और अरबों-खरबों ही हैं, पहले भी हुए हैं, फिर गांधी पर ही नजर क्यों टिकती है? अनुयायी हों या विरोधी, सभी की चर्चा के केंद्र में गांधी क्यों रहते हैं? वास्तव में जब कोई महात्मा गांधीव्यक्ति अपने को सर्वजन-चेतना से अभिभूत कर लेता है, जब व्यक्ति-चेतना अथवा अहंता-ममता की बर्फ पिघलकर जलधारा बन जाती है, तब व्यक्ति, व्यक्ति नहीं रहता, वह कोटि-कोटि जन की अभिव्यक्ति बन जाता है। वास्तव में गांधी व्यक्ति नहीं रह गए थे, वे समष्टिचेतना बन गए थे, भारत के लोकजीवन की मूल्यप्रणाली, विश्वासप्रणाली, विचारप्रणाली और अभिव्यक्तिप्रणाली का युगावतार! गांधी एक व्यक्ति ही नहीं हैं, एक दर्शन हैं। भारत की जो विचारधाराएं सहस्राब्दियों से लोकजीवन में प्रवाहित हो रही हैं, उनका परिपाक गांधी हैं। बापू ऐसा मानते थे कि राष्ट्रीय जीवन की समस्त गतिविधियां जनोन्मुख हों, बोली और भाषा का जनतंत्र, संस्कृतियों का जनतंत्र। विशेष से साधारण की ओर गतिशील बने। यदि लोकतंत्र की आत्मा लोकचेतना है, तो भारत के संविधान की आत्मा है—सत्य। आजादी के आंदोलन में गांधी जी ने जनता को अपने साथ लिया, सत्य का अहिंसात्मक आग्रह, सविनय अवज्ञा। बापू और जनता के बीच विश्वास का सूत्र था—सत्य। यदि हम ‘सत्यमेव जयते’ को संविधान से अलग कर दें तो संविधान अन्यथा सिद्ध हो जाएगा। सत्याग्रह-दर्शन विश्वमानवता को प्रकाश देगा! जो सत्य-अहिंसा की विचारप्रणाली को नहीं समझता, वह भारत को कैसे जान सकेगा? गांधी व्यक्ति से विचार बन चुके थे, युग बन चुके थे—गांधी-युग। प्रेमचंद और दूसरे साहित्यकार हों, या चित्रकार, कलाकार, विचारक या शिक्षाविद—सभी के कृतित्व पर उस युग का प्रभाव हुआ। गांधी को युगावतार के रूप में नमन किया जाता है! वे लोकमानस में आज भी रसे-बसे हैं! तभी सोहनलाल द्विवेदी के कंठ से स्वर फूटा था— चल पड़े जिधर दो डग, मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गए कोटि दृग उसी ओर; जिसके सिर पर निज धरा हाथ, उसके सिर रक्षक कोटि हाथ जिस पर निज मस्तक झुका दिया, झुक गए उसी पर कोटि माथ। हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु! हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!
सामान्यजन-तत्व उनके व्यक्तित्व में इतनी गहराई तक रमा हुआ था कि वे असामान्य बन गए! उनकी मृत्यु के बाद युग के महान वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था कि—”आने वाली पीढ़ियां विश्वास ही नहीं कर सकेंगी कि गांधी नाम का व्यक्ति इस धरती पर उसी प्रकार चलता-फिरता था, जिस प्रकार सामान्य जन चलते-फिरते हैं, उसी तरह बातचीत करता था, जिस प्रकार सामान्यजन बातचीत करते हैं, उसका व्यक्तित्व और वेशभूषा उसी प्रकार की थी, जिस प्रकार आम-जन की होती है।”
भारत की सामान्य जनता की निष्ठा के संबंध में महात्मा गांधी ने एक बार यूरोप के एक पत्रकार से बात की! पत्रकार रेवरेंड माट् ने पूछा कि—”श्रीमान! सार्वजनिक जीवन में आपको आशा और निराशा दोनों ही होती होंगी। आपको किस बात से आश्वासन मिला और किस बात से निराशा हुई?” महात्मा गांधी ने उत्तर दिया—”भारत की सामान्य जनता बहुत कष्ट में जीवन व्यतीत कर लेती है, किन्तु अहिंसा की वृत्ति को नहीं छोड़ती! इससे मुझे आश्वासन मिला है।” महात्मा गांधी ने कहा कि निराशा की बात यह है कि शिक्षित लोगों के हृदय में दया भाव का स्रोत सूखता जा रहा है, इससे मुझे चिंता होती है!
2 अप्रैल, 1947 को दिल्ली में एक इंटर एशियन रिलेशंस कान्फ्रेंस हुई थी, जिसमें महात्मा गांधी ने जो भाषण दिया था, उसमें आपको उसी भारतीय लोकचेतना का स्वर सुनाई देगा! गांधी जी ने कहा कि—”आप सभी दोस्तों ने जो भारत है, उसे वाकई नहीं देखा है। यह कांफ्रेंस भी असल भारत में नहीं हो रही है। दिल्ली, बॉम्बे, मद्रास, कलकत्ता, लाहौर—बड़े शहर होने की वजह से ये सभी पश्चिम से प्रेरित हैं।” उन्होंने एक कहानी सुनाई—एक बार की बात है, फ्रांस के तीन वैज्ञानिक सत्य की खोज में निकले। तीनों एशिया के अलग-अलग हिस्सों में चले गए। इनमें से एक वैज्ञानिक ने भारत में अपनी खोज जारी रखी। वह उस वक्त के तथाकथित शहरों में गया। यह अंग्रेजों और मुगलों के आधिपत्य से पहले की बात है। उसने यहां के कथित ऊंची जाति के लोगों, पुरुषों व महिलाओं को देखा। मगर उसे संतुष्टि नहीं मिली। अंत में थक-हार कर वह एक साधारण-सी कुटिया में जा पहुंचा। वहां उसे उस सत्य के दर्शन हुए, जिसकी उसे लंबे समय से तलाश थी। गांधीजी ने कहा कि—”अगर आप वाकई भारत को देखना चाहते हैं, तो आपको यहां के गांवों में बसे दलितों के बेहद साधारण-से घरों में आना होगा। यहां ऐसे सात लाख गांव हैं, जिनमें अड़तीस करोड़ लोग रहते हैं। इस भारत को मैंने खुद अपनी आंखों से देखा है। मैंने भारत की एक छोर से दूसरे छोर तक यात्रा की है। मुरझाई आंखों से मैंने यहां मनुष्यता की दयनीय तस्वीर देखी है। भारत यहीं बसता है। गोबर से सनी इन मामूली झोपड़ियों में मिलते हैं वे दलित, जिनमें मिलेगा आपको खांटी ज्ञान। लोकतंत्र और निर्धनतम लोगों के जागरण के इस दौर में आप पूरी ताकत से इस संदेश को फैला सकते हैं।”
गांधी लोक में रमे और ऐसे रमे कि भारत के लोकमन बन गए! लोक ने गांधी में अपना ही अधिष्ठान किया और इसी अधिष्ठान के सहारे भारतीय लोकतंत्र के सपने बुने थे! महात्मा गांधी भारत का मूर्तिमान लोकमन हैं। भारत की मूर्तिमान मेधा हैं। सचाई, ईमानदारी, सादगी, समानता, भाईचारा, लोकमंगल, विश्वशांति आदि लोकजीवन के मूल्य जैसे महात्माजी के रूप में जीवंत हो गए थे! गांधी ने भारत के लोकजीवन का प्रत्यक्ष दर्शन और अनुभव किया था! गांधी ने भारत को जानने के लिए, भारत को पाने के लिए भारत की पैदल-पैदल यात्रा करते हुए लोकमन से तादात्म्य की साधना की और लोकमानस में जगह बनाई थी। लोक को जगाया था, लोक के विश्वास को जगाया था और लोक का विश्वास जीता था! लोक ने भी उनको विश्वास दिया था! 6 जुलाई, 1944 को आज़ाद हिंद फौज रेडियो से सुभाषचंद्र बोस ने एक पत्र महात्माजी के नाम प्रसारित किया था, उसमें उन्होंने महात्माजी कह कर संबोधित किया और उन्हें लोकजागरण का प्रतीक बताया! कहा कि भारत और भारत के बाहर रहनेवाले भारतीयों की दृष्टि में आप हमारे देश के वर्तमान जागृति के जनक हैं। लोकजागरण ही तो था जिसके कारण सुभाष चंद्र बोस ने अपने संदेश में उनको राष्ट्रपिता कहा! भारत के लोकमानस को जितनी गहराई से गांधी ने पहचाना था, भारत के लोकमानस ने उतनी ही गहराई से महात्मा गांधी को स्वीकार कर लिया। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि भारत की लोकचेतना महात्मा गांधी के रूप में साकार हो गई! लोकमन की इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति गांधी के रूप में चरितार्थ हुई! सचाई यह है कि भारत के लोकमानस ने ही गांधी को सिरजा था और फिर गांधी के रूप में भारत के लोकमानस ने अपने को ही पा लिया था! आप भले ही यूं कहें कि गांधी नए भारत की लोकचेतना हैं!
गांधी लोकजीवन को इतना उद्वेलित नहीं कर पाते यदि वे स्वयं ही सामान्यजन न बन गए होते! वे तो बैरिस्टर थे, लेकिन सामान्यजन के बीच घुलमिल जाने के लिए उन्होंने सिर के बाल हटा दिए, आधी धोती पहन ली और आधे से शरीर को ढक लिया! पैरों में चप्पल डाल ली! सामान्यजन की वह असामान्यता कि गोलमेज सम्मेलन असफल हो गया, होना ही था, किन्तु उस दौरान सम्राट पंचम जॉर्ज ने बर्किंघम पैलेस में विशाल भोज दिया। दो हजार मेहमान थे, जिनमें राजनयिक थे, लार्ड थे तथा भारत के राजा, महाराजा और नवाब—लोग बड़े ठाठ-बाठ से सजे-धजे खड़े हुए, हीरे और जवाहरातों की नुमाइश कर रहे थे। उस वैभवशाली समारोह में उन सभी महिमाशाली लोगों ने देखा कि—घुटनों तक धोती बांधे, सफेद दुपट्टा डाले, बड़े गौरव के साथ एक सामान्य आदमी आ रहा है। सभी की नजर उस धोतीवाले पर ही जा टिकी। थोड़ी देर में पंचम जॉर्ज आए, उन्होंने चारों ओर देखा और उस सामान्यजन के पास आकर खड़े हो गए। सम्राट कुछ देर तक तो उन्हें देखते रहे, फिर बोले कि—”आप अफ्रीका में तो हमारे मित्र थे, मैं नहीं समझ पाया कि अब आप हमारे विरुद्ध कैसे हो गए?” बापू ने उन्हें देखा और मुस्करा दिए! सम्राट फिर बोले—”मैं आपको चेतावनी देता हूँ कि आपने भारत में गड़बड़ी की और मेरी सरकार के साथ सहयोग नहीं किया तो वहाँ मेरी सेना उपद्रवियों को उड़ा देगी।” यह बात इतनी धीरे से कही गई थी कि वहाँ खड़ी हुई सरोजिनी नायडू ने ही सुनी। गांधी उस समय तो मुस्करा दिए, किन्तु जब प्रतिनिधियों की सबसे बड़ी समिति की बैठक हुई तो वे बोले—”भारत में मेरे बच्चे ब्रिटिश बमों को केवल पटाखे समझते हैं।”
बापू के समस्त लेखन में, संपूर्ण वक्तृता में सर्वजन और सामान्यजन का भाव है। गांधी-साहित्य का हम जितना अध्ययन करेंगे, यह बात उतने ही व्यापक रूप में स्पष्ट हो जाएगी। क्यों उन्होंने चरखे को अपने आंदोलन का केन्द्र बनाया? और क्यों वह चरखा भारत के लोकमानस की इतनी गहराई में उतर गया कि देश के विभिन्न जनपदों में हजारों लोकगीत चरखे से जुड़े हुए हैं? भारत की विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं के लोकगीतों में गांधी मौजूद हैं! गांधी स्वयं लोकगीतों की महिमा समझते थे! देवेंद्र सत्यार्थी से उन्होंने कहा था—”लोकगीतों में धरती गाती है, पहाड़ गाते हैं!” उन्होंने देवेंद्र सत्यार्थी को लोकगीतों के संकलन के लिए भारत-भ्रमण की प्रेरणा दी थी! गांधी का चिंतन स्वदेशी पर आधारित था, दरिद्र-नारायण या उस अंतिम-व्यक्ति की सुध-बुध लेना उनके ही वश की बात थी। बापू के प्रिय भजन की मूल चेतना ही दायरों का अस्वीकार है—”रघुपति राघव राजाराम, पतित-पावन सीताराम। ईश्वर-अल्ला तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान!”
गांधी स्वयं ही सामान्यजन और समष्टिजन बन गए। क्यों उन्होंने चरखे को अपने आंदोलन का केंद्र बनाया? और क्यों चरखा भारत के लोकमानस में इतनी गहराई में रच-बस गया? भारत के विभिन्न जनपदों के हजारों-हजारों गीतों में चरखा चल रहा है। भारत के हजारों-हजारों ही लोकगीतों में महात्मा गांधी अवतरित हो चुके हैं। गांधी स्वयं भी तो लोकगीतों की महिमा समझते थे। देवेंद्र सत्यार्थी को उन्होंने लोकगीतों की अभ्यर्थना के लिए भारत-भ्रमण की प्रेरणा दी थी। जब देवेंद्र सत्यार्थी का लोकगीत-संग्रह तैयार हो गया तो बोले—”लोकगीतों में धरती गाती है, पहाड़ गाते हैं।” उस संकलन का नाम बन गया—”धरती गाती है!”
मोरे चरखा कै टूटे न तार, चरखा चालू रहे गांधी महतमा दूल्हू बने हैं, दुल्हिन बनी सरकार, चरखा चालू रहे। चंदन काठ के बना है म्याना, खादी पड़ी है ओहार, चरखा चालू रहे। सगरे सुराजी बने हैं बराती, पुलिस बनी है कहार, चरखा चालू रहे।
यदि हम महात्मा गांधी के सत्याग्रह दर्शन के सूत्रों को लोकवार्ता, लोककथा और लोकगीतों में देखने का प्रयास करें तो ऐसे शत-शत सूत्र हमें मिल जाएंगे! उदाहरण के लिए सुरही गीत है—कजरीवन से चलकर सुरही नंदनवन में चरने चली गई। वहां ऊंची पूंठरी पर सिंह बैठा था। वह बोला—”री गाय! तैने मेरे द्वारा संरक्षित वन में प्रवेश किया है, अब मैं तुझे नहीं छोड़ूंगा!” सुरही बोली—”खिरक रंभावे मेरे बाछरा हो माय! एक बच, दो बच, तीन बच भरि जाऊं! बचनन की बींधी सुरही ना रहे हो माय! रे सिंह! खिरक में मेरा छोटा सा बछड़ा रंभा रहा होगा। मैं तुझे वचन देती हूं, उसे एक बार दूध पिलाकर मैं लौट आऊंगी। तू मुझे खा लेना।” सिंह ने सोचा—”सुना है कि गाय बड़ी सरल और सच्ची होती है, परमार्थी होती है। एक बार गाय की परीक्षा ही सही!” गाय खिरक में आई! उसने अपने बछड़े से कहा—”आ वत्स, अंत में एक बार तू मेरा दूध पी ले, मैं सिंह को लौटने का वचन दे चुकी हूं, तो लौटना तो है।” बछड़ा बोला—”यदि ऐसी ही बात है तो, बचनन कौ बींधौ दूधा ना पियें हो माय! आगे-आगे बालक बछरे, पीछे सुरही गाय! बचनन की बींधी सुरही आई है हो माय!” सिंह ने देखा तो अचरज में डूब गया। सुरही बोली—”रे सिंह, अब तू मुझे खा ले!” तभी बछड़ा बोला—”आओ रे मेरे सिंह मामा, पहले भक्खो मोय, ता पीछे माये बिनासिये हो माय। सिंह मामा, मां को बाद में खाना, पहले मुझे खा जाओ।” सिंह का मन बदल गया। वह उन्हें लेकर अपनी रानी के पास गया—”आओ री मेरी सिंहिन रानी, पूजौ इनके पांय! यह तो बहन, मेरा भानजा हो माय!” लोकमानस में यह सत्य की शक्ति है, जो हिंसक के मन को भी बदल सकती है, उसे परास्त कर सकती है! यह सुरही गाथा केवल ब्रज में ही नहीं है, हरियाणा, बुंदेली, राजस्थानी, गुजराती, मगही, भोजपुरी से होते हुए कर्नाटक तक गाई जाती है! श्री देवेंद्र सत्यार्थी ने इसे अहिंसा का राष्ट्रगान कहा था। ~~
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