महात्मा गांधी के जन्मदिन पर!

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Mahatma Gandhi

धर्म की तीन मंज़िलें-मैं धर्म को अक्सर एक तीन-मंज़िला इमारत की तरह देखती हूँ। इस इमारत का सबसे निचला हिस्सा—बेसमेंट—अंधकार में है। वहाँ हिंसा है, क्रूरता है, नफरत है, द्वेष है, घृणा है। वहाँ मनुष्य अपने धर्म को दूसरों के विरुद्ध खड़ा करता है और अपने विश्वास को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए दूसरे को छोटा करने लगता है।

फिर आता है ग्राउंड फ्लोर।
यहाँ पूरब है, पश्चिम है; मंदिर हैं, मस्जिदें हैं, गुरुद्वारे हैं और चर्च हैं। यहाँ भगवा है, हरा है, सफेद है, पीला है। यहाँ धार्मिक प्रतीक हैं, परंपराएँ हैं, संस्कार हैं और धार्मिक ग्रंथ हैं। यह धर्म का वह रूप है जिसे हम बाहर से आसानी से पहचान सकते हैं—उसके नाम, वेश, प्रतीक और संस्थाओं से।

लेकिन इस इमारत की पहली मंज़िल कुछ और ही है।
वह सुवासित है, प्रकाश से भरी हुई है। वहाँ करुणा है, क्षमा है, दया है, प्रेम है और सर्वधर्म-समभाव है। वहाँ धर्म मनुष्य को दूसरे मनुष्य से अलग नहीं करता, बल्कि उसके भीतर एकता का अनुभव पैदा करता है।

मुझे लगता है कि बेसमेंट में रहने वाला व्यक्ति पहली मंज़िल पर रहने वाले व्यक्ति को समझ ही नहीं पाता।
उसके लिए प्रेम कमजोरी हो सकती है, क्षमा कायरता और अहिंसा असंभव आदर्श। वह यह समझ ही नहीं पाता कि कोई व्यक्ति अपने धर्म से गहरा प्रेम करते हुए भी दूसरे धर्म के प्रति उतना ही सम्मान और प्रेम कैसे रख सकता है।
शायद इसी कारण गोडसे गांधी को नहीं समझ पाया।
और इतिहास में ऐसा केवल गांधी के साथ नहीं हुआ। बुद्ध, ईसा और सुकरात जैसे महापुरुषों को भी अपने समय के लोगों ने उनकी ऊँचाई से नहीं, अपनी सीमित दृष्टि से समझने की कोशिश की।
जब दृष्टि छोटी होती है, तो ऊँचाई दिखाई नहीं देती।

मेरा जन्म एक वैष्णव परिवार में हुआ। बचपन से ही साधु-संतों को पढ़ने और उनके विचारों को जानने का अवसर मिला। उसी यात्रा में मुझे इस अद्भुत महात्मा को जानने का अवसर मिला, जो अपने स्वधर्म से बेपनाह प्रेम करता था, लेकिन दूसरे धर्मों के प्रति भी उतना ही आदर और प्रेम रखता था।

गांधी के लिए धर्म किसी एक संप्रदाय की संपत्ति नहीं था।
उनकी दृष्टि में मंदिर में जाने वाला हो या मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वाला, गुरुद्वारे में माथा टेकने वाला हो या चर्च में प्रार्थना करने वाला—सभी मनुष्य उसी एक परम सत्ता की संतान हैं।
इसलिए गांधी का धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं था। धर्म उनके लिए सत्य था, अहिंसा था, परहित था, सेवा थी, करुणा थी और सबसे बढ़कर प्रेम था।

शायद धर्म की असली परीक्षा भी यही है।
हम किस धर्म के हैं, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह कि हम उस धर्म के कारण कैसे मनुष्य बने हैं।
यदि हमारा धर्म हमें दूसरे से घृणा करना सिखाता है, तो हम अभी बेसमेंट में हैं।
यदि हमारा धर्म हमें केवल अपने प्रतीकों और पहचान से जोड़ता है, तो हम अभी ग्राउंड फ्लोर पर हैं।
लेकिन जब धर्म हमें सत्य, करुणा, क्षमा, सेवा और प्रेम तक ले जाता है—तभी हम उसकी पहली मंज़िल पर पहुँचते हैं।
और हमारे महात्मा इसी पहली मंज़िल के निवासी थे।


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