— परिचय दास —
गिरधर राठी का अस्सीवाँ वर्ष किसी कैलेंडर पर चढ़ी हुई एक संख्या भर नहीं है। यह उस कवि की यात्रा का एक पड़ाव है जिसने समय को केवल जिया नहीं, उसे पढ़ा भी है। राठी के यहाँ उम्र का अर्थ बीतते वर्षों का हिसाब नहीं, बल्कि अनुभव की उन परतों का खुलना है जिनमें कविता, समाज, राजनीति, मनुष्य और भाषा एक-दूसरे को पहचानते हैं। पचहत्तर पर पहुँचा कवि इसलिए वृद्ध नहीं होता; वह अपने समय का अधिक गहरा पाठक हो जाता है।
गिरधर राठी की कविता में एक खास तरह की सजगता है। वे शब्दों को केवल सजाते नहीं, उनसे सवाल करते हैं। उनकी कविता में सौंदर्य है, लेकिन वह सौंदर्य आँख मूँदकर प्रसन्न होने वाला सौंदर्य नहीं। उसके भीतर अपने समय की खरोंचें हैं। वहाँ मनुष्य अपनी उपलब्धियों के बीच स्वयं से भी पूछता दिखाई देता है कि आखिर उसने बनाया क्या और खोया कितना। राठी की कविता का यह आत्मसंवादी स्वभाव उसे महज वक्तव्य बनने से बचाता है।
उनकी काव्य-दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण गुण है कि वह बड़े प्रश्नों को छोटे अनुभवों में पकड़ती है। इतिहास जब मनुष्य के घर में प्रवेश करता है तो वह नारे की तरह नहीं आता, वह किसी परिचित चेहरे, किसी चुप्पी, किसी स्मृति या किसी मामूली-सी वस्तु के रूप में आता है। राठी की संवेदना इसी मामूली में असामान्य को पहचानती है। उनकी कविता में दुनिया बड़ी है, लेकिन मनुष्य उससे छोटा होकर गायब नहीं होता।
राठी के साहित्य का एक दूसरा आकर्षण उनकी बौद्धिक बेचैनी है। वे किसी एक विचारधारा की सुविधाजनक छत के नीचे लंबे समय तक बैठे रहने वाले लेखक नहीं हैं। उनके लिए विचार जीवन को समझने का उपकरण है, जीवन पर ताला लगाने की चाबी नहीं। इसलिए उनकी रचनात्मकता में प्रश्न बचा रहता है। यह प्रश्नाकुलता ही उनकी आधुनिकता का एक महत्त्वपूर्ण आधार है।
राठी की भाषा ध्यान खींचती है। वह न तो शब्दों की आतिशबाजी करती है, न अर्थ को इतना साधारण बनाती है कि वह तुरंत समाप्त हो जाए। उनकी भाषा में एक संयमित चमक है। वे जानते हैं कि कविता में बहुत कुछ कहा हुआ शब्दों से बाहर भी रहता है। इसीलिए उनकी पंक्तियों के बीच की चुप्पी भी अर्थवान होती है। अच्छे कवि की पहचान शायद यही है कि कविता समाप्त होने के बाद भी उसका अर्थ पाठक के भीतर चलता रहे।
उनकी साहित्यिक यात्रा को देखते हुए पत्रकारिता और सार्वजनिक बौद्धिकता को भी अलग करके नहीं देखा जा सकता। राठी उन लेखकों में हैं जिनके लिए साहित्य पुस्तकालय की अलमारी में रखी हुई वस्तु नहीं, सार्वजनिक जीवन से संवाद करने की एक विधि है। वे अपने समय से असहमति भी रखते हैं और उसके भीतर उपस्थित मनुष्य को समझने की कोशिश भी करते हैं। यह द्वंद्व उनकी रचनात्मकता को जीवंत बनाता है।
अस्सी की उम्र में राठी को पढ़ना इसलिए भी दिलचस्प है कि यहाँ पीछे मुड़कर देखने और आगे देखने की दो दिशाएँ एक साथ उपस्थित हैं। स्मृति उन्हें अतीत में ले जाती है लेकिन दृष्टि वर्तमान पर टिकी रहती है। वे उन कवियों में हैं जिनके लिए अतीत कोई संग्रहालय नहीं और भविष्य कोई चमकीला विज्ञापन नहीं। दोनों वर्तमान के भीतर ही उपस्थित हैं।
राठी की साहित्यिक उपस्थिति का सबसे सुंदर पक्ष शायद उनकी मनुष्यता है। बड़े वैचारिक प्रश्नों के बावजूद उनकी रचना अंततः मनुष्य के पास लौटती है। सत्ता, इतिहास, राजनीति, व्यवस्था और विचारधारा के बीच वे उस व्यक्ति को खोजते हैं जिसकी आवाज सबसे आसानी से दब जाती है। कविता की नैतिकता यहीं बनती है। वह केवल सुंदर वाक्य नहीं रचती, वह मनुष्य के पक्ष में खड़ी होती है।
अस्सी के राठी को इसलिए केवल जन्मवर्षों से नहीं, अर्जित विवेक से पढ़ना चाहिए। उनके पास पीछे छूटा हुआ समय है, वर्तमान की बेचैनी है और भविष्य के प्रति एक ऐसी जिज्ञासा है जो अभी समाप्त नहीं हुई। साहित्य में दीर्घ जीवन का असली अर्थ भी शायद यही है कि लेखक अपने समय से बूढ़ा न हो।
राठी की अस्सीवीं उम्र में उनके भीतर का कवि अभी भी प्रश्न पूछता है। और जब कोई कवि पचहत्तर पर भी प्रश्न पूछ रहा हो, तब समझना चाहिए कि उसकी यात्रा पूरी नहीं हुई है। उम्र वहाँ केवल देह की होती है; कविता की उम्र हर पाठ के साथ फिर से शुरू होती है।
इस अर्थ में ‘अस्सी के राठी’ किसी जन्मदिन का अभिनंदन नहीं, एक जीवित साहित्यिक चेतना का उत्सव है। राठी ने समय को जितना देखा है, उससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्होंने उसे किस तरह देखा है। उनकी दृष्टि में कविता जीवन का अलंकार नहीं, जीवन को पहचानने की एक कठिन और सुंदर प्रक्रिया है। अस्सी पर खड़े राठी इसी प्रक्रिया के अब भी यात्री हैं।
गिरधर राठी की कविताओं की बारीकी उनके कथ्य से अधिक उनके कहने के ढंग में दिखाई देती है। वे कविता को किसी ऊँचे मंच पर खड़ा करके बोलते नहीं, उसे जीवन के बीच बैठाकर धीरे-धीरे बोलने देते हैं। उनकी कविता में बहुत कुछ ऐसा है जो पहली निगाह में साधारण लगता है, किंतु थोड़ा ठहरकर पढ़ने पर उसके भीतर समय की एक महीन हलचल सुनाई देने लगती है।
राठी की कविता का संसार रोजमर्रा की वस्तुओं, अनुभवों और स्थितियों से बना है। मगर वे रोजमर्रा को केवल दर्ज नहीं करते। उसकी सतह के नीचे छिपी हुई विडंबना को टटोलते हैं। एक सामान्य-सा दृश्य अचानक अपने भीतर सामाजिक अर्थ खोल देता है। एक मामूली-सा व्यवहार मनुष्य और व्यवस्था के संबंध की ओर संकेत करने लगता है। यही वह जगह है जहाँ राठी की कविता अपनी असली चमक पाती है।
उनकी कविता सीधे निष्कर्ष नहीं सुनाती। वह एक दृश्य रखती है, फिर उसके भीतर कोई हल्की-सी दरार खोल देती है। पाठक को उस दरार से अर्थ तक पहुँचना पड़ता है। यही उनकी कविता की व्यंजना का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। राठी के यहाँ मौन भी भाषा का हिस्सा है। पंक्ति जहाँ समाप्त होती है, अर्थ वहाँ समाप्त नहीं होता। कविता आगे पाठक के भीतर चलती रहती है।
राठी की भाषा में एक तरह की संयमित सफाई है। वे शब्दों को सजाने के लिए शब्द नहीं रखते। उनकी भाषा बोलचाल के निकट रहती है, लेकिन बोलचाल की सपाटता में नहीं गिरती। साधारण शब्दों को ऐसी जगह रख देते हैं कि वे अचानक असाधारण अर्थ देने लगते हैं। उनकी कविता की काव्यात्मकता अलंकारों से नहीं, अर्थ की हल्की-सी करवट से बनती है।
उनका व्यंग्य भी इसी बारीकी का हिस्सा है। वह हथौड़े की तरह नहीं पड़ता, सुई की तरह चुभता है। राठी किसी विसंगति पर सीधे उँगली रख सकते हैं, लेकिन उनकी कविता अक्सर उसे थोड़ी दूरी से दिखाती है। पाठक पहले मुस्कराता है, फिर उस मुस्कान के भीतर छिपी बेचैनी को पहचानता है। यही व्यंग्य की परिपक्वता है।
राठी की राजनीतिक चेतना कविता को नारे में बदलने से बचाती है। उनके यहाँ राजनीति केवल संसद, सत्ता या दलों की भाषा नहीं है। वह मनुष्य के रोजमर्रा के जीवन में प्रवेश कर चुकी व्यवस्था है। वह संबंधों में, भाषा में, भय में, सुविधा में और चुप्पी में दिखाई देती है। राठी उस अदृश्य राजनीति को पकड़ते हैं। इसलिए उनकी कविता तत्कालीन संदर्भ से निकलकर व्यापक मानवीय अनुभव तक पहुँचती है।
उनकी कविताओं में ‘मैं’ भी निजी होकर अकेला नहीं रहता। व्यक्तिगत अनुभव धीरे-धीरे सामाजिक अनुभव में बदल जाता है। कवि अपने भीतर उतरता है तो अपने समय तक पहुँच जाता है। यही कारण है कि राठी की आत्मपरकता आत्ममुग्ध नहीं है। उसमें अपने को देखने के साथ-साथ अपने समय को देखने की बेचैनी भी है।
राठी की काव्य-दृष्टि में विडंबना एक गहरी अंतर्धारा की तरह बहती है। मनुष्य जिस चीज को उपलब्धि समझता है, वही कभी-कभी उसके भीतर किसी कमी का संकेत बन जाती है। आधुनिकता सुविधा देती है और अकेलापन भी। विकास रास्ते बनाता है और कुछ पुराने रास्ते मिटा देता है। सभ्यता का उजाला अपने साथ कुछ छायाएँ भी लेकर आता है। राठी इन विरोधों को किसी दार्शनिक घोषणा में नहीं बदलते, उन्हें जीवन की छोटी-छोटी स्थितियों में पकड़ते हैं।
उनकी कविता में विराम और मौन का भी अपना सौंदर्य है। जो कहा गया है, उतना ही महत्त्वपूर्ण वह भी है जो नहीं कहा गया। पंक्ति का ठहराव, अचानक समाप्ति और छोटी-सी चुप्पी अर्थ को पाठक के भीतर आगे बढ़ाती है। उनकी कविता भाषा पर भरोसा करती है, लेकिन भाषा की सर्वशक्तिमत्ता पर नहीं। हर अनुभव शब्दों में पूरा नहीं उतरता, इसलिए कविता में एक अनकहा हिस्सा बचा रहता है। वही अनकहा उसकी ललितता को गाढ़ा करता है।
गिरधर राठी की कविता का ‘मैं’ निजी और सार्वजनिक के बीच एक पुल की तरह है। वह केवल आत्मकथ्य नहीं बनता, अपने समय का नागरिक भी बन जाता है। निजी स्मृति सामाजिक स्मृति में बदलती है और व्यक्तिगत बेचैनी धीरे-धीरे सामूहिक बेचैनी का रूप ले लेती है। फिर भी कविता घोषणापत्र नहीं बनती। यही संयम उसे साहित्य बनाता है।
राठी की कविता पाठक से थोड़ा धैर्य माँगती है। वह तुरंत चमत्कृत करने के बजाय धीरे-धीरे खुलती है। उसकी चमक आतिशबाजी की नहीं, दीपक की है। पहली दृष्टि में वह केवल प्रकाश देती है, थोड़ी देर बाद मालूम होता है कि उस प्रकाश में कमरे की कितनी चीजें दिखाई देने लगी हैं।
गिरधर राठी की कविता बड़ी बात को छोटा करके कहने और छोटी बात के भीतर बड़ी बेचैनी जगा देने की कला है। उनकी बारीकी शब्दों में कम, शब्दों के बीच के तनाव में अधिक है। पचहत्तर के राठी को पढ़ना इसलिए एक ऐसे कवि से मिलना है जिसने समय को केवल देखा नहीं, उसकी महीन आवाजों को सुना है। उनकी कविता में जीवन का शोर कम और उसकी प्रतिध्वनि अधिक है। यही उनकी काव्य-प्रतिभा की सबसे सुंदर पहचान है।
लेकिन कहाँ है जवाब ?
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~ गिरधर राठी
बातें बेलाग हैं
सवाल दो-टूक–
कटे हुए जंगल
जलती हुई औरतें
ख़ाक छानते बच्चे
लुरियाते जवाँ-मर्द…
रंग हैं पहचाने
रौशनी अधुंधली–
भीनी-भीनी जूठन की पत्तलें
लपकते इंसान
चुंधियाती आँखें
और कुछ प्रवाल-द्वीप…
(और एक ऎसी ही लम्बी फ़ेहरिस्त
छटाएँ गहरी हल्की रंगारंग बदरंग
जटिलतम गुत्थियाँ
सरल-कठिन रेशे)।
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