
— Manoj abhigyan —
भारत में किसी बच्चे के डॉक्टर या इंजीनियर बनने की कहानी को थोड़ा उलटकर देखें तो बच्चे की मेहनत के अलावा एक और चौंकाने वाला दृश्य दिखाई देता है। लाखों बच्चे परीक्षा देते हैं और कुछ हजार या कुछ लाख सीटों तक पहुंचते हैं। इंजीनियरिंग में देश के पास इतनी सीटें हैं कि बड़ी संख्या में सीटें खाली रह जाती हैं, फिर भी आईआईटी की एक सीट के लिए असाधारण होड़ है। मेडिकल में भी एमबीबीएस की कुल सीटें बढ़ी हैं, लेकिन सरकारी सीट अभी भी इतनी दुर्लभ है कि लाखों परिवार उसके पीछे अपनी पूरी आर्थिक और भावनात्मक ताकत लगा देते हैं। इसका अर्थ है कि भारत में समस्या सीटों की उतनी बड़ी नहीं है। असल समस्या यह है कि सभी सीटों का सामाजिक और आर्थिक मूल्य एक जैसा नहीं है।
इंजीनियरिंग का उदाहरण लीजिए। एक तरफ देश में बीटेक और बीई की लाखों सीटें हैं, दूसरी तरफ आईआईटी की एक सीट के लिए जेईई देने वालों की संख्या कई गुना है। अगर हर इंजीनियरिंग कॉलेज में लगभग समान स्तर की पढ़ाई, प्रयोगशाला, शिक्षक, उद्योग से संपर्क और नौकरी की संभावना होती, तो आईआईटी की एक सीट के लिए इतनी बेचैनी पैदा ही नहीं होती। बच्चे इंजीनियरिंग की सीट नहीं, ऐसी सीट खरीदना चाहते हैं जिसकी डिग्री नौकरी के बाजार में ज्यादा कीमत रखती हो।
यही बात मेडिकल शिक्षा में और अधिक स्पष्ट है। सरकारी मेडिकल कॉलेज की सीट का अर्थ है अपेक्षाकृत कम फीस में डॉक्टर बनने का अवसर। इसके मुकाबले महंगे निजी मेडिकल कॉलेज की सीट आर्थिक रूप से पूरी तरह अलग चीज है। इसलिए दो छात्रों का नीट में एक जैसा प्रदर्शन होने के बावजूद उनके परिवारों की जेब उनकी वास्तविक संभावनाएं अलग कर सकती है। एक छात्र के लिए रैंक का अर्थ सरकारी मेडिकल कॉलेज हो सकता है, दूसरे के लिए वही रैंक महंगी निजी सीट और भारी कर्ज का रास्ता खोल सकती है।
यहीं से मेरिट का सवाल थोड़ा पेचीदा हो जाता है। परीक्षा में मिले अंक तो वास्तविक हैं, लेकिन वे बच्चे की बौद्धिक क्षमता का ही परिणाम नहीं हैं। उनके पीछे वर्षों की स्कूली शिक्षा, घर का माहौल, माता-पिता की आर्थिक स्थिति, निजी शिक्षक, कोचिंग, किताबें, इंटरनेट, टेस्ट सीरीज और परीक्षा के लिए दोबारा तैयारी करने की क्षमता भी होती है। एक बच्चा अगर दो साल तक बिना नौकरी की चिंता के सिर्फ तैयारी कर सकता है और दूसरा बच्चा परिवार की आर्थिक जरूरतों के बीच पढ़ रहा है, तो दोनों को एक ही प्रश्नपत्र देना बराबरी नहीं है।
2025 के व्यापक शिक्षा सर्वेक्षण में पाया गया कि देश के 55.9 प्रतिशत स्कूली बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि 31.9 प्रतिशत निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में हैं। लेकिन ग्रामीण भारत में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी 66 प्रतिशत है, जबकि शहरी भारत में यह केवल 30.1 प्रतिशत रह जाती है। यानी बच्चा कहां रहता है, इससे ही उसकी स्कूली शिक्षा की संस्थागत दुनिया काफी बदल जाती है।
अब कोचिंग को देखिए। यह समानांतर व्यवस्था बन चुकी है। पुराने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण में पाया गया था कि सामान्य पाठ्यक्रम के विद्यार्थी पर शिक्षा से जुड़े कुल खर्च में निजी कोचिंग का हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 11.2 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 12.3 प्रतिशत था। शहर में शिक्षा पर औसत खर्च ग्रामीण क्षेत्र के मुकाबले बहुत अधिक था। यानी परीक्षा के मैदान में पहुंचने से पहले ही परिवार अलग-अलग आर्थिक गलियों से होकर आते हैं।
चलिए, इसे एक साधारण उदाहरण से समझते हैं। एक परिवार के पास बच्चे को कोचिंग दिलाने, दूसरे शहर में भेजने, हॉस्टल का खर्च उठाने और एक साल ड्रॉप करवाने की क्षमता है। दूसरा परिवार बेटे या बेटी से उम्मीद करता है कि बारहवीं के बाद जल्दी कोई रास्ता निकले। दोनों बच्चों की प्रतिभा में कोई अंतर नहीं है, लेकिन उनके पास असफल होने की क्षमता अलग है। संपन्न परिवार का बच्चा एक परीक्षा में असफल होकर फिर कोशिश कर सकता है। गरीब परिवार के बच्चे के लिए वही असफलता परिवार के बजट में दिखाई देती है।
यही कारण है कि कोचिंग को बच्चे की मेहनत कहकर समझना पर्याप्त नहीं है। कोचिंग का कारोबार उस सामाजिक मांग से पैदा हुआ है जिसमें अच्छी संस्थाओं की सीटें कम हैं और उन सीटों से मिलने वाली आर्थिक सुरक्षा बहुत अधिक है। जब एक सीट का संभावित जीवन-मूल्य बहुत बड़ा हो जाता है, तो परिवार उस सीट के लिए वर्तमान आय का बड़ा हिस्सा खर्च करने को तैयार हो जाता है।
भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार हुआ है। 2021-22 में 18 से 23 वर्ष की आबादी के लिए उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात 28.4 प्रतिशत था। अनुसूचित जाति के लिए यह 25.9 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के लिए 21.2 प्रतिशत था। यानी विश्वविद्यालयों तक पहुंच पहले की तुलना में बढ़ी है। लेकिन उच्च शिक्षा में प्रवेश बढ़ जाना और अच्छी उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ जाना एक ही बात नहीं है।
यही फर्क पूरे विवाद की जड़ में है। अगर किसी देश में सौ कॉलेज हैं और उनमें से पांच ऐसे हैं जहां पढ़ने पर अच्छी नौकरी मिलने की संभावना बहुत ज्यादा है, तो वास्तविक प्रतियोगिता उन पांच कॉलेजों की होगी। बाकी 95 कॉलेजों में सीटें खाली भी रह सकती हैं। भारत में इंजीनियरिंग के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। सीटों की संख्या बढ़ी, लेकिन संस्थानों की गुणवत्ता और रोजगार क्षमता समान गति से नहीं बढ़ी।
मेडिकल शिक्षा में भी सरकार ने सीटों का विस्तार किया है। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के पास अब 2026-27 के लिए एमबीबीएस सीटों का अलग सीट मैट्रिक्स है और मेडिकल कॉलेजों को सरकारी तथा निजी प्रबंधन के आधार पर अलग-अलग देखा जा सकता है। यानी कैपेसिटी बढ़ रही है। लेकिन किसी मेडिकल सीट को मात्र इसलिए उपलब्ध नहीं माना जा सकता कि वह कागज पर मौजूद है। अगर उसकी फीस सामान्य परिवार की पहुंच से बाहर है, तो वह सीट सामाजिक रूप से कितने लोगों के लिए उपलब्ध है, असल सवाल तो यह है।
इसका दूसरा पहलू भी है। महंगी निजी शिक्षा के लिए परिवार बैंक से कर्ज ले सकता है। यानी शिक्षा अब परिवार की वर्तमान आय से ही नहीं, भविष्य की आय से भी खरीदी जा सकती है। बच्चा डॉक्टर बनेगा, अच्छी कमाई करेगा और कर्ज चुका देगा, यह उम्मीद परिवार को आज भारी रकम खर्च करने के लिए प्रेरित करती है। इस तरह शिक्षा और कर्ज का रिश्ता बनता है; वह भविष्य की कमाई के लिए किया गया निवेश है।
लेकिन इस व्यवस्था में जोखिम किसका है? अगर बच्चा सफल हुआ तो परिवार कहेगा कि निवेश सफल रहा। अगर असफल हुआ तो फीस, कोचिंग, हॉस्टल और वर्षों की तैयारी का खर्च परिवार के ऊपर रह जाएगा। इसीलिए शिक्षा के बाजार में सबसे अधिक सुरक्षित वही व्यक्ति है जिसके पास पहले से पर्याप्त संसाधन हैं। जिसके पास पैसा है वह अवसर खरीद सकता है; जिसके पास पैसा नहीं है, उसके लिए प्रतिभा को अवसर में बदलना अधिक कठिन है।
सबको समान परीक्षा बराबरी की गारंटी नहीं है। परीक्षा का प्रश्नपत्र समान हो सकता है, लेकिन परीक्षा तक पहुंचने के रास्ते अलग-अलग हैं। कोई बच्चा वातानुकूलित कोचिंग कक्षा में हजारों प्रश्न हल कर रहा है, कोई सरकारी स्कूल में शिक्षक की कमी के बीच पढ़ रहा है। कोई हर सप्ताह टेस्ट दे रहा है, कोई इंटरनेट डेटा बचाकर वीडियो देख रहा है। कोई असफल होकर दूसरा साल खरीद सकता है, कोई असफल होकर परिवार की आय में योगदान देने के लिए मजबूर हो सकता है।
इस पूरी व्यवस्था में शहर और गांव का अंतर भी महत्वपूर्ण है। 2025 के सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में ग्रामीण विद्यार्थियों की हिस्सेदारी 24.3 प्रतिशत थी, जबकि शहरी विद्यार्थियों में यह 51.4 प्रतिशत थी। यानी शहर में रहने वाले बच्चों का एक बड़ा हिस्सा उस स्कूल व्यवस्था में पढ़ता है जहां परिवार सीधे शिक्षा के लिए ज्यादा खर्च करता है। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों पर निर्भरता कहीं ज्यादा है।
इससे एक और सवाल पैदा होता है; जब देश की स्कूली शिक्षा ही इतनी अलग-अलग गुणवत्ता वाली है, तो 18 साल की उम्र में सबको एक ही एंट्रेंस परीक्षा के सामने खड़ा करके हम वास्तव में किस चीज को माप रहे हैं? बच्चे की क्षमता या उसको हासिल पिछले दस वर्षों के अवसर? सवाल उस पूरी संरचना का है जो परीक्षा को जीवन-मरण का सवाल बना देती है। अगर देश में हजारों अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज और पर्याप्त संख्या में उच्च गुणवत्ता वाले मेडिकल कॉलेज हों, तो एक परीक्षा में कुछ अंकों का अंतर बच्चे के पूरे भविष्य का फैसला नहीं करेगा।
माता-पिता आईआईटी इसलिए चाहते हैं क्योंकि उन्हें आईआईटी की डिग्री के साथ नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा की अपेक्षाकृत अधिक गारंटी दिखाई देती है। मेडिकल कॉलेज में भी यही है। सरकारी मेडिकल कॉलेज परिवार को यह विश्वास देता है कि बच्चे की मेहनत के बदले उसे अपेक्षाकृत सुरक्षित पेशेवर भविष्य मिलेगा। इसलिए आईआईटी और सरकारी मेडिकल कॉलेजों की असाधारण मांग को ब्रांड के पीछे भागने की आदत कह देना मूल सवाल से भागना है। यह उस समाज की प्रतिक्रिया है जिसमें नौकरी असुरक्षित है, आय में असमानता बहुत बड़ी है और पेशेवर डिग्री को सामाजिक सुरक्षा का टिकट माना जाता है। जब बाकी रास्ते अनिश्चित दिखाई देते हैं तो परिवार किसी भी सुरक्षित रास्ते के पीछे पूरी ताकत लगा देता है।
भारत को महज़ कुछ और मेडिकल कॉलेज या इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं, ऐसे संस्थान चाहिए जिनके नाम के आगे टॉप लगाने की जरूरत न पड़े। उसे ऐसे सरकारी विश्वविद्यालय चाहिए जिनमें पढ़ना गरीब परिवार के बच्चे के लिए भी सम्मानजनक और भविष्य-सुरक्षित विकल्प हो। उसे ऐसे इंजीनियरिंग कॉलेज चाहिए जहां प्रयोगशाला वास्तव में प्रयोगशाला हो, ऐसे मेडिकल कॉलेज चाहिए जहां अस्पताल में मरीज पर्याप्त हों।
जब शिक्षा की गुणवत्ता कुछ संस्थानों में केंद्रित हो जाती है तो प्रतियोगिता स्वाभाविक रूप से क्रूर होती जाती है। फिर बच्चे एक-दूसरे से नहीं, सीटों की कमी से लड़ते हैं। परिवार दूसरे परिवार से नहीं, फीस और कोचिंग के खर्च से लड़ता है। और अंत में समाज यह मानने लगता है कि जो बच्चा आईआईटी या सरकारी मेडिकल कॉलेज तक नहीं पहुंचा, वह किसी तरह पीछे रह गया। लेकिन वास्तविकता इसके उलट भी हो सकती है। पीछे बच्चा नहीं, व्यवस्था रह गई है जिसने लाखों प्रतिभाओं के लिए अच्छे विकल्पों की पर्याप्त संख्या तैयार नहीं की।
सवाल है कि हम कब ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाएंगे जिसमें किसी बच्चे का भविष्य इस बात से तय न हो कि उसके परिवार के पास कितनी महंगी तैयारी खरीदने की क्षमता थी? अच्छी शिक्षा अगर अधिकार है तो उसे पाने के लिए प्रतियोगिता इतनी भयंकर क्यों है? अगर वह बाजार में खरीदी जाने वाली वस्तु बन चुकी है, तो फिर हम उसे समान अवसर कहने पर क्यों अड़े हुए हैं?
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