सत्यप्रकाश मिश्र: आलोचना में असहमति का विवेक

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Satyaprakash Mishra

Parichay Das

— परिचय दास —

।। एक।।

हिंदी आलोचना के इतिहास में कुछ आलोचक ऐसे हैं जिनकी अनुपस्थिति से अधिक उनकी उपस्थिति का ढंग ध्यान खींचता है। वे अपने समय में लिखते हैं, बहस करते हैं, स्थापित मान्यताओं से टकराते हैं, दूसरे आलोचकों को भी आलोचना के घेरे में लाते हैं पर समय बीतने के बाद आलोचना की मुख्य स्मृति में उनके लिए उतनी जगह नहीं बचती जितनी उनके काम की माँग होती है। सत्यप्रकाश मिश्र ऐसे ही आलोचक हैं। उन्हें याद करना किसी उपेक्षित नाम को सूची में जोड़ देना नहीं है; बल्कि आलोचना के उस स्वभाव को फिर से पहचानना है जिसमें सहमति से अधिक महत्त्व विवेकपूर्ण असहमति का होता है।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना का मूल स्वभाव उनकी दृष्टि की स्वतंत्रता में है। वे आलोचना को किसी रचनाकार की प्रतिष्ठा की पुष्टि करने वाला कर्म नहीं मानते। उनके लिए आलोचक का काम कृति के सामने खड़े होकर उसके पक्ष में या विपक्ष में फैसला सुनाना भर नहीं, बल्कि उस समूचे संसार को समझना है जिसमें कृति जन्म लेती है। रचनाकार, उसका परिवेश और उसकी कृति, इन तीनों को अलग-अलग करके देखने से साहित्य का वास्तविक अर्थ पकड़ में नहीं आता। ‘कृति-विकृति-संस्कृति’ की आलोचनात्मक संरचना इसी व्यापक आग्रह को सामने लाती है।

यहीं से सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना की पहली विशेषता सामने आती है: वे आलोचना को परिचय-धर्मिता से बचाना चाहते हैं। किसी कवि के बारे में यह बता देना कि वह किस समय का कवि है, उसकी प्रमुख कृतियाँ कौन-सी हैं और उसके साहित्य में कौन-कौन से विषय आते हैं, आलोचना नहीं है। आलोचना तब शुरू होती है जब आलोचक यह पूछता है कि कृति अपने समय से किस प्रकार संबंध बनाती है, अपने समय से कहाँ असहमत होती है और अपने भीतर किस तरह का मनुष्य निर्मित करती है। इस अर्थ में मिश्र की आलोचना सूचना से अधिक विवेक की आलोचना है।

उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनका निर्भीक आलोचनात्मक विवेक है। वे अपने प्रिय आलोचक विजयदेवनारायण साही से गहरे प्रभावित थे, लेकिन किसी प्रभाव को अनुकरण में बदल देना उनकी प्रकृति नहीं थी। साही में जिस स्वतंत्र आलोचनात्मक मुहावरे का आकर्षण था, मिश्र ने उसे अपनी सामाजिक और वैचारिक जमीन पर फिर से बरतने का प्रयत्न किया। ‘कृति-विकृति-संस्कृति’ में शुक्ल, द्विवेदी और वाजपेयी के बाद रामविलास शर्मा, साही, नामवर सिंह और मैनेजर पाण्डेय जैसे आलोचकों की दृष्टि, पद्धति और मूल्यांकन-क्षमता को परखना इसी स्वतंत्र आलोचनात्मक साहस का प्रमाण है।

मिश्र की आलोचना में असहमति एक नैतिक कर्म बन जाती है। वे असहमति के लिए असहमति नहीं करते। उनकी असहमति तर्क से आती है और तर्क के पीछे साहित्य तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव है। इसलिए उनकी आलोचना में तीखापन है, लेकिन वह केवल वाक्-चातुर्य का तीखापन नहीं है। उसके पीछे प्रमाण, संदर्भ और मूल्यबोध काम करते हैं। उनकी आलोचनात्मक भाषा में एक ऐसी आवाज दिखाई देती है जिसे अपने समय की आलोचना में अलग और विशिष्ट कहा जा सकता है।

उनके यहाँ साहित्य और संस्कृति अलग-अलग खाने नहीं हैं। कृति को केवल सौंदर्य की वस्तु मानकर उसकी सामाजिक अंतर्ध्वनियों से आँख मूँद लेना उन्हें स्वीकार नहीं था। इसी कारण उनकी आलोचना में साहित्यिक मूल्य और सामाजिक मूल्य लगातार एक-दूसरे से संवाद करते हैं। वे साहित्य को समाजशास्त्र में विलीन नहीं करते, लेकिन साहित्य को समाज से काटकर भी नहीं देखते। यही संतुलन उनकी आलोचना को महत्त्वपूर्ण बनाता है।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना का एक दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है इतिहास-बोध। वे किसी साहित्यिक प्रवृत्ति को निर्वात में नहीं देखते। आलोचना के विकासक्रम को समझते हुए वे यह देखते हैं कि अलग-अलग समय में आलोचना की दृष्टि क्यों बदली, उसके मूल्यांकन के आधार कैसे बदले और आलोचक ने अपने समय की चुनौतियों का सामना किस प्रकार किया। इसीलिए उनका आलोचना-कर्म केवल कृतियों का मूल्यांकन नहीं, बल्कि आलोचना के अपने इतिहास का भी पुनर्पाठ है।

लेकिन मिश्र को केवल इतिहास-बोध वाला आलोचक कहना भी उनके साथ न्याय नहीं होगा। उनके यहाँ इतिहास किसी मृत अभिलेख की तरह नहीं आता। वह वर्तमान में सक्रिय रहता है। अतीत की साहित्यिक बहसों को वे इस तरह देखते हैं कि उनसे आज की आलोचना के लिए प्रश्न निकलें। यही उनकी आलोचना को पुनर्पाठ की आलोचना बनाता है। वे हमें केवल यह नहीं बताते कि पहले क्या कहा गया था, बल्कि यह भी पूछते हैं कि उसे फिर से पढ़ने की जरूरत आज क्यों है।

यहीं उनकी आलोचना का एक गहरा पक्ष खुलता है: आलोचना स्वयं भी आलोचना की वस्तु है। रचना की आलोचना करते-करते आलोचक अपनी पद्धति को भी प्रश्नांकित करता है। यह बिंदु अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हिंदी में आलोचना की परंपरा बहुत समृद्ध रही है, लेकिन आलोचना पर आलोचना करने की परंपरा उतनी व्यापक नहीं रही। सत्यप्रकाश मिश्र इस दूसरे स्तर को गंभीरता से ग्रहण करते हैं। वे साहित्य के साथ-साथ उस साहित्य को देखने वाली आँख की भी जाँच करते हैं।

इसीलिए ‘कृति-विकृति-संस्कृति’ का शीर्षक भी केवल तीन शब्दों का संयोजन नहीं है। इसमें एक पूरी आलोचनात्मक प्रक्रिया छिपी हुई है। कृति सामने है, लेकिन कृति के साथ विकृति भी संभव है और उसके पीछे संस्कृति की जटिल संरचना भी। कोई रचना केवल अपनी भाषा में नहीं रहती; उसके अर्थ उसके समय, समाज, विचार, पूर्वग्रह, मूल्य और पाठकीय संस्कारों से भी बनते-बिगड़ते हैं। आलोचक का काम इसी जटिलता को पहचानना है।

यहाँ ‘विकृति’ को केवल रचना की खराबी समझ लेना भूल होगी। विकृति आलोचनात्मक दृष्टि में भी हो सकती है। पाठ के चयन में, मूल्यांकन की कसौटी में, साहित्यिक प्रतिष्ठा के निर्माण में, किसी लेखक को अत्यधिक महत्त्व देने या किसी को लगातार हाशिए पर रखने में भी विकृति पैदा हो सकती है। इस दृष्टि से मिश्र की आलोचना केवल रचनाओं को नहीं परखती, बल्कि साहित्यिक प्रतिष्ठा के निर्माण की प्रक्रिया को भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रश्नांकित करती है।

यही वह बिंदु है जहाँ उनका आलोचना-कर्म आज विशेष रूप से प्रासंगिक हो उठता है।

आज साहित्य में लेखक की रचना से पहले उसकी प्रतिष्ठा दिखाई देने लगती है। नाम पहले आता है, कृति बाद में। संबंध पहले आते हैं, मूल्यांकन बाद में। संस्थाएँ, पुरस्कार, समूह, वैचारिक निकटताएँ और साहित्यिक मंडलियाँ कई बार कृति की वास्तविक शक्ति से अधिक उसके सार्वजनिक प्रभाव को निर्धारित करने लगती हैं। ऐसी स्थिति में आलोचक का स्वतंत्र विवेक धीरे-धीरे कठिन होता जाता है।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना इस कठिनाई के बीच खड़ी दिखाई देती है। वह पूछती है कि साहित्य में किसी को बड़ा मानने का आधार क्या है? क्या केवल इसलिए कि वह पहले से प्रतिष्ठित है? क्या आलोचना का काम प्रतिष्ठा को दोहराना है? या आलोचक को कभी-कभी उस प्रतिष्ठा के भीतर जाकर यह देखना चाहिए कि उसकी वास्तविक साहित्यिक ऊर्जा कहाँ है और उसका निर्मित आभामंडल कहाँ से आया है?

यह प्रश्न मिश्र को अपने समय से आगे ले जाता है।

उनकी आलोचना में साहित्यिक संबंधों का मनोविज्ञान भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में उपस्थित है। साहित्य केवल विचारों का संसार नहीं है; वह मनुष्यों का संसार भी है। लेखक एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं, विरोध करते हैं, समूह बनाते हैं, दूरी बनाते हैं, प्रशंसा करते हैं, उपेक्षा करते हैं। आलोचक भी इस मानवीय संसार से बाहर नहीं होता। इसलिए आलोचना की निष्पक्षता कोई सहज उपलब्ध वस्तु नहीं है। उसे अर्जित करना पड़ता है।

यहीं आलोचक का चरित्र सामने आता है।

किसी रचनाकार की आलोचना करना आसान है; अपने प्रिय लेखक की आलोचना करना कठिन है। किसी विरोधी लेखक की कमजोरी पकड़ना सरल है; अपने वैचारिक या साहित्यिक निकट व्यक्ति की सीमा पहचानना अधिक कठिन। सत्यप्रकाश मिश्र का महत्त्व इस कठिन क्षेत्र में उनकी आवाज के कारण है। वे आलोचना को व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर उठाने की कोशिश करते हैं।

इसी संदर्भ में उनका आलोचना-कर्म विजयदेवनारायण साही की परंपरा से एक गहरे बिंदु पर जुड़ता है। साही के यहाँ आलोचना स्वतंत्र बौद्धिक अनुभव है। आलोचक किसी पूर्वनिर्धारित साँचे का कर्मचारी नहीं है। मिश्र में भी यह आग्रह दिखाई देता है कि आलोचक को अपनी आँख से देखना चाहिए। वह किसी स्थापित मत का प्रवक्ता भर न बने। साहित्य में उसकी अपनी पहचान उसकी अपनी दृष्टि से बने।

लेकिन मिश्र की स्वतंत्रता का स्वर साही की स्वतंत्रता की हूबहू पुनरावृत्ति नहीं है। यही उनकी मौलिकता है। वे सामाजिक यथार्थ और वैचारिक प्रश्नों को आलोचना के केंद्र में अधिक स्पष्टता से रखते हैं। उनके यहाँ स्वतंत्रता का अर्थ केवल सौंदर्यात्मक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ी स्वतंत्रता है।

इसलिए उनके आलोचक को केवल ‘विचारधारात्मक आलोचक’ कहना भी अपर्याप्त है। विचार उनके यहाँ कृति पर आरोपित कोई बाहरी वस्तु नहीं होना चाहिए। यदि विचार कृति के भीतर से नहीं निकलता, तो वह आलोचना को घोषणापत्र में बदल देता है। मिश्र का बेहतर आलोचनात्मक रूप वहाँ दिखाई देता है जहाँ विचार कृति की आंतरिक संरचना, भाषा और सामाजिक अर्थ से निकलकर सामने आता है।

उनकी आलोचना का एक और उल्लेखनीय गुण है कि वे बड़े नामों से भयभीत नहीं होते। हिंदी साहित्य में कुछ नाम ऐसे बने जिनके सामने आलोचक की आवाज धीमी पड़ जाती है। प्रतिष्ठा का दबाव आलोचना की स्वतंत्रता को सीमित कर देता है। मिश्र इस दबाव से मुक्त होने की कोशिश करते हैं। बड़े आलोचक को भी आलोचना की कसौटी पर रखना उनके लिए असम्मान नहीं, बल्कि आलोचना के सम्मान की शर्त है।

यही बात उन्हें आज पढ़ने का सबसे मजबूत कारण देती है।

क्योंकि किसी आलोचक का मूल्य केवल इस बात से निर्धारित नहीं होता कि उसने किन लेखकों की प्रशंसा की। उसका मूल्य इस बात से भी निर्धारित होता है कि उसने किसे प्रश्नांकित करने का साहस किया और क्यों किया।

सत्यप्रकाश मिश्र का आलोचनात्मक व्यक्तित्व इसी ‘क्यों’ में निहित है।

उनकी आलोचना में साहित्यिक मूल्य और सामाजिक मूल्य के बीच कोई आसान समझौता नहीं है। दोनों के बीच तनाव है। और यही तनाव आलोचना को जीवित रखता है। यदि साहित्य केवल सामाजिक संदेश बन जाए तो उसकी कलात्मक जटिलता नष्ट हो सकती है। यदि साहित्य केवल सौंदर्य बन जाए तो उसके सामाजिक अर्थ अदृश्य हो सकते हैं। मिश्र इन दोनों अतियों के बीच आलोचना की अपनी जमीन तलाशते हैं।

इस जमीन पर आलोचक न तो न्यायाधीश है, न प्रचारक। वह एक सजग पाठक है, लेकिन साधारण पाठक से अधिक जिम्मेदार सजग पाठक। उसे कृति के भीतर उतरना है, उसके मौन को सुनना है, उसकी भाषा को समझना है, उसके समय को पहचानना है और फिर अपने निष्कर्ष को तर्क के सामने रखना है।

यहाँ आलोचना एक प्रकार की बौद्धिक नैतिकता बन जाती है।

और शायद यही सत्यप्रकाश मिश्र की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

उनकी आलोचना हमें यह भी सिखाती है कि साहित्यिक इतिहास केवल प्रसिद्ध नामों से नहीं बनता। इतिहास के मंच पर कुछ नाम लगातार प्रकाश में रहते हैं, कुछ धीरे-धीरे धुँधले पड़ जाते हैं और कुछ को बाद की पीढ़ियों को फिर से खोज निकालना पड़ता है। यह खोज केवल विस्मृत नामों की पुनर्स्थापना नहीं होती। यह साहित्यिक इतिहास की अपनी चयन-प्रक्रिया की जाँच भी होती है।

इसलिए सत्यप्रकाश मिश्र को पढ़ना एक आलोचक को पढ़ना भर नहीं है। यह हिंदी आलोचना की स्मृति को पढ़ना है।

किसे याद रखा गया?

किसे कम याद रखा गया?

किसकी बहस को आगे बढ़ाया गया?

किसकी दृष्टि को किनारे कर दिया गया?

और सबसे कठिन प्रश्न: किस आधार पर?

‘आलोचना का नेपथ्य’ जैसे किसी उपक्रम में सत्यप्रकाश मिश्र की वापसी का अर्थ इसी प्रश्न को सामने लाना है। नेपथ्य में वे इसलिए नहीं हैं कि उनका काम छोटा था। संभव है कि आलोचना की मुख्यधारा ने जिन प्रश्नों को अपने समय में पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया, उन्हीं प्रश्नों के कारण उनका पुनर्पाठ आज अधिक जरूरी हो।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना हमें साहित्यिक प्रतिष्ठा से अधिक साहित्यिक प्रमाण पर भरोसा करना सिखाती है। वह बताती है कि आलोचक का सबसे बड़ा हथियार उसकी भाषा नहीं, उसकी स्वतंत्र दृष्टि है। उसकी सबसे बड़ी पूँजी उसका ज्ञान नहीं, उसका विवेक है। और उसकी सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं कि वह कितना लिख सकता है, बल्कि यह कि वह किसके सामने भी अपनी आलोचनात्मक दृष्टि को बचाए रख सकता है।

यहीं उनका वर्तमान महत्त्व सबसे अधिक दिखाई देता है।

आज जब आलोचना कई बार समीक्षा में सिमट जाती है, समीक्षा प्रशंसा में और प्रशंसा संबंधों की सामाजिक शिष्टता में, तब सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना हमें आलोचना के मूल अर्थ की ओर लौटाती है। आलोचना का अर्थ निंदा नहीं है, लेकिन प्रशंसा भी नहीं। आलोचना का अर्थ है किसी रचना को उसके समूचे जटिल अस्तित्व में समझने का प्रयत्न।

इस प्रयत्न में प्रेम भी चाहिए और दूरी भी।

आत्मीयता भी चाहिए और संदेह भी।

परंपरा का ज्ञान भी चाहिए और उससे असहमति का साहस भी।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना का स्थायी मूल्य शायद इसी संतुलन में है।

वे हमें यह नहीं सिखाते कि किसी लेखक को कैसे स्वीकार करें। वे इससे अधिक कठिन बात सिखाते हैं कि किसी लेखक को क्यों स्वीकार करें, और आवश्यकता पड़ने पर क्यों अस्वीकार करें।

यही आलोचना का विवेक है।

और यही वह विवेक है जिसकी आज सबसे अधिक जरूरत है।

इस अर्थ में सत्यप्रकाश मिश्र हिंदी आलोचना के हाशिए पर पड़े हुए नाम मात्र नहीं हैं। वे उस आलोचनात्मक संभावना के प्रतिनिधि हैं जिसे मुख्यधारा की चमक कई बार ढँक देती है। उन्हें नेपथ्य से मंच पर लाना किसी साहित्यिक न्याय की औपचारिक कार्रवाई नहीं, बल्कि अपनी आलोचनात्मक दृष्टि को अधिक सजग बनाने की प्रक्रिया है।

क्योंकि साहित्य में भूले हुए आलोचक कभी-कभी हमें भूली हुई आलोचना वापस दे जाते हैं।

।। दो।।

सत्यप्रकाश मिश्र को पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात ध्यान खींचती है, वह यह है कि उनकी आलोचना किसी एक समय, एक प्रवृत्ति या एक विचारधारात्मक घेरे में स्थिर नहीं रहती। उनकी आलोचनात्मक यात्रा रीतिकाव्य और कविशिक्षा की परंपरा से शुरू होकर आधुनिक आलोचना, काव्यभाषा और समकालीन साहित्यिक विमर्श तक आती है। इस यात्रा में विषय बदलते हैं, साहित्यिक संदर्भ बदलते हैं, लेकिन एक चीज लगातार बनी रहती है: साहित्य को उसकी भीतरी संरचना और उसके व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ, दोनों में समझने की बेचैनी।

यही बेचैनी सत्यप्रकाश मिश्र को केवल पुस्तक लिखने वाला आलोचक नहीं रहने देती। वे साहित्यिक परंपरा के भीतर जाकर उसके अर्थों की पुनर्रचना करते हैं। उनकी आलोचना में अतीत कोई बंद कमरा नहीं है, जहाँ साहित्यिक इतिहास की पुरानी वस्तुओं पर धूल जमी हुई हो। अतीत वर्तमान के प्रश्नों से लगातार टकराता है और इस टकराव में नई अर्थवत्ता पैदा करता है।

उनकी पुस्तक ‘कविशिक्षा की परम्परा और हिन्दी रीति-साहित्य’ को इसी दृष्टि से देखना चाहिए। रीति-साहित्य को लंबे समय तक हिंदी आलोचना में या तो श्रृंगार और अलंकार के साहित्य के रूप में सीमित किया गया या उसे आधुनिक संवेदना के सामने एक पिछड़ी हुई साहित्यिक प्रवृत्ति मानकर देखा गया। सत्यप्रकाश मिश्र का महत्त्व इस बात में है कि वे रीति-काव्य को केवल उसकी रूढ़ियों से नहीं, उसकी साहित्यिक संरचना और उसके पीछे मौजूद काव्यशास्त्रीय संस्कारों से समझने की कोशिश करते हैं।

‘कविशिक्षा’ उनके यहाँ महज कवि को कविता लिखने की शिक्षा देने वाली कोई पुरानी व्यवस्था नहीं रह जाती। उसके भीतर एक पूरा साहित्यिक संस्कार छिपा है। कवि किस प्रकार तैयार होता है, उसकी भाषा कैसे बनती है, काव्य के लिए किन मानकों को महत्त्व दिया जाता है, काव्य-रचना के पीछे कौन-सी परंपराएँ सक्रिय रहती हैं, ये सभी प्रश्न रीति-साहित्य को एक नए कोण से देखने की जमीन तैयार करते हैं।

यहीं उनकी आलोचना की पहली उल्लेखनीय विशेषता सामने आती है: वे साहित्य को उसकी अपनी ऐतिहासिक शर्तों पर समझना चाहते हैं।

यह आग्रह बहुत महत्त्वपूर्ण है। किसी पुराने साहित्य को आज की कसौटी से खारिज कर देना जितना आसान है, उतना ही उसे केवल परंपरा के नाम पर स्वीकार कर लेना भी। आलोचना का कठिन रास्ता इन दोनों के बीच से निकलता है। मिश्र इसी कठिन रास्ते पर चलते हैं। वे रीति-काव्य के सौंदर्य को पहचानते हुए उसकी सीमाओं को भी देखते हैं। वे परंपरा के भीतर मौजूद रचनात्मकता और रूढ़ि, दोनों को अलग-अलग पहचानने की कोशिश करते हैं।

इसी क्रम में ‘रीतिकाव्य : प्रकृति एवं स्वरूप’ उनकी आलोचना का दूसरा महत्त्वपूर्ण पड़ाव दिखाई देता है। यहाँ उनका आग्रह केवल यह बताना नहीं है कि रीति-काव्य कैसा था, बल्कि यह समझना है कि उसका साहित्यिक स्वभाव किस प्रकार निर्मित हुआ। ‘प्रकृति’ और ‘स्वरूप’ का प्रश्न वास्तव में साहित्य की आंतरिक संरचना का प्रश्न है।

रीतिकाव्य को केवल विषय के आधार पर समझना उसके साथ अन्याय होगा। उसकी भाषा, अलंकार-चेतना, नायिका-भेद, श्रृंगार-बोध, काव्य-रूढ़ियाँ और दरबारी संस्कृति से उसका संबंध मिलकर उसके स्वरूप को बनाते हैं। आलोचक का काम इनमें से किसी एक को पकड़कर पूरे साहित्य का निर्णय कर देना नहीं, बल्कि इन सबके पारस्परिक संबंध को समझना है।

मिश्र की आलोचना इसी संबंधपरक दृष्टि की ओर जाती है।

उनकी दृष्टि में साहित्य न तो केवल समाज का प्रतिबिंब है, न केवल कवि की निजी प्रतिभा का परिणाम। साहित्य इन दोनों के बीच बनने वाली जटिल रचनात्मक प्रक्रिया है। इसीलिए उनके यहाँ साहित्यिक इतिहास को केवल कालक्रम के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं। उसके पीछे सक्रिय काव्य-दृष्टि, सांस्कृतिक संस्कार और सामाजिक संरचना को भी देखना आवश्यक है।

यहाँ से सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना धीरे-धीरे रीतिकाव्य के अध्ययन से आगे बढ़ती है और आलोचना के अपने स्वरूप की ओर मुड़ती है।

‘आलोचक और समीक्षाएँ’ इस अर्थ में उनकी आलोचनात्मक चेतना का एक अलग चरण है। अब विषय केवल कवि या काव्य नहीं रह जाता। स्वयं आलोचक और उसकी दृष्टि प्रश्न के घेरे में आती है। आलोचना किस आधार पर निर्णय करती है? आलोचक की अपनी सीमाएँ क्या हैं? समीक्षा और आलोचना में अंतर कहाँ बनता है? कृति को पढ़ने की पद्धति किस प्रकार उसके मूल्यांकन को प्रभावित करती है?

इन प्रश्नों का महत्त्व आज और बढ़ गया है।

क्योंकि साहित्य में आलोचक की भूमिका केवल कृति पर टिप्पणी करने वाले व्यक्ति की नहीं है। वह साहित्यिक मूल्य निर्मित करने वाली शक्तियों में से एक है। वह किसी रचना को सामने ला सकता है, किसी को पीछे कर सकता है, किसी रचनाकार की प्रतिष्ठा को पुष्ट कर सकता है और किसी दूसरे को उपेक्षित भी कर सकता है। इसलिए आलोचक की अपनी दृष्टि की जाँच भी उतनी ही आवश्यक है जितनी कृति की।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना का महत्त्व यहीं बढ़ता है। वे आलोचक को निष्पक्ष देवता की तरह नहीं देखते। आलोचक भी अपने समय, अपने संस्कार, अपनी वैचारिक स्थिति और अपने साहित्यिक अनुभवों से बना मनुष्य है। इसलिए आलोचना में विवेक जितना आवश्यक है, आत्म-सजगता भी उतनी ही आवश्यक है।

इस बिंदु पर उनकी आलोचना विजयदेवनारायण साही की याद दिलाती है। साही के यहाँ आलोचना की स्वतंत्रता और आलोचक की वैयक्तिक दृष्टि अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। सत्यप्रकाश मिश्र भी आलोचक को किसी तैयार साँचे में फिट करने के बजाय उसकी अपनी दृष्टि से पहचानना चाहते हैं। लेकिन वे साही की पुनरावृत्ति नहीं हैं। उनकी अपनी जमीन सामाजिक सरोकारों और साहित्यिक इतिहास की गहरी समझ से बनती है।

उनकी आलोचना में भाषा का प्रश्न भी इसी कारण महत्त्वपूर्ण हो जाता है। ‘काव्य भाषा पर तीन निबन्ध’ जैसी कृति यह संकेत करती है कि उनके लिए भाषा केवल अभिव्यक्ति का बाहरी माध्यम नहीं थी। कविता में भाषा स्वयं अनुभव का निर्माण करती है। शब्द केवल अर्थ को ढोते नहीं, वे अर्थ को बनाते भी हैं।

काव्यभाषा को समझना इसलिए कविता के बाहरी शब्द-सौंदर्य को समझना भर नहीं है। भाषा में समय रहता है, समाज रहता है, कवि का संस्कार रहता है और उसकी कल्पना की संरचना भी। एक ही शब्द अलग-अलग कवियों में अलग अर्थ पैदा कर सकता है, क्योंकि शब्द का अर्थ केवल शब्दकोश से निर्धारित नहीं होता। उसके पीछे पूरा सांस्कृतिक अनुभव सक्रिय होता है।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना में यह भाषिक सजगता उन्हें सामान्य विषय-आधारित आलोचना से अलग करती है। वे यह समझते हैं कि कविता को उसके कथ्य से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता, लेकिन केवल कथ्य से पढ़ना भी कविता को अधूरा पढ़ना है। कविता का अर्थ उसके कहे हुए में जितना है, उतना ही उसके कहने के ढंग में भी है।

यहीं उनकी आलोचना अधिक सूक्ष्म होती है।

और फिर आता है ‘कृति-विकृति-संस्कृति’।

यह पुस्तक उनकी आलोचनात्मक यात्रा को एक व्यापक सांस्कृतिक धरातल पर ले जाती है। यहाँ उनका ध्यान केवल रचनाओं पर नहीं, आलोचना की परंपरा और आलोचकों की दृष्टि पर भी है। रामविलास शर्मा, विजयदेवनारायण साही, नामवर सिंह और मैनेजर पाण्डेय जैसे आलोचकों को एक साथ रखकर देखना अपने आप में एक आलोचनात्मक जोखिम है। क्योंकि इन नामों के साथ हिंदी आलोचना के कई बड़े वैचारिक विवाद जुड़े हुए हैं।

मिश्र इन नामों के सामने श्रद्धालु पाठक की तरह नहीं खड़े होते। वे उनके योगदान को स्वीकार करते हुए उनकी सीमाओं को भी देखने का प्रयास करते हैं। यही आलोचना का असली साहस है।

किसी बड़े आलोचक की प्रशंसा करना कठिन नहीं। कठिन यह है कि उसके प्रभाव से मुक्त होकर उसे पढ़ा जाए।

मिश्र की आलोचना इस मुक्ति की कोशिश करती है।

‘कृति-विकृति-संस्कृति’ का शीर्षक भी उनके आलोचनात्मक स्वभाव को समझने की कुंजी देता है। कृति अकेली नहीं होती। उसकी व्याख्या में संस्कृति प्रवेश करती है और संस्कृति की व्याख्या में हमारी अपनी दृष्टि। इसी प्रक्रिया में कृति के अर्थ बनते हैं और कभी-कभी विकृत भी होते हैं।

यहाँ ‘विकृति’ केवल खराब रचना नहीं है। किसी कृति को गलत ढंग से पढ़ना भी विकृति है। किसी रचनाकार की प्रतिष्ठा को उसकी रचना से बड़ा बना देना भी विकृति है। किसी लेखक को केवल उसकी विचारधारा के आधार पर स्वीकार या अस्वीकार करना भी विकृति है। आलोचना की पूर्वनिर्धारित कसौटी भी कभी-कभी कृति को विकृत कर सकती है।

इस अर्थ में सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना एक गहरा प्रश्न उठाती है: हम साहित्य को पढ़ते हैं या साहित्य के बारे में पहले से बनी अपनी धारणाओं को?

यह प्रश्न आज विशेष रूप से प्रासंगिक है।

आज साहित्य में लेखक की प्रतिष्ठा कई बार उसकी कृति से पहले चलती है। साहित्यिक संबंध, संस्थागत प्रभाव, समूहगत निकटता, पुरस्कार और सार्वजनिक प्रसिद्धि किसी रचना की स्वीकृति को प्रभावित करते हैं। ऐसी स्थिति में आलोचक का स्वतंत्र विवेक कठिन होता जाता है।

सत्यप्रकाश मिश्र का आलोचक इसी कठिनाई के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है।

उनकी आलोचना का मूल्य इस बात में नहीं कि उन्होंने कितने बड़े नामों पर लिखा। असली मूल्य इस बात में है कि बड़े नामों को भी उन्होंने आलोचना की कसौटी से मुक्त नहीं माना।

यही वह बिंदु है जहाँ उनकी आलोचना अपने समय से आगे निकलती है।

उनकी आलोचना हमें यह भी बताती है कि साहित्यिक परंपरा में ‘क्लासिक’ होना और ‘प्रश्न से परे’ होना एक बात नहीं है। कोई लेखक महान हो सकता है, लेकिन उसकी महानता की प्रकृति फिर भी जाँची जा सकती है। कोई आलोचक प्रभावशाली हो सकता है, लेकिन उसकी आलोचना में भी सीमाएँ हो सकती हैं। किसी साहित्यिक परंपरा का ऐतिहासिक महत्त्व हो सकता है, लेकिन उसमें रूढ़ियाँ भी हो सकती हैं।

आलोचना का काम इसी द्वंद्व को बनाए रखना है।

यदि आलोचक केवल स्वीकार करता है, तो वह आलोचक नहीं रह जाता। यदि वह केवल अस्वीकार करता है, तब भी वह आलोचक नहीं रह जाता। आलोचना का असली क्षेत्र स्वीकार और अस्वीकार के बीच की वह जटिल जमीन है जहाँ प्रमाण, संवेदना, इतिहास और विवेक एक साथ काम करते हैं।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना इसी जमीन की तलाश है।

इसलिए उनकी पुस्तकों को अलग-अलग करके पढ़ने के बजाय एक आलोचनात्मक यात्रा की तरह पढ़ना अधिक सार्थक है।

‘कविशिक्षा की परम्परा और हिन्दी रीति-साहित्य’ में वे साहित्यिक परंपरा की जड़ों की ओर जाते हैं।

‘रीतिकाव्य : प्रकृति एवं स्वरूप’ में वे उस परंपरा के साहित्यिक शरीर को समझते हैं।

‘आलोचक और समीक्षाएँ’ में वे आलोचना की आँख को देखने लगते हैं।

‘काव्य भाषा पर तीन निबन्ध’ में वे उस भाषा की संरचना को पकड़ते हैं जिससे साहित्य अपना अनुभव निर्मित करता है।

और ‘कृति-विकृति-संस्कृति’ में कृति, आलोचना और सांस्कृतिक दृष्टि के बीच का व्यापक संबंध सामने आता है।

यही क्रम उनके आलोचक का विकास भी है।

वे रचना से आलोचना तक, आलोचना से आलोचक तक और आलोचक से संस्कृति तक जाते हैं।

इस यात्रा में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह है कि उन्होंने आलोचना को केवल निर्णय की विधा नहीं रहने दिया। वह उनके यहाँ अन्वेषण की विधा बनती है। आलोचक पहले से निष्कर्ष लेकर कृति के पास नहीं जाता; कृति के भीतर जाकर अपने निष्कर्ष को निर्मित करता है।

यह प्रक्रिया धीमी है, कठिन है और आज की त्वरित साहित्यिक संस्कृति के लिए शायद कुछ असुविधाजनक भी। लेकिन साहित्यिक आलोचना की वास्तविक गरिमा इसी धैर्य में है।

सत्यप्रकाश मिश्र को फिर से पढ़ने की आवश्यकता इसलिए नहीं कि हिंदी में एक और आलोचक का नाम जोड़ना है। आवश्यकता इसलिए है कि उनके माध्यम से हम स्वयं आलोचना के अर्थ पर पुनर्विचार कर सकते हैं।

कृति को पढ़ना क्या है?

परंपरा को पढ़ना क्या है?

भाषा को पढ़ना क्या है?

आलोचक को पढ़ना क्या है?

और सबसे बढ़कर, क्या हम साहित्य को सचमुच स्वतंत्र होकर पढ़ते हैं?

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना इन प्रश्नों को हमारे सामने रखती है। वह अपने उत्तरों से अधिक अपने प्रश्नों के कारण महत्त्वपूर्ण हैं।

यही उनकी आलोचना की असली शक्ति है।

और शायद यही उनकी उपेक्षा का सबसे बड़ा कारण भी।

क्योंकि जो आलोचक साहित्यिक प्रतिष्ठा से असुविधाजनक प्रश्न पूछता है, वह स्वयं प्रतिष्ठा की सहज व्यवस्था में बहुत आसानी से जगह नहीं बना पाता। लेकिन समय का अपना न्याय होता है। कुछ आवाजें अपने समय में कम सुनी जाती हैं और बाद में अधिक जरूरी हो जाती हैं।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना ऐसी ही आवाज है।

उन्हें फिर से पढ़ना हिंदी आलोचना के किसी भूले हुए अध्याय को खोलना भर नहीं है। यह अपनी आलोचनात्मक आँख की धूल साफ करना है।

।। तीन ।।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना का महत्त्व आलोचना को स्वतंत्र बौद्धिक कर्म बनाए रखने के आग्रह में है। उन्होंने साहित्य को न तो केवल इतिहास की वस्तु माना, न विचारधारा का प्रमाण और न प्रतिष्ठित नामों की पुष्टि का माध्यम। उनकी दृष्टि में कृति अपने समय, भाषा, संस्कृति और मनुष्य के साथ बनती है और आलोचना का दायित्व इन्हीं परस्पर संबंधों को खोलना है।

रीतिकाव्य से आरंभ हुई उनकी यात्रा धीरे-धीरे काव्यभाषा, आलोचक की भूमिका और अंततः साहित्यिक संस्कृति की संरचना तक पहुँचती है। इसीलिए उनकी आलोचना का वास्तविक विषय केवल साहित्य नहीं, साहित्य को देखने वाली दृष्टि भी है। ‘कृति-विकृति-संस्कृति’ में यह चेतना अपनी अधिक परिपक्व अवस्था में दिखाई देती है। कृति की विकृति केवल रचना में नहीं होती, उसकी व्याख्या, प्रतिष्ठा, चयन और मूल्यांकन में भी हो सकती है।

यहीं सत्यप्रकाश मिश्र आज हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हो उठते हैं। ऐसे समय में जब साहित्य में नाम कई बार कृति से पहले पहुँच जाता है और साहित्यिक प्रतिष्ठा आलोचनात्मक निर्णय को प्रभावित करने लगती है, उनका आग्रह हमें याद दिलाता है कि आलोचक का पहला दायित्व किसी लेखक के पक्ष में या विपक्ष में खड़ा होना नहीं, कृति के पक्ष में खड़ा होना है।

उनकी आलोचना की सबसे बड़ी शक्ति इसी स्वतंत्रता में है। वह हमें केवल यह नहीं बताती कि साहित्य में क्या महत्त्वपूर्ण है, बल्कि यह पूछने की आदत डालती है कि हमने जिसे महत्त्वपूर्ण माना, उसे क्यों माना और जिसे पीछे छोड़ दिया, उसे क्यों पीछे छोड़ा।

इस अर्थ में सत्यप्रकाश मिश्र को पुनः पढ़ना किसी उपेक्षित आलोचक को साहित्य के मुख्य मंच पर वापस लाना भर नहीं है। यह हिंदी आलोचना के भीतर उस स्वतंत्र विवेक की वापसी है, जिसके बिना आलोचना धीरे-धीरे समीक्षा, समीक्षा धीरे-धीरे प्रशंसा और प्रशंसा धीरे-धीरे साहित्यिक प्रतिष्ठा की औपचारिक मुहर बन जाती है।

भूले हुए आलोचक कभी-कभी हमें भूली हुई आलोचना वापस दे जाते हैं। सत्यप्रकाश मिश्र का महत्त्व इसी लौटती हुई आलोचनात्मक चेतना में है।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना में वह दृष्टि, जिससे विषय को देखा गया है। रीतिकाव्य हो, काव्यभाषा हो, आलोचना की परंपरा हो अथवा आधुनिक हिंदी आलोचना के बड़े नाम, वे किसी तैयार निष्कर्ष को लेकर कृति के सामने नहीं जाते। उनकी कोशिश कृति के भीतर से उसके अर्थ-संबंधों को पकड़ने की है।

यही उनकी आलोचना का केंद्रीय संस्कार है।

उनकी आलोचना में एक प्रकार की बौद्धिक बेचैनी लगातार सक्रिय रहती है। यह बेचैनी केवल नया कहने की इच्छा नहीं है। इसका संबंध उस असंतोष से है जो आलोचक को स्थापित निष्कर्षों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होने देता। साहित्य में जो पहले कहा जा चुका है, उसे फिर से कह देना आलोचना नहीं है। आलोचना तब शुरू होती है जब पहले से कही हुई बात के भीतर कोई अनदेखा कोण दिखाई पड़ता है।

सत्यप्रकाश मिश्र इसी अनदेखे कोण की तलाश करते हैं।

इसलिए उनकी आलोचना में इतिहास महज पृष्ठभूमि नहीं बनता। वह कृति के अर्थ का सक्रिय हिस्सा है। किसी साहित्यिक प्रवृत्ति को समझने के लिए केवल उसके रचनाकारों को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं। यह भी देखना पड़ता है कि वह प्रवृत्ति किन सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक परिस्थितियों में बनी। लेकिन इसके साथ ही यह सावधानी भी आवश्यक है कि साहित्य को केवल उसकी परिस्थितियों में विलीन न कर दिया जाए।

यहीं उनकी आलोचना का संतुलन दिखाई देता है।

वे साहित्य को समाज से जोड़ते हैं, लेकिन साहित्य को समाजशास्त्रीय दस्तावेज में बदल देने की कोशिश नहीं करते। वे विचार को महत्त्व देते हैं, लेकिन विचारधारा को कृति पर थोपने से बचते हैं। वे इतिहास को देखते हैं, लेकिन इतिहास के नाम पर रचना की विशिष्टता को समाप्त नहीं करते।

इस संतुलन को साधना आलोचना का सबसे कठिन काम है।

किसी रचना के बारे में यह कहना कि उसमें सामाजिक यथार्थ है, बहुत आसान है। कठिन यह बताना है कि वह सामाजिक यथार्थ साहित्य में किस रूप में रूपांतरित हुआ। इसी तरह किसी कविता में विचार पहचान लेना आसान है, लेकिन यह समझना कठिन है कि कविता ने उस विचार को अपनी भाषा, बिंब और संरचना में किस तरह नया अर्थ दिया।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना का आग्रह इसी दूसरे स्तर पर है।

इस दृष्टि से उनकी काव्यभाषा संबंधी चिंतनधारा विशेष महत्त्व रखती है। भाषा उनके लिए केवल शब्दों का चयन नहीं है। भाषा कवि की दृष्टि का रूपाकार है। किसी कवि की भाषा को समझना उसके अनुभव-जगत को समझने की दिशा में बढ़ना है।

यहाँ आलोचक को एक साथ भाषाविद्, सहृदय पाठक और सांस्कृतिक पाठक होना पड़ता है।

सिर्फ भावुकता से कविता नहीं खुलती और केवल शास्त्रीय उपकरणों से भी नहीं। कविता के लिए संवेदना चाहिए, लेकिन संवेदना को विवेक की आवश्यकता है। सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना इसी संयोग को साधने की कोशिश करती है।

उनकी आलोचना का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है आलोचक की जवाबदेही।

साहित्यिक आलोचक अक्सर स्वयं को निर्णायक की स्थिति में रखता है। वह कहता है कि कौन बड़ा है, कौन छोटा; कौन प्रगतिशील है, कौन प्रतिक्रियावादी; कौन महत्त्वपूर्ण है, कौन गौण। लेकिन इस निर्णय की प्रक्रिया स्वयं आलोचना के लिए कितनी खुली है, यह प्रश्न कम पूछा जाता है।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना में यह प्रश्न भीतर से उठता है।

आलोचक किस आधार पर निर्णय करता है?

उसके अपने पूर्वग्रह क्या हैं?

उसकी पसंद का निर्माण कैसे हुआ?

वह किन लेखकों के प्रति सहज उदार है और किनके प्रति अनजाने में कठोर?

किसी रचनाकार की वैचारिक निकटता क्या आलोचक को उसके साहित्यिक मूल्यांकन में प्रभावित करती है?

ये प्रश्न आलोचना को कठिन बनाते हैं, लेकिन इसी कठिनाई में उसकी नैतिकता है।

आलोचना की स्वतंत्रता का अर्थ केवल सत्ता से स्वतंत्र होना नहीं है। आलोचक को अपने ही प्रिय विचारों, प्रिय लेखकों और प्रिय साहित्यिक परंपराओं से भी पर्याप्त दूरी रखनी पड़ती है।

यहीं एक बड़े आलोचक की पहचान होती है।

किसी विरोधी लेखक की कमजोरी खोज लेना आलोचना की बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं। असली कसौटी तब आती है जब आलोचक को अपने प्रिय लेखक की सीमा बतानी पड़े। आत्मीयता बनी रहे और निर्णय फिर भी स्वतंत्र रहे, यही आलोचनात्मक परिपक्वता है।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना इस परिपक्वता की ओर संकेत करती है।

उनके यहाँ साहित्यिक मूल्यांकन में ‘नियत’ और ‘दृष्टि’ का प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण हो उठता है। आलोचना केवल बुद्धि का खेल नहीं। आलोचक के पीछे एक नैतिक स्थिति भी होती है। वह किसी कृति को क्यों पढ़ रहा है, किस प्रश्न के साथ पढ़ रहा है और उसके निर्णय से साहित्य की कौन-सी समझ पुष्ट हो रही है, यह सब आलोचना के भीतर उपस्थित रहता है।

इसलिए उनकी आलोचना को केवल प्रगतिशील या समाजवादी आलोचना कह देना भी उसे सीमित कर देना होगा।

उनके भीतर सामाजिक न्याय और मनुष्य के पक्ष में खड़े होने की स्पष्ट आकांक्षा है, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य किसी विचारधारा की प्रतिष्ठा नहीं, साहित्यिक विवेक की स्थापना है। विचार उनके यहाँ उपकरण है, अंतिम सत्य नहीं।

यही कारण है कि उनकी आलोचना को आज की बहसों में भी पढ़ा जा सकता है।

आज साहित्यिक संसार में मूल्यांकन की प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक जटिल हो गई है। लेखक की रचना के साथ उसकी सार्वजनिक छवि, संस्थागत पहचान, पुरस्कार, साहित्यिक नेटवर्क और सामाजिक दृश्यता भी उसके मूल्यांकन को प्रभावित करती है। ऐसे वातावरण में आलोचक का काम केवल रचना पर टिप्पणी करना नहीं रह जाता। उसे यह भी देखना पड़ता है कि रचना के मूल्यांकन के पीछे कौन-सी अदृश्य शक्तियाँ काम कर रही हैं।

यहीं ‘विकृति’ की अवधारणा बहुत दूर तक जाती है।

किसी साहित्यिक कृति को गलत समझना एक प्रकार की विकृति है। लेकिन किसी लेखक की प्रतिष्ठा को उसकी रचना के स्थान पर रख देना भी विकृति है। किसी विशेष समूह द्वारा लगातार किसी लेखक को महत्त्व दिया जाना और दूसरे लेखक की उपेक्षा होना भी साहित्यिक संस्कृति के अध्ययन का विषय है।

साहित्य का इतिहास केवल महान रचनाकारों की सूची नहीं होता। वह उन रचनाकारों की अनुपस्थिति का इतिहास भी होता है जिन्हें पर्याप्त जगह नहीं मिली।

इसलिए आलोचक को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि कौन महान है। उसे यह भी पूछना चाहिए कि महानता की हमारी कसौटी किसने बनाई?

यह प्रश्न सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना को गहरे स्तर पर समकालीन बनाता है।

उनकी आलोचना का एक और गुण है कि उसमें साहित्यिक परंपरा के प्रति न तो अंधी श्रद्धा है और न अंधा विद्रोह। परंपरा उनके लिए ऐसी जीवित संरचना है जिसे हर पीढ़ी अपने प्रश्नों के साथ पुनः पढ़ती है।

रीतिकाव्य को इसी कारण वे केवल अतीत नहीं मानते। उसके भीतर काव्यशास्त्र है, भाषा है, सौंदर्यबोध है, सामाजिक संरचना है और कवि बनने की एक विशिष्ट प्रक्रिया है। उसे समझना हिंदी साहित्य के एक पुराने अध्याय को समाप्त करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि हिंदी की काव्य-दृष्टि किन रास्तों से होकर वर्तमान तक पहुँची।

यहाँ सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना इतिहास और वर्तमान के बीच एक सेतु का काम करती है।

लेकिन उनकी आलोचना की अपनी सीमाएँ भी हैं। उन्हें केवल श्रद्धांजलि की दृष्टि से पढ़ना उतना ही अनुचित होगा जितना उन्हें उपेक्षित मानकर अचानक महान घोषित कर देना। आलोचना का सम्मान तभी पूरा होता है जब आलोचक की आलोचना भी संभव हो।

उनकी भाषा कहीं-कहीं वैचारिक आग्रह से अधिक घनी हो जाती है। कुछ जगहों पर उनके तर्क की व्यापकता उनके विश्लेषण की सूक्ष्मता पर भारी पड़ती दिखाई दे सकती है। उनकी आलोचना में जिस स्वतंत्र विवेक की आकांक्षा है, उसे हर रचना में समान तीव्रता से साध पाना संभव नहीं हुआ है।

लेकिन यह सीमा उनकी मूल उपलब्धि को समाप्त नहीं करती।

बल्कि किसी आलोचक की वास्तविक प्रतिष्ठा इसी से बनती है कि उसकी रचनाएँ हमें उसके साथ सहमत होने के लिए ही नहीं, उससे बहस करने के लिए भी प्रेरित करें।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना ऐसी बहस की जमीन देती है।

और शायद यही किसी आलोचक का सबसे बड़ा जीवन है।

रचनाकार अपनी रचना के भीतर जीवित रहता है। आलोचक अपनी दृष्टि के भीतर। यदि उसकी दृष्टि आने वाली पीढ़ी को नए प्रश्न देती है, तो उसका आलोचनात्मक जीवन समाप्त नहीं होता।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना का पुनर्पाठ इसलिए आवश्यक है कि हिंदी आलोचना को आज फिर से उसी चीज की आवश्यकता है जिसकी उन्हें सबसे अधिक चिंता थी: स्वतंत्र दृष्टि।

स्वतंत्र दृष्टि का अर्थ अकेले खड़े होना नहीं। इसका अर्थ है किसी भी समूह, प्रतिष्ठा, परंपरा या विचार के सामने अपनी विवेकशीलता को गिरवी न रखना।

आलोचक को सबके निकट जाना चाहिए, लेकिन किसी का आश्रित नहीं होना चाहिए।

उसे कृति से आत्मीयता रखनी चाहिए, लेकिन मोहग्रस्त नहीं होना चाहिए।

उसे परंपरा का सम्मान करना चाहिए, लेकिन प्रश्न पूछना बंद नहीं करना चाहिए।

उसे अपने समय को समझना चाहिए, लेकिन समय के शोर में अपनी आवाज नहीं खोनी चाहिए।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना की अपनी जमीन इन्हीं तनावों से बनती है।

इसलिए उन्हें पढ़ने का सबसे सार्थक तरीका यह नहीं कि उनके विचारों को अंतिम निष्कर्ष मान लिया जाए। उन्हें पढ़ते हुए अपनी आलोचनात्मक दृष्टि को अधिक सजग करना ही उनके प्रति वास्तविक सम्मान है।

क्योंकि अंततः महान आलोचना वह नहीं जो पाठक को अपने निष्कर्ष दे दे।

महान आलोचना वह है जो पाठक को बेहतर प्रश्न पूछने की क्षमता दे।

सत्यप्रकाश मिश्र की आलोचना की स्थायी उपलब्धि शायद यही है।

उन्होंने साहित्य को केवल पढ़ने की चीज नहीं माना, उसे समझने की जिम्मेदारी माना।

और आलोचना को केवल निर्णय देने की शक्ति नहीं, साहित्यिक विवेक की जिम्मेदारी माना।

यही कारण है कि उन्हें याद करना किसी भूले हुए नाम को सूची में जोड़ना नहीं है। उन्हें पढ़ना हिंदी आलोचना के उस हिस्से को फिर से सक्रिय करना है जहाँ साहित्यिक प्रतिष्ठा से अधिक महत्त्व कृति, विवेक और मनुष्य का है।


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