सर्वेश्वर दयाल सक्सेना: समय की नब्ज पर सर्वेश्वर की उंगली

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Sarveshwar Dayal Saxena: Sarveshwar's finger on the pulse of the times.

Parichay Das

— परिचय दास —

र्वेश्वर दयाल सक्सेना की पत्रकारिता को केवल साहित्यकार की पत्रकारिता कह देना उसके वास्तविक महत्त्व को छोटा कर देना होगा। उनकी पत्रकारिता में एक ऐसा विवेक सक्रिय दिखाई देता है जो सूचना को जीवन से अलग करके नहीं देखता। उनके लिए समाचार केवल घटित घटना नहीं था बल्कि घटना के भीतर छिपा हुआ मनुष्य था। इसी कारण उनकी पत्रकारिता में तथ्य के साथ संवेदना, टिप्पणी के साथ व्यंग्य और तात्कालिकता के साथ एक गहरी नैतिक बेचैनी दिखाई देती है। वे पत्रकारिता को सूचना पहुँचाने का माध्यम भर नहीं मानते, बल्कि उसे सार्वजनिक विवेक को जाग्रत करने वाली भाषा में बदल देते हैं। ‘दिनमान’ से उनका जुड़ाव इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण है। 1964 में ‘दिनमान’ से जुड़े और बाद में उसके संपादन से भी उनका गहरा संबंध बना; 1982 में वे ‘पराग’ के संपादक बने।

सर्वेश्वर की पत्रकारिता का सबसे विशिष्ट पक्ष यह है कि उन्होंने पत्रकार और साहित्यकार के बीच खड़ी की गई कृत्रिम दीवार को स्वीकार नहीं किया। उनके लिए साहित्य जीवन की गहराई में उतरने का माध्यम था और पत्रकारिता जीवन के वर्तमान क्षण को पकड़ने का। दोनों की दिशाएँ अलग हो सकती थीं, लेकिन मनुष्य उनके केंद्र में एक ही था। इसलिए उनकी पत्रकारिता में कविता की संवेदना आती है, पर कविता की धुँध नहीं; विचार आता है, पर विचार का बोझ नहीं; व्यंग्य आता है, पर केवल हँसाने के लिए नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ उनकी पत्रकारिता अपनी स्वतंत्र पहचान बनाती है।

उनका प्रसिद्ध स्तंभ ‘चरचे और चरखे’ इस दृष्टि से असाधारण प्रयोग था। उसमें उन्होंने बड़े राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों को सीधे भाषण में नहीं बदला। उन्होंने उन्हें रोजमर्रा की भाषा, छोटे प्रसंगों, विडंबनाओं और हास्य के माध्यम से पकड़ा। ‘चरचा’ सार्वजनिक जीवन की बहस थी और ‘चरखा’ उस बहस को कातने वाली उनकी भाषा। यह केवल शब्द-क्रीड़ा नहीं थी। इसके भीतर एक संपादकीय पद्धति छिपी थी: गंभीर बात को गंभीर मुद्रा में कहना आवश्यक नहीं है। कभी-कभी मुस्कराता हुआ वाक्य सत्ता, समाज और व्यवस्था की उस नस पर हाथ रख देता है जहाँ लंबा भाषण पहुँच ही नहीं पाता। उनके इस स्तंभ को समकालीन साहित्यिक स्रोत भी उनकी पत्रकारिता की विशिष्ट पहचान मानते हैं।

सर्वेश्वर के यहाँ व्यंग्य का संबंध उपहास से नहीं, विवेक से है। वे जिस चीज पर हँसते हैं, उसके पीछे कोई मानवीय संकट छिपा होता है। यही कारण है कि उनका व्यंग्य पाठक को केवल मनोरंजन देकर मुक्त नहीं करता। वह उसे भीतर से असुविधाजनक बनाता है। पढ़ते हुए हँसी आती है और उसी हँसी के भीतर एक प्रश्न खड़ा हो जाता है कि हम जिस व्यवस्था को सामान्य मानकर जी रहे हैं, उसमें असामान्य क्या-क्या हो चुका है। इस प्रकार उनका व्यंग्य पत्रकारिता में नैतिक हस्तक्षेप बन जाता है।

उनकी भाषा का सबसे बड़ा गुण उसकी सहजता है। वे पत्रकारिता की ऐसी भाषा रचते हैं जो न तो सरकारी सूचना की निर्जीव भाषा है, न साहित्यिक आभूषणों से लदी हुई भाषा। उसमें बोलचाल की गर्मी है, लेकिन विचार की धार भी है। यही कारण है कि उनका गद्य पढ़ते हुए पाठक को यह अनुभव नहीं होता कि उसके सामने कोई कठिन विचार रखा जा रहा है। विचार धीरे-धीरे भाषा में घुलता है और फिर पाठक के अपने विचार की तरह भीतर बैठ जाता है। हिंदी पत्रकारिता में भाषा के इस लोकतंत्रीकरण का महत्व बहुत बड़ा है। ‘दिनमान’ से जुड़े लेखकों ने पत्रकारिता की एक ऐसी भाषा विकसित की जिसमें साहित्यिक संस्कार और सामाजिक सरोकार साथ दिखाई देते हैं।

सर्वेश्वर की पत्रकारिता को समझने के लिए उनके विषय-चयन पर भी ध्यान देना चाहिए। वे केवल राजनीति के बड़े प्रश्नों के पत्रकार नहीं थे। साहित्य, रंगमंच, नृत्य, संस्कृति, सामाजिक जीवन और सामान्य मनुष्य की समस्याएँ भी उनके लेखन में आती हैं। यह विस्तार बताता है कि उनके लिए समाज का अर्थ केवल संसद, सरकार और राजनीतिक दल नहीं था। समाज वह पूरा जीवन था जिसमें मनुष्य काम करता है, प्रेम करता है, डरता है, सपने देखता है, अन्याय सहता है और कभी-कभी उसी अन्याय पर हँसने का साहस भी जुटाता है। उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक टिप्पणियों का उल्लेख उनके परिचय-स्रोतों में भी मिलता है।

यहीं से उनकी पत्रकारिता में एक आधुनिक बौद्धिक दृष्टि दिखाई देती है। वे परंपरा को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करते कि वह पुरानी है और नवीनता को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करते कि वह नवीन है। उनकी कसौटी मनुष्य है। जो विचार मनुष्य को छोटा करता है, उस पर उनकी दृष्टि संदेह करती है; जो व्यवस्था मनुष्य की स्वतंत्रता और गरिमा को चोट पहुँचाती है, उसके भीतर की विडंबना को वे उजागर करते हैं। इस दृष्टि से उनकी पत्रकारिता किसी तैयार विचारधारा की व्याख्या कम और स्वतंत्र विवेक की पत्रकारिता अधिक है।

उनकी आलोचनात्मक चेतना का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है सत्ता और सामान्य नागरिक के बीच की दूरी को पहचानना। सत्ता अपनी भाषा स्वयं बनाती है। वह उपलब्धियों, योजनाओं, घोषणाओं और आदर्शों की भाषा बोलती है। सामान्य मनुष्य उस भाषा के बाहर अपने अनुभव में जीता है। सर्वेश्वर की पत्रकारिता इन दोनों भाषाओं के बीच खड़ी होती है। वह घोषणा के सामने अनुभव रखती है। नारा सामने हो तो उसके पीछे छूट गए मनुष्य को खोजती है। आँकड़ा सामने हो तो उसके भीतर छिपे जीवन को देखने की कोशिश करती है। यही उनकी पत्रकारिता की असली सामाजिक शक्ति है।

उनका व्यंग्य इसलिए प्रभावशाली है कि वह बाहर से थोपा हुआ नहीं लगता। वह जीवन की विसंगतियों से पैदा होता है। ‘जूते और जवान की जगलबंदी’, ‘दशहरा और रावण’, ‘नैतिकता की तलाश’ जैसे लेखों के उदाहरणों को लेकर शोध में यह रेखांकित किया गया है कि उन्होंने समकालीन सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को व्यंग्यात्मक ढंग से सामने रखा। इन शीर्षकों को देखें तो स्पष्ट होता है कि सर्वेश्वर सीधे उपदेश देने के बजाय वस्तुओं, प्रतीकों और साधारण जीवन-स्थितियों को अपने विचार का माध्यम बनाते हैं। यही उनकी पत्रकारिता की रचनात्मक युक्ति है।

‘दशहरा और रावण’ जैसा शीर्षक अपने भीतर ही सर्वेश्वर की पत्रकारिता का एक सूत्र छिपाए हुए है। वे मिथक को संग्रहालय में रखी हुई वस्तु की तरह नहीं देखते। उसे वर्तमान के सामने खड़ा कर देते हैं। रावण बाहर कहीं नहीं, हमारे सामाजिक व्यवहार में भी हो सकता है। इसी तरह नैतिकता कोई पुस्तक में सुरक्षित शब्द नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में बार-बार परीक्षा देने वाली चीज है। इस प्रकार उनकी पत्रकारिता अतीत को वर्तमान से जोड़ती है, लेकिन अतीत के प्रति अंधी श्रद्धा के कारण नहीं, बल्कि वर्तमान की आलोचना के लिए।

‘पराग’ के संपादन में भी उनकी पत्रकारिता-दृष्टि का दूसरा रूप सामने आता है। उन्होंने बाल-पत्रिका को केवल बच्चों के मनोरंजन का साधन नहीं माना। उनका विश्वास था कि किसी समाज का भविष्य उसके बाल साहित्य की समृद्धि से भी जुड़ा है। इसका अर्थ यह है कि संपादक सर्वेश्वर के लिए पाठक कोई एकरूप भीड़ नहीं था। वह बच्चे में भविष्य का नागरिक और पाठक दोनों देखते थे। इसलिए उनकी पत्रकारिता में पाठक के प्रति जिम्मेदारी का भाव बहुत गहरा था।

यहाँ उनकी संपादकीय दृष्टि को विशेष रूप से रेखांकित करना चाहिए। वे केवल सामग्री चुनने वाले संपादक नहीं थे। वे पाठक की बौद्धिक आदतों को निर्मित करने वाले संपादक थे। ‘दिनमान’ में साहित्य, संस्कृति और सामाजिक प्रश्नों को जगह देना तथा ‘पराग’ में बच्चों के लिए गंभीर और रचनात्मक सामग्री का आग्रह इसी संपादकीय विश्वास से जुड़ा है। पत्रकारिता उनके लिए बाजार में बिकने वाली सामग्री तैयार करने का शिल्प नहीं थी। वह पाठक के भीतर प्रश्न पैदा करने की प्रक्रिया थी।

सर्वेश्वर की पत्रकारिता में रिपोर्ट और टिप्पणी के बीच भी एक दिलचस्प तनाव दिखाई देता है। पारंपरिक समाचार में पत्रकार घटना के पीछे खड़ा रहता है, लेकिन सर्वेश्वर घटना के भीतर उपस्थित मनुष्य को सामने लाते हैं। फिर भी वे निजी भावुकता को तथ्य पर हावी नहीं होने देते। उनकी शक्ति इसी संतुलन में है। वे घटना को साहित्य में विलीन नहीं करते, बल्कि साहित्यिक संवेदना से घटना को अधिक मानवीय बना देते हैं। इसीलिए उनका गद्य पत्रकारिता होते हुए भी केवल पत्रकारिता नहीं रह जाता।

उनकी दृष्टि का सबसे मौलिक पक्ष शायद यही है कि वे ‘सार्वजनिक’ और ‘निजी’ के बीच की सीमा को लगातार प्रश्नांकित करते हैं। समाज की बड़ी समस्याएँ घरों तक आती हैं और घर की छोटी-छोटी पीड़ाएँ समाज की बड़ी संरचनाओं से जुड़ी होती हैं। भ्रष्टाचार केवल सरकारी कार्यालय की समस्या नहीं है; वह नागरिक जीवन की नैतिकता को भी प्रभावित करता है। अन्याय केवल किसी समाचार की घटना नहीं है; वह किसी परिवार की रात की नींद हो सकता है। सर्वेश्वर इसी अदृश्य संबंध को अपनी भाषा में दृश्य बनाते हैं।

इस दृष्टि से उनकी पत्रकारिता में करुणा भी है, लेकिन वह करुणा निष्क्रिय नहीं है। वे पाठक को केवल दुखी नहीं करते। वे उसे जाग्रत करते हैं। उनकी भाषा का उद्देश्य संवेदना को क्रिया में बदलना है। इसीलिए उनके व्यंग्य में भीतर से आती हुई बेचैनी है। हँसी उनके यहाँ अंतिम पड़ाव नहीं, प्रश्न की शुरुआत है।

सर्वेश्वर को केवल ‘व्यंग्यकार पत्रकार’ कह देना भी पर्याप्त नहीं होगा। उनका व्यंग्य उनकी व्यापक मानवीय दृष्टि का एक औजार है। वे मूलतः भाषा के माध्यम से सार्वजनिक जीवन की छिपी हुई असंगतियों को सामने लाने वाले लेखक हैं। उनकी कविता में जो मनुष्य प्रकृति, अकेलेपन और सामाजिक पीड़ा के बीच दिखाई देता है, वही पत्रकारिता में व्यवस्था, राजनीति और सामाजिक व्यवहार के बीच दिखाई देता है। विधा बदलती है, मनुष्य नहीं।

उनकी पत्रकारिता की एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि उसमें साहित्यिकता और पत्रकारिता एक-दूसरे को नष्ट नहीं करतीं। प्रायः साहित्यिक भाषा समाचार को धुँधला कर देती है और अत्यधिक पत्रकारिता साहित्यिक संवेदना को सपाट बना देती है। सर्वेश्वर इन दोनों के बीच तीसरी राह बनाते हैं। उनका वाक्य सूचनात्मक भी हो सकता है और स्मरणीय भी। उसमें तत्कालीन घटना का ताप भी रहता है और भाषा की अपनी स्वतंत्र चमक भी।

यहीं उनकी पत्रकारिता हिंदी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने यह प्रमाणित किया कि पत्रकारिता की भाषा सरल होने का अर्थ विचारहीन होना नहीं है। सहजता का अर्थ बौद्धिक दरिद्रता नहीं। व्यंग्य का अर्थ हल्कापन नहीं। और साहित्यिकता का अर्थ कठिन शब्दों का प्रदर्शन नहीं। उनकी भाषा इन सारे भ्रमों को एक साथ तोड़ती है।

सर्वेश्वर की पत्रकारिता को पढ़ते हुए इसलिए हमें उनके समय को ही नहीं, अपने समय को भी पढ़ना पड़ता है। उनकी अनेक टिप्पणियों के प्रसंग बदल चुके हैं, संस्थाएँ बदल गई हैं, राजनीतिक संदर्भ बदल गए हैं, लेकिन मनुष्य और व्यवस्था के बीच का तनाव बना हुआ है। यही किसी पत्रकार के स्थायी महत्व की पहचान है। तत्कालीन घटना समाप्त हो जाती है, पर उस घटना को देखने की दृष्टि जीवित रहती है।

इस अर्थ में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पत्रकारिता समाचारों की स्मृति नहीं, दृष्टि की स्मृति है। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को केवल नई सामग्री नहीं दी, उसे देखने की एक अलग आँख दी। वह आँख सत्ता से चकित नहीं होती, समाज से घृणा नहीं करती और मनुष्य से उम्मीद छोड़ती भी नहीं। वह हँसते हुए प्रश्न करती है, प्रश्न करते हुए दुख को पहचानती है और दुख को पहचानते हुए भाषा को मनुष्य के पक्ष में खड़ा करती है। ‘दिनमान’ के ‘चरचे और चरखे’ से लेकर ‘पराग’ के संपादन तक उनकी पूरी पत्रकारिता इसी जीवित संबंध की कहानी है। उपलब्ध स्रोत भी उनके ‘चरचे और चरखे’ को उनकी विशिष्ट पत्रकार पहचान और ‘पराग’ के संपादन को उनके अंतिम वर्षों के महत्वपूर्ण संपादकीय दायित्व के रूप में दर्ज करते हैं।

सर्वेश्वर की पत्रकारिता की सबसे बड़ी मौलिकता शायद इसी में है कि उन्होंने पत्रकारिता को ‘घटना लिखने’ से ‘समय को पढ़ने’ की ओर मोड़ा। घटना तो हर पत्रकार लिख सकता है; समय की चाल को पहचानना दूसरी बात है। उन्होंने अपने समय की भाषा, उसकी विडंबना, उसके भय, उसके छल, उसकी आकांक्षाओं और उसकी बची हुई मनुष्यता को पकड़ा। इसलिए उनका पत्रकार गद्य आज भी केवल पुरानी पत्रिका का पीला पड़ चुका पन्ना नहीं लगता। उसमें वर्तमान को पहचान लेने वाली बेचैनी अब भी धड़कती है।

और शायद यही सर्वेश्वर की पत्रकारिता का अंतिम अर्थ है: उन्होंने समाचार के भीतर मनुष्य और मनुष्य के भीतर समय को खोजा। उनके यहाँ पत्रकारिता सूचना से शुरू होकर विवेक तक पहुँचती है। यही उसे साहित्य से जोड़ता है और यही उसे साहित्य से अलग भी करता है। उन्होंने पत्रकारिता को साहित्य का अनुचर नहीं बनाया; उसे अपनी स्वतंत्र गरिमा दी। भाषा उनके हाथ में केवल लिखने का माध्यम नहीं रही, वह सार्वजनिक जीवन की नैतिक जाँच का उपकरण बन गई। यही कारण है कि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पत्रकारिता को हिंदी गद्य के इतिहास में पढ़ना केवल एक कवि की दूसरी विधा को पढ़ना नहीं, बल्कि उस समय की आत्मा को उसकी बोलती हुई भाषा में सुनना है।


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