
सत्य निकेतन मेरे लिए दिल्ली का केवल एक इलाका नहीं है। यह वह जगह है जहाँ से मेरी करीब 15 साल पहले दिल्ली और दिल्ली विश्वविद्यालय की यात्रा शुरू हुई थी। जीसस एंड मैरी कॉलेज से लगभग दस मिनट की पैदल दूरी पर स्थित यह इलाका मेरे जीवन के सात वर्षों का साक्षी रहा है। इन सात वर्षों में मैंने यहाँ केवल पढ़ाई ही नहीं की, बल्कि घर से दूर आत्मनिर्भर जीवन जीने का अर्थ भी सीखा — आटे-चावल के दाम से लेकर मकान मालिकों की मनमानी तक; बौद्धिक विकास से लेकर मानसिक और भावनात्मक संघर्षों तक; नए संपर्कों/संबंधों से लेकर अलगाव-बोध से पैदा उदासी तक!
आज जब सत्य निकेतन में एक छात्र-आवासीय इमारत के ढहने की खबर चर्चा में है, तो यह घटना मेरे लिए केवल एक समाचार नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था पर गंभीरता पूर्वक पुनर्विचार करने का अवसर है, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से आए विद्यार्थी अपने भविष्य के निर्माण के लिए महानगरों में आते हैं और उन्हें सुरक्षित, सम्मानजनक और सुलभ आवास के बदले अक्सर कड़वे समझौते करने पड़ते हैं।
सत्य निकेतन और उसके आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में मकान समय के साथ पेइंग गेस्ट (पीजी) और निजी छात्रावासों में बदल गए। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस से निकटता के कारण यह क्षेत्र विद्यार्थियों के लिए स्वाभाविक आवासीय केंद्र बन गया।
मेरे शुरुआती दिनों में एक कमरे में तीन-चार बेड लगा होना सामान्य बात थी। लगभग 2010 के आसपास प्रति बेड 4-5 हजार रुपये किराया देना पड़ता था। इसमें भोजन और बिजली का खर्च शामिल नहीं होता था। समय के साथ, विशेषकर क्षेत्र में मेट्रो कनेक्टिविटी और विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या के बाद, यही किराया कई जगहों पर 13-18 हजार रुपये प्रति बेड तक पहुँच गया। लेकिन सवाल केवल किराए का ही नहीं है, सवाल यह भी है कि इतने पैसे देने के बाद विद्यार्थी को मिलता क्या है — सुविधा, सुरक्षा और सम्मान या केवल रहने की मजबूरी?
रोजमर्रा की छोटी समस्याएँ, धीरे-धीरे बड़ी हो जाती हैं। पीजी में हर दिन कोई न कोई समस्या सामने आना असामान्य नहीं था। कभी पानी नहीं आता था, और आता भी था तो गंदा पानी। कभी कूड़ा उठाने वाले का नहीं आना तो कभी गैस खत्म हो जाने के कारण तीन-चार दिन बाहर का खाना खाना पड़ता था। किसी सामान की मरम्मत की आवश्यकता हो तो शिकायत दर्ज कराने के बावजूद कार्रवाई समय पर नहीं होती थी। मकान मालिक का एक आम जवाब होता था — “ज्यादा परेशानी है तो खाली कर दो।”
इस एक वाक्य में पूरी व्यवस्था की शक्ति-संरचना छिपी हुई थी। मकान मालिक जानते थे कि विद्यार्थी के पास विकल्प सीमित हैं। यदि वह कमरा खाली भी कर दे तो उसे दूसरा कमरा भी लगभग उसी परिस्थिति में मिलेगा — शायद उससे भी खराब। इसलिए विद्यार्थी शिकायत करने के बजाय समझौता करता रहता है।
मकान की दीवारों की मरम्मत कब करनी है, यह मकान मालिक भूल सकता है; लेकिन किराया किस तारीख को लेना है, यह वह कभी नहीं भूलता। फोन करने पर कई दिनों तक जवाब न देने वाला मकान मालिक भी किराए की तारीख आते ही कई बार फोन कर सकता है। यह केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि उस असंतुलित व्यवस्था का संकेत है जिसमें भुगतान करने वाला विद्यार्थी ग्राहक होते हुए भी उससे जुड़े अधिकारों से लगभग वंचित रहता है।
विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या ने सत्य निकेतन जैसे क्षेत्रों में पीजी व्यवसाय को एक बड़ा आर्थिक मॉडल बना दिया। एक छोटे से मकान में अधिक से अधिक बेड लगाकर अधिकतम किराया प्राप्त करना धीरे-धीरे सामान्य होता गया। यहीं से समस्या शुरू होती है। जिन इमारतों में विद्यार्थी अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए आते हैं, वही इमारतें कभी-कभी उनके वर्तमान यहां तक कि वजूद के लिए खतरा बन जाती हैं। जैसा की 6 सितंबर की भरी दोपहरी में हुआ।
क्या विद्यार्थी केवल इसलिए असुरक्षित रहें कि वे ‘स्थानीय मतदाता’ नहीं हैं? यह प्रश्न शायद सबसे ज्यादा असुविधाजनक है। देश के अलग-अलग राज्यों से विद्यार्थी दिल्ली आते हैं। वे यहाँ विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेते हैं, फीस देते हैं, पुस्तकें खरीदते हैं, स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देते हैं और अपने श्रम तथा प्रतिभा से शहर का हिस्सा बनते हैं। फिर भी वे अक्सर स्थानीय राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में सबसे कम प्रभावशाली वर्गों में दिखाई देते हैं।
वे दिल्ली के मतदाता भले न हों, लेकिन वे दिल्ली के विद्यार्थी तो हैं। उनका अधिकार केवल विश्वविद्यालय की कक्षा तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षा का अधिकार एक सुरक्षित जीवन-परिस्थिति से भी जुड़ा है। यदि विद्यार्थी को हर शाम यह चिंता करनी पड़े कि पानी आएगा या नहीं, गैस है या नहीं, मकान मालिक शिकायत सुनेगा या नहीं, इमारत सुरक्षित है या नहीं — तो उसका मानसिक और शैक्षणिक जीवन दोनों प्रभावित होंगे।
सत्य निकेतन ने मुझे एक और बात सिखाई। कॉलेज और विश्वविद्यालय में विद्यार्थी का बौद्धिक विकास होता है, लेकिन उसका मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक जीवन उस वातावरण में बनता है जिसमें वह कॉलेज के बाद लौटता है। कक्षा में हम विचारों से जूझते हैं, कमरे में लौटकर जीवन की वास्तविकताओं से। एक तरफ किताबें, शोध, परीक्षाएँ और भविष्य के सपने होते हैं, दूसरी तरफ किराया, बिजली, पानी, खाना, मकान मालिक और रोजमर्रा की अनिश्चितताएँ। इसलिए विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास की बात तभी सार्थक होगी, जब उसकी रहने की जगह भी उसके विकास का सहारा बने, बाधा नहीं। और शायद यही सत्य निकेतन की सबसे बड़ी सीख है।
एक विद्यार्थी से केवल यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह कठिन परिस्थितियों को सहकर पढ़ता रहे। जरूरी यह है वह सुरक्षित, सुविधायुक्त और सम्मानजनक परिस्थितियों में पढ़ाई करे।
आवश्यकता केवल यह देखने की नहीं है कि कोई इमारत खड़ी है या नहीं। आवश्यकता यह देखने की है कि उसमें रहने वाले लोग सुरक्षित भी हैं या नहीं। इस पूरी समस्या का समाधान केवल मकान मालिकों पर कार्रवाई करने से नहीं होगा। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को भी अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे विशालकाय संस्थान में विद्यार्थियों की संख्या बहुत बड़ी है, जबकि विश्वविद्यालय के छात्रावासों की उपलब्धता अत्यंत सीमित है। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में विद्यार्थी निजी पीजी और हॉस्टलों पर निर्भर होते हैं। इसलिए आवश्यकता है कि विश्वविद्यालय:
1 छात्रावासों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि करें। इसके लिए सभी कालेजों में छात्रावास कायम किए जाए।
2 उपलब्ध सीटों का विस्तार करें।
4 निजी पीजी और हॉस्टलों के साथ सुरक्षा-संबंधी न्यूनतम मानकों पर स्पष्ट व्यवस्था सुनिश्चित करें।
5 विद्यार्थियों के लिए शिकायत और सहायता की प्रभावी प्रणाली बनाएँ।
6 स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर छात्र-आवासीय क्षेत्रों की नियमित सुरक्षा-जाँच सुनिश्चित करें।
सत्य निकेतन आज मेरी स्मृतियों में बना हुआ है। यहाँ मैंने दिल्ली को करीब से जाना। एक सवाल भीतर से उठता है — क्या हम अपने विद्यार्थियों से केवल यह उम्मीद करते रहेंगे कि वे हर परिस्थिति में संघर्ष करके सफल हों, या कभी ऐसी व्यवस्था भी बनाएँगे जिसमें उन्हें संघर्ष के बजाय सीखने, सोचने और विकसित होने का अवसर मिले?
(ज्योति चौहान ने एमफिल और पीएचडी सहित अपनी उच्च शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से प्राप्त की है। वे एक प्राइवेट संस्थान में अध्यापन करती हैं)
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