सूचनाधिकार कानून कमजोर किये जाने पर जस्टिस लोकुर ने जतायी चिंता

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13 अक्टूबर। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन बी लोकुर ने सूचना के अधिकार कानून के कमजोर होने के उदाहरण के रूप में पीएम केयर्स फंड के बारे में सूचना के अभाव को पेश किया है।

उन्होंने कहा है कि हमें नहीं पता कि पीएम केयर्स फंड में जमा पैसा कहां जा रहा है। जस्टिस लोकुर ने कहा है, “सामान्य नागरिकों और बड़े व्यवसायों के दान किए गए करोड़ों रुपए कैसे खर्च किए जा रहे हैं, इस बारे में सार्वजनिक स्तर पर कोई जानकारी नहीं है।”

उन्होंने कहा, “एक और उदाहरण लेते हैं, पीएम केयर्स फंड। इसमें भी करोड़ों रुपये हैं। हम जानते हैं कि सरकारी कर्मचारियों ने पैसा दान किया है। सीएसआर को पीएम-केयर्स की ओर मोड़ दिया गया। लेकिन फंड में कितना पैसा है, हमें नहीं पता ? इसे कैसे खर्च किया गया, हमें नहीं पता? हमें बताया गया था कि इसका उपयोग वेंटिलेटर खरीदने के लिए किया जाएगा। वास्तव में क्या हुआ है? हम नहीं जानते।”

जस्टिस लोकुर ने कहा, “यदि आप पीएम-केयर्स वेबसाइट पर जाते हैं तो आप पाएंगे कि 28 फरवरी 2020 से 31 मार्च 2020 की अवधि तक की एक ऑडिट रिपोर्ट है, जिसमें कहा गया है कि चार दिनों में 3000 करोड़ रुपये जुटाए गए … यदि आप उस औसत को लेकर गिनें तो हम सैकड़ों और हजारों करोड़ रुपये की बात कर रहे होंगे! लेकिन यह पैसा कहां जा रहा है? हमें नहीं पता?”

जस्टिस लोकुर ने कहा, “2020-2021 की अवधि की ऑडिट रिपोर्ट अभी तक तैयार नहीं की गई है….एक साल बीत चुका है, आज 12 अक्टूबर है, ऑडिट रिपोर्ट के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है।”

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री कार्यालय पीएम केयर्स फंड की जानकारी देने से मना कर चुका है। इस संबंध में दायर एक याचिका को वह खारिज कर चुका है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा था कि पीएम केयर्स का गठन कोविड की आपात स्थिति के दरमियान एक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में किया गया था। य‌ह आरटीआई कानून के अर्थ में ‘पब्ल‌िक अथॉरिटी’ नहीं है। ‌दिल्‍ली हाईकोर्ट पीएम केयर्स से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।

जस्टिस मदन बी. लोकुर ने ये बातें सूचना अधिकार अधिनियम के 16 साल पूरे होने के मौके पर नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टु इन्‍फॉर्मेशन (एनसीपीआरआई) की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में कही।

उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार मारिया रेसे के एक उद्धरण से की, “तथ्यों के बिना आप के पास सच नहीं हो सकता है। सच के बिना आप के पास भरोसा नहीं हो सकता और इनमें से किसी भी चीज के बिना आप लोकतंत्र नहीं हो सकते।” जस्टिस लोकुर ने अपने भाषण में बताया कि कैसे कई तरीकों से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नष्ट किया जा रहा है।

उन्होंने आरटीआई एक्ट की धारा चार के बारे में बात करते हुए कहा, “हमें सरकार से जानकारी नहीं मांगनी चाहिए, बल्‍कि आरटीआई एक्ट की धारा चार के तहत सरकार को जानकारी खुद देना चाहिए।”

संस्थाओं पर आरटीआई एक्ट लागू होने के मुद्दे पर जस्टिस लोकुर ने राजनीतिक दलों की चर्चा की। उन्होंने कहा, 2013 के केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश में कहा गया था कि राजनीतिक दल आरटीआई एक्ट के दायरे में आते हैं क्योंकि वे आरटीआई एक्ट के सेक्शन 2 (एच) के तहत ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ हैं।

उन्होंने कहा, “8 साल बीत चुके हैं फिर भी एक भी पार्टी सीआईसी के आदेश और आरटीआई एक्ट का अनुपालन नहीं कर रही है!” भाषण के समापन में उन्होंने कहा, “यह सकारात्मक बदलाव की शुरुआत होती है, जहां सरकार स्वतंत्र रूप से सूचना देती है और लोगों को जानकारी मांगने के लिए इधर-उधर नहीं जाना पड़ता है।

( livelawhindi से साभार )

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