Tag: अरुण कुमार त्रिपाठी
संवाद और संग्राम के बीच हमारी सभ्यता – अरुण कुमार त्रिपाठी
वैसे तो पूरी मानव सभ्यता ही संवाद और संग्राम के बीच उलझी हुई है लेकिन भारत विशेष तौर पर इसका शिकार है। जंतर मंतर...
वांगचुक को कोसिए, सत्याग्रह को नहीं – अरुण कुमार त्रिपाठी
कृतघ्नता दिल्ली के स्वभाव में है। चूंकि दिल्ली भारत की राजधानी है इसलिए वह स्वभाव एक चरित्र बनकर पूरे देश में व्याप्त हो गया...
गालियां मोहब्बत की, गालियां नफरत की और गालियां गुस्से की
— अरुण कुमार त्रिपाठी —
जंतर मंतर प्रदर्शन और अनशन के दौरान जेन-जी के बयानों और पोस्टरों में सरकार और उसके पदाधिकारियों के लिए गालियां...
डूबते लोकतंत्र को जेन जी का किनारा – अरुण कुमार त्रिपाठी
अचानक पुरानी हिंदी फिल्मों के गाने याद आने लगे। 1954 में ‘जागृति’ फिल्म आई थी। उसका एक गाना लोगों की जुबान पर लंबे समय...
क्या इससे रुक जाएगा हिंदू राष्ट्र का रथ? – अरुण कुमार...
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और शिक्षा में सुधार की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर से पूरे देश में फैल चुका...
सभ्य समाज को ही मिलती है अच्छी पुलिस – अरुण कुमार...
साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता, जाने माने शायर और इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति रहे आनंद नारायण मुल्ला ने 1961 में भारतीय पुलिस व्यवस्था को...
भगवान के भरोसे है हमारी नागरिकता – अरुण कुमार त्रिपाठी
भारतीय नागरिकता पर विदेश मंत्रालय के बयान के बाद देश में एक नए किस्म का भ्रम पैदा हो गया है। अब पासपोर्ट धारी लोग...
हिंदू नैतिकता, संघ और भारतीय समाज – अरुण कुमार त्रिपाठी
पिछले दिनों स्वयं सेवी संगठनों के कुछ मित्रों के आमंत्रण पर जयपुर में था। वह गोष्ठी सामाजिक नागरिक संस्थाओं के आत्मावलोकन की एक कोशिश...
बहुत अंतर है नेहरू-मोदी और उनके युग में – अरुण कुमार...
हरिवंश राय बच्चन की रचना मधुशाला की कुछ पंक्तियां पंडित जवाहर लाल नेहरू और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल की तुलना पर एकदम सटीक...
आत्मरति, अवसाद और प्रहसन में घिरा समाज – अरुण कुमार त्रिपाठी
मशहूर समाजशास्त्री आशीष नंदी ने कुछ साल पहले एक पुस्तक लिखी थी जिसका शीर्षक था—रिजीम्स आफ नारसिसिज्म, रिजीम्स आफ डेस्पेयर। यानी आत्मरति और अवसाद...




















