
मशहूर समाजशास्त्री आशीष नंदी ने कुछ साल पहले एक पुस्तक लिखी थी जिसका शीर्षक था—रिजीम्स आफ नारसिसिज्म, रिजीम्स आफ डेस्पेयर। यानी आत्मरति और अवसाद का समय। शासक वर्ग आत्मरति में मग्न है और बाकी समाज असवाद में। लगता है सचमुच हमारा समाज उसी स्थिति में चला गया है। अगर न गया होता तो मुख्य न्यायाधीश की काकरोच वाली टिप्पणी पर रचे गए प्रहसन पर ऐसी प्रतिक्रिया न करता जैसी कर रहा है। यह आजमाया हुआ सिद्धांत है कि तानाशाह सबसे अधिक हास्य और प्रहसन से ही चिढ़ता और डरता है। कभी स्पेन के तानाशाह जनरल फ्रैंको ने आदेश जारी किया कि जब भी देश के दो नागरिक मिलेंगे तो तीन बार हेल फ्रैंको, बोलेंगे। यानी तीन बार उसकी जय जयकार करेंगे। एक कमेडियन ने रेस्तरां में जाकर तीन बार चाय चाय कह कर चाय का आर्डर दिया। देखते देखते सारा शहर हर बात को तीन बार कहने लगा। जब यह बात तानाशाह तक पहुंची तो उसने आदेश वापस ले लिया। लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है। अधिनायकवाद और उसका समर्थक वर्ग तो काकरोच जनता पार्टी का अपने ढंग से इस्तेमाल कर रहा है और विपक्ष के समर्थक उसके भाव और प्रभाव को समझे बिना उस पर हमलावर हो गए हैं। वे समझ रहे हैं कि यह कोई साजिश है जो उसके जनाधार को समाप्त करने के लिए की गई है, जिसे क्रांतिकारी प्रश्नों से घेर लिए जाने की जरूरत है।
कुछ लोग विपक्ष को व्यक्ति वाचक संज्ञा मानते हैं। कुछ लोग दलवाचक संज्ञा मानते हैं तो कुछ लोग गठबंधन वाचक। वे लोग महीने भर पहले गैस के रूप में उदित हुई काकरोच जनता पार्टी के द्रव में परिवर्तित होने से भयभीत हैं कि कहीं उनका संज्ञापद छिन न जाए। इस भयातुर समूहों में वह कांग्रेस पार्टी भी भयभीत है जो 140 साल पुराना है और जिसका अगर पचास पचपन साल के शासन का इतिहास रहा है तो कम से कम सत्तर साल आंदोलन का इतिहास रहा है। वे इस बात से एकदम खुश नहीं हैं कि काकरोच जनता पार्टी नामक नवोदित प्रहसन केंद्रित संगठन से सत्तापक्ष भी आशंकित है। इसकी वजह यह है कि विपक्ष ने हार को अपनी नियति मान लिया है। विपक्ष और विशेषकर कांग्रेस पार्टी के तमाम समर्थक बौद्धिक काकरोच जनता पार्टी पर सत्तापक्ष से अधिक घातक हिट लेकर टूट पड़े हैं। बिना इस बात का ज्ञान रखे कि उनके हिट का आजकल किसी पर कोई असर नहीं होता वे समझते हैं कि वे इस हिट से 1975 के जेपी आंदोलन और 1967 के लोहिया आंदोलन का भी नामोनिशान मिटा डालेंगे। ऐसे लोगों से कुछ प्रतिवेदन किया जाना अपना फर्ज बनता है, मानना न मानना उनके अपने डर और बौद्धिक अहंकार पर निर्भर करता है।
अगर हम विपक्ष को संज्ञा के बजाय एक क्रिया मानें और उसे विरोध शब्द से संबोधित करें तो शायद काकरोच जनता पार्टी या देश के युवाओं में इस व्यवस्था और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर पैदा हुए विरोध को समझ कर उस पर एक सकारात्मक प्रतिक्रिया दे सकेंगे? लोकतंत्र में विरोध या विपक्ष एक मानक और सम्मानित क्रिया है। उसके बिना लोकतंत्र के पहिए रुक जाते हैं उसमें जंग लग जाता है उस तालाब का पानी सड़ने लगता है जिसमें लोकतांत्रिक मूल्यों के कमल खिलने की उम्मीद रहती है। (यहां कमल का मतलब किसी दल विशेष के चुनाव चिह्न से नहीं है। जो अब प्लास्टिक का हो चुका है।) अच्छी बात है कि 6 जून को जंतर मंतर पर प्रस्तावित काकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन में बड़े पैमाने पर युवा ही नहीं बुजुर्ग भी आए और सीपीआई की एनी राजा, सीपीआईएमएल के दीपंकर भट्टाचार्य और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संघ के पदाधिकारी और तमाम वामपंथी लोग भी पहुंचे। उनके पहुंचने का असर यह हुआ कि चंद दिनों पहले गांधीवादी बने कुछ मार्क्सवादी बौद्धिक इस आंदोलन को सीधे सीधे दक्षिणपंथी आंदोलन साबित नहीं कर पाए। हालांकि उनका पूरा प्रयास इसी का था।
काकरोच जनता पार्टी को संज्ञा के बजाय क्रिया कहना इसलिए उचित है क्योंकि वह इस देश में सरकार के हिंदू मुस्लिम और सवर्ण अवर्ण के विभाजन में आकर भटक चुके युवाओं को व्यवस्था का असली चेहरा दिखाने की एक क्रिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक व्यंगात्मक टिप्पणी को अपनी नियति या नाम बना चुका युवाओं का यह समूह कोई क्रांति कर देगा या कोई पार्टी बनाकर चुनावों में पारंपरिक विपक्ष का स्थान ले लेगा या सत्तारूढ़ दल का तख्तापलट कर देगा, भारत में ऐसी संभावना दूर दूर तक दिखती नहीं। धर्मनिरपेक्ष और कांग्रेस की सत्ता कायम करने में लगे बौद्धिकों की यह आशंका सही हो सकती है कि यह लोग भी भारत बनाम भ्रष्टाचार की तरह से आम आदमी पार्टी के रूप में प्रकट होंगे और देश में फासीवादी ताकतों को और मजबूत करेंगे, लेकिन अभी तक इस प्रयास और इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिल रहे हैं। वह अभी तक युवाओं का स्वतःस्फूर्त आंदोलन जैसा ही दिख रहा है और 2010-11 में यूपीए सरकार ने भारत बनाम भ्रष्टाचार के नेताओं की जितनी मिजाजपुर्शी की थी अभी की सरकार उससे बहुत कम कर रही है। कांग्रेस पार्टी अगर अभी भी इस गलतफहमी में है कि वह सत्ता में है और यह आंदोलन उसके विरुद्ध चल रहा है तो यह उसकी बुद्धि की बलिहारी है। कांग्रेस पार्टी शिक्षा जगत और विशेषकर नीट, सीबीएसई में व्याप्त भयंकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध पूरे देश में आंदोलन कर रही है और उसे इसका श्रेय दिया जाना चाहिए। उसके नेता राहुल गांधी मौजूदा सरकार और उसके नेतृत्व के सामने सीना तानकर खड़े हैं इस बात में किसी को कोई संदेह नहीं है। इसीलिए उनसे बहुत उम्मीदें हैं और उन्हें देश का हर समझदार और लोकतांत्रिक व्यक्ति अपना नैतिक और भौतिक समर्थन देने को तैयार है।
लेकिन इस सरकार ने पारंपरिक विपक्ष के दमन और उसे नष्ट करने का जो अभियान छेड़ रखा है, वह एक हद तक इंदिरा गांधी की सरकार ने किया था लेकिन इतने बड़े पैमाने पर कभी नहीं हुआ। आपातकाल को अगर छोड़ दिया जाए तो इंदिरा गांधी के कार्यकाल में विपक्ष के एकजुट होने और प्रतिरोध करने का लोकवृत्त काफी खुला हुआ था। आज अगर हम हाल में मृत्यु को प्राप्त हुए जर्मन दार्शनिक जुगरेन हैबरमास के शब्दों में भारत के विपक्षी लोकवृत्त की बात करें तो कहा जा सकता है कि बिना आपातकाल के ही वह आपातकालीन प्रतिबंधों का शिकार है। इसी स्थिति को देखते हुए हाल में इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक टिप्पणी गौरतलब है। एक सदस्यीय बेंच के न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा है कि अफसर सरकार और अपने राजनीतिक आकाओं के प्रति अधिक वफादार हैं न कि संविधान के प्रति। गाजियाबाद के एक परिवार द्वारा लेन देन में कुछ धांधली हुई तो प्रशासन ने पूरे परिवार पर गैंगेस्टर कानून लगा दिया। जबकि संगठित रूप से अपराध करने का कोई प्रमाण अफसरों के पास नहीं था। हाई कोर्ट ने गैंगेस्टर कानून हटा दिया है।
इस सिलसिले में हमें अभिजीत दीपके के इस बयान को देखना चाहिए कि मेरी मां उस समय ज्यादा दुखी नहीं थीं जब मैं अमेरिका जा रहा था लेकिन जब मैं लौटने लगा तो वे ज्यादा दुखी और असुरक्षित महसूस कर रही थीं। उन्होंने जंतर मंतर पर दिए संबोधन में न सिर्फ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा बल्कि हिंदू मुस्लिम विभाजन का विरोध किया और युवाओं में बनी हुई दहशत को तोड़ने का प्रयास किया। बहुत संभव है कि हार्दिक पटेल की तरह ही अभिजीत दीपके की स्थिति हो और सरकारी दमन के बाद वे अपने प्रतिरोध कार्यक्रम को वापस भी ले लेकिन अगर इससे देश के युवाओं में सत्तर और अस्सी के दशक की प्रतिरोध की चेतना किसी हद तक वापस लौटती है तो उसे एक उपलब्धि मानना होगा। यह आशंका जितनी प्रबल है कि इस आंदोलन का लाभ सत्तापक्ष बखूबी उठा लेगा, उतनी ही यह संभावना भी है कि इससे विपक्ष अपनी ताकत बढ़ाएगा। क्योंकि एक ओर यह आंदोलन उन्हीं बातों को रख रहा है जिन्हें विपक्षी नेता रखते रहे हैं। जैसे कि संविधान सम्मत शासन, शासन करने वालों की जवाबदेही और हिंदू मुस्लिम एजेंडे की समाप्ति और बेरोजगारी मिटाना, शिक्षा व्यवस्था को सुधारना, ग्रामीण शिक्षा में गुणवत्ता लाना और न्यायपालिका जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा बहाल करना।
साथ ही वे आंबेडकर के सपनों का लोकतंत्र कायम करने की बात कर रहे हैं जो कि इस दौर की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह इस दौर की विडंबना है जो जो आंबेडकर आजाद भारत में आंदोलन न करने का सुझाव देते थे उन्हीं के अनुयायी गांधी के रास्ते पर आंदोलन करने को मजबूर हैं। यह हमारे इतिहास के दो महापुरुषों के समन्वय का सर्वश्रेष्ठ अवसर भी है। भले ही युवा भारत के मुख्य न्यायाधीश का इस्तीफा नहीं मांग रहे हैं लेकिन अहंकार में दिए गए एक बयान के कारण उनका भारत से लंदन तक जो माखौल उड़ रहा है और विरोध हो रहा, उसे उन्हें समझना चाहिए। दूसरी ओर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस सरकार मैं बैठे लोगों में भयंकर किस्म का अहंकार और अपने को सही बताने की प्रवृत्ति है। आप केंद्रीय संसदीय मंत्री किरण रिजिजू का बयान देख लीजिए कि यूपीए की तरह इस मामले में कोई मंत्री शामिल नहीं है, यह तो गड़बड़ी स्वायत्त संस्थाओं ने की है। उधर भाजपा के अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा है कि युवा सकारात्मक दिशा में राष्ट्र निर्माण करना चाहते हैं जबकि यह आंदोलन व्यवस्था विरोध का पाठ पढ़ा रहा है। ऐसे में तय है कि यह टकराव एक हद तक आगे बढ़ेगा।
जो लोग युवाओं के इस आक्रोश की विफलता की पहले से ही भविष्यवाणी कर रहे हैं वे इतिहास में नियतिवाद के शिकार हैं। वे हर चीज को यह मान कर चलते हैं कि सारी चीजें पहले से तय हैं। या तो उन्हें बड़ी ताकतें संचालित कर रही हैं या फिर कोई ऐसा नियम है जिससे सब चीजें संचालित हो रही हैं। वे मनुष्य की भूमिका को एकदम नकार कर चल रहे हैं। उन्हें इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा की पुस्तक ‘अधूरी क्रांतियों का इतिहास बोध’ देखना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि क्रांतियों का अधूरा रह जाना इतिहास सिद्ध है, पर उनका अमर रहना भी उतना ही….। वे लिखते हैं, ‘ संक्रमण के इस दौर में इतिहास बोध और प्रयोगधर्मिता का विस्तार हो रहा है, कोई एक मंजिल, कोई एक राह, कोई एक क्रांति ही चरितार्थ होती न दिखे—कई मंजिलें, कई राहें, कई क्रांतियां अंगड़ाई लेती दिख रही हैं, विकल्प अनिश्चित लगे तो क्या हुआ? समवेत प्रयास न हो रहे हों तो क्या हुआ? हालात ही कुछ ऐसे हैं कि कोई चैन से बैठ नहीं सकता।’
पुनश्चः हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि काकरोच जनता पार्टी गहरे अवसाद और अपमान से निकला एक हास्य, एक व्यंग्य और एक प्रहसन है। उसने दो करोड़ लोगों तक अपना गहरा असर छोड़ दिया है। उसका जो इस्तेमाल है वही करें न कि उससे क्रांति की उम्मीद करें। लेकिन एक बात ध्यान रखने की है हर हास्य के पीछे गहरी त्रासदी होती है। इसलिए हास्य को महज हंसी में न उड़ाएं।
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