
पश्चिम बंगाल चुनाव का परिणाम चाहे जो हो लेकिन चुनाव की प्रक्रिया ने एक बात तो साबित कर दी है कि भारतीय लोकतंत्र भय, अविश्वास, प्रतिशोध और पक्षपाती राज्य तंत्र के शिकंजे में फंस चुका है। इसमें नागरिक की गरिमा निरंतर कम होती जा रही है और अगर आप को अपनी गरिमा बचानी है तो थोड़ी बहुत कीमत देकर इस या उस गिरोह के सदस्य बन जाना चाहिए। कहा जा सकता है कि आदर्श लोकतंत्र तो कहीं कभी रहा नहीं और न ही कभी आएगा क्योंकि उसके लिए एक वैश्विक व्यवस्था जरूरी है। बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर इतनी क्षमता भी नहीं है कि वह आदर्श समाज और व्यवस्था का शीघ्र निर्माण कर सके, इसके बावजूद उसके आदर्शों के जो दावे हैं उनका आधा भी पालन होता नहीं दिख रहा है। सचमुच अगर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार चार्टर का आधा हिस्सा ही दुनिया में लागू हो जाए तो यह धरती स्वर्ग बन जाए। लेकिन स्थिति दूसरी है। अगर इस बार चुनावी ड्यूटी के लिए ढाई लाख केंद्रीय बल तैनात किए गए तो संभव है अगली बार जिस राज्य में विपक्ष की सरकार हो और उसकी जीत की संभावना प्रबल हो वहां सेना लगा दी जाए। विडंबना देखिए कि जो प्रधानमंत्री 2014 में अपने भाषणों में कहते थे कि अच्छी सरकार वही है जो सबसे कम नियंत्रण करती है लेकिन आज वे उसके ठीक विपरीत कार्य कर रहे हैं।
भारी सुरक्षा के बीच काम करने वाले शासकों पर आज के 110 साल पहले की गई महात्मा गांधी की एक टिप्पणी यहां बहुत प्रासंगिक है। वे 4 फरवरी 1916 की शाम बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में बोल रहे थे। उससे एक दिन पहले वायसराय लार्ड हार्डिंग उद्घाटन करके गए थे। उनके आगमन के कारण बनारस में भारी सुरक्षा बंदोबस्त था। गांधी ने उस पर टिप्पणी करते हुए कहा, “ जब वायसराय बनारस की गलियों से गुजर रहे थे तो हम सभी ने एक किस्म की बेचैनी महसूस की होगी। तमाम जगहों पर जासूस खड़े थे और हम भयभीत थे। हम अपने आप से पूछ रहे थे कि इतना अविश्वास क्यों? इस जिंदा मौत से बेहतर होता कि लार्ड हार्डिंग मर गए होते। लेकिन शक्तिशाली संप्रभु सत्ता का प्रतिनिधि ऐसा करेगा नहीं। वह हमारे ऊपर जासूस थोपना जरूरी समझता होगा। हम चाहे जितने फूले रहें, बेचैन रहें या प्रतिरोध करते रहें लेकिन एक बात नहीं भूलनी चाहिए कि अपनी अधीरता में भारत ने आज अराजकतावादियों की एक सेना पैदा कर दी है।………….
यह वास्तव में भय का संकेत है। अगर हम ईश्वर पर भरोसा करते हैं और उससे डरते हैं तो हमें किसी और से डरने की जरूरत नहीं है। न महाराजा से डरने की जरूरत है, न वायसराय से, न जासूसों से और यहां तक कि सम्राट जार्ज से भी डरने की जरूरत नहीं है।………………………मैं अपने देश को दोनों तरफ के संदेह के इस वातावरण से बाहर निकालना चाहता हूं। अगर हमें अपने लक्ष्य को पाना है तो ऐसा करना ही पड़ेगा। हमें एक ऐसा साम्राज्य चाहिए जो प्रेम और पारस्परिक विश्वास पर आधारित हो।…..भारत में अराजकता के लिए कोई जगह नहीं है। मुझे अपने शासकों से जो कहना है खुल कर कहना चाहिए, कुछ अप्रिय कहना है तो उसके परिणाम का सामना करना चाहिए। लेकिन हमें गाली नहीं देनी चाहिए।” महात्मा गांधी उस समय जिसे ईश्वर कहते थे उसे ही बाद में सत्य कहने लगे और उसे ही हम एक नैतिक मूल्य व्यवस्था भी कह सकते हैं। लेकिन उनका ईश्वर वह नहीं था जो मंदिरों के निर्माण करने और वहां डमरू बजाने से खुश होता है। वह तो दरिद्र नारायण की पूजा करते थे।
आजादी के 31 साल पहले देश की स्थिति के बारे में दिया गया महात्मा गांधी का यह वक्तव्य आजादी के 80 साल बाद भी उतना ही प्रासंगिक लगेगा, यह चिंता का विषय है। इसकी वजह यह है कि हमारे शासक अपने को वायसराय समझने लगे और मतदाताओं की सुरक्षा के नाम पर भय, धमकी और प्रतिशोध का वातावरण निर्मित करने लगे। माना जाता है कि कम से कम चुनाव के दिन तो मतदाता संप्रभु होता है, शासन प्रशासन के सामने उसकी हैसियत बड़ी होती है, क्योंकि उस दिन वह सरकार चुन रहा होता है। या कम से कम उसका मौलिक अधिकार उस दिन पूर्णावस्था में होता है। लेकिन जब उसी दिन सुरक्षा बल उस पर डंडे बरसा रहे हों, गालियां दे रहे हों और घरों में घुसकर धमका रहे हों तो फिर क्या कोई इसे लोकतंत्र कहेगा? अब्राहम लिंकन ने कहा है कि लोकतंत्र में बैलेट बुलेट से अधिक शक्तिशाली होता है और सत्ता बुलेट के बजाय बैलेट से बदलती है। लेकिन जब वह पूरी प्रक्रिया सुरक्षा बलों के बूटों और बख्तरबंद गाड़ियों के साए में संपन्न की जा रही हो, तो लोकतंत्र के विश्वास का वह मूल्य तो लुप्त हो जाता है। राज्य की सर्वसत्ता और उसके दमनकारी प्रदर्शन के माध्यम से क्या कोई निर्भय और विश्वास पर आधारित लोकतंत्र कायम हो सकता है?
यह सही है कि पश्चिम बंगाल में 1952 के चुनाव से लेकर हाल फिलहाल तक कभी हिंसा मुक्त चुनाव नहीं हुए। लेकिन क्या इसी आधार पर उन सभी चुनावों को धांधली और बेईमानी से भरा चुनाव कहा जा सकता है? क्या पहले की सभी सरकारों को अवैधानिक सरकारें बताया जा सकता है? उस हिंसा की जड़ें सामाजिक आर्थिक असमानता में रही हैं। घनघोर असमानता के कारण ही बंगाल में नक्सलवाद पनपा और कम्युनिस्ट आंदोलन भी। अगर हमारे लोकतंत्र में आंबेडकर के आह्वान के मुताबिक सहज और शीघ्र रूप से असमानता को मिटाने की क्षमता होती तो हिंसा होती ही क्यों? यही वजह है कि नेता भले एक दूसरे से मिलते जुलते रहें लेकिन कार्यकर्ताओं में शत्रुता भी पनपती है और पनपाई जाती है। इन सब स्थितियों के बावजूद बंगाल सांप्रदायिकता और दंगों से मुक्त रहा है, भले ही वह विभाजन के समय भयानक दंगों का गवाह रहा हो। वजह यही है कि वहां सांप्रदायिक सरकारें नहीं रहीं। कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और तृणमूल में सारे दोष रहे हों लेकिन यह दोष नहीं रहा।
चार मई को जो भी हो लेकिन बंगाल उस स्थिति में नहीं रहेगा। भले ही हिंसा रहित चुनाव पहली बार संपन्न हुआ है लेकिन उसके पीछे संरचनात्मक और सांस्कृतिक हिंसा भयानक रही है। भारत की नौकरशाही ने अपनी निष्पक्षता और स्वायत्तता की धारणा को तिलांजलि दे दी है। गांधी ने ब्रिटिश नौकरशाही को क्रूर और दमनकारी कहा था। लेकिन उनका कहना था कि उनमें सभी लोग ऐसे नहीं हैं वे तो शासन करने आए हैं न कि लोगों को मारने पीटने। हमने उनकी चाटुकारिता करके उन्हें वैसा बना दिया है। आज वही बात स्वतंत्र भारत की नौकरशाही के बारे में कही जा सकती है। स्वतंत्र भारत की जिस नौकरशाही को लोकतंत्र के मूल्य सिखाने थे, नागरिकों की गरिमा का पाठ पढ़ाया जाना था और जिसमें सेवा भाव पैदा करना था उसका हिंदूकरण और सैन्यकरण कर दिया गया उसे पूंजी की लूट का रखवाला बना दिया गया। वह ब्रिटिश नौकरशाही से अधिक क्रूर हो चली है। वह भ्रष्ट, झूठे, पाखंडी और धनाढ्य लोगों की रक्षक बन गई है और आम आदमी के लिए काल। नौकरशाही को भी अपने भीतर झांकना होगा वरना उसका रुतबा बचेगा नहीं। लोकतंत्र को कमजोर करने की जो प्रक्रिया 2013 में गोवा से शुरु हुई थी और जिस प्रयोग को पहले गुजरात में किया जा चुका था, उसके चरण पूरब की ओर बढ़ते हुए बंगाल में पड़ चुके हैं। लोकतंत्र में सबसे ऊपर है व्यक्ति की गरिमा। उसके साथ है पारस्परिक विश्वास। यह दोनों मूल्य आज की व्यवस्था में बिलुप्त हो रहे हैं।
डॉ आंबेडकर ने बार बार कहा है कि लोकतंत्र न तो महज चुनाव जीतने के कौशल का नाम है और न ही शासन प्रणाली का नाम है। वह पारस्परिक विश्वास और साझापन की एक संस्कृति है। अगर वहसाझापन समाज में नहीं रहेगा तो लोकतंत्र नाममात्र को ही रहेगा और मुश्किल से बना यह राष्ट्र भी मजबूत नहीं रहेगा।
वैसी ही बड़ी बात टैगोर ने कही है जिसको समझे बिना लोकतंत्र और चुनाव की हार जीत का अर्थ समझ में नहीं आएगा। टैगोर ने कहा है कि हार केवल एक परिणाम नहीं बल्कि आत्मा के विकास और सीखने की एक प्रक्रिया है। हमें जीवन के खतरों से बचने की प्रार्थना नहीं करनी चाहिए बल्कि उनका निडरता से सामना करना चाहिए। हार या भय का सामना करना ही असली स्वतंत्रता और आत्मा का जागृति है। जीवन की असफलताओं और दुःखों के बीच आत्मा का सौंदर्य और सत्य साफ दिखता है।
संभव है बंगाल चुनाव में एक पक्ष खुश हो और एक पक्ष दुखी हो। एक पक्ष जश्न मनाए और दूसरा पक्ष बैठकर या तो कुढ़े या फिर चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर जागरण अभियान पर निकले और देशव्यापी आंदोलन उठाए। लेकिन एक बात तय है कि बंगाल के चुनाव ने बहुत सारे प्रश्न दिए हैं जो इस राष्ट्र को मथना चाहते हैं।
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