कर्मयोग के समर्पित साधक : श्री श्रीनाथ जी

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Shrichandra Modi

— हरकराज पुरोहित —

न् 1904 में पाली जिले के खोड़ ग्राम में जन्मे श्रद्धेय गुरुदेव श्री श्रीनाथजी मोदी का जीवन बाल्यकाल से ही संघर्षमय रहा। श्री मोदीजी की अल्पायु में ही इनके पिता श्री रूपनाथजी मोदी का देहावसान हो गया। विधवा माँ और दो बहनों के परिवार के भार ने उन्हें बाल्यावस्था में ही गंभीर और शालीन बना दिया था। ग्रामीण अंचल के परिवेश में पल रहे श्री मोदीजी के बाल मानस पर सामाजिक कुरीतियों और अंधरूढ़िवादी परम्पराओं के विरुद्ध विद्रोह और संघर्ष की भावना बलवती हो रही थी। ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के संरक्षण में पनप रही सामंती व्यवस्था और परम्पराओं को इन सामाजिक दोषों की मूल जड़ समझते हुए उन्होंने किशोरावस्था में ही शिक्षाध्ययन के साथ-साथ ग्राम सुधार और लोक-जागरण का रचनात्मक अभियान प्रारम्भ कर दिया।

सन् 1920 में 16 वर्ष की अवस्था में उन्होंने रेडक्रॉस सोसायटी के माध्यम से अनेक गाँवों में जाकर लोक-शिक्षण का कार्य शुरू किया। स्वतन्त्र रूप से ‘जादू की लालटेन’ के माध्यम से स्लाइडों का प्रदर्शन कर ‘समाज-सुधार’ कार्यक्रम को नया आयाम प्रदान किया। स्लाइड प्रदर्शन के दौरान भाषण, गीत आदि के माध्यम से बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह, मृत्यु-भोज, पर्दा-प्रथा, सती-प्रथा, कन्या-विक्रय प्रथा, दहेज-प्रथा, बेगारी-प्रथा, सप्त-व्यसन तथा अश्लील गायन जैसी सामाजिक बुराइयों को मिटाने के लिए जनमानस में चेतना का संचार किया। ‘जादू की लालटेन’ के इस अभिनव प्रयोग की सार्थक सफलता से प्रेरित होकर श्री मोदीजी और उनके अभिन्न मित्र स्व. धीरजमल बच्छावत ने ‘शुभ गीत’ और ‘सुधार संगीत माला’ के अन्तर्गत लोक-चेतना के सैकड़ों गीत लिखे।

सन् 1928 के आसपास श्री मोदीजी पैतृक स्थल जोधपुर पधार गए और टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल विद्याशाला में शिक्षक के रूप में कार्य करने लगे। उन्होंने अध्यापन के साथ-साथ संस्थान के पुस्तकालय को वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर एक नया स्वरूप प्रदान किया। स्काउट आंदोलन में नई जान फूँकी। अंकगणित के अध्यापन में अपनी नई मौलिक शैली का सूत्रपात कर जटिल से जटिल गणितीय समस्याओं को हल करने के लिए सरलतम उपायों के सूत्र स्थापित किए। कड़ी मेहनत और लगन के कारण शिक्षक से इंस्ट्रक्टर पद पर अल्प समय में ही पदोन्नति हो गई।

श्री सम्पूर्णानाथ हुक्कू, परसराम मदेरणा, डॉ. मोहन सिंह पुरोहित आदि मेरे सहपाठी थे और श्री मोदीजी मेरे शिक्षक थे। उनकी अध्यापन-शैली से हम सभी प्रभावित थे।

कहानी, गीत आदि के अभिनव प्रयोग से जहाँ हम उनसे विषयान्तरगत ज्ञानार्जन करते थे और आनन्दित होते थे, वहीं हम सभी छात्रों की सदैव यही कामना रहती थी कि सारे विषय वे ही पढ़ाएँ।

विद्याशाला टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल में अध्यापन व प्रशिक्षण कार्य के साथ-साथ लेखन का कार्य बराबर जारी रहा।

स्व. शिवदानमलजी थानवी और उनके होनहार सुपुत्र श्रद्धेय श्री सरदारमलजी थानवी डायमण्ड जुबली बुक डिपो (स्थापना सन् 1889) व श्री सुमेर प्रिन्टिंग प्रेस का संचालन कर रहे थे।

श्री मोदीजी की पुस्तकों का प्रकाशन व मुद्रण इन्हीं संस्थानों में होता था।

श्री सरदारमलजी थानवी और श्री मोदीजी के मध्य अद्वितीय और अनुकरणीय प्रगाढ़, स्नेहिल सम्बन्ध स्थापित हुए। दोनों मित्र महात्मा गांधी के विचार और दर्शन से अत्यधिक प्रभावित थे। लोक-साहित्य के प्रचार और प्रसार के माध्यम से दोनों मित्र स्वतन्त्रता आंदोलन में अपने कर्मक्षेत्र से नज़दीक से जुड़े रहे। समकालीन गांधीवादी और मारवाड़ में स्वतन्त्रता आंदोलन के अग्रणी नेता स्व. जयनारायण व्यास, जो स्वयं सुधारवादी और लोक-चेतना के अभियान से जुड़े थे, उन्हीं दिनों श्री थानवीजी और श्री मोदीजी ने घर-घर जाकर अंधरूढ़िवादी परम्पराओं के उन्मूलन हेतु जमकर काम किया।

सन् 1928 से सन् 1944 की अवधि के मध्य श्री मोदीजी ने 87 पुस्तकें लिखीं, जिनमें गद्य-पद्य, नाटक, भाषण और बाल-साहित्य भी सम्मिलित हैं। तत्कालीन राष्ट्रीय स्तर के लगभग 20 साहित्यकारों की 47 पुस्तकों का सम्पादन कर उनका प्रकाशन किया।

जिनमें से आज भी अनेक साहित्यकार राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की ख्याति से सुशोभित हैं।

शिक्षा विभाग के तत्कालीन अंग्रेज अफसर से वैचारिक मतभेद के कारण सन् 1944 में श्री मोदीजी ने स्वेच्छा से त्यागपत्र देकर शासकीय सेवा से अलग होकर कानपुर चले गए। वहाँ उन्होंने ‘राज कम्पनी लिमिटेड’ की स्थापना की, लेकिन निदेशकों की केवल मुनाफा-प्रेरित व्यावसायिक शैली उन्हें रास नहीं आई और वे स्वेच्छा से अलग हो गए। श्री सरदारमल थानवी से पत्र-व्यवहार के माध्यम से सम्पर्क बराबर बना रहा।

श्री थानवीजी के आग्रह पर वे सन् 1946 में पुनः जोधपुर लौट आए। दोनों मित्रों ने अपने एक अन्य गांधीवादी मित्र, स्वतन्त्रता सेनानी स्व. रतनचंदजी पारख के साथ बसन्त पंचमी, 1946 को सोजती गेट पर स्थित ‘किताबघर’ के माध्यम से पुस्तक-व्यवसाय का कार्य प्रारम्भ किया। पुस्तक का लेखन और प्रकाशन फिर भी सम्भव था, लेकिन उनको पाठकों तक प्रसारित करने हेतु बेचना साहित्य-प्रसार के लिए उतना ही आवश्यक था। इसी लक्ष्य की प्राप्ति के उद्देश्य से वे इस व्यवसाय से जुड़े।

सादा जीवन, मितव्ययी, आत्म-सन्तोषी, अल्प किन्तु मृदुभाषी, सदैव हँसमुख कर्मयोगी श्री थानवीजी और श्री मोदीजी आज भी अपने नियमित जीवन को उसी क्रमबद्धता के साथ जी रहे हैं। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व मूक सेवा के ज़रिये आज भी समाज को सही दिशा दे रहा है। आवश्यकता है उनके जीवन-दर्शन से प्रेरणा लेकर महात्मा गांधी के सपनों का समाज बनाने की।

आभार — श्री श्रीनाथजी मोदी अभिनन्दन समारोह, 1985, स्मारिका


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