प्रेमचंद : राजनीति से संवाद करता साहित्य, राजनीति के अधीन नहीं

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Parichay Das

— परिचय दास —

प्रेमचंद का साहित्य जिस समय विकसित हुआ, वह भारतीय इतिहास का असाधारण संक्रमणकाल था। औपनिवेशिक सत्ता, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन, सामंती अवशेष, जमींदारी शोषण, जातिगत विषमता, स्त्री की पराधीनता, किसान की दरिद्रता और औद्योगिक पूँजी के प्रारंभिक दबाव, ये सब एक साथ भारतीय जीवन को प्रभावित कर रहे थे। ऐसे समय में साहित्य का सामाजिक यथार्थ से विमुख रहना संभव भी नहीं था।

प्रेमचंद ने इस यथार्थ को देखा। उन्होंने किसान को देखा, स्त्री को देखा, दलित को देखा, निम्नवर्गीय मनुष्य को देखा, छोटे कर्मचारी को देखा, धार्मिक पाखंड को देखा और औपनिवेशिक शासन की संरचना को भी देखा। इसलिए उनके साहित्य में राजनीति का प्रवेश स्वाभाविक है।

लेकिन यहाँ एक बारीक अंतर समझना आवश्यक है।

प्रेमचंद राजनीति को साहित्य का विषय बनाते हैं, साहित्य को राजनीति का उपकरण नहीं।

यह अंतर अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

यदि कोई लेखक राजनीति पर लिखता है, तो इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वह साहित्य को राजनीति की अधीनस्थ शाखा मानता है। राजनीति जीवन की एक शक्ति है। वह मनुष्य के जीवन को प्रभावित करती है। इसलिए साहित्य राजनीति को ग्रहण करेगा। लेकिन साहित्य केवल राजनीति नहीं है।

“साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है। उसका दर्जा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।” ~ प्रेमचंद

प्रेमचंद का साहित्य इसीलिए महत्त्वपूर्ण है कि उसमें राजनीति मनुष्य के जीवन में है किंतु वह किसी पार्टी के प्रस्ताव की तरह नहीं आती।

प्रेमचंद की वैचारिकी : नैतिक मानवतावाद
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प्रेमचंद की वैचारिकी को केवल मार्क्सवादी, केवल गांधीवादी या केवल राष्ट्रवादी कह देना उनकी जटिलता को कम करना होगा। उनके भीतर इन सभी धाराओं के प्रभाव दिखाई देते हैं, लेकिन वे किसी एक के पूर्ण अनुयायी नहीं हैं।

उनकी मूल वैचारिकी को यदि किसी एक शब्द में व्यक्त करना हो, तो वह है:

नैतिक मानवतावाद।

प्रेमचंद के लिए मनुष्य की गरिमा सबसे बड़ा प्रश्न है।

उनकी चिंता यह है कि मनुष्य किस प्रकार अपमान, गरीबी, अन्याय, जाति, वर्ग, पितृसत्ता, सामंती सत्ता और औपनिवेशिक दमन के बीच मनुष्य बना रह सकता है।

उनका साहित्य किसी राजनीतिक कार्यक्रम की व्याख्या नहीं करता। वह मनुष्य के अपमान को अनुभव में बदलता है।

यही कारण है कि ‘गोदान’ को केवल किसान-शोषण का उपन्यास कहना उसके सौंदर्य और मानवीय जटिलता को कम कर देना होगा। होरी केवल किसान नहीं है। वह भारतीय मनुष्य की उस गहरी आकांक्षा का प्रतीक है जो सम्मानपूर्वक जीना चाहती है। उसका संघर्ष केवल आर्थिक नहीं है। उसमें धर्म है, परिवार है, जाति है, सामाजिक प्रतिष्ठा है, परंपरा है, ऋण है, भूख है और जीवन को किसी तरह बचाए रखने की इच्छा है।

होरी की त्रासदी यह नहीं कि वह केवल आर्थिक रूप से शोषित है। उसकी त्रासदी यह है कि वह एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था में जीता है जिसमें उसकी नैतिकता भी उसी व्यवस्था द्वारा नियंत्रित होती है जिसने उसे शोषित किया है।

यही प्रेमचंद की दृष्टि की बारीकी है।

‘साहित्य का उद्देश्य’ : राजनीति की अधीनता या सामाजिक उत्तरदायित्व?
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1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में प्रेमचंद का प्रसिद्ध अध्यक्षीय भाषण ‘साहित्य का उद्देश्य’ हुआ। इस भाषण ने भारतीय साहित्य में साहित्य और सामाजिक जीवन के संबंध पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने साहित्य को जीवन से जोड़ते हुए कहा कि साहित्य में आलोचनात्मक चेतना होनी चाहिए और वह मनुष्य को जीवन की कठोर वास्तविकताओं का सामना करने की शक्ति दे।

यहीं से प्रेमचंद को बाद की आलोचना ने प्रगतिशील और राजनीतिक साहित्य की परंपरा में स्थापित किया।

लेकिन इस भाषण को ध्यान से पढ़ने पर एक बात स्पष्ट होती है।

प्रेमचंद साहित्य को राजनीति का प्रचार-पत्र नहीं बनाते। वे साहित्य से जीवन की आलोचना की अपेक्षा करते हैं। उनके लिए साहित्य का काम मनुष्य को सोचने, प्रश्न करने और अपने समय की वास्तविकताओं से जूझने की चेतना देना है।

यहाँ ‘सामाजिक प्रतिबद्धता’ और ‘राजनीतिक अधीनता’ के बीच अंतर करना आवश्यक है।

साहित्य यदि समाज से जुड़ा है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह किसी राजनीतिक दल के अधीन है।

साहित्य यदि अन्याय के विरुद्ध है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह किसी पार्टी का साहित्यिक विभाग है।

साहित्य यदि परिवर्तन चाहता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह राजनीतिक कार्यक्रम का कलात्मक संस्करण है।

प्रेमचंद की वैचारिकी को समझने में सबसे बड़ी भूल यही हुई कि सामाजिक सरोकार को राजनीतिक अधीनता समझ लिया गया।

प्रेमचंद और राजनीति : संबंध, लेकिन अधीनता नहीं
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प्रेमचंद राजनीति से दूर नहीं थे। वे राष्ट्रीय आंदोलन से प्रभावित थे। गांधीजी के असहयोग आंदोलन का उनके जीवन पर प्रभाव पड़ा। उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी। वे औपनिवेशिक सत्ता के विरोधी थे। उनके लेखन में राष्ट्रीय मुक्ति की आकांक्षा स्पष्ट है।

लेकिन उनकी रचनाओं को किसी राजनीतिक दल की साहित्यिक शाखा मानना गलत होगा।

उनके यहाँ गांधी का प्रभाव है, लेकिन वे गांधी के प्रचारक नहीं हैं।

उनके यहाँ किसान का प्रश्न है, लेकिन वे किसी आर्थिक सिद्धांत के व्याख्याता नहीं हैं।

उनके यहाँ वर्गीय विषमता है, लेकिन वे पात्रों को केवल वर्ग-प्रतिनिधि नहीं बनाते।

उनके यहाँ स्त्री की पीड़ा है, लेकिन स्त्रियाँ केवल पितृसत्ता-विरोधी घोषणाओं की पात्र नहीं हैं।

उनके यहाँ धर्म की आलोचना है, लेकिन धर्म का संपूर्ण निषेध नहीं।

यानी प्रेमचंद का साहित्य राजनीति से संवाद करता है, लेकिन राजनीति के निर्देश पर नहीं चलता।

प्रेमचंद का गांधीवाद : नैतिकता का प्रश्न
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प्रेमचंद की वैचारिकी को समझने के लिए गांधी का प्रभाव अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। लेकिन प्रेमचंद को गांधीवादी साहित्यकार कहना भी पर्याप्त नहीं होगा।

गांधी के यहाँ राजनीति नैतिकता से जुड़ी हुई थी। प्रेमचंद के यहाँ भी सामाजिक परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन नहीं है। वे यह नहीं मानते कि शोषक वर्ग को हटाकर मात्र सत्ता किसी दूसरे वर्ग को दे देने से मनुष्य स्वतः मुक्त हो जाएगा।

उनके यहाँ मनुष्य का नैतिक रूपांतरण भी आवश्यक है।

‘पंच परमेश्वर’ में न्याय की चेतना व्यक्ति के निजी संबंधों से ऊपर उठती है। ‘नमक का दारोगा’ में ईमानदारी सत्ता और आर्थिक प्रलोभन से टकराती है। ‘ईदगाह’ में गरीबी के बीच मानवीय करुणा बची रहती है। ‘कफन’ में वे मनुष्य की नैतिकता को सबसे अंधकारमय स्थिति में परखते हैं।

प्रेमचंद का प्रश्न केवल यह नहीं है कि व्यवस्था कैसी है।

उनका प्रश्न यह भी है:

व्यवस्था के भीतर मनुष्य कैसा बन रहा है?

यह प्रश्न किसी भी कठोर राजनीतिक विचारधारा के लिए असुविधाजनक है, क्योंकि राजनीति अक्सर संरचना बदलने को प्राथमिकता देती है, जबकि प्रेमचंद मनुष्य के भीतर की नैतिक संरचना को भी उतना ही महत्त्व देते हैं।

‘कफन’ : प्रेमचंद की राजनीति का सबसे बड़ा प्रतिपक्ष
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यदि प्रेमचंद को केवल प्रगतिशील राजनीतिक लेखक के रूप में पढ़ना हो तो ‘कफन’ एक कठिन कहानी बन जाती है।

घीसू और माधव कौन हैं?

क्या वे केवल शोषित किसान हैं?

क्या वे केवल व्यवस्था के पीड़ित हैं?

क्या उनकी अमानवीयता का पूरा उत्तर सामाजिक संरचना में मिल जाता है?

कहानी इन प्रश्नों का आसान उत्तर नहीं देती।

घीसू और माधव गरीबी से उत्पन्न अमानवीयता के पात्र हैं। लेकिन प्रेमचंद उन्हें केवल निर्दोष पीड़ित बनाकर नहीं छोड़ते। वे उनके भीतर की नैतिक विघटनशीलता को भी सामने रखते हैं।

यही प्रेमचंद की साहित्यिक ईमानदारी है।

यदि साहित्य केवल यह कहता कि गरीबी मनुष्य को अच्छा बनाती है और अमीरी मनुष्य को बुरा, तो वह जीवन का सरलीकरण होता। प्रेमचंद ऐसा नहीं करते।

वे दिखाते हैं कि गरीबी मनुष्य को करुण भी बना सकती है और क्रूर भी।

शोषण मनुष्य में विद्रोह पैदा कर सकता है, लेकिन कभी-कभी उसकी संवेदना को भी नष्ट कर सकता है।

यहाँ प्रेमचंद किसी राजनीतिक सिद्धांत की पुष्टि नहीं कर रहे। वे मनुष्य के नैतिक पतन की भयावहता को देख रहे हैं।

यही कारण है कि ‘कफन’ को केवल वर्गीय शोषण की कहानी बनाकर पढ़ना उसके आधे अर्थ को नष्ट कर देता है।

‘गोदान’ : वर्ग से बड़ा मनुष्य
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‘गोदान’ प्रेमचंद की वैचारिकी का सबसे बड़ा उदाहरण है।

यदि प्रेमचंद साहित्य को राजनीति की अधीनस्थ शाखा मानते, तो ‘गोदान’ एक स्पष्ट राजनीतिक उपन्यास होता। उसमें किसान बनाम जमींदार, श्रम बनाम पूँजी, गाँव बनाम शहर और शोषित बनाम शोषक का स्पष्ट राजनीतिक ढाँचा होता।

लेकिन ‘गोदान’ ऐसा नहीं है।

होरी की समस्या केवल जमींदार नहीं है।

उसकी समस्या ऋण है।

जाति है।

धर्म है।

परिवार है।

सामाजिक प्रतिष्ठा है।

परंपरा है।

भूख है।

आर्थिक निर्भरता है।

और सबसे बढ़कर, वह सम्मानपूर्वक जीने की असफल इच्छा है।

होरी अपनी व्यवस्था का विरोध नहीं करता। वह उसी व्यवस्था के भीतर सम्मान प्राप्त करना चाहता है जिसने उसे लगातार अपमानित किया है।

यही उसकी त्रासदी है।

प्रेमचंद यहाँ राजनीतिक विद्रोह का नारा नहीं देते। वे उस मनुष्य की गहरी मनोवैज्ञानिक और नैतिक स्थिति को चित्रित करते हैं जो शोषण को पहचानता तो है, लेकिन उससे बाहर निकलने की शक्ति नहीं रखता।

यह राजनीति से कहीं अधिक गहरा साहित्य है।

प्रेमचंद और वर्गीय दृष्टि
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प्रेमचंद के साहित्य में वर्ग-संबंधों की स्पष्ट उपस्थिति है। वे जमींदारी, ऋण, आर्थिक शोषण और सामाजिक विषमता को तीव्रता से चित्रित करते हैं। इस अर्थ में उनकी रचनाएँ सामाजिक यथार्थवाद की महान परंपरा में आती हैं।

लेकिन वे मार्क्सवादी सिद्धांत के यांत्रिक लेखक नहीं हैं।

उनके पात्र आर्थिक वर्ग से निर्मित होते हैं, लेकिन केवल आर्थिक वर्ग से नहीं।

उनकी चेतना में धर्म भी है।

जाति भी है।

परंपरा भी है।

नैतिकता भी है।

परिवार भी है।

प्रेम भी है।

यहाँ प्रेमचंद की भारतीयता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

यूरोपीय औद्योगिक समाज में वर्ग-संघर्ष का प्रश्न जिस रूप में विकसित हुआ, भारतीय समाज उसी रूप में निर्मित नहीं था। यहाँ जाति, धर्म, ग्राम-संरचना और परिवार की शक्तियाँ आर्थिक संबंधों के साथ गुँथी हुई थीं।

प्रेमचंद इस जटिलता को समझते थे।

इसलिए उनके साहित्य को केवल वर्गीय संघर्ष की भाषा में पढ़ना भारतीय सामाजिक संरचना को यूरोपीय सिद्धांत में समेटने का प्रयास होगा।

प्रेमचंद का किसान केवल ‘proletariat’ नहीं है।

वह जाति से भी बना है।

धर्म से भी।

गाँव से भी।

परिवार से भी।

भूमि से भी।

और स्मृति से भी।

प्रेमचंद की सबसे बड़ी वैचारिक विशेषता : मनुष्य को सूत्र में न बदलना
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प्रेमचंद के साहित्य में विचार है, लेकिन विचार पात्रों को नष्ट नहीं करता।

यह उनकी सबसे बड़ी शक्ति है।

कई बार विचारधारात्मक साहित्य में पात्र पहले से तय विचारों के वाहक बन जाते हैं। वे बोलते नहीं, विचार बोलता है। वे जीते नहीं, सिद्धांत को प्रमाणित करते हैं।

प्रेमचंद के पात्र ऐसे नहीं हैं।

होरी विचारधारा नहीं बोलता।

धनिया किसी राजनीतिक घोषणापत्र की प्रतिनिधि नहीं है।

घीसू और माधव किसी सामाजिक सिद्धांत का उदाहरण नहीं हैं।

सुमन किसी स्त्रीवादी सिद्धांत का प्रत्यक्ष रूप नहीं है।

जालपा केवल दहेज-व्यवस्था का प्रतीक नहीं है।

ये सभी मनुष्य हैं।

और मनुष्य की यही उपस्थिति प्रेमचंद को महान बनाती है।

साहित्य को राजनीति की अधीनस्थ शाखा मानने की समस्या
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अब इस प्रश्न पर लौटना आवश्यक है कि

क्या साहित्य को राजनीति की अधीनस्थ शाखा मानना उचित है?

मेरा उत्तर स्पष्टतः नकारात्मक है।

साहित्य राजनीति से अलग नहीं है लेकिन राजनीति के अधीन भी नहीं।

राजनीति सत्ता के वितरण का प्रश्न है।

साहित्य मनुष्य के अनुभव का प्रश्न है।

राजनीति पूछती है:

किसके पास सत्ता है?

साहित्य पूछता है:

सत्ता के भीतर मनुष्य के साथ क्या हो रहा है?

राजनीति पूछती है:

कौन शासन करेगा?

साहित्य पूछता है:

शासन मनुष्य की आत्मा के साथ क्या करता है?

राजनीति व्यवस्था बदलना चाहती है।

साहित्य यह भी देखता है कि व्यवस्था बदलने के बाद मनुष्य बदलता है या नहीं।

राजनीति का समय तत्कालीन होता है।

साहित्य का समय अधिक दीर्घ होता है।

राजनीतिक विचारधाराएँ इतिहास की दिशा निर्धारित करना चाहती हैं।

साहित्य इतिहास के भीतर छूटे हुए मनुष्य की आवाज़ बचाता है।

यही अंतर है।

यदि साहित्य राजनीति की अधीनस्थ शाखा बन जाए, तो उसकी स्वतंत्र आलोचनात्मक शक्ति समाप्त हो जाती है।

वह सत्ता की आलोचना नहीं कर पाएगा, क्योंकि वह स्वयं किसी सत्ता का उपकरण बन चुका होगा।

इतिहास में यह कई बार हुआ है। जिस साहित्य ने किसी राजनीतिक विचारधारा को पूर्ण सत्य मान लिया, वह धीरे-धीरे मनुष्य की जटिलता से दूर होता गया। उसके पात्र नारे बन गए, संघर्ष योजनाबद्ध हो गया, दुख का कारण पहले से निर्धारित हो गया और साहित्य जीवन की जगह सिद्धांत का विस्तार बन गया।

प्रेमचंद को इस खतरे से बचाकर पढ़ना आवश्यक है।

प्रेमचंद और साहित्य की स्वायत्तता
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प्रेमचंद साहित्य की सामाजिक उपयोगिता में विश्वास करते थे। लेकिन सामाजिक उपयोगिता और राजनीतिक अधीनता एक ही बात नहीं है।

किसी साहित्य का सामाजिक प्रभाव हो सकता है, बिना उसे राजनीतिक प्रचार में बदलने के।

‘गोदान’ पढ़कर पाठक किसान की पीड़ा को समझता है। यह राजनीतिक चेतना भी पैदा कर सकता है। लेकिन उपन्यास किसी राजनीतिक दल का घोषणापत्र नहीं है।

‘निर्मला’ पढ़कर दहेज और स्त्री की स्थिति पर प्रश्न उठते हैं। लेकिन वह किसी सामाजिक संगठन का प्रचार-पत्र नहीं है।

‘सद्गति’ पढ़कर जातिगत अमानवीयता का अनुभव होता है। लेकिन वह केवल राजनीतिक नारा नहीं है।

यही साहित्य की शक्ति है।

वह विचार को अनुभव में बदलता है।

राजनीति कह सकती है:

“दलित का शोषण हो रहा है।”

साहित्य दिखाता है कि दुखी चमार किस तरह एक मृत पशु की तरह व्यवस्था के सामने पड़ा है।

राजनीति कह सकती है:

“किसान शोषित है।”

साहित्य दिखाता है कि होरी किस तरह अपनी पूरी जिंदगी एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था में बिताता है जहाँ उसका श्रम कभी उसका अपना नहीं हो पाता।

राजनीति कह सकती है:

“स्त्री पर अत्याचार है।”

साहित्य दिखाता है कि निर्मला के जीवन में संदेह, विवाह, उम्र, परिवार और सामाजिक नैतिकता किस तरह एक अदृश्य जेल बन जाते हैं।

यही साहित्य और राजनीति का अंतर है।

साहित्य नारे को जीवन में बदलता है।

प्रेमचंद की वैचारिकी में परिवर्तनशीलता
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प्रेमचंद की वैचारिकी स्थिर नहीं थी। उनके आरंभिक लेखन में राष्ट्रवादी और नैतिक सुधारवादी दृष्टि अधिक स्पष्ट है। बाद के लेखन में सामाजिक विषमता और आर्थिक शोषण का प्रश्न अधिक तीव्र होता जाता है। 1936 तक आते-आते उनका साहित्य सामाजिक परिवर्तन और प्रगतिशील चेतना के अधिक निकट दिखाई देता है।

लेकिन इस परिवर्तन को किसी एक विचारधारा में पूर्ण रूपांतरण के रूप में देखना उचित नहीं।

प्रेमचंद का विकास एक निरंतर नैतिक और सामाजिक विस्तार का विकास है।

वे धीरे-धीरे समझते हैं कि केवल व्यक्तिगत नैतिकता से सामाजिक अन्याय समाप्त नहीं होगा।

लेकिन वे यह भी नहीं भूलते कि केवल व्यवस्था बदल देने से मनुष्य स्वतः नैतिक नहीं हो जाता।

यही संतुलन उनकी वैचारिकी को विशिष्ट बनाता है।

वे व्यक्ति और व्यवस्था दोनों को देखते हैं।

यहाँ वे उन विचारधारात्मक दृष्टियों से अलग हो जाते हैं जो सारी बुराई का कारण केवल व्यवस्था में खोजती हैं।

और उन रूढ़िवादी दृष्टियों से भी अलग हो जाते हैं जो सारी बुराई का कारण केवल व्यक्ति के चरित्र में खोजती हैं।

प्रेमचंद की दृष्टि कहती है:

व्यक्ति को समझना है तो व्यवस्था को देखिए।
व्यवस्था को समझना है तो व्यक्ति को देखिए।

प्रेमचंद : न तो केवल गांधीवादी, न केवल मार्क्सवादी
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प्रेमचंद के साहित्य में गांधी और मार्क्स दोनों की प्रतिध्वनियाँ खोजी जा सकती हैं लेकिन उन्हें किसी एक का साहित्यिक अनुचर बना देना गलत होगा।

गांधी ने उन्हें नैतिकता, सत्याग्रह, ग्रामजीवन और सामाजिक सुधार की दृष्टि दी।

मार्क्सवादी चिंतन ने उनके समय को वर्गीय और आर्थिक संरचनाओं के संदर्भ में समझने का अवसर दिया।

लेकिन प्रेमचंद का साहित्य इन दोनों से आगे जाकर अपना स्वतंत्र मानवीय संसार बनाता है।

उनके यहाँ मनुष्य न तो केवल आत्मशुद्धि का पात्र है और न केवल वर्ग-संघर्ष का सैनिक।

वह दोनों से बड़ा है।

वह अपने समय का सामाजिक उत्पाद है, लेकिन अपने भीतर नैतिक निर्णय की संभावना भी रखता है।

यही प्रेमचंद की वास्तविक वैचारिकी है।

साहित्य का राजनीति से संबंध : अधीनता नहीं, संवाद
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साहित्य और राजनीति का संबंध होना चाहिए। लेकिन यह संबंध संवाद का होना चाहिए, अधीनता का नहीं।

राजनीति साहित्य से प्रश्न कर सकती है।

साहित्य राजनीति से प्रश्न कर सकता है।

राजनीति साहित्य को सामाजिक यथार्थ की ओर देखना सिखा सकती है।

साहित्य राजनीति को मनुष्य के परिणाम दिखा सकता है।

राजनीति व्यवस्था बदल सकती है।

साहित्य यह पूछ सकता है कि उस बदली हुई व्यवस्था में मनुष्य किस रूप में बचा है।

इसलिए साहित्य राजनीति का शत्रु नहीं है।

लेकिन साहित्य राजनीति का नौकर भी नहीं है।

प्रेमचंद की महानता इसी स्वतंत्रता में है।

वे राजनीति को समझते हैं, लेकिन उसके अधीन नहीं होते।

वे समाज की आलोचना करते हैं, लेकिन किसी एक राजनीतिक सूत्र में उसे बंद नहीं करते।

वे परिवर्तन चाहते हैं, लेकिन मनुष्य को परिवर्तन की मशीन नहीं बनाते।

उनकी वैचारिकी का अंतिम केंद्र कोई दल, कोई राज्य, कोई वर्ग या कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है।

उसका अंतिम केंद्र है:

मनुष्य की गरिमा।

और यहीं प्रेमचंद की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।

आज जब साहित्य से भी राजनीतिक प्रमाणपत्र माँगे जाते हैं, जब रचना को पहले खेमे में रखा जाता है और फिर पढ़ा जाता है, जब लेखक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह किसी निश्चित विचारधारा की भाषा में ही बोले, तब प्रेमचंद को पुनः पढ़ना आवश्यक है।

प्रेमचंद हमें सिखाते हैं कि साहित्य सामाजिक होना चाहिए, लेकिन सामाजिक होने का अर्थ राजनीतिक दल का साहित्यिक विभाग बन जाना नहीं है।

साहित्य परिवर्तनकारी हो सकता है, लेकिन परिवर्तन का एकमात्र मार्ग राजनीतिक सत्ता नहीं है।

साहित्य अन्याय का विरोध कर सकता है, लेकिन विरोध को नारे में सीमित करना उसकी शक्ति को कम करना है।

साहित्य मनुष्य को जगाता है, लेकिन जागरण हमेशा किसी पार्टी के कार्यालय की ओर मार्च नहीं होता।

कभी-कभी जागरण केवल इतना होता है कि हम पहली बार किसी दूसरे मनुष्य के दुख को सचमुच देख लेते हैं।

और प्रेमचंद का सबसे बड़ा साहित्यिक चमत्कार यही है।

उन्होंने भारतीय समाज को केवल समझाया नहीं।

उन्होंने उसे मनुष्य के चेहरे में दिखाया।

इसलिए प्रेमचंद को राजनीति का लेखक कहना गलत नहीं, यदि उसका अर्थ है कि वे राजनीति से प्रभावित समाज के लेखक हैं।

लेकिन उन्हें राजनीति के अधीनस्थ साहित्य का लेखक कहना उनकी रचनात्मक स्वतंत्रता और उनकी वैचारिक जटिलता, दोनों के साथ अन्याय होगा।

प्रेमचंद राजनीति से संवाद करते हैं, लेकिन साहित्य को राजनीति में विलीन नहीं करते।

वे सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर हैं, लेकिन साहित्य को राजनीतिक आदेश का पालन करने वाली शाखा नहीं बनाते।

वे प्रगतिशील हैं, लेकिन किसी एक राजनीतिक सूत्र में समाप्त नहीं होते।

वे इसलिए श्रेष्ठ लेखक हैं कि उनके लिए मनुष्य किसी विचारधारा का साधन नहीं, साहित्य का अंतिम सत्य है।

प्रेमचंद की वैचारिकी का सार यही है: साहित्य जीवन से विमुख न हो, लेकिन जीवन को किसी एक विचारधारा में भी कैद न करे।

साहित्य को राजनीति से आँख मिलानी चाहिए, उसके सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए।

और प्रेमचंद का साहित्य आज भी इसी स्वतंत्र, आलोचनात्मक और मनुष्य-केंद्रित साहित्यिक स्वाधीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है।


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