पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और नेपाल का लोकतांत्रिक संघर्ष

0

मोहम्मद इरफान ऊर्फी

— मोहम्मद इरफान ऊर्फी —

ज जब हम पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी का जन्मशताब्दी वर्ष मना रहे हैं, तो ऐसे समय में उनके और नेपाल के ऐतिहासिक संबंधों तथा उनके लोकतांत्रिक योगदान को जानना अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना, राजशाही-विरोधी आंदोलन और भारत-नेपाल संबंधों को मजबूत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उनका मानना था कि दोनों देशों का रिश्ता केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि साझा इतिहास, भूगोल, संस्कृति और सामाजिक परंपराओं से जुड़ा गहरा आत्मिक संबंध है।

नेपाल के राजनीतिक घटनाक्रमों में विशेष रुचि रखते हुए वे वहाँ लोकतंत्र के प्रबल समर्थक रहे। इसी सोच के तहत उन्होंने नेपाल के राजशाही नेतृत्व (राजा महेंद्र) से भी नेपाली कांग्रेस के नेताओं को राजनीतिक प्रक्रिया में उचित स्थान देने का आग्रह किया था।

1960 और 1970 के दशक से ही चंद्रशेखर के नेपाली कांग्रेस के शीर्ष नेताओं बी.पी. कोइराला, गणेश मान सिंह, शैलजा आचार्य और कृष्ण प्रसाद भट्टराई और शेर बहादुर देउबा के साथ अत्यंत घनिष्ठ और आत्मीय संबंध थे। यह संबंध केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति साझा प्रतिबद्धता पर आधारित था।

चंद्रशेखर जी का लोकनायक जयप्रकाश नारायण से गहरा जुड़ाव था और जेपी के ही सानिध्य में वे बी.पी. कोइराला व अन्य नेपाली नेताओं के संपर्क में आए थे।

नेपाल के राजा द्वारा प्रधानमंत्री पद से अपदस्थ कर आठ वर्ष जेल में रखे जाने के बाद जब बी.पी. कोइराला 1968 में रिहा होकर भारत प्रवास पर आए, तो 1969 से 1976 के इस प्रवास काल में चंद्रशेखर ने उनका ऐतिहासिक सहयोग किया।उन्होंने बी.पी. कोइराला के भारत में रहने और उनकी राजनीतिक गतिविधियों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनका सीधा संवाद कराकर संबंधों को सहज बनाया।

दिसंबर 1976 में जब बी.पी. कोइराला नेपाल लौटे और पुनः गिरफ्तार कर लिए गए, तब तत्कालीन जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने उनकी रिहाई के लिए भारत में व्यापक राजनीतिक अभियान चलाया। प्रारंभ में भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं थे, किंतु चंद्रशेखर के निरंतर अभियान और प्रयास के कारण वे सहमत हुए। इस विषय में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी चंद्रशेखर के दृष्टिकोण का समर्थन किया। इन सामूहिक कूटनीतिक प्रयासों के परिणामस्वरूप अंततः बी.पी. कोइराला की रिहाई संभव हो सकी। रिहाई के बाद जब वे गंभीर रूप से गले के कैंसर से पीड़ित होकर भारत आए, तो चंद्रशेखर जी ने प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई व विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से समन्वय बनाकर उन्हें इलाज के लिए अमेरिका भेजने की समुचित व्यवस्था की।

चंद्रशेखर केवल भारत से लोकतंत्र के समर्थन में वक्तव्य देने तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने नेपाल जाकर वहाँ के लोकतंत्र समर्थक नेताओं और कार्यकर्ताओं का प्रत्यक्ष रूप से उत्साहवर्धन किया। इसी क्रम में वर्ष 1989 में उनकी काठमांडू यात्रा ने नेपाल की राजनीति में व्यापक हलचल पैदा कर दी। उस समय की नेपाल सरकार ने उनकी गतिविधियों पर असंतोष व्यक्त करते हुए नई दिल्ली के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई। यह यात्रा आगे चलकर नेपाल के लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए मील का पत्थर साबित हुई।

chandra shekhar

फरवरी 1990 में नेपाल की तत्कालीन राजशाही पंचायती व्यवस्था और कड़े राजनीतिक प्रतिबंधों के बीच काठमांडू में प्रतिबंधित नेपाली कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित हुआ, जो लोकतांत्रिक आंदोलन की भावी रणनीति तय करने का प्रमुख मंच बना। इस संवेदनशील वातावरण में भारतीय नेता चंद्रशेखर ने 18 फरवरी 1990 को इसमें भाग लेकर नेपाल के लोकतांत्रिक आंदोलन के प्रति अपना स्पष्ट समर्थन व्यक्त किया।

अधिवेशन में आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने नेपाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया। अपने भाषण में उन्होंने लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और राजनीतिक स्वतंत्रता को किसी भी आधुनिक राष्ट्र की आधारशिला बताया। उनके संबोधन ने लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं और नेपाली कांग्रेस के नेताओं का मनोबल बढ़ाया तथा आंदोलन को नया नैतिक बल प्रदान किया। इस संबोधन को ‘युगांतरकारी भाषण’ की संज्ञा दी गई।

chandra shekhar

चंद्रशेखर का यह भाषण इतना ओजस्वी और प्रभावशाली था कि उस समय कार्यकर्ताओं द्वारा इस भाषण को ऑडियो टेप में रिकॉर्ड कर लिया गया। बाद में इन टेपों को नेपाल के सुदूर गाँवों और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों तक पहुँचाया गया, जहाँ गाँव वालों को यह भाषण सुनाकर लोकतंत्र के प्रति जागरूक किया गया। इस आंदोलन के दौरान चंद्रशेखर का नाम नेपाल के घर-घर में लिया जाने लगा था। इसी अवसर पर उन्होंने नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गणेश मान सिंह के नेतृत्व की सराहना करते हुए उन्हें सम्मानपूर्वक “नेपाल का गांधी” कहा।

चंद्रशेखर की इस सक्रिय भागीदारी से नेपाल की तत्कालीन राजशाही समर्थित सरकार असहज हो गई। विभिन्न विवरणों के अनुसार, उनके भाषण के बाद प्रशासनिक स्तर पर उन्हें गिरफ्तार करने की संभावना पर भी विचार किया गया था। हालांकि, संभावित कूटनीतिक परिणामों को देखते हुए अंततः ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया।

इसी यात्रा के दौरान चंद्रशेखर काठमांडू के बानेश्वर स्थित शेराटन होटल में ठहरे हुए थे। वहीं राजशाही समर्थित पंचायती व्यवस्था के प्रतिनिधियों ने नेपाल सरकार की ओर से उन्हें एक औपचारिक पत्र सौंपा। पत्र में कहा गया कि नेपाल सरकार उन्हें भारत के एक जिम्मेदार नेता और नेपाल के मित्र के रूप में सम्मान देती रही है, किंतु पिछले कुछ दिनों की उनकी गतिविधियाँ इस विश्वास के अनुरूप नहीं हैं।पत्र में उन पर नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने, राजशाही के प्रति अनादर प्रदर्शित करने, कुछ राजनीतिक समूहों का पक्ष लेने तथा देश में तनाव और अस्थिरता का वातावरण बनाने जैसे आरोप लगाए गए। साथ ही उनसे आग्रह किया गया कि वे तत्काल नेपाल छोड़कर भारत लौट जाएँ और अपने आचरण पर पुनर्विचार करें।

इन आरोपों और सरकारी दबाव के बावजूद चंद्रशेखर ने लोकतांत्रिक आंदोलन के प्रति अपना समर्थन वापस नहीं लिया। चंद्रशेखर की गतिविधियों के विरोध में तत्कालीन राजशाही प्रधानमंत्री मरीच मान सिंह श्रेष्ठ के नेतृत्व वाली पंचायत सरकार ने व्यापक राजनीतिक अभियान चलाया। पंचायत नेता नवराज सुबेदी ने टेलीविजन पर प्रसारित अपने वक्तव्य में पंचायत व्यवस्था को नेपाल की वास्तविक लोकतांत्रिक प्रणाली बताया तथा भारत पर नेपाल की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने और आर्थिक दबाव बनाने के आरोप लगाए।

इन राजनीतिक आरोपों और सरकारी विरोध के बावजूद चंद्रशेखर अपने रुख पर कायम रहे। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका समर्थन किसी राजनीतिक दल विशेष के लिए नहीं, बल्कि नेपाल की जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों और राजनीतिक स्वतंत्रता के पक्ष में है। यही कारण था कि वे लोकतंत्र समर्थक नेताओं के साथ लगातार संवाद बनाए रहे और विभिन्न सार्वजनिक मंचों से लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थन में अपनी बात रखते रहे।

चंद्रशेखर के इस सक्रिय रुख के कारण भारत की तत्कालीन वी.पी. सिंह सरकार जो नेपाल की राजशाही के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने या उनके पक्ष में झुकी दिख रही थी को भी असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। यद्यपि यह चंद्रशेखर की अपनी ही पार्टी जनता दल की सरकार थी, फिर भी अपनी सरकार से असहमति व्यक्त करते हुए उन्होंने सार्वजनिक रूप से नेपाल के लोकतंत्र बहाली आंदोलन का समर्थन किया।

इसी उद्देश्य से उन्होंने कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के सदस्यों सहित भारतीय सांसदों के एक सर्वदलीय दल का नेतृत्व करते हुए पुनः नेपाल की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने नेपाली लोकतंत्र समर्थक नेताओं से मुलाकात की और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति भारत की जनता की सहानुभूति और समर्थन का संदेश दिया।

chandra shekhar

नेपाल में 1990 के जनआंदोलन की सफलता और बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली के बाद भारत-नेपाल संबंधों में नया दौर शुरू हुआ। आंदोलन के दौरान चंद्रशेखर द्वारा बनाए गए प्रगाढ़ राजनीतिक व व्यक्तिगत संबंध इस विश्वास का आधार बने। यह इसी का प्रतीक था कि नेपाल के अंतरिम प्रधानमंत्री कृष्ण प्रसाद भट्टराई ने अपनी भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह से मुलाकात की, तत्कालीन सरकार की तरफ से सरकारी आयोजन में चंद्र शेखर से मुलाकात की बात की गईं लेकिन भट्टाराई ने सरकार का धन्यवाद करते हुए चंद्र शेखर से व्यक्तिगत तौर पर उनके घर जाकर मुलाकात की और नेपाली लोकतन्त्र बहाली में उनके सहयोग के प्रति कृतज्ञता प्रकट की।

chandra shekhar

10 नवंबर 1990 को चंद्रशेखर के भारत के प्रधानमंत्री बनने पर नेपाली कांग्रेस के महासचिव गिरिजा प्रसाद कोइराला उन्हें बधाई देने नई दिल्ली आए।

chandra shekhar

प्रधानमंत्री के रूप में चंद्रशेखर ने पड़ोसी देशों के साथ व्यावहारिक व विश्वासपूर्ण संबंधों को प्राथमिकता दी। इसी नीति के तहत उन्होंने 13 से 15 फरवरी 1991 तक नेपाल की महत्वपूर्ण राजकीय यात्रा की, जो दोनों देशों के संबंधों में एक प्रमुख पड़ाव बनी।

chandra shekhar

इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 1990 के संयुक्त वक्तव्य को द्विपक्षीय संबंधों का आधार मानते हुए सहयोग के अनेक क्षेत्रों में आगे बढ़ने पर सहमति व्यक्त की। परिवहन संपर्क को सुदृढ़ बनाने के लिए भारत ने जयनगर, जनकपुर, बिजलपुरा रेलवे लाइन के पुनरुद्धार का निर्णय लिया। साथ ही नेपालगंज, गौरीफंटा और बनबसा में नए सीमा प्रवेश बिंदु विकसित करने पर भी सहमति बनी, जिससे व्यापार और लोगों के आवागमन को अधिक सुगम बनाया जा सके।

chandra shekhar

दोनों देशों के बीच जल संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग, नेपाल में भारतीय वाहनों के पंजीकरण की बहाली, भारतीय मुद्रा के सुचारु संचालन तथा नेपाल में कार्यरत भारतीय शिक्षकों से संबंधित व्यावहारिक विषयों पर भी सकारात्मक चर्चा हुई। आर्थिक सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करने के लिए एक उच्च स्तरीय कार्यबल गठित करने का निर्णय लिया गया, जिसका गठन बाद में 1991 में किया गया।

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) के अंतर्गत नेपाल में SAARC क्षयरोग (टीबी) केंद्र की स्थापना के निर्णय को भी चंद्रशेखर सरकार का एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।

 chandra shekhar

15 फरवरी 1991 को बी पी कोईराला के पुश्तैनी घर बिराटनगर में नागरिक अभिनंदन के दौरान जब डॉ. शेखर कोइराला ने कोशी अस्पताल के अपग्रेडेशन की मांग रखी, तो प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने आत्मीयता से कहा, “मांगना ही है तो अपने नेता और मेरे प्रिय मित्र बी.पी. कोइराला के नाम पर एक नया मेडिकल कॉलेज और अस्पताल मांगिए।” अपना वादा निभाते हुए उन्होंने एक महीने बाद ही तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला को भारत की ओर से मेडिकल कॉलेज के निर्माण में पूर्ण सहयोग दिया।

chandra shekhar

कोइराला परिवार ने नेपाल को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं और भारतीय राजनीति में उनके सबसे करीबी मित्र पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर थे। एक ऐसे राजनेता के रूप में जो स्वयं में एक अद्वितीय प्रभाव रखते थे, चंद्रशेखर का सभी राजनीतिक दलों में ऐसा कद था जो उनकी राजनीतिक ताकत से कहीं अधिक बड़ा था। भारत के कई प्रधानमंत्री और अधिकांश विदेश मंत्री नेपाल के मुद्दों पर सलाह के लिए चंद्रशेखर के पास ही जाते थे।

वर्ष 2007 में जब चंद्रशेखर का निधन हुआ, तब नेपाली कांग्रेस के शीर्ष नेताओं जिनमें मुख्य रूप से पूर्व उप प्रधानमंत्री शैलजा आचार्य, पूर्व गृह और विदेश मंत्री चक्र प्रसाद बास्तोला और डॉ. शेखर कोइराला ने विशेष रूप से भारत आकर उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

नेपाल के सभी प्रमुख दलों (नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-यूएमएल, नेपाल सद्भावना पार्टी आदि) और शीर्ष नेताओं ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए।

chandra shekhar

तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने कहा कि भारत ने एक कुशल नेता और नेपाल ने अपना एक सच्चा व निकटतम मित्र खो दिया है। देउबा और गणेश मान सिंह के पुत्र प्रकाश मान सिंह ने याद किया कि 1990 के जनआंदोलन में चंद्रशेखर के भाषणों ने कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भर दिया था।

नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री कृष्ण प्रसाद भट्टराई ने चंद्रशेखर जी के अतुलनीय कद और वैश्विक दृष्टिकोण की सराहना करते हुए कहा था कि वे महात्मा गांधी, माओत्से तुंग और सुन यात-सेन की परंपरा के एक महान एशियाई नेता थे।

chandra shekhar

‘द काठमांडू पोस्ट’ ने उन्हें “नेपाल का पुराना मित्र” बताया, वहीं नेपाल के विभिन्न दलों ने माना कि उन्होंने भारत की संसद से लेकर नेपाल की सड़कों तक लोकतांत्रिक संघर्ष, राष्ट्रीय संप्रभुता और संस्थाओं को मजबूत करने में अटूट सहयोग दिया।

नेपाल में आज भी विभिन्न प्रतिष्ठित राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर आयोजित कार्यक्रमों में नेपाली नेताओं द्वारा चंद्रशेखर के इस ऐतिहासिक योगदान को बेहद सम्मान के साथ याद किया जाता है।

नेपाली परिदृश्य में चंद्रशेखर की भूमिका केवल एक भारतीय राजनेता तक सीमित नहीं थी। उन्होंने नेपाल के लोकतांत्रिक संघर्ष के प्रति वैचारिक समर्थन, राजनीतिक सहयोग और व्यक्तिगत प्रतिबद्धता का परिचय दिया। यही कारण है कि नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास में उनका नाम दर्ज है। जन मानस में वे पहले से ही लोकप्रिय हैं।वे सही अर्थों में नेपाल के एक महान मित्र थे, और यही उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक विरासत है।

सन्दर्भ:
1. पुस्तक ‘द लॉन्ग मार्च’
द्वारा अत्तार चंद

2. संसद में चंद्र शेखर स्मृति ग्रंथ
लोक सभा सचिवालय नई दिल्ली

3.श्री सूर्यकुमार
प्रसिद्ध गांधीनिष्ठ समाजवादी एवं लोकतंत्र सेनानी, भारत यात्रा ट्रस्ट के ट्रस्टी तथा चंद्र शेखर जी के जीवंत दस्तावेज एवं भारत-नेपाल संबंधों के जानकार (जिन्होंने कई बार नेपाल की यात्राएं की हैं तथा कोइराला परिवार से जिनके निकटतम निजी संबंध रहे हैं) के साथ बातचीत।

4. द टाइम्स ऑफ इंडिया
https://timesofindia.indiatimes.com/india/monarchy-to-mayhem-what-next-for-nepal/articleshow/123842932.cms?utm_source=perplexity

5. द हिंदुस्तान टाइम्स
https://www.hindustantimes.com/lucknow/as-foreign-minister-atal-helped-nepalese-leader-bp-koirala/story-qIXFsmalWR7b3VTsqxKzlN.html?utm_source=perplexity

6. द टेलीग्राफ
https://www.telegraphindia.com/opinion/a-trusted-ally-between-g-p-koirala-and-india-it-was-a-two-way-street/cid/541803?utm_source=perplexity

7. द काठमांडू पोस्ट 09/07/2007

8. नेपाल Radio https://radionepalonline.com/en/2025/04/08/405663.html

9. ekantipur .com https://ekantipur.com/news/2025/04/07/en/chandrasekhars-role-is-important-in-strengthening-nepal-india-relations-deputy-prime-minister-singh-01-00.html.

10. Rising Nepal Daily https://risingnepaldaily.com/news/59998

11. Awaaj News

Government’s response to NC’s 1990 convention

12.पुस्तक: चंद्रशेखर: ए लॉन्ग जर्नी (अभिनंदन ग्रंथ)

13. संसद में चंद्रशेखर: एक स्मृति ग्रंथ

लेखक:
मोहम्मद इरफान ऊर्फी
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी के वैचारिक विषयों के शोधार्थी एवं पेशे से फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग में क्वालिटी कंट्रोल मैनेजर।


Discover more from समता मार्ग

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Comment