
— अनिल अत्रि —
नवंबर 1997 की बात है. आज से करीब तीन दशक पहले की. चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली समाजवादी जनता पार्टी का गठन हुए सात साल हो चुके थे. पार्टी ने अपने राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए बिहार के ऐतिहासिक स्थल राजगीर का चयन किया था. शायद यह पार्टी का दूसरा राष्ट्रीय अधिवेशन था. पहला दिल्ली में लाल किले के पीछे आयोजित किया गया था. तब यंग इंडियन के पुनर्प्रकाशन को अभी तीन महीने ही हुए थे. हम लोग नरेंद्र निकेतन में अगले अंक का संपादकीय तय करने की मीटिंग में बैठे थे. मीटिंग डॉ एस. के. गोयल के कमरे में ही हुआ करती थी. बैठक खत्म होने के बाद चंद्रशेखर जी ने कहा कि आप लोग भी राजगीर चलिए.धीरे-धीरे मगध एक्सप्रेस धीना से दूर होने लगी. ट्रेन की पटरियों के आसपास खड़े चेहरे धुँधले होने लगे. लेकिन उन चेहरों की स्मृतियाँ धुँधली नहीं हुई.
डॉ गोयल ने सलाह दी कि राजगीर में यंग इंडियन का भी स्टॉल लगाया जाना चाहिए. चंद्रशेखर जी ने हामी भरते हुए कहा, ठीक है, आप अत्रि को भी अपने साथ ले लें. इस तरह मेरी भी राजगीर जाने की तैयारी हो गई.
हम लोगों के लिए मगध एक्सप्रेस से जाने की व्यवस्था की गई. डॉ. गोयल के अलावा चंद्रशेखर जी के भाई कृपा शंकर सिंह और बद्री नारायण सिंह भी हमारे साथ मगध से यात्रा कर रहे थे. समाजवादी जनता पार्टी से जुड़े कुछ अन्य नेता भी उसी ट्रेन में थे. कुछ हमारे ही डिब्बे में सफ़र कर रहे थे.
लेकिन उस सफ़र ने राजगीर पहुँचने से पहले ही एक अलग कहानी लिख दी. उस दिन बिहार के जहानाबाद जिले के मखदूमपुर रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर वैद्यनाथ गिरी की हत्या के विरोध में रेलवे कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे. बताया गया कि हत्यारे उनकी बेटी को अगुआ करके अपने साथ ले गए थे. इसके चलते उत्तर भारत के इस पूरे इलाके से गुजरने वाली सभी ट्रेनें जहाँ की तहाँ रोक दी गई थीं.
हमारी ट्रेन भी मुगलसराय से थोड़ा आगे एक छोटे-से गाँव के पास रोक दी गई. हम लगभग पूरा दिन उसी ट्रेन में फँसे रहे. उस दिन डॉ गोयल की बेचैनी और कृपा शंकर जी का हास्य-विनोद मुझे आज तक याद है. यह उसी दिन का किस्सा है.
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो उस सफ़र में सिर्फ़ एक रुकी हुई ट्रेन नहीं, बल्कि एक पूरा दौर दिखाई देता है. यह वह समय था जब देश आज़ादी की स्वर्ण जयंती मना रहा था. केंद्र में पहले अटल बिहारी वाजपेयी और एक के बाद एक देवेगौड़ा और गुजराल की सरकारें गिर चुकी थीं और गठबंधन की राजनीति ने देश की राजनीति की फिरकी बना रखी थी.
उस समय में चंद्रशेखर जी फिर से सक्रिय हो रहे थे, यंग इंडियन के पुनर्प्रकाशन का निर्णय इसी सक्रियता का परिणाम था, राजनीतिक दलों में महिला आरक्षण को लेकर संसद के भीतर और टकराव चल रहा था, समाजवादी गुट लगातार बिखर रहे थे, बाबरी मस्जिद के बाद देश की राजनीति नई करवट ले रही थी, विश्व व्यापार संगठन और उदारीकरण की दिशा को लेकर बहस चल रही थी और उन सबके बीच पत्रकारिता के वे शुरुआती साल थे, जब मैं नया-नया ही पत्रकारिता में आया था और राजनीतिक घटनाओं को देखने-समझने की एक अलग ही बेचैनी हुआ करती थी.
आज समय बहुत आगे निकल आया है. वे दिन भी पीछे छूट गए और उन दिनों के कई किरदार भी अब स्मृतियों का हिस्सा बन चुके हैं. मगध एक्सप्रेस का वह सफ़र भी उन्हीं स्मृतियों का एक हिस्सा है.
मेरा यह संस्मरण यंग इंडियन के 22 नवंबर, 1997 के अंक में प्रकाशित हुआ था. लेख में एक स्केच भी था जिसे मनोज पंडित ने बनाया था. करीब तीन दशक बाद उस पुराने रोचक यात्रा-वृतांत को फिर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ. आप भी पढ़ें!
…
प्रातः नौ बजे के आसपास का समय था. मुगलसराय स्टेशन पर कुछ देर विश्राम के बाद मगध एक्सप्रेस पटना की ओर रवाना हो चली थी और मुगलसराय की हलचल पीछे छूट चुकी थी. हमारे डिब्बे में सवार यात्री चाय-पान के बाद अपने को तरोताज़ा महसूस कराने का दिखावा कर रहे थे. जबकि सच्चाई कुछ और थी.
मैं अपनी सेकेंड क्लास एसी कोच की सीट पर बैठा अखबार की खबरों में डूब-उतर रहा था. किन्तु, मेरे सहयात्रियों की बातचीत मुझे बार-बार अपनी ओर खींच रही थी. मौसम, महँगाई, रेलवे की सुविधा-असुविधाओं और निजी सुख-दुःख से होते हुए बातचीत राजनीति पर आकर अटक गई थी, जिस पर गर्मागर्म बहस चल रही थी.
इसी बीच शायर साहब पूरे कॉन्फिडेंस के साथ फिर से अपनी ग़ज़लों की पोटली लेकर हमारे बीच एंट्री मार बैठे. वही, जो बीती रात अपनी ग़ज़लों के कारण हमारी नींद के दुश्मन बने हुए थे. यात्रियों की डिब्बे से बाहर न जा पाने की मज़बूरी का फ़ायदा वे बड़े इत्मीनान से उठा रहे थे.
रेल का डिब्बा, लोकतंत्र की तरह सबको बाँध कर रखता है. भारतीय रेल केवल यात्रा ही नहीं कराती बल्कि हर बार नए अनुभव भी कराती है.
मगध एक्सप्रेस अपनी पटरियों पर दौड़ रही थी और उनकी ग़ज़लें यात्रियों के धैर्य की सीमाओं के पार. उनके हर एक शेर के बाद डिब्बे से ‘आह’ तथा ‘वाह’ के स्वर उठ रहे थे. ‘वाह’ तो उनकी जो शायरी के रसिक थे और ‘आह’ उनकी, जिनकी नींद का अपहरण बीती रात हो चुका था और जो अब थोड़ी देर सोना चाहते थे.
यह सब चल ही रहा था कि मुगलसराय से कुछ किलोमीटर आगे जाकर एक छोटे से स्टेशन धीना के पास जाकर ट्रेन रुक गई. भारतीय रेल का इस प्रकार किसी स्थान पर अचानक रुक जाना कोई असामान्य घटना नहीं थी. किन्तु जब बहुत देर बाद भी ट्रेन ने अपने स्थान से हिलने का नाम नहीं लिया तो डिब्बों में हलचल शुरू हो गई.
इस बीच लोग कई दौर चाय पी-पीकर ऊब चुके थे. अब उनमें बेचैनी बढ़ने लगी थी. जब सब्र का बाँध टूटने लगा तो कुछ यात्री ट्रेन से नीचे उतरने लगे और ट्रेन के रुकने का कारण जानने लगे. पर, उस समय तक इसका उत्तर किसी के पास नहीं था.
सुबह का सूरज अब सिर पर चढ़ने लगा था. ट्रेन में मौजूद करीबन डेढ़ हजार यात्रियों को भोजन की आवश्यकता महसूस होने लगी थी. इस बीच रेलवे कैंटीन के कर्मचारियों की आवाजाही भी बंद हो चुकी थी और उन्होंने अपने हाथ खड़े कर दिए थे. यहां तक कि वे यात्रियों को चाय तक उपलब्ध कराने में असमर्थ हो गए थे.
यात्रियों के पास पीने का पानी भी समाप्त होने लगा था. बच्चे प्यास से बेहाल हो रहे थे. आसपास लगे पानी के नलों में भी पानी नदारद था. प्लेटफार्म के पास एक हैंडपंप था, जिससे पानी पीकर यात्री अपना गला तर कर रहे थे. किन्तु वह बेचारा इकलौता हैडपंप भी मगध एक्सप्रेस के डेढ़ हजार से अधिक यात्रियों का भार कब तक उठाता? ज्यादा उपयोग के कारण पहले तो उसने पानी के साथ रेत उगलनी शुरू की, और फिर देखते ही देखते उसने अपने घुटने टेक दिये.
इस बीच, मुश्किल से सौ-पचास घरों वाले इस गाँव में यह ख़बर फैल चुकी थी कि एक ट्रेन स्टेशन पर सुबह से खड़ी है और उसके यात्रियों का भोजन-पानी आदि समाप्त हो चुका है. कुछ ही देर में वहाँ के लोग, जिनमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे, खाने-पीने के सामान के साथ प्लेटफॉर्म पर पहुँचने लगे थे. कुछ लोग चाय बनाने का सामान लेकर ट्रेन के समीप आ जुटे थे.
एक कप चाय की कीमत दो रुपये थी, जो अधिक नहीं थी. चाय छोटे-छोटे कुल्हड़ों में दी जा रही थी. कुल्हड़ आकार में मिट्टी के दीपक से बड़े नहीं थे. हालांकि स्वच्छता के लिहाज से ये कुल्हड़ उत्तम थे. किन्तु उनमें चाय इतनी ही आती थी कि बस चीनी की मिठास महसूस की जा सके. उन कुल्हड़ों की एक और विशेषता थी. वह यह कि इनमें आप वहीं खड़े होकर चाय पी सकते हैं. ट्रेन तक लाने में आधी चाय तो सूखे मिट्टी के कुल्हड़ ही पी जा रहे थे.
कुछ ही देर में चाय के साथ बिस्किट, नमकीन, अधपके केले, भुने हुए चने भी वहां बिकने लगे. चने दो रुपये के पचास ग्राम थे. लेकिन उस पचास ग्राम में चनों के साथ प्याज और पत्तों सहित मूली भी शामिल थी.
तभी मेरी नज़र एक परिवार पर जाकर ठहर गई. एक व्यक्ति फटेहाल अवस्था में सिर पर टोकरी रखे खड़ा था. उसके साथ एक महिला जो उसकी पत्नी रही होगी और दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे. पूरा परिवार मिलकर भुने हुए चने बेच रहा था.
अनायास ही मुझे दिल्ली के चाँदनी चौक स्थित टाउन हॉल की याद आ गई, जहाँ कुछ लोग प्रतिदिन डेढ़-दो किलो दाल व चने आदि कबूतरों को खिला देते हैं. वहीं दूसरी ओर यह धीना के ग्रामीण हैं, जहाँ मुश्किल से एक-डेढ़ किलो चने बेचने के लिए पूरे परिवार को मेहनत करनी पड़ रही है. चने के इन मुट्ठी भर दानों पर उनके परिवार की पूरी अर्थव्यवस्था टिकी थी. जब वह ट्रेन के यात्रियों को चने देता तो
उसकी पत्नी जगह-जगह से पिचके हुए एक स्टील के गिलास की धार से छोटे-छोटे प्याज़ और मूली काटकर चनों में मिला देती. मैंने उससे पूछा, “आप, चाकू का इस्तेमाल क्यों नहीं करतीं?” उस महिला ने उत्तर दिया कि “बाबू हमको क्या रोज-रोज साग-सब्जी बनानी पड़ती है जो चाकू खरीदें? कभी बनाते भी हैं, तो ऐसे ही काम चला लेते हैं.” उस जवाब ने, जिसमें गरीबी का यथार्थ समाया हुआ था, मुझे निरुत्तर कर दिया.
धीना के ग्रामीण अपनी तरफ से यात्रियों को भोजन आदि उपलब्ध कराने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे. किंतु उनकी भी अपनी सीमाएं थीं. छोटे से उस गाँव में अचानक डेढ़ हजार से अधिक बिन बुलाए मेहमान आ पधारे थे. स्टेशन के आसपास मौजूद घरों की आबादी से कई गुना अधिक लोगों के भोजन की व्यवस्था वे करते भी तो कैसे? गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले इन परिवारों के लिए अपने घर का चूल्हा जलाना ही किसी संघर्ष से कम नहीं था. जो लोग दो जून की रोटी के लिए दिन-भर कठिन परिश्रम करते हों, उनके घर भोजन की तलाश करना सचमुच रेगिस्तान में पानी का सोता खोजने जैसा था.
स्टेशन से कुछ कदम आगे चलकर एक रेलवे फाटक था, जिसके पास कच्ची झोपड़ियों में बनी दो-तीन छोटी-छोटी दुकानें थीं. वहाँ एक दुकान पर पूड़ी-सब्ज़ी बन रही थी, तो दूसरी पर पकौड़े तले जा रहे थे. दोपहर लगभग दो बजे तक पहुँचने वालों को यहाँ कुछ भोजन मिल सका. पूड़ी एक रुपये की थी और पकौड़ों का भाव पचास रुपये प्रति किलो.
दुकानदारों के हाव-भाव देखकर लग रहा था कि उन्होंने अपने जीवन में इतनी भीड़ कभी नहीं देखी थी. वे रोज़मर्रा की ज़रूरत के अनुसार ही थोड़ा-सा सामान लेकर दुकान खोले बैठे थे. उन्हें क्या पता था कि उस दिन उनकी दुकान पर भारी भीड़ टूट पड़ेगी. जैसे-जैसे उन दोनों दुकानों पर भीड़ बढ़ती गई, उनमें मौज़ूद सामान घटता गया. धीरे-धीरे पूड़ी वाले की सब्ज़ी के भगोने की तली दिखाई देने लगी. सब्ज़ी में आलू कम और नमकीन पानी अधिक रह गया था, लेकिन भूख ऐसी थी कि लोग उसे भी किसी मोहनभोग की तरह ग्रहण कर रहे थे.
उधर पकौड़े वाले के आलू और बेसन भी समाप्त होने लगे. उसने अब पकौड़ों में आलू के साथ मूली के पत्ते भी मिलाने शुरू कर दिए थे. बेसन का गाढ़ा घोल अब पीले पानी में बदल चुका था. इतना सब होने पर भी दोनों दुकानदारों का ध्यान अपनी कमाई की ओर नहीं था. इतनी भीड़ में कौन पैसे दे रहा है और कौन बिना पैसे दिए चला जा रहा है, इसकी उन्हें कोई परवाह नहीं थी. पकौड़े वाले की चिंता केवल इतनी थी कि कहीं भट्ठी का ईंधन न समाप्त हो जाए. उसने अपने छोटे लड़के को आसपास से लकड़ियाँ बटोर लाने के लिए भेज दिया.
अपने भोजन की चिन्ता में दिन-रात एक कर देने वाले उन ग्रामीणों को उस दिन अपने भोजन की बजाय उनके अतिथि बने डेढ़ हजार यात्रियों के भोजन की थी. यही कारण था कि लगभग पूरा गाँव स्टेशन पर खाने-पीने का जो भी सामान घरों में था, उसे लेकर ट्रेन के पास पहुँच गया था. लगभग 65-70 साल की एक वृद्धा तो अपनी थाली में गुड़ के कुछ टुकड़े ही रखकर ले आई. शायद उसके घर में यात्रियों को देने के लिए खाने की यही सबसे कीमती चीज रही होगी!
इसी बीच यात्रियों को सूचना मिली कि बिहार में जहानाबाद जिले के मकदूमपुर रेलवे स्टेशन मास्टर वैधनाथ गिरी की हत्या के विरोध में रेलवे कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी है. हड़ताल के चलते उत्तर भारत के इस पूरे क्षेत्र की सभी ट्रेनें जहाँ की तहाँ रोक दी गई हैं. यह भी पता चला कि पटना में इस विषय पर बैठक चल रही है और शीघ्र ही कोई निर्णय होने की संभावना है.
उधर हमारे शायर महाशय ने अब अपना मजमा प्लेटफार्म पर जमा लिया था. उनकी शायरी का आनंद अब केवल हमारे डिब्बे के यात्री ही नहीं, बल्कि दूसरे डिब्बों के यात्री और गाँव के लोग भी लेने लगे थे. इंतज़ार, भूख और भविष्य की अनिश्चितता से भरे उन पलों में शायर महाशय लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाने का भरसक प्रयास कर रहे थे.
उसी समय मैंने अगले स्टेशन पर उतरने वाले कुछ यात्रियों को अपने सामान के साथ ट्रेन से उतरकर पैदल जाते हुए देखा. उनका कहना था, ‘ट्रेन का क्या भरोसा. जब सुबह से अभी तक नहीं चली तब आगे भी चलेगी, इसकी गारंटी कौन दे?’ जमनिया, बक्सर और आसपास के क्षेत्रों की ओर जाने वाले कई यात्री अब सड़क मार्ग से आगे बढ़ने की सोच कर दूसरे साधनों की तलाश में निकल पड़े थे.
दिन ढलने लगा था. यात्रियों के चेहरों पर परेशानी साफ़ दिखने लगी थी. जिन यात्रियों के साथ बच्चे थे, उन्हें अब रात के भोजन की चिन्ता भी सताने लगी थी. हालाँकि यात्रियों की इस चिन्ता से धीना के ग्रामीण भी बेख़बर नहीं थे. वे भी इसी उधेड़बुन में थे कि यात्रियों की इस चिंता को कैसे कम किया जाए.
ये लोग न तो हमारे रिश्तेदार थे, न परिचित और न ही जानकार. ये सभी वे थे जिन्हें हमने इसके पहले कभी देखा तक न था. न ही भविष्य में कभी मिलने की कोई संभावना ही थी. किन्तु इसके बावजूद उनकी सहायता में हमें कहीं भी परायापन महसूस नहीं हुआ. ऐसा लगता था कि जैसे हम उनसे पहली बार नहीं, बल्कि कई बार मिल चुके हों. एक अनजान रिश्ता ट्रेन के यात्रियों और धीना निवासियों के बीच उन कुछ घंटों ने पैदा कर दिया था. एक ऐसा रिश्ता जिसे किसी नाम की ज़रूरत नहीं थी. अनजान रिश्ते की यह गाँठ समय बीतने के साथ और मजबूत होती जा रही थी. परेशानी और भूख से व्याकुल बच्चों को देखकर उनके मन में जो दर्द उठते देखा, वह आज भी मेरी आँखों में समाया हुआ है.
दिन ढलते-ढलते अचानक ट्रेन को सिग्नल मिल गया. इंजन ने सीटी दी तो प्लेटफॉर्म और आसपास पटरियों और फाटक के पास दुकानों पर बैठे यात्रियों के कदम तेजी से अपनी अपनी डिब्बों की ओर बढ़ने लगे. कुछ ही घंटों पहले जिनसे परिचय हुआ था, अब उनसे विदा लेने का समय आ गया था.
इस बीच जो कुछ घंटों में मित्र बन गए थे वे आपस में ऐसे मिल रहे थे जैसे कोई फौजी छुट्टी बिताकर जाते समय अपने मित्रों से विदा ले रहा हो. कोई हाथ मिला रहा था, कोई गले लग रहा था तो कोई दूर तक साथ चल रहा था.
मैं राजगीर की अपनी यात्रा पूरी करके दिल्ली लौट चुका हूँ. लेकिन धीना जैसे अब भी मेरे भीतर ही कहीं जीवित है.
कभी-कभी अब भी ऐसा लगता है जैसे मैं धीना के उस फाटक के पास छप्पर की उस दुकान पर खड़ा हूँ. हाथ में मिट्टी का छोटा-सा कुल्हड़ है. और उसमें दो रुपए की चाय है. कुछ यात्राएं ट्रेन के आगे चल देने या ट्रेन से उतरकर घर लौट आने के बाद भी ख़त्म नहीं होतीं. कहीं न कहीं हमारी स्मृतियों में चलती रहती हैं. मगध एक्सप्रेस से दिल्ली से राजगीर की यात्रा ऐसी एक यात्रा थी.
सरे राह चलते-चलते ..
(यंग इंडियन साप्ताहिक के 22 नवंबर, 1997 के अंक में प्रकाशित)
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