दलित प्रधानमंत्री का प्रश्न और चंद्रशेखर का प्रयास

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The Question of a Dalit Prime Minister and Chandra Shekhar's Effort

मोहम्मद इरफान ऊर्फी

— मोहम्मद इरफान ऊर्फी —

पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के जन्म शताब्दी के अवसर पर, देश को पहला दलित प्रधानमंत्री देने के उनके ऐतिहासिक प्रयासों को याद करना बेहद प्रासंगिक है। जनता पार्टी के उस दौर में बाबू जगजीवन राम तीन बार प्रधानमंत्री पद के बेहद करीब पहुंचे, लेकिन राजनैतिक समीकरणों, आंतरिक गुटबाजी और राष्ट्रपति के जल्दबाजी में लिए गए फैसले के कारण वह चूक गए। इन सभी महत्वपूर्ण मौकों पर, चंद्रशेखर जी ने जनता पार्टी के अध्यक्ष के रूप में जगजीवन बाबू को प्रधानमंत्री बनाने के लिए बेहद सक्रिय और महती भूमिका निभाई थी। चंद्रशेखर जी की यह कोशिश किसी जातिवादी राजनीति का हिस्सा नहीं थी, बल्कि यह उनके गहरे समाजवादी मूल्यों और शोषित-वंचित समाज को हक़ अधिकार दिलाने के संकल्प का परिणाम थी।

चंद्रशेखर के बेहद करीबी रहे लोकतंत्र सेनानी और गांधीनिष्ठ समाजवादी सूर्य कुमार बताते हैं कि मार्च 1977 में आपातकाल हटने के बाद, बाबू जगजीवन राम कांग्रेस छोड़ने की दुविधा में थे। उन्हें डर था कि विपक्ष के ‘गैर-कांग्रेसी’ नेताओं के बीच उनका राजनैतिक भविष्य कैसा होगा।इस मोड़ पर, हेमवती नंदन बहुगुणा ने विपक्षी एकता के मुख्य केंद्र चंद्रशेखर से संपर्क किया। इसके बाद चंद्रशेखर, बहुगुणा और जगजीवन राम के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण गुप्त बैठक हुई। बैठक में चंद्रशेखर ने जगजीवन बाबू को आश्वस्त किया कि लोकतंत्र की बहाली और विपक्षी एकजुटता के लिए उनका साथ जरूरी है।इस आश्वासन से जगजीवन राम का संशय दूर हुआ और उन्होंने तुरंत ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ का गठन किया, जिसने आगे चलकर जनता पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा।

चुनाव में जनता पार्टी को भारी बहुमत मिला। पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि तब प्रधानमंत्री पद के चार प्रमुख दावेदार थे,मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, जगजीवन राम और चंद्रशेखर। स्वयं जेपी की इच्छा ऊर्जावान चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाने की थी, लेकिन चंद्र शेखर ने खुद को इस दौड़ से दूर रखा। मोरारजी भाई के अड़ियल स्वभाव के कारण चंद्रशेखर उनके नाम पर असहमत थे। उनका मानना था कि विभिन्न विचारधाराओं वाली इस नई व्यवस्था को स्थायित्व देने के लिए एक वरिष्ठ, प्रशासनिक रूप से सक्षम और कुशल ‘समन्वयक’ की ज़रूरत है जो सबको साथ लेकर चल सके। चंद्रशेखर की राय थी कि बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनना चाहिए।ऐसे में बाबू जगजीवन राम के नाम पर सहमति बनती दिख रही थी।

लेकिन यहाँ जनता पार्टी की आंतरिक गुटबाजी और वैचारिक मतभेद आड़े आ गए। मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह के समर्थकों का तर्क था कि आपातकाल का प्रस्तावक रहा व्यक्ति इस ऐतिहासिक जीत की अगुवाई नहीं कर सकता। साथ ही, किसानों और पिछड़ी जातियों के मुख्य चेहरा माने जाने वाले चौधरी चरण सिंह भी जगजीवन बाबू का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इन जटिल समीकरणों के बीच जयप्रकाश नारायण (जेपी) और आचार्य कृपलानी ने मोरारजी देसाई के नाम पर मुहर लगा दी और 24 मार्च 1977 को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

जनता पार्टी के आंतरिक कलह और दोहरी सदस्यता के प्रश्न पर 15 जुलाई 1979 को मोरारजी भाई ने इस्तीफा दे दिया। जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्र शेखर के सामने पार्टी और सरकार दोनों के बचाने का गंभीर प्रश्न खड़ा था। वरिष्ठ पत्रकार प्रबाल मैत्र ने अपने एक लेख रहस्यमय राजनेता में उल्लेख किया है कि जनता सरकार के पतन के बाद मोरारजी मंत्री मंडल के लगभग दो दर्जन सदस्य तत्कालीन अध्यक्ष चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाने का विचार करने लगे थे।
इंदिरा गांधी की एक सहयोगी चंद्रशेखर के पास आई कि आपके नेतृत्व संभालना चाहिए।उसके बाद इंदिरा गांधी का फोन चंद्रशेखर के पास आया कि अगर आप प्रधानमंत्री बनते हैं तो हमें प्रसन्नता होगी, जगजीवन बाबू को हम नहीं चाहते हैं। यही प्रस्ताव कमलापति त्रिपाठी की ओर से भी आया था लेकिन यहाँ जनता पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर ने राजनैतिक परिपक्वता दिखाते हुए बाबू जगजीवन राम का नाम आगे बढ़ाया।

चंद्रशेखर ने जगजीवन बाबू के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए बहुमत जुटाना शुरू कर दिया। उन्होंने राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी से मुलाकात कर सूची सौंपने का समय मांगा, जिस पर राष्ट्रपति ने सहमति देते हुए कहा कि मुझे कोई जल्दी नहीं है।लेकिन जब दोनों नेता सांसदों की लिस्ट तैयार कर रहे थे, तभी राष्ट्रपति ने जनता पार्टी की अंतिम सूची का इंतजार किए बिना ही चौधरी चरण सिंह को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर दिया, जिन्हें कांग्रेस (आई) का बाहरी समर्थन प्राप्त था।राष्ट्रपति के इस अप्रत्याशित फैसले से आहत होकर चंद्रशेखर ने संसद परिसर में सांसदों को जुटाकर जुलूस निकाला। वोट कल्ब से राष्ट्रपति भवन की तरफ बढ़े। विजय चौक पर सभा हुई । राष्ट्रपति के इस कदम को अनैतिक और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ बताया, जबकि कुछ विश्लेषक इसे राजनीतिक अस्थिरता का परिणाम मानते हैं। चंद्रशेखर की रणनीति तैयार थी, जनता पार्टी के पास बहुमत था लेकिन राष्ट्रपति की जल्दबाजी ने जगजीवन बाबू से यह दूसरा मौका भी छीन लिया।

28 जुलाई 1979 को कांग्रेस के समर्थन से चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने, लेकिन इंदिरा गांधी द्वारा समर्थन वापस लेने के कारण उन्होंने संसद का सामना किए बिना ही 21 अगस्त 1979 को इस्तीफा दे दिया।इसी दिन चंद्रशेखर ने तुरंत सक्रियता दिखाई और राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी से मिलकर जनता पार्टी की ओर से वैकल्पिक सरकार का दावा पेश किया। अगले दिन 22 अगस्त को चंद्रशेखर और बाबू जगजीवन राम ने राष्ट्रपति से मिलकर आश्वस्त किया कि वे सदन में या हस्ताक्षरित सूची के जरिए बहुमत साबित कर देंगे। राष्ट्रपति रेड्डी ने भी उन्हें आश्वस्त किया कि वे कोई जल्दबाजी नहीं करेंगे।

इसके तुरंत बाद जब जगजीवन राम और चंद्रशेखर संसद भवन में सांसदों की सूची तैयार करने में जुटे थे, तभी दोपहर में अचानक खबर आई कि राष्ट्रपति ने निवर्तमान चरण सिंह मंत्रिमंडल की सिफारिश पर लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी है। इस अचानक लिए गए फैसले के कारण बहुमत का दावा धरे का धरा रह गया और जगजीवन बाबू प्रधानमंत्री बनने से फिर चूक गए।

इस आकस्मिक फैसले से क्षुब्ध होकर संसद भंग होने के ठीक दो दिन बाद, 24 अगस्त 1979 को दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में एक विशाल रैली हुई। इस रैली में चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी और जगजीवन बाबू ने राष्ट्रपति के इस कदम को संसदीय मर्यादाओं के विपरीत बताते हुए कड़ी आलोचना की और चुनाव के बाद पूर्ण बहुमत आने पर राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का संकल्प लिया।

इसके बाद 1980 के चुनाव में चंद्रशेखर ने जनता पार्टी के अध्यक्ष के रूप में बाबू जगजीवन राम को ही प्रधानमंत्री पद का आधिकारिक उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ा। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार था जब किसी प्रमुख दल ने एक दलित चेहरे को देश के सामने प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया था। हालांकि, उस चुनाव में देश का राजनैतिक माहौल बदल चुका था और कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई।

चंद्रशेखर की जन्म शताब्दी पर यह स्पष्ट होता है कि संसदीय राजनीति के समीकरणों और जनता पार्टी की आंतरिक कलह के बीच भी चंद्रशेखर ने सत्ता के पद से ऊपर उठकर बाबू जगजीवन राम को आगे किया। उनका यह आचरण यह साबित करता है कि वंचित समाज को उसका हक दिलाना उनके लिए महज एक राजनीतिक दांव-पेंच नहीं, बल्कि उनका गहरा समाजवादी संकल्प था।
इन घटनाओं से इतना स्पष्ट होता है कि चंद्रशेखर ने विभिन्न अवसरों पर जगजीवन राम के नेतृत्व का समर्थन किया। हालांकि यह प्रश्न इतिहासकारों के बीच बहस का विषय बना हुआ है कि इसके पीछे उनका प्रमुख उद्देश्य सामाजिक प्रतिनिधित्व था, वरिष्ठता का सम्मान था,या फिर उस दौर की राजनैतिक परिस्थितियों में सबसे मजबूत नेतृत्व की खोज।

संदर्भ

1. चंद्रशेखर. ज़िंदगी का कारवाँ (आत्मकथा)।

2. Gujral, I. K. Matters of Discretion: An Autobiography.

3. Advani, L. K. My Country My Life: An Autobiography.

4. श्री सूर्यकुमार (प्रसिद्ध गांधीनिष्ठ समाजवादी, लोकतंत्र सेनानी, भारत यात्रा ट्रस्ट के ट्रस्टी तथा चंद्रशेखर जी के निकट सहयोगी) से व्यक्तिगत बातचीत।

5. मैत्र, प्रबाल. रहस्यमय नेता. सारंग स्वर, जुलाई 1989।

6. चतुर्वेदी, जयराम. ई-चर्चा।

7. समाचार-पत्र:

– Hindustan Times, 23 जुलाई 1979।
– The Indian Express, 27 जुलाई 1979।
– The Indian Express, 21 अगस्त 1979।


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