बिहार के मंत्रिमंडल का विस्तार : जातियों का गणित, सत्ता, प्रतिनिधित्व और नागरिकता का समीकरण

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🚨Bihar Cabinet 2026: Full Portfolio Allocation of Ministers

Parichay Das

— परिचय दास —

बिहार की राजनीति को यदि किसी एक शब्द में समझना हो तो वह शब्द “प्रतिनिधित्व” नहीं, “गणना” होगा। यहाँ सत्ता विचारधारा से कम और सामाजिक अंकगणित से अधिक निर्मित होती है। मंत्रिमंडल केवल प्रशासनिक संस्था नहीं रह गया है, वह एक चलती-फिरती जातीय जनगणना बन चुका है। कौन मंत्री बनेगा, इसका निर्णय उसकी प्रशासनिक क्षमता, वैचारिक स्पष्टता, बौद्धिक गहराई या सार्वजनिक दृष्टि से कम और उसकी जातीय उपयोगिता से अधिक तय होता है। यह स्थिति केवल बिहार तक सीमित नहीं पर बिहार में यह सबसे अधिक स्पष्ट रूप में दिखाई देती है। वहाँ सत्ता का हर चेहरा किसी सामाजिक समूह का संकेत होता है, हर शपथ एक जातीय संदेश, हर विभाग एक चुनावी संतुलन। लोकतंत्र का दृश्य कभी-कभी इतना विचित्र हो जाता है कि मंत्री परिषद संविधान की कम और जातीय उपस्थिति की अधिक सूची लगती है।

बिहार में आज बने मंत्रिमंडल की सूची पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि यह सरकार केवल शासन चलाने के लिए नहीं बनाई गई बल्कि आने वाले चुनावों की मानसिक तैयारी के रूप में गठित की गई है। इसमें ओबीसी और ईबीसी समुदायों की अत्यधिक उपस्थिति संयोग नहीं है। बिहार की राजनीति अब उस मोड़ पर पहुँच चुकी है जहाँ “अति पिछड़ा” सबसे निर्णायक सामाजिक शक्ति बन गया है। कभी राजनीति केवल यादव, कुर्मी, राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण जैसे बड़े सामाजिक समूहों के इर्द-गिर्द घूमती थी लेकिन अब छोटी-छोटी जातीय इकाइयाँ सत्ता की धुरी बन चुकी हैं। धानुक, नोनिया, केवट, गंगोता, मल्लाह, तेली, कुशवाहा, पासी, कहार, मांझी, निषाद जैसे समूहों की राजनीतिक उपयोगिता अचानक बढ़ गई है। कारण स्पष्ट है। लोकतंत्र में संख्या सबसे बड़ा धर्म बन जाती है। जो समूह संगठित होकर मतदान कर सकता है, वही सत्ता की भाषा बदल देता है।

मंत्रिमंडल में कोइरी ( मतलब ~ कुशवाहा ) समुदाय की उपस्थिति विशेष ध्यान खींचती है। मुख्यमंत्री स्वयं इसी समुदाय से आते हैं। इसके अतिरिक्त भी कई चेहरे इस सामाजिक आधार को साधने के लिए शामिल किए गए हैं। यह केवल प्रतिनिधित्व नहीं, राजनीतिक निवेश है। बिहार में कुशवाहा समुदाय लंबे समय से एक अस्थिर राजनीतिक स्थिति में रहा है। कभी वह जदयू के साथ गया, कभी राजद के साथ, कभी भाजपा के साथ। इसलिए हर दल उसे स्थायी रूप से अपने पक्ष में करना चाहता है। इसी कारण मंत्रिमंडल में उनकी उपस्थिति संख्या से अधिक राजनीतिक अर्थ रखती है। सत्ता जानती है कि एक बड़ा समुदाय यदि स्थिर हो गया तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।

कुर्मी समुदाय की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम संख्या में होते हुए भी प्रभावशाली है। इसका कारण यह है कि सत्ता में उनकी वास्तविक शक्ति संख्या से नहीं, नेतृत्व से आती है। बिहार में कुर्मी राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा लंबे समय से नीतीश कुमार रहे हैं। इसलिए इस समुदाय को कम प्रतिनिधित्व देकर भी उसका प्रभाव बना रहता है। यह राजनीति का एक रोचक पक्ष है कि कुछ जातियाँ संख्या के कारण प्रभावशाली होती हैं और कुछ नेतृत्व के कारण। कुर्मी समुदाय दूसरी श्रेणी में आता है। उनकी उपस्थिति सत्ता की केंद्रीय संरचना में है।

राजपूत समुदाय की स्थिति भी उल्लेखनीय है। मंत्रिमंडल में उनकी संख्या सीमित होते हुए भी प्रभावशाली दिखाई देती है। यह इसलिए कि बिहार की परंपरागत सत्ता संरचना में राजपूतों की सामाजिक उपस्थिति अभी भी मजबूत है। ग्रामीण सत्ता, स्थानीय प्रभाव, संगठनात्मक शक्ति और आर्थिक आधार उन्हें राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण बनाए रखते हैं। भाजपा विशेष रूप से इस समुदाय को संतुलित रखना चाहती है क्योंकि उत्तर भारत में उसका पारंपरिक सवर्ण आधार अभी भी उसकी शक्ति का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए राजपूतों को पूरी तरह उपेक्षित करना उसके लिए संभव नहीं।

भूमिहार समुदाय का प्रतिनिधित्व भी दिलचस्प है। बिहार के राजनीतिक इतिहास में भूमिहारों की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही है। शिक्षा, प्रशासन, कृषि भूमि और स्थानीय प्रभुत्व में उनकी ऐतिहासिक स्थिति मजबूत रही है लेकिन मंडल राजनीति के बाद उनकी सत्ता धीरे-धीरे कम हुई। इसके बावजूद कोई भी दल उन्हें पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। कारण यह है कि भूमिहार केवल एक जाति नहीं बल्कि एक प्रभावशाली राजनीतिक नेटवर्क भी हैं। इसलिए मंत्रिमंडल में उन्हें सीमित लेकिन सुनिश्चित उपस्थिति दी जाती है। यह उपस्थिति सत्ता के भीतर उनकी पूर्ण शक्ति का नहीं बल्कि उनके ऐतिहासिक प्रभाव का संकेत है।

ब्राह्मण समुदाय की स्थिति और भी रोचक है। कभी भारतीय राजनीति में ब्राह्मण नेतृत्व केंद्रीय शक्ति हुआ करता था लेकिन बिहार में अब उनकी संख्या सत्ता के केंद्र में नहीं, बल्कि संतुलन की राजनीति में दिखाई देती है। उन्हें इतना प्रतिनिधित्व दिया जाता है कि असंतोष न हो, लेकिन इतना भी नहीं कि अन्य सामाजिक समूहों को असुविधा हो। राजनीति अब ब्राह्मणवाद की नहीं, “संतुलनवाद” की राजनीति बन चुकी है। यह परिवर्तन केवल सत्ता का नहीं, सामाजिक संरचना का भी परिवर्तन है।

दलित समुदाय की उपस्थिति को सत्ता विशेष रूप से प्रदर्शित करती है। मांझी, पासवान, रविदास और अन्य दलित समूहों को मंत्रिमंडल में शामिल करना केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं बल्कि राजनीतिक अनिवार्यता भी है। दलित वोट अब किसी एक दल की स्थायी संपत्ति नहीं रहे। भाजपा ने पिछले एक दशक में इस वर्ग में गहरी पैठ बनाई है। इसलिए मंत्रिमंडल में दलित प्रतिनिधित्व प्रतीकात्मक नहीं, रणनीतिक है। हर दल जानता है कि यदि दलित और अति पिछड़ा वर्ग स्थायी रूप से एक गठबंधन में आ जाएँ, तो बिहार की राजनीति की पूरी दिशा बदल सकती है।

मुस्लिम प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देता है। यह भी वर्तमान राजनीतिक यथार्थ का संकेत है। एन डी ए की राजनीति मुस्लिम प्रतिनिधित्व को प्रतीकात्मक स्तर पर बनाए रखती है लेकिन उसे केंद्रीय स्थान नहीं देती। यह उसकी वैचारिक और चुनावी दोनों रणनीतियों का हिस्सा है। दूसरी ओर राजद और कांग्रेस मुस्लिम प्रतिनिधित्व को अपने मुख्य सामाजिक गठबंधन का हिस्सा मानते हैं। इसलिए बिहार की राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व अक्सर सत्ता और विपक्ष के बीच अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है।

इस मंत्रिमंडल में अधिक ध्यान खींचने वाली अनुपस्थिति कायस्थ समुदाय की है। मंत्रिमंडल में एक भी कायस्थ चेहरा नहीं होना केवल संयोग नहीं बल्कि बदलती राजनीति का संकेत है। बिहार के सामाजिक और बौद्धिक इतिहास में कायस्थों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। हिंदी साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका और नौकरशाही में इस समुदाय की गहरी उपस्थिति रही है। अनेक बड़े लेखक, पत्रकार, शिक्षाविद और प्रशासक इसी समुदाय से आए। लेकिन आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति में बौद्धिक उपस्थिति की तुलना में चुनावी संख्या अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है। यही कारण है कि आज कायस्थ समुदाय राजनीतिक रूप से लगभग अदृश्य दिखाई देता है।

यह स्थिति केवल एक जाति की अनुपस्थिति नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के बदलते चरित्र का संकेत है। अब राजनीति विचार आधारित कम और जनसंख्या आधारित अधिक हो गई है। यदि कोई समुदाय संगठित वोट बैंक नहीं बन पाता तो उसकी प्रशासनिक, सांस्कृतिक या बौद्धिक शक्ति भी उसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं दिला पाती। लोकतंत्र में संख्या का गणित कभी-कभी प्रतिभा, शिक्षा और ऐतिहासिक योगदान पर भारी पड़ जाता है। यह कठोर सत्य है लेकिन बिहार की राजनीति इसे बार-बार प्रमाणित करती है।

कायस्थ समुदाय के साथ समस्या यह भी है कि वह राजनीतिक रूप से संगठित नहीं है। उसका एक बड़ा हिस्सा शहरी मध्यवर्ग, शिक्षा, प्रशासन और पेशेवर क्षेत्रों में बँटा हुआ है। वह किसी एक दल का स्थायी समर्थक नहीं माना जाता। इसलिए राजनीतिक दल उसे “सुरक्षित वोट” मान लेते हैं। सत्ता का गणित बहुत व्यावहारिक होता है। जहाँ जोखिम हो, वहाँ प्रतिनिधित्व दिया जाता है। जहाँ बिना प्रतिनिधित्व के भी समर्थन मिलने की संभावना हो, वहाँ उपेक्षा शुरू हो जाती है। यही कारण है कि कई छोटे लेकिन संगठित समुदाय आज सत्ता में दिखाई देते हैं जबकि ऐतिहासिक रूप से प्रभावशाली समुदाय धीरे-धीरे हाशिए पर चले जाते हैं।

यह पूरा दृश्य भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी विडंबना को उजागर करता है। संविधान ने नागरिकता को जाति से ऊपर रखने का स्वप्न देखा था, लेकिन राजनीति ने जाति को नागरिकता से भी अधिक शक्तिशाली बना दिया। चुनाव के समय विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, बेरोजगारी जैसे प्रश्न पीछे हट जाते हैं और जातीय प्रतिनिधित्व सबसे बड़ा प्रश्न बन जाता है। मंत्री की योग्यता से अधिक उसकी जाति चर्चा का विषय होती है। मानो शासन नहीं, सामाजिक उपस्थिति का वितरण हो रहा हो।

इसका सबसे खतरनाक परिणाम यह है कि राजनीति धीरे-धीरे प्रशासनिक क्षमता खोने लगती है। जब मंत्री चयन का पहला आधार जातीय संतुलन बन जाए, तो योग्यता पीछे चली जाती है। तब शासन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। बिहार जैसे राज्य, जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और रोजगार की चुनौतियाँ पहले से गंभीर हैं, वहाँ यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। लेकिन राजनीतिक दल जानते हैं कि चुनाव प्रशासनिक रिपोर्ट से नहीं, सामाजिक समीकरण से जीते जाते हैं। इसलिए वे वही करते हैं जो चुनाव जिताए।

फिर भी इस पूरे परिदृश्य को केवल नकारात्मक रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। जातीय प्रतिनिधित्व का एक सकारात्मक पक्ष भी है। लंबे समय तक भारतीय सत्ता संरचना कुछ सीमित सामाजिक समूहों के हाथ में केंद्रित रही।

पिछड़े, दलित और अति पिछड़े समुदायों की राजनीतिक भागीदारी बहुत कम थी। मंडल राजनीति ने पहली बार सत्ता के दरवाजे व्यापक समाज के लिए खोले। आज यदि कोई नोनिया, धानुक, मल्लाह या मांझी समुदाय का व्यक्ति मंत्री बनता है, तो वह केवल व्यक्ति की सफलता नहीं, सामाजिक परिवर्तन का भी संकेत है। समस्या प्रतिनिधित्व में नहीं, प्रतिनिधित्व के संकुचित हो जाने में है। जब जाति ही राजनीति का अंतिम सत्य बन जाए, तब लोकतंत्र की व्यापक दृष्टि कमजोर पड़ने लगती है।

बिहार आज उसी चौराहे पर खड़ा है। एक ओर सामाजिक न्याय की ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हैं, दूसरी ओर जातीय खाँचों में बँटती हुई राजनीति। सत्ता के गलियारों में हर जाति अपना चेहरा खोज रही है। कोई पूछता है, हमारे कितने मंत्री हैं। कोई गिनता है, हमारे कितने विधायक हैं। कोई देखता है, कौन सा विभाग किस जाति के पास गया। लोकतंत्र का दृश्य कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे पूरा राज्य एक विशाल जातीय कैलकुलेटर में बदल गया हो। मनुष्य की पहचान नागरिक के रूप में कम और जातीय संख्या के रूप में अधिक की जा रही है।

सबसे दुखद बात यह है कि जनता भी अब इसी भाषा में सोचने लगी है। मंत्री अच्छा है या बुरा, यह प्रश्न पीछे चला जाता है। पहले पूछा जाता है, वह “हमारी जाति” का है या नहीं। राजनीति ने समाज को इतना विभाजित कर दिया है कि सामूहिक नागरिकता का विचार लगातार कमजोर होता जा रहा है। यह केवल बिहार की नहीं, पूरे भारतीय लोकतंत्र की चुनौती है।

उम्मीद पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। समाज स्थिर नहीं रहता। नई पीढ़ियाँ शिक्षा, रोजगार, प्रवासन और डिजिटल दुनिया के माध्यम से नई पहचानें बना रही हैं। जाति अभी भी शक्तिशाली है, लेकिन वह अकेली शक्ति नहीं रह गई। आने वाले वर्षों में संभव है कि राजनीति को केवल जातीय समीकरण से आगे बढ़ना पड़े। क्योंकि बेरोजगार युवा की जाति अलग हो सकती है, पर उसकी चिंता एक ही होती है। किसान की जाति अलग हो सकती है, पर उसकी फसल का संकट समान होता है। छात्र की जाति अलग हो सकती है, पर उसकी परीक्षा और नौकरी की समस्या साझा होती है।

फिलहाल बिहार की राजनीति उसी पुराने गणित में उलझी हुई है। मंत्रिमंडल की सूची देखकर लगता है जैसे राज्य नहीं, जातियों का महासंघ चल रहा हो। लोकतंत्र कभी-कभी बड़ी अजीब चीज़ बन जाता है। जनता विकास चाहती है, नेता समीकरण बनाते हैं, और अंत में मंत्री परिषद एक ऐसी तालिका बन जाती है जिसमें विभागों से अधिक जातियाँ दिखाई देती हैं। मानव सभ्यता ने चाँद पर पहुँचने तक की तकनीक बना ली, लेकिन भारतीय राजनीति अब भी जातीय अबेकस पर उँगलियाँ घुमा रही है।


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