JNU का मार्ग: मुनिरका

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The Road to JNU: Munirka

Ambedkar Sahu

— अम्बेदकर कुमार साहु —

गौरी और दीपक की पहली मुलाकात किसी कैफे या लाइब्रेरी में नहीं, बल्कि मुनिरका की एक बदबूदार गली के उस कोने पर हुई थी जहाँ एक पुराना फोटोकॉपी वाला बैठता था। दीपक वहाँ अपनी बगल में ‘सोफी का संसार’ दबाए, अपनी ‘इकोनॉमिक्स’ के नोट्स की ज़ेरोक्स कराने खड़ा था। जैसे चंदर अपने आदर्शों का बोझ उठाए चलता था, दीपक भी उस किताब को इसलिए साथ रखता था क्योंकि उसे लगता था कि दर्शन ही उसे उसकी नियति के क्रूर सवालों का जवाब दे सकता है, पर फिलहाल वह अपनी कांपती हथेलियों में उन चंद सिक्कों को गिन रहा था जो उसकी जेब के आखिरी अवशेष थे। दीपक बिहार के एक पिछड़े गाँव से आने वाला अपने परिवार का ‘फर्स्ट जनरेशन’ विद्यार्थी था, जिसके पिता गाँव में हजाम (नाई) का काम करके अपनी हड्डियों को गलाते हुए उसे इस महानगर तक लाए थे।

दीपक की प्रारंभिक शिक्षा बिहार के एक सरकारी स्कूल में हुई थी, जहाँ संसाधनों के अभाव में उसकी अंग्रेजी की नींव कमजोर रह गई। विडंबना यह थी कि बिहार की शिक्षा व्यवस्था की दयनीय स्थिति आज भी वैसी ही बनी हुई है, जो दीपक जैसे प्रतिभाशाली छात्रों के आत्मविश्वास को भाषा की दीवार के पीछे कैद कर देती है। उसके लिए शिक्षा कोई विलासिता नहीं, बल्कि अपनी सात पीढ़ियों की दरिद्रता और सामाजिक हीनता के अंधकार को चीरने वाला इकलौता चिराग थी।

तभी बगल में एक सफेद होंडा सिटी रुकी। गौरी उसमें से उतरी—चमकते हुए परिधान और एक ऐसी खुशबू जो मुनिरका की सीलन भरी हवा में भी पारिजात के फूल खिला दे। वह महाराष्ट्र के एक संभ्रांत कुलकर्णी ब्राह्मण परिवार की कुलीन कन्या थी। गौरी ने देश के बेहतरीन कॉन्वेंट स्कूलों में शिक्षा प्राप्त की थी, जहाँ अंग्रेजी केवल एक भाषा नहीं बल्कि उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुकी थी। गौरी के पिता पुणे के एक प्रसिद्ध सर्जन थे और उसकी माँ एक क्लासिकल डांसर। वह एक ऐसी अभिजात्य दुनिया से आई थी जहाँ संघर्ष का अर्थ मात्र ‘रुचियों का चयन’ था, जीवन की भयावह आवश्यकताएँ नहीं। गौरी असल में जेएनयू में एडमिशन लेने के लिए आई थी और इस इलाके के भूलभुलैया जैसे भूगोल से बिल्कुल अनजान और घबराई हुई थी। उसका फोन डिस्चार्ज हो चुका था और वह जेएनयू का रास्ता भटक गई थी। उसने दुकानदार से रास्ता पूछा, पर दुकानदार की टूटी-फूटी अंग्रेजी उसे और उलझा रही थी। दीपक ने बिना उसकी ओर आँखें उठाए, अपनी सधी हुई और अत्यंत संस्कारित हिंदी में कहा, “मैडम, मुनिरका की इन गलियों में गूगल मैप भी रास्ता भूल जाता है। आप बस सीधे जाइए और बाबा गंगनाथ मार्ग से बाएं मुड़ जाइए, जेएनयू का गेट सामने दिखेगा।”

गौरी उसकी आवाज़ की उस गहरी खनक और चेहरे की दार्शनिक गंभीरता पर ठिठक गई। उसने देखा कि यह युवक भले ही साधारण कुर्ते और चप्पल में है, पर उसकी आँखों में एक अजीब सा स्वाभिमानी तेज है। उसने हँसते हुए कहा, “थैंक्स! वैसे मेरा नाम गौरी है।” दीपक ने बस सिर हिलाया, अपना ज़ेरोक्स लिया और चलने लगा। गौरी ने उसे पीछे से टोका, “रुको! क्या तुम भी जेएनयू से हो?” दीपक रुका और बिना किसी हिचकिचाहट के बोला, “मैं मुनिरका के उस कमरे से हूँ जिसका किराया देने के लिए मुझे अपनी किताबें बेचनी पड़ती हैं। पर हाँ, मेरा ठिकाना दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स है और मैं इकोनॉमिक्स विभाग से गरीबी उन्मूलन पर पीएचडी शोधार्थी हूँ।” गौरी ने तब हैरत से पूछा था कि नॉर्थ कैंपस छोड़कर वह मुनिरका में क्यों रहता है, तब दीपक ने बताया था कि दिल्ली विश्वविद्यालय के पास रहने की उसकी औकात नहीं और मुनिरका से वह पैदल जेएनयू की लाइब्रेरी पहुँचकर मुफ्त में पढ़ सकता है।

उस दिन गौरी को दीपक की ‘फिलॉसफी’ पहली बार पसंद आई थी। वह उसकी निर्धनता को एक ‘रोमांटिक एडवेंचर’ की तरह देख रही थी, जैसे सुधा चंदर की बौद्धिक गरिमा पर मुग्ध होती थी। गौरी के लिए दीपक का अभाव मात्र एक काव्यात्मक अनुभूति थी, जबकि दीपक के लिए वह उसकी कड़वी और नग्न वास्तविकता। गौरी की एंट्रेंस में अच्छी रैंक थी, अतः उसे जल्द ही जेएनयू में हॉस्टल मिल गया, जिससे उसका संघर्ष खत्म हो गया और वह कैंपस की सुरक्षित और काल्पनिक दुनिया का हिस्सा बन गई। वहीं से शुरू हुआ था ‘सुदामा की चाय’ और गहन विमर्श का वह सिलसिला। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के बाहर सुदामा की उस मशहूर चाय की चुस्कियों के बीच दीपक अक्सर गौरी को अर्थशास्त्र और समाज के गहरे अर्थ समझाता। उन दिनों दीपक अक्सर फोन पर गौरी को लंबी-लंबी रोमांटिक बातें और अपनी कविताएं सुनाता था, जिसे सुनकर गौरी मंत्रमुग्ध हो जाती थी। मुनिरका की उस पहली मुलाकात के बाद गौरी और दीपक के बीच का रिश्ता एक ऐसे कच्चे धागे की तरह बढ़ा, जिसमें एक सिरा नवादा की मिट्टी की सौंध से और दूसरा महाराष्ट्र की संभ्रान्त संस्कृति के रेशम से जुड़ा था। शुरुआती दिनों में यह रिश्ता किसी स्वप्निल उपन्यास की तरह खुशनुमा था। गौरी अक्सर दीपक के उन सांवले और श्रम से सख्त हो चुके हाथों को अपनी कोमल हथेलियों में थाम लेती। उसे दीपक की ‘मार्क्सवादी’ दलीलें और संघर्ष की बातें किसी रोमांचक कथा की तरह लगती थीं।

पर जैसे-जैसे जेएनयू का शैक्षणिक दबाव बढ़ा, उनके बीच का ‘भूगोल’ बदलने लगा। गौरी अंतरराष्ट्रीय भाषा केंद्र में फ्रेंच भाषा और संस्कृति की गहराइयों में उतरने लगी, जहाँ उसकी दुनिया पेरिस के कैफे और पश्चिमी उदारवाद के छलावे से भरने लगी। इसी बीच आर्यन मल्होत्रा का आगमन हुआ, जो न केवल गौरी की तरह फ्रेंच बोलता था, बल्कि उसके पास वह ‘अभिजात्य’ और रईसाना सलीका भी था जिसे दीपक कभी स्वप्न में भी हासिल नहीं कर सकते थे। आर्यन की जुबान पर फ्रेंच के अलंकृत शब्द थे, और दीपक की ‘शुद्ध हिंदी’, जो कभी गौरी को पवित्र लगती थी, अब उसे दरिद्र और पुरातन महसूस होने लगी थी। दीपक समझ रहा था कि भाषा अब उनके बीच एक अभेद्य दीवार बन चुकी है। दीपक अक्सर गरीबी उन्मूलन की अपनी पीएचडी और यूजीसी नेट की तैयारियों के बोझ तले दबे रहते, जिससे गौरी को लगने लगा कि दीपक की बातें अब केवल सिद्धांतों और शिकायतों का पुलिंदा बनकर रह गई हैं। गौरी का दीपक से दूर जाना कोई अचानक हुआ हादसा नहीं था, बल्कि एक धीमी और खामोश प्रक्रिया थी। उसने धीरे-धीरे दीपक के कॉल्स को यह कहकर टालना शुरू किया कि वह लाइब्रेरी में है, जबकि असल में वह आर्यन के साथ कैंपस के बाहर किसी महँगे रेस्टोरेंट में फ्रेंच गानों पर विमर्श कर रही होती थी। दीपक के साथ वह ‘गरीबी’ के आंकड़े पढ़ती थी, पर आर्यन के साथ वह उस आज़ादी और आधुनिकता को जीती थी जिसका वादा पश्चिमी दर्शन करता है। दीपक की शुद्ध हिंदी और ‘मुनिरका का कमरा’ अब गौरी को अपनी पहचान के लिए छोटा लगने लगा था। वह उस दीपक की ऋणी तो थी जिसने उसे जेआरएफ दिलाने में रात-दिन एक कर दिया, पर उसका मन अब उस अंग्रेज की ओर भाग रहा था जो उसे एक नई और चमकदार दुनिया का रास्ता दिखा रहा था।

पार्था सारथी पार्क की उस शाम तक, गौरी पूरी तरह दीपक के जीवन से बाहर होकर आर्यन की बाहों में अपना नया संसार ढूँढ चुकी थी। यही वजह थी कि जेएनयू पहुँचने से पहले जो दीपक का कन्फर्मेशन मैसेज गौरी के चैटिंग पर घंटों पहले उपलब्ध हो जाता था, अब वह घंटों तक ‘अनरीड’ पड़ा रहता। गंगा ढाबा की वो मुलाकातें जो कभी घंटों चलती थीं, अब महज कुछ मिनटों की औपचारिकता में सिमट गई थीं। गौरी अब दीपक से नजरें चुराने लगी थी और बात-बात पर आर्यन के विदेशी नजरिए की तारीफ करने लगी थी। दीपक ये सब देख रहा था, समझ रहा था, लेकिन वह अपनी गरीबी और अपनी भाषा के संकोच में चुप रहा, जब तक कि पार्था सारथी पार्क की उस शाम उसके भीतर का ज्वालामुखी फट नहीं पड़ा।

पार्था सारथी चटर्जी पार्क का शाम का नजारा किसी खुली हुई लाइब्रेरी और राजनीतिक अखाड़े के खूबसूरत मेल जैसा होता है। ढलते सूरज की सुनहरी और लाल रंग की किरणें जब अरावली की पथरीली चट्टानों पर पड़ती हैं, तो पूरा पार्क एक जादुई चमक से भर जाता है। यहाँ का वातावरण हर दूसरे दिन एक जैसी ही जीवंतता से ओतप्रोत रहता है—कहीं पत्थरों के ऊबड़-खाबड़ टुकड़ों पर बैठे विद्यार्थियों के समूह हंसी-मज़ाक और गॉसिप में मशगूल दिखते हैं, तो कहीं दिनभर की भारी पढ़ाई और सेमिनारों से थके हुए जोड़े एक-दूसरे का साथ पाकर सुखद अनुभूति प्राप्त करते हैं। यहाँ की हवा में सिर्फ ऑक्सीजन नहीं, बल्कि विचार तैरते हैं। गंगा ढाबा की तरह यहाँ भी छात्र प्रोफेसरों के लेक्चर से लेकर देश की राजनीति और वैश्विक दर्शन तक पर चर्चा करते हुए किसी राजनीतिक सलाहकार की तरह तल्लीन नजर आते हैं। पार्क के ऊँचे पत्थरों पर बैठकर जब छात्र नीचे ढलती शाम को देखते हैं, तो ऐसा लगता है मानो वे दुनिया की हर समस्या का समाधान यहीं खोज लेंगे। झाड़ियों के बीच से आती मोर की आवाज़ और दूर मुनिरका की तरफ से उठने वाला हल्का शोर इस सन्नाटे और शोर के बीच एक अजीब सा संतुलन बना देता है। आज भी नजारा वैसा ही था, बस मिस्टर दीपक के लिए वह पार्क किसी कब्रिस्तान की तरह खामोश हो गया था, जहाँ उनकी पुरानी दोस्ती और प्यार का ‘दाह-संस्कार’ होने वाला था।

पार्था सारथी पार्क की उस ढलती शाम में, जब सूरज की अंतिम किरणें अरावली की चट्टानों को चूमकर विदा ले रही थीं, मिस्टर दीपक के भीतर एक अलग ही अँधेरा पसर रहा था। दीपक यहाँ अकेले सुकून के लिए नहीं आए थे, बल्कि उन्हें गौरी ने ही खास तौर पर मैसेज करके बुलाया था ताकि वह उन्हें आर्यन मल्होत्रा से मिलवा सके। गौरी को लगा था कि उसका बेस्ट फ्रेंड दीपक और उसका नया दोस्त आर्यन मिलकर कोई बौद्धिक चर्चा करेंगे, लेकिन दीपक के लिए यह स्थिति किसी अपमान से कम नहीं थी। वह तीनों एक ही पत्थर पर साथ बैठे तो थे, पर दीपक के लिए वह फासला मीलों का था। उनके बगल में बैठी गौरी और आर्यन की खिलखिलाहट उन्हें किसी मर्मान्तक पीड़ा की तरह महसूस हो रही थी। इस चुभन की असली वजह यह थी कि गौरी अब दीपक से बात ही नहीं कर रही थी; वह पूरी तरह आर्यन की बातों में खोई हुई थी। दीपक को यह कड़वा अहसास हो रहा था कि जिस गौरी के साथ घंटों विमर्श चलता था, आज वह उन्हीं के बगल में बैठकर उन्हें नज़रअंदाज़ कर रही है। गौरी ने जब आर्यन की बातों के बीच एक औपचारिकता निभाते हुए अनमने ढंग से दीपक के माथे को छुआ और पूछा कि कहीं उन्हें बुखार तो नहीं, तो वह छुअन दीपक को हमदर्दी कम और एहसान ज़्यादा लगी। दीपक को साफ़ महसूस हो गया कि अब उनके बीच के शब्द खत्म हो चुके हैं। उन्हें याद आया कि यही वो हाथ थे जो कभी मुनिरका की तंग गलियों में उनका साथ देने का वादा करते थे, और आज यही हाथ आर्यन की ‘होंडा सिटी’ के स्टीयरिंग के साथ ताल मिला रहे थे।

गौरी के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई और आर्यन कुछ कहने के लिए आगे बढ़ा, पर दीपक ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया। “नहीं आर्यन, आज तुम मत बोलो। आज उस विशुद्ध हिंदी भाषी को बोलने दो जिसे तुम अक्सर एक ‘केस स्टडी’ की तरह देखते हो। गौरी, तुम ठहरीं महाराष्ट्र के रईस परिवार की बेटी… और मैं नवादा का वो लड़का जो आज भी घर पैसे भेजने के लिए अपनी किताबों का वजन तौलता है। हमारी दुनिया के बीच जो ये पार्क है न, ये सिर्फ़ रास्ता नहीं है, ये एक बहुत बड़ी खाई है जिसे तुम अपनी ‘लिबरल’ बातों से कभी नहीं भर पाओगी। गरीब और छोटी जाति के लड़के का प्रेम तुम्हारी दुनिया में बस एक अनुभव हो सकता है, हकीकत नहीं। तुमने मेरा इस्तेमाल अपनी बौद्धिक भूख मिटाने और जेआरएफ पाने के लिए किया, पर अंत में तुम अपनी उसी ऊँची दुनिया में लौट गईं जहाँ मैं फिट नहीं बैठता।”

बिजली कड़की और बारिश की कुछ बूँदें पत्थरों पर गिरीं, मानो प्रकृति भी दीपक के इस ज्वालामुखी के फटने का इंतज़ार कर रही थी। दीपक ने अपनी ‘सोफी का संसार’ उठाई और बिना पीछे मुड़े स्टेशन की ओर कदम बढ़ा दिए। दीपक वापस मुनिरका की उन तंग गलियों और उस 10×10 के कमरे में नहीं जाना चाहता था। वह कमरा, जहाँ की दीवारों पर टंगे अर्थशास्त्र के चार्ट और गौरी के साथ बिताई गई बौद्धिक चर्चाओं की यादें अब उसे डसने लगी थीं। मुनिरका की वो सीलन भरी हवा अब उसे घुटन दे रही थी। उसे लगा कि यदि वह वापस उस कमरे में गया, तो गौरी का वह एहसान और मुनिरका का वो भूगोल उसे फिर से कमजोर कर देगा। उसे अपनी माटी की पुकार सुनाई दे रही थी, जहाँ कम से कम कोई छलावा नहीं था। इसलिए, अपने कमरे की चाबी और अपना सामान वहीं पीछे छोड़कर, वह सीधे नई दिल्ली स्टेशन की ओर बढ़ गया। उसके पास सिर्फ़ उसकी किताबें थीं और एक दृढ़ संकल्प।

उन्हें पता था कि पीछे गौरी खड़ी है, शायद उसकी आँखों में आँसू भी हों, लेकिन अब उन आँसुओं की कीमत दीपक के स्वाभिमान से कम थी। नई दिल्ली स्टेशन की भीड़ में खो जाने से पहले दीपक ने आखिरी बार जेएनयू की उन पहाड़ियों को देखा और बुदबुदाए— “दार्शनिकों ने सच कहा है, दुनिया वैसी नहीं होती जैसी दिखाई देती है।”

पार्था सारथी पार्क की उस बारिश और कड़वाहट को पीछे छोड़कर दीपक जब नई दिल्ली स्टेशन के प्लेटफॉर्म संख्या चार पर खड़ा था, तो उसके मन में कोई पछतावा नहीं था, बस एक गहरी शून्यता थी। ‘गोड्डा हमसफ़र’ बारह घंटे की देरी से आई, मानो वक्त भी दीपक को अपनी हार पर विचार करने का पूरा मौका देना चाहता हो। बिना टिकट जनरल कोच के एक कोने में सिमटे दीपक की आँखें पूरी रात खिड़की से बाहर भागते हुए अँधेरे को ताकती रहीं। वह अँधेरा बिल्कुल वैसा ही था जैसा मुनिरका की उन तंग गलियों में होता था, जहाँ से उसकी और गौरी की दोस्ती शुरू हुई थी। दो दिन के थकाऊ सफर के बाद जब दीपक नवादा की उस चिर-परिचित मिट्टी पर उतरा, तो उसे दिल्ली की लाइब्रेरी की खुशबू और जेएनयू के बौद्धिक विमर्श किसी दूसरे ग्रह की बातें लगने लगीं। नवादा की वो धूल भरी सड़कें और गरीबी की वही पुरानी गंध उसका स्वागत कर रही थी। घर पहुँचते ही उसे अहसास हुआ कि मुनिरका का वो 10×10 का कमरा, जिसे वह अपनी तंगी समझता था, इस घर की तुलना में शायद एक महल ही था। यहाँ बाबूजी की खाँसी और माँ की फटी हुई साड़ी ने उसे फिर से उस धरातल पर ला खड़ा किया जहाँ से ‘तर्क’ और ‘दर्शन’ के पंख निकलना अभी बाकी था।

माँ ने उसकी उतरी हुई सूरत देखी तो पास आकर बैठ गईं। दीपक की आँखों में जमी मुनिरका की सीलन और जेएनयू की वो कड़वाहट माँ से छिपी न रही। माँ ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, दिल्ली से खैली-पीली कुछु लायले की न? बड़ी सुखायल लगही।”

दीपक की आँखों में अचानक अपने उस सरकारी स्कूल का मंजर तैर गया—जहाँ टाट-पट्टी पर बैठकर वह पहाड़े रटता था। उसे याद आया कि कैसे मास्टर साहब अंग्रेजी के शब्दों का मजाक उड़ाते थे और कहते थे, “ई अंग्रेजवा के भाषा सीख के का करबे? हल जोते ला ही काम एतौ।” आज उसे समझ आया कि उन मास्टर साहब की वो बात कितनी घातक थी। उस स्कूल की टूटी हुई छत और बिना ब्लैकबोर्ड वाली दीवारों ने ही आज उसके और गौरी के बीच एक ऐसी भाषा की दीवार खड़ी कर दी थी, जिसे लांघना उसके बस में नहीं था।

दीपक ने माँ का हाथ थाम लिया और भारी आवाज़ में बोला, “माँ, हमरा स्कूल में मास्टर साहब अंग्रेजी काहे न पढ़ैलथिन? आज दिल्ली में हमरा ओकरे वजह से हीन नजर से देखल गेलै।” माँ की आँखों में एक अजीब सी लाचारी थी। उन्होंने बस इतना कहा, “बेटा, हमनी के किस्मत में मेहनत लिखल है, साहेबी भाषा न। पर तू त पढ़ लिख के बड़ा आदमी बनबे न?” दीपक के पास कोई जवाब नहीं था, सिर्फ़ एक संकल्प था कि अब उसे अपनी पहचान किसी विदेशी भाषा की मोहताज नहीं होने देनी है।

तभी एक दोपहर, जब दीपक घर के दरवाजे पर बैठा अपनी अधूरी पीएचडी थीसिस और ‘सोफी का संसार’ के पन्नों के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर रहा था, डाकिया एक बंद लिफाफा दे गया। उस लिफाफे पर लगा जर्मनी का स्टैम्प और विदेशी पता देखकर दीपक के माथे पर सिलवटें पड़ गईं। उसके मजदूर पिता ने अचरज से पूछा, “रे बेटा, ई सात समंदर पार से के खत भेजलको है?” दीपक ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला। पत्र की पंक्तियाँ किसी तेज़ाब की तरह उसके स्वाभिमान को जलाने लगीं: “तुम एक गरीब देश के नागरिक हो… जहाँ आज भी तर्क से ज़्यादा ऊँचा धर्म और जाति का झंडा है। मेरा देश तुम्हारा देश नहीं है।” दीपक का सिर चकराने लगा। उसे लगा कि जेएनयू में गौरी ने जो तिरस्कार उसे दिया था, वही तिरस्कार आज एक वैश्विक स्तर पर उसके सामने खड़ा था। उसे अपनी माँ की वो बात याद आई— “लिखबे-पढ़बे त गरीबी दूर होयतो।” क्या वाकई? क्या शिक्षा उसे इस गरीबी और हीनभावना से आज़ाद कर पाएगी? तभी उस लिफाफे के नीचे से एक और छोटा सा पुर्जा गिरा, जिसमें किसी विदेशी मुहर की ताक़त नहीं थी, पर उसमें लिखी तीन पंक्तियों ने दीपक के भीतर बुझती हुई लौ को फिर से दहका दिया: “तुम गरीब से अमीर बन सकते हो, तुम्हें स्वतंत्रता मिल सकती है… सिर्फ तुम कोशिश करो।”

दीपक ने देखा कि उसकी माँ, जो खुद पढ़ना नहीं जानती थी, बड़े गौर से उस पत्र को देख रही थी। दीपक ने धीरे से पत्र समेटा और अपनी ‘सोफी का संसार’ को बंद कर दिया। उसे अब सोफी नहीं बनना था जो गुलाब के बगीचे में बैठकर पत्र पढ़े; उसे तो ‘हामिद’ बनना था जो अपनी गरीबी के चिमटे से समाज की रोटियाँ सेक सके। उन्होंने अपनी लेखनी उठाई और थीसिस का अगला पन्ना पलटा— गरीबी उन्मूलन, अब केवल एक शोध का विषय नहीं था, बल्कि वह उनके अस्तित्व का महायुद्ध और गौरी जैसे लोगों के प्रतिशोध का एक मात्र शस्त्र था।


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