— परिचय दास —
ज्येष्ठ की कठोर धूप में जब पृथ्वी की देह तपकर लगभग धातु जैसी हो जाती है, तब भारतीय स्त्रियाँ वट वृक्ष की छाया के नीचे एक ऐसे अनुष्ठान का निर्वाह करती हैं जिसे आधुनिक समय अक्सर केवल “पौराणिक व्रत” कहकर टाल देता है परंतु किसी भी प्राचीन सांस्कृतिक क्रिया को केवल आस्था या अंधविश्वास की श्रेणी में रख देना उतना ही अधूरा है जितना किसी कविता को केवल व्याकरण समझ लेना।
वट सावित्री का अनुष्ठान भारतीय मानस की उस गहरी संरचना से जुड़ा है जहाँ प्रकृति, शरीर, मन, स्मृति, दाम्पत्य, समुदाय और समय एक-दूसरे से अलग नहीं बल्कि परस्पर गुंथे हुए हैं। पश्चिमी आधुनिकता ने जीवन को विश्लेषित किया, भारतीय परंपरा ने उसे संयोजित किया। दोनों की अपनी उपलब्धियाँ हैं, दोनों की अपनी त्रुटियाँ। मनुष्य हर युग में सत्य को आधा-आधा पकड़ता है और फिर उसे पूर्ण घोषित कर देता है।
यदि वट सावित्री को केवल “पति की लंबी आयु के लिए रखा गया व्रत” मान लिया जाए तो उसका अर्थ बहुत सीमित हो जाता है। उसके भीतर स्त्री की मनोवैज्ञानिक शक्ति, जैविक अनुशासन, पर्यावरणीय चेतना, सामाजिक संरचना और सामूहिक स्मृति की अनेक तहें छिपी हुई हैं। भारतीय व्रतों का एक बड़ा पक्ष शरीर और मन के बीच संबंध को लेकर है। आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान और व्यवहार-मनोविज्ञान यह मानने लगे हैं कि मनुष्य की मानसिक स्थिरता केवल दवाओं या सिद्धांतों से नहीं बनती; उसके लिए अनुष्ठानिक स्थिरता भी आवश्यक होती है।
नियमित अनुष्ठान मनुष्य के भीतर चिंता को कम करते हैं, उसे जुड़ाव का अनुभव देते हैं और जीवन में निरंतरता की अनुभूति कराते हैं। अनेक पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों ने भी माना कि प्रतीक और अनुष्ठान मानव-चेतना की गहरी आवश्यकताएँ हैं। आधुनिक मनुष्य ने पारंपरिक अनुष्ठानों को छोड़ा लेकिन उनकी जगह उसने अपने नए अनुष्ठान बना लिए। मनुष्य अनुष्ठान-विहीन कभी नहीं होता; वह केवल अनुष्ठान बदलता है।
वट सावित्री का सबसे महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक पक्ष उसका वृक्ष-केंद्रित होना है। वट वृक्ष भारतीय पारिस्थितिकी में असाधारण महत्त्व रखता है। उसका फैलाव, दीर्घजीविता, प्राणवायु उत्सर्जन, सूक्ष्म जैविक तंत्रों को संरक्षण और तापमान संतुलन की क्षमता उसे एक जीवित पर्यावरणीय केंद्र बनाती है। आधुनिक पर्यावरण-अध्ययन बताते हैं कि बड़े वृक्ष किसी भी क्षेत्र की आर्द्रता, पक्षी जीवन, सूक्ष्मजीव विविधता और तापीय संतुलन को प्रभावित करते हैं।
भारतीय परंपरा ने जिन वृक्षों को पवित्र घोषित किया, उनमें अधिकांश का गहरा पर्यावरणीय महत्त्व था। पीपल, वट, नीम, तुलसी। यह केवल धार्मिक कल्पना नहीं थी; यह सांस्कृतिक पारिस्थितिकी थी। पश्चिमी पर्यावरण चिंतन ने उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में जाकर जिस पर्यावरण-नीति को सिद्धांत बनाया, भारतीय लोकजीवन ने उसे अनुष्ठान के रूप में बहुत पहले जी लिया था।
वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए स्त्रियाँ केवल प्रतीकात्मक क्रिया नहीं करतीं; वे अनजाने में वृक्ष-संरक्षण की सामाजिक व्यवस्था को जीवित रखती हैं। जिस वृक्ष के साथ मनुष्य की भावनात्मक संबद्धता बन जाती है, वह वृक्ष कटने से बच जाता है। आधुनिक संरक्षण-विज्ञान भी यह मानता है कि केवल कानून पर्यावरण नहीं बचाते; सांस्कृतिक आत्मीयता अधिक प्रभावी होती है।
यूरोप में पवित्र उपवनों की परंपरा लगभग समाप्त हो गई, इसलिए वहाँ जंगल औद्योगिक संसाधन बन गए। भारत में अब भी अनेक वृक्ष इसलिए जीवित हैं क्योंकि वे केवल वनस्पति नहीं, स्मृति और श्रद्धा के केंद्र हैं। सभ्यता का सबसे बड़ा संकट तब शुरू होता है जब मनुष्य प्रकृति को केवल “संसाधन” कहने लगता है।
व्रत के भीतर उपवास की परंपरा भी केवल धार्मिक अनुशासन नहीं है। आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान नियंत्रित उपवास और सीमित आहार के अनेक लाभों पर लगातार अध्ययन कर रहा है। शरीर की चयापचयी लचीलेपन, मधुरस संतुलन, कोशिकीय पुनरुत्थान और पाचन-विश्राम जैसे पक्ष अब वैज्ञानिक विमर्श का हिस्सा हैं। भारतीय व्रतों में पूर्ण वैज्ञानिक एकरूपता खोज लेना गलत होगा लेकिन यह भी उतना ही गलत है कि उनमें शरीर-संबंधी कोई अनुभवजन्य ज्ञान नहीं था। लोकसमाज सदियों तक शरीर को प्रयोगशाला की तरह जीता रहा। उसके पास पारिभाषिक शब्द नहीं थे, अनुभव था। आधुनिक विज्ञान के पास पारिभाषिक शब्द हैं पर अनुभव से उसका संबंध अधिक यांत्रिक है।
पश्चिमी विचार-दृष्टि से यदि देखें, तो वट सावित्री को अस्तित्वगत प्रतिरोध के रूप में भी समझा जा सकता है। सावित्री की कथा मृत्यु के विरुद्ध प्रेम की जिद है। यह केवल दाम्पत्य कथा नहीं; यह नश्वरता के विरुद्ध चेतना की प्रतिक्रिया भी है। अस्तित्ववादी दार्शनिकों ने मनुष्य के भीतर मृत्यु-भय को केंद्रीय अनुभव माना। भारतीय स्त्री इस भय का सामना दार्शनिक ग्रंथ से नहीं, अनुष्ठान से करती है। वह मृत्यु को नकारती नहीं लेकिन उसके सामने प्रेम और धैर्य का वृक्ष खड़ा करती है। यह सांस्कृतिक मनोविज्ञान का अत्यंत सूक्ष्म रूप है।
भारतीय व्रतों को केवल स्त्री-दमन कह देना भी एक रेखीय आधुनिक दृष्टि है। यह सत्य है कि कई परंपराओं में स्त्री पर असमान दायित्व डाले गए लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि भारतीय स्त्रियों ने इन्हीं परंपराओं के भीतर अपनी भावनात्मक सत्ता निर्मित की। घरों में जहाँ निर्णय पुरुष लेते थे, वहाँ सांस्कृतिक वातावरण स्त्रियाँ बनाती थीं। व्रत, कथा, गीत, पर्व, लोकस्मृति और पारिवारिक संबंधों की ऊष्मा। पश्चिमी नारीवादी चिंतन का एक बड़ा हिस्सा वैयक्तिक स्वायत्तता पर आधारित है, जबकि भारतीय स्त्री-अनुभव लंबे समय तक संबंधपरक पहचान पर आधारित रहा। दोनों को एक-दूसरे पर आरोपित कर देखने से समझ कम और शोर अधिक पैदा होता है।
वट सावित्री के अनुष्ठान में सामुदायिकता का तत्व भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। स्त्रियाँ एक साथ इकट्ठी होती हैं, संवाद करती हैं, अनुभव बाँटती हैं। आधुनिक नगरजीवन के एकाकीपन की तुलना में यह सामूहिकता मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। पश्चिमी समाजों में अब अकेलेपन की महामारी पर गंभीर शोध हो रहे हैं। डिजिटल जीवन ने संपर्क बढ़ाया, संबंध नहीं। भारतीय पर्वों और व्रतों में सामाजिक उपस्थिति का जो भाव था, उसने लंबे समय तक लोगों को भावनात्मक एकांत से बचाए रखा। आधुनिक मनुष्य के पास अनुयायी अधिक हैं, सहचर कम।
फिर भी परंपरा का अंध-समर्थन उचित नहीं। कोई भी अनुष्ठान यदि केवल भय, सामाजिक दबाव या स्त्री-असमानता में बदल जाए, तो उसकी आत्मा नष्ट हो जाती है। वट सावित्री की जीवित शक्ति उसके प्रतीकों में है, उसकी करुण मानवीय आकांक्षा में है, न कि यांत्रिक कर्मकांड में। हर परंपरा को समय के साथ पुनर्पाठ की आवश्यकता होती है। परंपरा जो बदलती नहीं, वह संग्रहालय बन जाती है; आधुनिकता जो जड़ों को नकार देती है, वह मानसिक मरुस्थल।
संध्या उतरती है। वट वृक्ष की जटाएँ हवा में धीरे-धीरे हिलती हैं। उनके नीचे बँधे लाल धागे केवल धार्मिक संकेत नहीं, मनुष्य की उस पुरानी बेचैनी के चिह्न हैं जिसमें वह जीवन को थोड़ी देर और बचाए रखना चाहता है। पश्चिम ने विज्ञान से मृत्यु की गति को समझा, भारत ने अनुष्ठानों से जीवन की निरंतरता को महसूस किया। दोनों के बीच संवाद अभी अधूरा है। शायद सभ्यता का भविष्य उसी दिन थोड़ा अधिक मानवीय होगा जब प्रयोगशाला और वटवृक्ष एक-दूसरे को संदेह से नहीं, जिज्ञासा से देखेंगे।
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