दिल्ली में सरकारी स्कूल : ढोल के भीतर पोल

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— अरमान अंसारी —

म आदमी पार्टी, आंदोलन से आयी हुई पार्टी है। अपने शुरुआती दौर में इस पार्टी ने जनहित के बहुत सारे मुद्दों को राजनीति में हवा देने की कोशिश की। बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, भ्रष्टाचार जैसे तमाम मुद्दों को राजनीति का मुद्दा बनाया। अन्य राजनीतिक दलों पर आम आदमी पार्टी द्वारा शुरू की गयी नयी तरह की राजनीति का प्रभाव दिखाई भी पड़ने लगा था। कई राज्यों में, राजनेताओं व मंत्रियों ने लालबत्ती की संस्कृति को छोड़ने की कोशिश शुरू कर दी थी। व्यक्तिगत जीवन में सादगी और शुचिता की कोशिशों को बल मिलने लगा था। इसका परिणाम हुआ कि दिल्ली की जनता ने, आम आदमी पार्टी पर भरोसा किया। 2015 में हुए दूसरे चुनाव में पार्टी को जनता का पूरा समर्थन मिला। पार्टी ने 70 में से 67 सीटों पर जीत दर्ज की।

इतने भारी बहुमत से बनी सरकार ने निश्चित रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य की दृष्टि से ऐसे कदम उठाये जिससे साधारण आदमी को धीरे-धीरे इस बात का अहसास होने लगा कि पार्टी ठीक दिशा में आगे बढ़ रही है। इसको लेकर मीडिया और पार्टी तंत्र के माध्यम से प्रचार-प्रसार भी खूब किया गया। शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर करने के बजाय, स्कूलों में बन रहे कमरों की संख्या, स्विमिंग पूल और उनकी तस्वीरों को प्रचारित-प्रसारित किया गया। इन प्रचारों का असर यह हुआ कि देश-विदेश में आम आदमी की निगाह में, सरकार और पार्टी की शानदार छवि बन गयी।

इसके बरअक्स तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि इतने सालों के बाद भी दिल्ली सरकार के स्कूलों में भारी संख्या में अतिथि शिक्षक काम कर रहे हैं। इन शिक्षकों को समान काम के अनुरूप समान वेतन तक नसीब नहीं होता।शिक्षकों की सेवा शर्तें अबूझ पहेली बन कर रह गयी हैं।एक सत्र में काम करनेवाले शिक्षक-शिक्षिकाओं को पता नहीं होता है कि उन्हें अगले सत्र में काम मिलेगा या नहीं मिलेगा। नौकरी की अनिश्चितता के कारण शिक्षकों का मन शैक्षणिक गतिविधियों में कितना लगता होगा यह सहज ही समझा जा सकता है।

हाल में दिल्ली सरकार ने नया स्कूल बोर्ड गठित किया है।सरकार का मानना है कि वह दिल्ली के बच्चों को विश्वस्तरीय शिक्षा देगी। दिल्ली सरकार इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की संस्था इंटरनेशनल बकलारीट के साथ मिलकर काम करने जा रही है। ‘द हिन्दू’ में 12 अगस्त को छपी खबर के अनुसार नवगठित बोर्ड का इस संस्था के साथ एक समझौता हुआ है, जिससे इसी सत्र के दरम्यान 30 स्कूलों में ‘वैश्विक चलन’ अपनाए जाएंगे। इसी खबर के अनुसार 20 स्कूल ऑफ स्पेशलाइज्ड एक्सीलेंस (SoSE) भी होगा, जिसका गठन सरकार ने इसी साल से किया है। शिक्षा के क्षेत्र में काम रही संस्थाओं ने इन तमाम बदलावों को लेकर कई महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाये हैं। इनमें लोक शिक्षक मंच जैसी संस्थाएं अग्रणी हैं। उनका मानना है कि शिक्षा संबंधी सैद्धांतिक मान्यताओं के अनुसार, दिल्ली सरकार की नयी शिक्षा संकल्पना में कई दिक्कतें हैं जो सहज रूप से कई सवाल उठाने को विवश करती हैं।

आखिर दिल्ली सरकार अपने सभी स्कूलों के बच्चों को समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा क्यों नही दे सकती? सरकार कुछ स्कूलों में ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना चाहती, इसीलिए वह स्कूल ऑफ एक्सीलेंस की परिकल्पना लेकर आयी है।एक समय में दिल्ली में प्रतिभा विद्यालय की परिकल्पना इसी राजनीति का हिस्सा थी जहाँ कुछ बच्चों को प्रतिभा विद्यालय में अच्छी शिक्षा दी जाती थी। बाकी बच्चे सुविधाविहीन स्थिति में पढ़ने को मजबूर हुए। अब स्कूल ऑफ एक्सीलेंस की नयी व्यवस्था शिक्षा के क्षेत्र में एक नयी परत लेकर आ गयी है। बदलाव के इस दौर में प्रतिभा विद्यालय के नामांकन की प्रक्रिया और नियमावली में भी सरकार ने बड़े बदलाव किये हैं। पहले प्रतिभा विद्यालय में नामांकन के लिए निगम या निदेशालय के स्कूलों में, कम से कम दो साल पढ़ा होना अनिवार्य होता था। इसकेे कारण प्रतिभा विद्यालय जैसे स्कूल में सरकारी स्कूलों से आए बच्चों के लिए मौका सुरक्षित रहता था। अब यह शर्त हटा दी गयी है। अब इनमें 50 फीसद प्रवेश ही सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए सुरक्षित होगा। इसका अर्थ होगा कि 50 फीसद सीटें निजी विद्यालय के बच्चों के लिए अपने आप सुरक्षित हो जाएंगी। अब एक ही स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के दो वर्ग होंगे। इससे सरकारी विद्यालयों से पढ़कर आनेवाले विद्यार्थियों के अवसर कम होंगे। वहीं इन स्कूल ऑफ स्पेशलाइज्ड एक्सीलेंस जैसे स्कूल में पढ़ने के लिए बच्चे गलाकाट प्रतिस्पर्धा करेंगे, जिससे शिक्षा अधिकार अधिनियम की धज्जियां उड़ेंगी।

अब सवाल उठता है कि प्रतिस्पर्धा के आधार पर खड़े ये विद्यालय केवल शिक्षा के केंद्र होंगे या कोचिंग संस्थान का आभास दिलाएंगे। यदि सर्वोत्तम शिक्षा की परिभाषा स्कूल ऑफ स्पेशलाइज्ड एक्सीलेंस में है, जहाँ बच्चों को मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रशासन और कानून आदि की प्रवेश परीक्षा के लिए तैयार किया जाएगा, तो प्रश्न उठता है कि क्या स्कूलों को सरकार कोचिंग संस्थान बनाना चाहती है?

दिल्ली सरकार शिक्षा के बजाय प्रचार पर जोर देना चाहती है। जब सरकारी स्कूलों के बच्चे बड़ी संख्या में इन प्रवेश परीक्षाओं में जाएंगे तो सरकार प्रचार कर सकेगी कि दिल्ली सरकार के स्कूलों में पढ़नेवाले इतने बच्चे इन परीक्षाओं में सफल हुए। इसकी आड़ में सरकार बाकी स्कूलों में दी जा रही दोयम दर्जे की शिक्षा को छुपा सकेगी। इससे शिक्षा में नवउदारवादी एजेंडा लागू हो सकेगा। एक बच्चे की सफलता के पीछे हजारों बच्चों की असफलता होगी। असफल बच्चे कुंठा व मानसिक तनाव के शिकार होंगे। अब तक कोचिंग जैसी विकृति सरकारी स्कूलों से बाहर थी अब कोचिंग की बीमारी को स्कूलों के अंदर प्रवेश करा दिया जाएगा। जब इंजीनियरिंग और मेडिकल में प्रवेश के लिए कोचिंग की गलाकाट प्रतियोगिता शुरू हो रही थी तो हमारी सरकारों ने उसे नहीं रोका, अब स्वयं अपने विद्यालयों को सरकार कोचिंग जैसे प्रतिशिक्षा संस्थान में तब्दील कर रही है।

इसके अतिरिक्त कई और सवाल हैं जो अनुत्तरित हैं, जैसे इन संस्थाओं में वित्तीय प्रबंधन, प्रवेश फीस, नियुक्तियों में सामाजिक न्याय के संवैधानिक प्रावधानों का क्या होगा? क्या विशेष जरूरत वाले बच्चों को यहां प्रवेश मिलेगा?प्रायः यह देखा जाता है कि कथित उच्च स्तरीय, विश्वस्तरीय संस्थानों के पीछे समाज के कमजोर, दबे- कुचले वर्गों को बाहर ही रखा जाता है।

आज की तारीख में दिल्ली सरकार के स्कूलों में कक्षा 5 से 8 तक मिशन बुनियादी थोपा गया है, जो मुख्यरूप से साक्षरता प्रोग्राम है,बच्चे पाठ्यचर्या से दूर हैं। वहीं तस्वीर का दूसरा पहलू अंतरराष्ट्रीय मानक के नाम पर आई.बी. से करार कर विश्वस्तरीय शिक्षा की बात की जा रही है।दरअसल सरकार के एजेंडे में मुठ्ठी भर बच्चों को अच्छी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है ताकि उन्हें प्रबंधकीय और प्रशासनिक कार्यकुशलता के लिए तैयार किया जा सके। बाकी बच्चों को वर्तमान अर्थव्यवस्था के अनुरूप कुशल श्रमिक के रूप में तैयार करना है। ऐसा श्रमिक जो भविष्य में अपने हक की बात नहीं करेगा, जिसके अंदर कोई अधिकार-चेतना नहीं होगी। शिक्षा के वर्तमान ढांचे में स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक ऐसा ही देखने में आ रहा है। विश्वविद्यालय से लेकर स्कूल तक में प्रवेश परीक्षा की एक छलनी बिछायी जा रही है।

दिल्ली सरकार द्वारा शुरू किया गया देशभक्ति करिकुलम और अंतरराष्ट्रीय नागरिक बनाने के घोषित मकसद के तहत आई.बी. को लाना, तथा केंद्र सरकार द्वारा नयी शिक्षा नीति को लागू करना विरोधाभास उत्पन्न करता है। दरअसल, शिक्षा और देशभक्ति के नाम पर राष्ट्रवाद की अधकचरी समझ रखनेवाले लोगों को खुश करना है तथा इसकी आड़ में शिक्षा को संपूर्ण रूप से बाजार के हवाले करना ही इसका असली मकसद लगता है।

आज हालत यह है कि बड़े पैमाने पर लोगों के रोजगार छिन गये हैं, नोटबन्दी, कोरोना के कारण घरबंदी आदि स्थितियों से आर्थिक संकट बढ़े हैं। इन कारणों से लोगों की माली हालत बेहद खराब हो गयी है। जो लोग अपने बच्चों को कल तक निजी स्कूलों में पढ़ाते थे, अब वे अपने बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूलों में करा रहे हैं। आज के समय की मांग थी कि वर्तमान शैक्षिक चुनातियों से निपटने के लिए नये सरकारी स्कूल खोले जायं, आवश्यक नियमित शिक्षकों और शिक्षणेतर कर्मचारियों की नियुक्ति की जाय, निजी विद्यालयों की मनमर्जी रोकी जाए। दिल्ली सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया, उलटे शिक्षा के मूल सिद्धान्तों के साथ समझौता किया है। बहु परती स्कूली व्यवस्था, जो पहले से ही चली आ रही है उसे और मजबूत करने की दिशा में दिल्ली सरकार आगे कदम बढ़ाती हुई दिख रही है। इससे सभी बच्चों के लिए समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सपना कैसे पूरा होगा?

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