सिनेमाई चश्मा और सामाजिक यथार्थ: ‘दो दीवाने शहर में’ और जातिगत पितृसत्ता का अंतर्संबंध

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Ambedkar Sahu

— अम्बेदकर कुमार साहु —

ह लेख फिल्म ‘दो दीवाने शहर में’ (पात्र: ईशान/शशांक और रौशनी/मृणाल ठाकुर) का एक आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय संदर्भ में नारीवाद केवल लैंगिक समानता का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह जातिगत पदानुक्रम और अंतर्विवाह की जकड़नों से गहराई से जुड़ा हुआ है। फिल्म में रौशनी और ईशान का प्रेम संबंध उस ‘यौन स्वायत्तता’ का प्रदर्शन है जिसे कुचलना पितृसत्ता और जाति व्यवस्था की पहली शर्त है (Ambedkar, 1936)। जहाँ यह फिल्म एक शहरी आधुनिकता का विमर्श रचती है, वहीं जमीनी हकीकत आज भी भयावह है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के नवीनतम आंकड़ों एवं सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) 2025-26 के दस्तावेजीकरण के अनुसार, भारत के कुछ राज्यों (विशेषकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र) में जातिगत हिंसा और ‘ऑनर किलिंग’ के मामलों में वृद्धि देखी गई है। यह लेख तर्क देता है कि आधुनिकता के दावों के बावजूद, भारत में अंतर-जातीय विवाहों की दर अभी भी अत्यंत कम है, जोकि पश्चिमी देशों के अंतर-नस्लीय (Inter-racial) विवाहों की तुलना में सामाजिक जकड़न की गहराई को दर्शाती है।
तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम पश्चिमी देश
जब हम ‘दो दीवाने शहर में’ की प्रेम कहानी को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं तो भारतीय समाज की संरचनात्मक बाधाएं और भी स्पष्ट हो जाती हैं।
विशेषता भारत (अंतर-जातीय विवाह) पश्चिमी देश/USA (अंतर-नस्लीय विवाह)
वर्तमान दरभारत में अंतर-जातीय विवाहों की दर लगभग 5.8% से 10% के बीच स्थिर है (IHDS-II, NFHS-5)।अमेरिका में लगभग 11% से 19% नए विवाह अंतर-नस्लीय या अंतर-जातीय होते हैं (Pew Research, 2024)।
स्वीकार्यताशहरी मध्यम वर्ग में स्वीकार्यता बढ़ी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सामाजिक बहिष्कार और हिंसा का डर बना रहता है।1958 में केवल 4% अमेरिकियों ने इसे सही माना था, जबकि 2021 तक यह आंकड़ा 94% तक पहुँच गया है (Gallup)।
शिक्षा का प्रभावभारत में उच्च शिक्षा का अंतर-जातीय विवाहों की संभावना पर बहुत सीमित प्रभाव पड़ता है; यहाँ ‘अरेंज्ड मैरिज’ की परंपरा आज भी हावी है (Ray et al., 2017)।पश्चिमी देशों में उच्च शिक्षा सीधे तौर पर ‘आउट-मैरिज’ (दूसरे समूह में विवाह) की संभावना को बढ़ा देती है।
हिंसा का स्वरूपभारत में आज भी ‘ऑनर किलिंग’ एक संस्थागत हिंसा के रूप में मौजूद है, जो ‘जाति की शुद्धता’ को बचाने के नाम पर की जाती है।पश्चिमी देशों में नस्लीय भेदभाव मौजूद है, लेकिन विवाह के कारण परिवार द्वारा हत्या के मामले नगण्य हैं।
‘दो दीवाने शहर में’ और भारतीय नारीवाद का समाजशास्त्र: आधुनिकता, स्वायत्तता एवं जातिगत बेड़ियाँ
भारतीय सिनेमा और नारीवाद का रिश्ता हमेशा से ही द्वंद्वात्मक रहा है। अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि सिनेमा जिस स्वतंत्र महिला की छवि पेश करता है, वह वास्तव में पितृसत्ता के ही एक नए, अधिक परिष्कृत रूप का हिस्सा होती है। हाल ही में देखी गई फिल्म ‘दो दीवाने शहर में’ इस विमर्श को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण केस-स्टडी प्रदान करती है। फिल्म की मुख्य किरदार रौशनी (मृणाल ठाकुर) और ईशान (शशांक) के माध्यम से हम भारतीय समाज में नारीवाद, शहरीकरण और सामाजिक संरचनाओं के बदलते स्वरूप का विश्लेषण कर सकते हैं।
शहरी आधुनिकता और नारीवादी पहचान का ‘बबल’
समाजशास्त्रीय नजरिए से देखें तो यह फिल्म ‘लिबरल फेमिनिज्म’ के उस भारतीय संस्करण को दिखाती है जो मुख्य रूप से महानगरीय क्षेत्रों तक सीमित है। रौशनी का किरदार उस महिला का प्रतिनिधित्व करता है जिसके पास सांस्कृतिक पूंजी है। वह पढ़ी-लिखी है, आर्थिक रूप से स्वायत्त होने की दिशा में बढ़ रही है और अपने निर्णय स्वयं लेने का साहस रखती है।
लेकिन यहाँ एंटोनियो ग्राम्शी का ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ (Hegemony) का सिद्धांत लागू होता है। फिल्म जिस आधुनिक भारतीय महिला को मानक बनाकर पेश कर रही है, वह वास्तव में एक बहुत ही छोटे और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की कहानी है। भारत के व्यापक जनसमुदाय, विशेषकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी महिलाओं के लिए रौशनी की चुनौतियां और उसकी स्वतंत्रता एक काल्पनिक धरातल (Utopian Space) जैसी है। भारतीय नारीवाद का एक बड़ा हिस्सा इसी बात की आलोचना करता है कि मुख्यधारा का विमर्श अक्सर ‘इंटरसेक्शनलिटी’ यानी अंतर-अनुभागीयता को भूल जाता है।
अंतर-अनुभागीयता (Intersectionality) और जाति का सवाल
भारतीय नारीवाद का सबसे मुखर और सशक्त रूप ‘दलित नारीवाद’ के माध्यम से सामने आता है। शर्मिला रेगे जैसे समाजशास्त्रियों ने स्पष्ट किया है कि भारतीय संदर्भ में ‘स्त्री’ कोई एकरूप श्रेणी नहीं है। शर्मिला रेगे के अनुसार एक सवर्ण महिला और एक दलित या पिछड़ी जाति की महिला के अनुभव जमीन-आसमान का अंतर रखते हैं।
‘दो दीवाने शहर में’ इस संदर्भ में एक दिलचस्प मोड़ लेती है। फिल्म में जब ईशान और रौशनी अपने प्रेम के लिए खड़े होते हैं, तो वे केवल व्यक्तिगत पसंद की बात नहीं कर रहे होते, बल्कि वे ‘एंडोगैमी’ यानी अंतर्विवाह की उस सदियों पुरानी परंपरा को चुनौती दे रहे होते हैं, जिस पर भारतीय जाति व्यवस्था टिकी है। इस आलोक में बाबा साहेब अंबेडकर का यह दृढ़ मत था कि जाति को मिटाने का एकमात्र तरीका अन्तरजातीय विवाह है।
नारीवाद के नजरिए से, महिला की यौन स्वायत्तता (Sexual Autonomy) पर नियंत्रण रखना ही पितृसत्ता और जाति व्यवस्था का सबसे बड़ा हथियार रहा है। जब रौशनी जैसा किरदार अपनी पसंद का साथी चुनती है, तो वह वास्तव में उस सामाजिक पवित्रता के पाखंड को तोड़ती है जो महिलाओं को ‘जाति की इज्जत’ का रक्षक मानकर उन्हें बेड़ियों में जकड़े रखता है। इसलिए, यह फिल्म भले ही शहरी और एलीट लगे, लेकिन इसका प्रेम संबंध एक ‘विद्रोही कृत्य’ (Subversive Act) है जो जाति और पितृसत्ता के गठबंधन को कमजोर करता है।
‘एजेंसी’ और पारिवारिक ढांचा
समाजशास्त्री मैक्स वेबर के ‘सोशल एक्शन’ के नजरिए से देखें तो रौशनी और ईशान की एजेंसी महत्वपूर्ण है। भारतीय समाज में परिवार एक ‘यूनिट’ के रूप में कार्य करता है, जहाँ व्यक्तिगत इच्छाओं को अक्सर सामुदायिक हितों के नाम पर कुचल दिया जाता है। फिल्म दिखाती है कि कैसे शहरीकरण व्यक्ति को उसकी सामूहिक पहचान से मुक्त कर एक ‘इंडिविजुअल’ बनाता है।
भारतीय नारीवाद के लिए यह एक दोहरी चुनौती है। एक तरफ जहाँ पश्चिमी नारीवाद ‘व्यक्तिवाद’ पर जोर देता है, वहीं भारतीय नारीवाद को परिवार और समुदाय के भीतर रहते हुए अपनी जगह बनानी पड़ती है। फिल्म में रौशनी का संघर्ष इसी संतुलन की तलाश है—वह परिवार को पूरी तरह छोड़ना नहीं चाहती, लेकिन वह उनके थोपे हुए मूल्यों के बोझ तले दबना भी नहीं चाहती।
सिनेमाई चश्मा और वास्तविकता का अलगाव
फिल्म का समाजशास्त्रीय विश्लेषण यह भी उजागर करता है कि सिनेमा कैसे वास्तविकता को सैनिटाइज कर देता है। भारतीय समाज जैसे कम गतिशील वाले संरचना के लिए यह रेखांकित करना आवश्यक है कि ‘दो दीवाने शहर में’ जैसे विजुअल्स एक ऐसी दुनिया रचते हैं जहाँ गरीबी, जातिगत भेदभाव और सांप्रदायिक तनाव लगभग गायब हैं। यह एक ‘पोस्ट-फेमिनिस्ट’ दुनिया दिखाने की कोशिश है जहाँ मान लिया गया है कि समानता आ चुकी है। परंतु, एक समाजशास्त्रीय प्रेक्षक के रूप में हम जानते हैं कि भारत की वास्तविक नारीवादी लड़ाई आज भी न्यूनतम मजदूरी, शिक्षा के अधिकार, घरेलू हिंसा और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा के इर्द-गिर्द घूम रही है। फिल्म में रौशनी का ‘कम्फर्ट’ उस अदृश्य श्रम और वर्ग-विभेद पर टिका है जिसे फिल्म पूरी तरह नजरअंदाज कर देती है।
निष्कर्ष: क्या यह फिल्म नारीवादी है?
‘दो दीवाने शहर में’ को पूरी तरह से एक क्रांतिकारी फिल्म कहना मुश्किल है, लेकिन इसे पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। इसकी महत्ता इस बात में निहित है कि यह प्रेम को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है। भारतीय नारीवाद के परिप्रेक्ष्य में, कोई भी संबंध जो ‘जातिगत शुद्धता’ और ‘पारिवारिक नियंत्रण’ को चुनौती देता है, वह प्रगतिशील है। ईशान और रौशनी की कहानी भले ही एक चमक-धमक वाले पर्दे पर रची गई हो, लेकिन उनका यह चुनाव कि “हम साथ रहेंगे, चाहे समाज कुछ भी कहे”, उस कट्टरपंथी पितृसत्ता की बुनियाद हिलाने की क्षमता रखता है जो आज भी हमारे देश के बड़े हिस्से को नियंत्रित करती है।
यद्यपि इस फिल्म को मध्यनजर रखते हुए कहा जा सकता है कि सच्चा भारतीय नारीवाद वही होगा जो न केवल रौशनी जैसी शहरी महिलाओं की स्वायत्तता का जश्न मनाए, बल्कि उस स्वायत्तता को जाति और वर्ग की सीमाओं से पार ले जाकर समाज के अंतिम पायदान पर खड़ी महिला तक पहुँचाए। सिनेमा को ‘दो दीवानों’ की जरूरत केवल शहर में ही नहीं, बल्कि उन गाँवों और कस्बों में भी है जहाँ आज भी प्रेम करना एक दंडनीय अपराध बना हुआ है।

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