कर्त्तव्यनिष्ठा
श्री श्रीनाथजी मोदी बाली स्कूल में मास्टर थे। गाँव में प्लेग फैल गया। स्कूल की पन्द्रह दिनों की छुट्टी कर दी गई। शिक्षा-विभाग को अनुभव तो था नहीं कि प्लेग जैसी महामारी फैलने पर कितने दिनों की छुट्टियाँ करनी चाहिए।
बाली गाँव वीरान हो गया। पन्द्रह दिन समाप्त होते ही श्री श्रीनाथजी मोदी तो बाली अपनी ड्यूटी पर पहुँच गए। लोगों ने कहा, “क्यों आए? प्लेग फैला हुआ है।” केवल वे ही अकेले ड्यूटी पर हाज़िर थे।
कर्त्तव्य निभाने की पराकाष्ठा
मोदी साहब विद्याशाला में शिक्षक थे। सदैव समय पर पहुँचते थे। एक दिन वे कुछ देर से पहुँचे। सबने अचम्भा किया कि आज मोदीजी देर से कैसे पहुँचे। पूछने पर मोदी साहब ने शांत भाव से कहा कि उनका छोटा बच्चा मर गया था। उसको दफनाने गए थे, वहाँ थोड़ी देर हो गई। हेडमास्टर साहब ने कहा, “तो फिर आज आप आते ही नहीं। आखिर बच्चे की मृत्यु के गम में आप डूबे हुए थे।”
मोदीजी ने कहा, “ड्यूटी तो आखिर ड्यूटी है। मैंने आज तक न तो छुट्टी ली और न देर की। फिर आज तो शाला में महत्वपूर्ण काम था और वह मेरे ही जिम्मे था।”
उत्तर सुनकर सभी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। काश, हमारे सभी शिक्षक कर्त्तव्यनिष्ठ होते।
प्रतिक्रमण : आधुनिक रूप
जैन धर्म में साधुओं और साध्वियों को सदैव संध्या के समय ‘प्रतिक्रमण’ करने का नियम है। प्रतिक्रमण में वे दिन में हुई भूलों के लिए प्रायश्चित करते हैं और आने वाले कल में उन्हें दोहराएँ नहीं, इसकी प्रतिज्ञा करते हैं। इसके अलावा वे प्रार्थना में अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों तथा साधुओं को सम्यक भाव से नमन करते हैं। अपनी काया का उत्सर्ग करते हैं।
इन बातों को तो अब साधु व श्रावक भूल गए हैं और परिपाटी के तौर पर रटी-रटाई गाथाओं का प्रतिक्रमण करते हैं।
भाईसाहब श्रीनाथजी मोदी इन रूढ़िवादी क्रिया-काण्डों के खिलाफ हैं, परन्तु वे वर्षों से आधुनिक प्रतिक्रमण करते आए हैं। वे दिनभर की भूलों, गलतियों व त्रुटिपूर्ण व्यवहारों को याद कर उन्हें दैनिक डायरी में लिखते हैं और उनके लिए प्रायश्चित करते हैं, तथा संकल्प करते हैं कि वे उन त्रुटियों को दोहराएँ नहीं। दिनभर में किसी साधु-पुरुष ने उपकार किया हो तो उन्हें याद कर उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। अपने गुरु साधुजनों को याद कर सदाचार की प्रेरणा लेते हैं। यह है उनके आधुनिक व बुद्धिपूर्ण प्रतिक्रमण का तरीका।
उनकी इन डायरियों का यदि कोई शोध विद्यार्थी पठन करेगा तो उसको अपने समाज व राष्ट्र की तत्कालीन सामाजिक तथा राजनीतिक हलचलों का ज्ञान प्राप्त होगा। लगभग आधी से अधिक शताब्दी के लम्बे समय का अप्रत्यक्ष इतिहास इन डायरियों के पन्नों में भरा पड़ा है। शोध विद्यार्थियों के लिए यह भरपूर खजाना है।
आभार : श्री श्रीनाथजी मोदी अभिनन्दन समारोह, 1985, स्मारिका

















