— परिचय दास —
।। एक ।।
मनुष्य ने जब पहली बार किसी पत्थर को हथियार बनाया होगा, उसी दिन शक्ति का पहला बीज धरती पर पड़ा होगा। उस पत्थर के साथ न तो संसद थी, न संविधान, न चुनाव और न कोई अदालत। केवल एक मनुष्य था और उसके हाथ में दूसरे से अधिक बल था। सभ्यता आगे बढ़ती गई, हथियार बदलते गए, सिंहासन बदलते गए, वेशभूषाएँ बदलती रहीं, लेकिन शक्ति का आकर्षण नहीं बदला। उसने केवल अपने चेहरे बदले हैं।
आज शक्ति केवल तलवार नहीं है। वह कुर्सी भी है, पूँजी भी है, भीड़ भी है, सूचना भी है और प्रचार भी। मनुष्य ने शक्ति को इतना परिष्कृत कर लिया है कि कई बार वह मुस्कुराते हुए भी शासन करती है। आदेश देने के लिए अब ऊँची आवाज़ की आवश्यकता नहीं पड़ती। कभी बैंक का खाता बोलता है, कभी कैमरे का लेंस, कभी समाचार की सुर्खियाँ और कभी लाखों लोगों की तालियाँ।
शक्ति अपने आप में न तो शुभ है, न अशुभ। अग्नि की तरह वह भोजन भी पका सकती है और घर भी जला सकती है। प्रश्न शक्ति का नहीं, उसके स्वामी का है। किंतु मनुष्य का इतिहास यह बताता है कि शक्ति मिलते ही आत्मसंयम सबसे पहले संकट में पड़ता है। अधिकार जितना बढ़ता है, आत्मालोचन उतना ही घटने लगता है। शायद इसी कारण इतिहास में सबसे अधिक त्रासदियाँ उन लोगों ने रचीं, जिन्हें स्वयं पर सबसे कम संदेह था।
फिर शक्ति अकेली नहीं चलती। उसे अपने साथ दो विश्वसनीय साथी चाहिए। पहला है पैसा और दूसरा है पब्लिक। पैसा शक्ति को साधन देता है, पब्लिक उसे वैधता देती है। इन दोनों के बिना सत्ता अधूरी रहती है। और जब तीनों एक ही दिशा में खड़े हो जाएँ, तब मनुष्य के भीतर यह भ्रम जन्म लेने लगता है कि उसकी इच्छा ही व्यवस्था है, उसका निर्णय ही न्याय है और उसकी सुविधा ही सत्य है।
यहीं से मनमर्जी की शुरुआत होती है।
मनमर्जी कभी अचानक नहीं आती। वह धीरे-धीरे आती है। पहले वह नियमों में छोटे अपवाद खोजती है, फिर अपवादों को परंपरा बना देती है और अंततः परंपरा को अपना अधिकार घोषित कर देती है। समाज भी प्रारंभ में इसका विरोध करता है, फिर समझौता करता है और अंततः कई बार उसे स्वाभाविक मान लेता है। यह मनुष्य की सबसे पुरानी आदत है। वह शक्ति के सामने प्रश्न पूछने से पहले उसकी सफलता का आकार देखता है।
लोकतंत्र ने इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए संविधान बनाया, संस्थाएँ बनाईं और सत्ता का विभाजन किया। किंतु कोई भी संविधान मनुष्य के भीतर का अहंकार समाप्त नहीं कर सकता। कानून सीमाएँ बना सकता है, चरित्र नहीं। इसलिए प्रत्येक युग में यह प्रश्न फिर खड़ा हो जाता है कि क्या शक्ति सेवा का माध्यम बनेगी या स्वेच्छाचार का?
इतिहास बार-बार उत्तर देता है कि शक्ति की सबसे बड़ी परीक्षा उसके विरोधियों से नहीं, उसके अपने समर्थकों से होती है। विरोधी तो प्रश्न पूछते ही हैं; असली संकट तब आरंभ होता है, जब समर्थक प्रश्न पूछना छोड़ देते हैं। उसी दिन शक्ति को यह भ्रम हो जाता है कि जनता उसके साथ नहीं, उसके नीचे खड़ी है।
यहीं से लोकतंत्र का सबसे सूक्ष्म क्षरण आरंभ होता है। और यही वह क्षण है, जहाँ पावर, पैसा और पब्लिक का त्रिकोण समाज के लिए वरदान भी बन सकता है और अभिशाप भी।
।। दो ।।
पैसा कभी केवल मुद्रा नहीं रहा। वह हमेशा एक अदृश्य भाषा रहा है। जिसके पास वह अधिक होता है, उसकी आवाज़ भी अधिक दूर तक सुनाई देती है। कभी वह महलों की ऊँची दीवारों में बोलता था, आज वह कॉरपोरेट भवनों, चुनावी रैलियों, डिजिटल मंचों और विज्ञापनों की चमक में बोलता है। सिक्के बदल गए, नोट बदल गए, लेन-देन के माध्यम बदल गए, किंतु पैसे का स्वभाव नहीं बदला। वह अवसर भी खरीदता है और कभी-कभी मौन भी।
कहा जाता है कि धन से सब कुछ नहीं खरीदा जा सकता। यह बात सत्य है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि धन बहुत-सी ऐसी परिस्थितियाँ बना देता है, जिनमें सत्य की आवाज़ धीमी पड़ जाती है। पैसा किसी मनुष्य का चरित्र नहीं खरीद सकता, पर उसके चारों ओर ऐसा वातावरण अवश्य बना सकता है, जिसमें चरित्र की परीक्षा कठिन हो जाए।
फिर आती है पब्लिक, अर्थात भीड़ । भीड़ अपने आप में न अच्छी होती है, न बुरी। वह नदी की तरह है। उसका प्रवाह जिस दिशा में मोड़ दिया जाए, वह उधर बह निकलती है। इतिहास में भीड़ ने साम्राज्य गिराए हैं, स्वतंत्रता के आंदोलन खड़े किए हैं, तानाशाहों को हटाया है; और कभी-कभी उसी भीड़ ने विवेक को किनारे रखकर अन्याय का भी उत्सव मनाया है। इसलिए भीड़ संख्या है, लेकिन संख्या हमेशा सत्य नहीं होती।
लोकतंत्र का सबसे सुंदर पक्ष यही है कि वह जनता को सर्वोच्च मानता है। पर लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट भी तब पैदा होता है, जब जनता को नागरिक नहीं, भीड़ में बदल दिया जाता है। नागरिक प्रश्न पूछता है, भीड़ नारे लगाती है। नागरिक तर्क चाहता है, भीड़ ताली चाहती है। नागरिक भविष्य देखता है, भीड़ वर्तमान के उन्माद में बह जाती है।
यहीं पावर और पैसा अपना सबसे बड़ा खेल खेलते हैं। शक्ति को पता है कि यदि धन से प्रचार मिल जाए और प्रचार से भीड़, तो निर्णय का संतुलन बदल सकता है। धीरे-धीरे व्यक्ति नहीं, उसकी छवि वोट माँगने लगती है। विचार नहीं, उसका प्रचार अधिक प्रभावी हो जाता है। सत्य नहीं, उसकी प्रस्तुति महत्वपूर्ण हो जाती है। यह आधुनिक लोकतंत्र की सबसे जटिल विडंबनाओं में से एक है।
लेकिन इस कथा का दूसरा पक्ष भी है। इतिहास यह भी बताता है कि जनता को लंबे समय तक भ्रमित नहीं रखा जा सकता। देर-सवेर वास्तविकता प्रचार के आवरण को भेद देती है। सत्ता चाहे कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हो, धन कितना ही विपुल क्यों न हो और भीड़ कितनी ही विशाल क्यों न दिखाई दे, अंततः समय सबसे कठोर परीक्षक सिद्ध होता है। समय न किसी दल का कार्यकर्ता है, न किसी विचारधारा का प्रचारक। वह केवल परिणाम देखता है।
इसलिए पावर, पैसा और पब्लिक का यह त्रिकोण जितना आकर्षक दिखाई देता है, उतना ही अस्थिर भी है। यदि उसके केंद्र में नैतिकता न हो, तो वह रेत पर बने महल की तरह होता है। बाहर से भव्य, भीतर से खोखला।
सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसने शक्ति अर्जित कर ली; उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि तब होगी, जब वह शक्ति के बीच भी विनम्र रहना सीख ले। क्योंकि मनुष्य का वास्तविक कद उसके अधिकार से नहीं, उसके संयम से मापा जाता है।
।। तीन ।।
मनमर्जी कभी घोषणा करके नहीं आती। वह संविधान की प्रस्तावना में अपना नाम नहीं लिखती, न किसी राजाज्ञा में उसका उल्लेख मिलता है। वह धीरे-धीरे मनुष्य के भीतर जन्म लेती है। पहले वह सुविधा बनती है, फिर अधिकार, उसके बाद आदत और अंततः स्वभाव। जब कोई व्यक्ति, संस्था या सत्ता यह मान बैठती है कि उससे प्रश्न पूछना अनुचित है, तब समझ लेना चाहिए कि मनमर्जी ने अपना पहला महल बना लिया है।
इतिहास का एक विचित्र व्यंग्य है। हर युग में सत्ता ने स्वयं को जनता का प्रतिनिधि कहा है, और हर युग में कुछ लोगों ने जनता के नाम पर जनता की ही आवाज़ को दबाने का प्रयास भी किया है। शब्द वही रहे, अर्थ बदलते गए। “जनहित” कभी-कभी “शासनहित” में बदल गया और “राष्ट्रहित” का अर्थ भी कई बार सत्ता की सुविधा के अनुसार गढ़ा जाने लगा। भाषा की यही सबसे बड़ी त्रासदी है। वह सत्य का भी वस्त्र बन सकती है और असत्य का भी मुखौटा।
पावर जब पैसे से मिलती है, तो संसाधनों का विस्तार होता है। पावर जब पब्लिक से मिलती है, तो वैधता का विस्तार होता है। किंतु जब पावर, पैसा और पब्लिक तीनों एक-दूसरे को निरंतर पुष्ट करने लगते हैं, तब विवेक सबसे पहले हाशिए पर चला जाता है। यह स्थिति किसी एक दल, एक देश या एक काल की नहीं है। इतिहास के लगभग हर बड़े साम्राज्य ने किसी न किसी रूप में इस मोह को जिया है। रोम से लेकर आधुनिक लोकतंत्रों तक, सत्ता का प्रलोभन मनुष्य के स्वभाव से कभी पूरी तरह अलग नहीं हुआ।
लेकिन इतिहास की सबसे रोचक बात यह है कि मनमर्जी की आयु हमेशा सीमित होती है। कारण यह नहीं कि सत्ता अचानक बदल जाती है, बल्कि इसलिए कि जीवन स्वयं किसी एक इच्छा के अनुसार नहीं चलता। प्रकृति किसी राजा की आज्ञा नहीं मानती। समय किसी उद्योगपति की संपत्ति नहीं है। मृत्यु किसी लोकप्रिय नेता की समर्थक नहीं होती। अंततः वे सब सीमाएँ सामने आ जाती हैं जिन्हें मनुष्य अपने अधिकार के नशे में भूल जाता है।
लोकतंत्र की असली शक्ति चुनावों में नहीं, प्रश्न पूछने की संस्कृति में है। जहाँ प्रश्न जीवित रहते हैं, वहाँ मनमर्जी अधिक दिनों तक नहीं टिकती। जहाँ असहमति को देशद्रोह, आलोचना को शत्रुता और स्वतंत्र विचार को अपराध समझा जाने लगे, वहाँ लोकतंत्र का शरीर भले जीवित दिखाई दे, उसकी आत्मा थकने लगती है।
समाज का भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसके पास कितनी शक्ति है, बल्कि इस पर निर्भर करता है कि वह शक्ति पर कितनी निगरानी रखता है। धन कितना है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना यह कि वह धन किस उद्देश्य में लगाया जा रहा है। जनता कितनी बड़ी है, यह भी अंतिम प्रश्न नहीं; बड़ा प्रश्न यह है कि वह जनता नागरिक बनी हुई है या केवल भीड़ में बदल गई है।
शायद इसी कारण सभ्यता का सबसे बड़ा प्रहरी तलवार नहीं, विवेक है। तलवार सीमा की रक्षा करती है, विवेक समाज की। और जब विवेक वनवास पर चला जाता है, तब पावर, पैसा और पब्लिक का गठबंधन कुछ समय के लिए भले अजेय दिखाई दे, पर भीतर से वह अपनी ही छाया से डरने लगता है।
मनुष्य ने बहुत कुछ जीत लिया है, पर अभी उसे स्वयं पर विजय प्राप्त करनी बाकी है। वही विजय सबसे कठिन है, और वही सबसे आवश्यक भी।
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