भिखारी ठाकुर की रचना ‘बिदेसिया’ 1917 में हुई थी। सौ साल होने जा रहे हैं इस महान कृति के। आजकल कृतियों के महत्व का अन्दाजा इस बात से भी लगाया जाता है कि उसके कितने संस्करण हुए। इस पैमाने पर देखेंगे तो एकदम से अलग दृश्य सामने होगा। बिदेसिया का प्रकाशन ही तब हुआ जब यह कृति लीजेण्ड का दर्जा प्राप्त कर चुकी थी। बिदेसिया नाटक है। नाट्य कृतियों के महत्व का पता उसकी प्रस्तुतियों की संख्या से होता है। बिदेसिया की कितनी प्रस्तुतियाँ हुई होंगी? यह जानने का हमारे पास कोई उपाय नहीं है। यह संख्या हजार में है, दस हजार में है या कि लाख में। सच पूछिए तो बिदेसिया के महत्व का आकलन इन तरीकों से नहीं हो सकता। लोक मन में बैठी हुई , लोक चित्त में समाई हुई कृति का महत्व जानने के दूसरे पैमाने होंगे । विदेसिया केवल एक रचना नहीं है-यह लोकनाट्य शैली है, लोकधुन है।ऐसी धुन जिसमे बोली की सोयी हुयी क्रियाओं को जगा देने की सामर्थ्य है।
बिदेसिया की कथा बहुत छोटी सी है। बिदेसी गवना कराकर प्यारी सुन्दरी को घर लाता है और प्यारी सुन्दरी के मना करने पर भी वह चुपके से कलकत्ता कमाने चला जाता है। वहाँ जाकर एक दूसरी औरत के प्रेम में पड़ जाता है और उसके साथ रहने लगता है । उसके दो बच्चे हैं। इन्हीं सब के मोह पाश में बँधा बिदेसी भूल जाता है कि उसका घर भी है जहाँ वह प्यारी सुन्दरी को छोड़ आया है। प्यारी सुन्दरी विरह से कातर हो रही है। उसे बटोही मिलता है जो कलकत्ता जा रहा है। बटोही को रोक कर अपना दुखड़ा सुनाती है और कहती है कि मेरे पति को खोजकर उससे मेरी दशा का बयान करिए और समझा बुझाकर घर भेजिए। बटोही कलकत्ते में बिदेसी को खोज निकालता है और उसे वापस घर भेजता है। पीछे-पीछे वह औरत भी आती है । रास्ते में दोनों को डाकू लूट लेते हैं। जिस पैसे के लिए बिदेसी कलकत्ते आया था वह पैसा कलकत्ते में ही रह जाता है। प्यारी सुन्दरी को पैसा नहीं चाहिए। वह बिदेसी को पाकर खुश है। इस खुशी में वह अपनी सौत और उसके बच्चों को भी स्वीकार कर लेती है। सब साथ रहने लगते हैं। एक सुखान्त सी लघु कथा । घटनाएँ बहुत नहीं घटती। न राम बनवास है, न सीता का हरण होता है, न लंका का पता लगाया जाता है। न ही रावण का बध होता है और न ही सीता की अग्निपरीक्षा होती है।
फिर भी बिदेसिया राम कथा से होड़ लेती हुई कृति है। खास तौर से तुलसीदास के रामचरितमानस से। भिखारी ठाकुर कदम-कदम पर तुलसीदास को याद करते हैं। तुलसी बाबा की चौपाई-‘मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सो दसरथ अजिर बिहारी’ से नाटक शुरू होता है-और थोड़ी ही देर में भिखारी ठाकुर तुलसीदास को प्रणाम करते हुए अपनी चौपाई पर उतर आते हैं-नाच तमासा कीर्तन जेते। होखत बा सब जग मँह तेते। नावत बानी सब कर माथा। चित देइ सुनहु बिदेसिया काथा एह किताब के सब बिस्तारी। थोरही में सब कहत भिखारी / यह तुलसी बाबा की शैली है। तुलसीदास अपने पूर्व पुरुषों को याद करते हैं, उन्हें सम्मान देते हैं और धीरे से अपना रास्ता अलग कर लेते हैं। बिदेसिया में भिखारी ठाकुर ऐसा ही करते हैं। विविध प्रकार के नाच, तमासा, कीर्तन सब हो रहे हैं। भिखारी सबके आगे नतमस्तक हैं-‘नावत बानी सबकर माथा’। सब कुछ जो पहले हो चुका है या पहले से होता रहा है उसे आदर भी देते हैं पर साथ ही उसे प्रणाम भी कर लेते हैं। इस माथा नवाने में आदर के साथ विदाई भी है। इस विदाई के बाद भिखारी बिना समय गँवाये अपनी कथा पर आ जाते हैं-‘चित देइ सुनहु बिदेसिया काथा।’
बिदेसिया की लोकव्याप्ति जिस भोजपुरी प्रदेश में है वहाँ जो नाच तमासे प्रचलित थे उसमें रामलीला भी है। रामकथा की लोक व्याप्ति बेजोड़ है। राम कथा के असंख्य लिखित अलिखित पाठ मौजूद हैं। खड़गपुर में रामलीला देखकर ही भिखारी का ध्यान नाटक को ओर गया । खड़गपुर से लौटकर उन्होने पहले रामलीला करनी शुरू की। धीरे धीरे रामलीला से लोक लीला की ओर बढ़े । आखिर तुलसी के और राम के भक्त भिखारी ने ऐसा क्यों किया ।
भिखारी को लगा कि उनके समय समाज में जो परिवर्तन घटित हो रहा है , जो मूल्यगत टकराव हो रहे हैं , उन्हें व्यक्त करने की गुन्जाइश रामलीला के परंपराबद्ध कथानक में संभव नहीं रह गया है । तो वे बिदेसिया कथा की ओर मुड़े। भिखारी ठाकुर कहते हैं :बाल्मीकि महाभारत गीता, करहु कृपा जग जननी सीता/ एह नाटक के बिचऊ बाना, गावत बानी बिदेसिया गाना। एह नाटक के बिचऊ बाना-बहुत महत्वपूर्ण है। यानी प्रकट यथार्थ, दार्शनिक और मूल्यगत संसार-तीनों के बीच एक संतुलन स्थापित करने की कोशिश।
रामकथा जिन सामाजिक नैतिक मूल्यों को स्थापित करती है- आदर्श रचती है-जीवन उससे भिन्न है। बिदेसिया जीवन को उसकी तथता में स्वीकार करता है। नाटक के अन्त में बिदेसी, प्यारी सुन्दरी और रखेलिन एक साथ रहने लगते हैं। साथ रहने के लिए कहीं किसी को समझाने की जरुरत नहीं पड़ती। पद्मावत में रतनसेन जब पद्मावती के साथ चित्तौड़ लौटकर आता है नागमती के साथ तालमेल बनाने में काफी संघर्ष होता है-नागमती-पद्मावती विवाह खण्ड में पूरा ब्यौरा है। बिदेसिया में ऐसा कोई विवाद नहीं होता। बिदेसी कहता है ड्यौढ़ी में सौत खड़ी है। रखेलिन अपने बेटे से कहती है माँ है प्रणाम करो। और एक संगति बैठ जाती है।
राम कथा में जहाँ सीता जैसी आदर्श स्त्री को निर्वासन मिलता है, बिदेसिया में सौत भी घर में स्थापित हो जाती है। माया का मायात्व खत्म हो जाता है जीव ब्रह्म और माया एक हो जाते हैं।
पुरानी आर्थिक संरचना टूट रही है। मनीआर्डर वाली अर्थव्यवस्था जड़ सामाजिक ढ़ाचे को हिलाती है। समाज में मूल्यगत बदलाव आता है , गतिशीलता आती है। बिदेसिया में भिखारी ठाकुर इस गतिशीलता के पक्ष में सामाजिक जड़ता की आलोचना करते हैं । साथ ही वे नई अर्थकेन्द्रित मूल्य व्यवस्था की भी खबर लेते हैं -क़हत भिखारी भिखर होय गईनी दौलत बहुत कमा के । विदेसिया की लोक व्याप्ति के मूल में यह आलोचना ही है ।

















