SIR, परिसीमन और चुनाव आयोग पर कब्ज़ा — मोदी सरकार का एक और जुमला

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Sir, Delimitation and the Capture of the Election Commission — Another Slogan of the Modi Government

झारखंड जनाधिकार महासभा और बगाईचा द्वारा 25-26 अप्रैल को स्टेन स्वामी जयंती के अवसर पर दो-दिवसीय जन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसी क्रम में आज बगाईचा, नामकुम में “SIR व चुनावी व्यवस्था की वर्तमान स्थिति” विषय पर प्रेस वार्ता आयोजित की गई। कई राज्यों में SIR लागू हो चुका है और झारखंड में इसे लागू करने की तैयारी है। जहाँ असम में केवल SR (साधारण पुनरीक्षण) के तहत घर-घर सत्यापन के बाद लगभग 2 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, वहीं पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में SIR के तहत 90 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबरें सामने आई हैं। इससे एक बड़ा सवाल उठता है कि मतदाता सूची में नाम बनाए रखने के लिए अचानक दस्तावेज़ दिखाने की शर्त कहाँ से आई, जबकि 2002-03 के समय लोगों से इस तरह अपनी पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेज़ नहीं मांगे गए थे। जिन राज्यों में SIR लागू हुआ है, वहाँ से बड़े पैमाने पर नाम हटाने और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए अर्थशास्त्री एवं सामाजिक कार्यकर्ता परकाला प्रभाकर ने SIR को “रक्तहीन राजनीतिक जनसंहार (Bloodless Political Genocide)” करार दिया। उन्होंने कहा कि SIR की संवैधानिक वैधता को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है, लेकिन अभी तक कोई निर्णय नहीं आया है, इसके बावजूद चुनाव आयोग इसे लागू कर रहा है। अब तक 10 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 6.5 करोड़ मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किया जा चुका है, और पूरे देश में यह संख्या 16.5 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है; जो कई देशों की आबादी के बराबर है। यह पूरी प्रक्रिया अत्यंत गैर-पारदर्शी तरीके से चल रही है और चुनाव आयोग की अपनी नियमावली, जिसमें ग्राम सभा और वार्ड सभा के माध्यम से पारदर्शी प्रक्रिया की बात कही गई है, उसका उल्लंघन हो रहा है। उन्होंने कहा कि हमें कंप्यूटर जनित एल्गोरिदम से बाहर आकर ज़मीन पर जाना होगा और ग्राम सभाओं के माध्यम से पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि SIR, परिसीमन और जनगणना, इन तीनों के माध्यम से देश की राजनीतिक संरचना को बदलने की एक प्रक्रिया चल रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि इसके दूरगामी परिणाम बहुत गंभीर होंगे| इससे देश में दो तरह के नागरिक बन जाएंगे: एक जिनके पास वोट देने का अधिकार होगा और दूसरे जिनसे यह अधिकार छीन लिया जाएगा। यह केवल चुनाव जीतने-हारने का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कौन भाग ले सकता है और कौन नहीं। उन्होंने लोगों से अपील की कि इस प्रक्रिया के असली उद्देश्य को उजागर किया जाए और ग्राम/वार्ड सभाओं द्वारा पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की जाए।

झारखंड जनाधिकार महासभा ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह SIR जैसी मनमानी और अपारदर्शी प्रक्रियाओं को खारिज करता है। अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार साझा किए। अफ़ज़ल अनीस ने बताया कि SIR से पहले की गतिविधियों के कारण 2003 की मतदाता सूची में भारी गड़बड़ियाँ पैदा हो रही हैं और यह आशंका है कि बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए जा सकते हैं। अलोका कुजूर और एलिना होरो ने कहा कि SIR झारखंडी मूलवासियों की नागरिकता पर सवाल खड़ा करने का एक तरीका बनता जा रहा है। अब तक जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनमें बड़ी संख्या अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों और महिलाएँ शामिल हैं। प्रवीर पीटर ने इस बात पर चिंता जताई कि राजनीतिक दल अपनी भूमिका निभाने में विफल रहे हैं और चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने आधार, डेटा आधारित त्रुटियों प्रक्रियाओं और AI के नाम पर हो रहे बहिष्करण की ओर भी ध्यान दिलाया। बंगाल में 27 लाख वोटरों को कंप्यूटर जनित अल्गोरिथम (नाम में त्रुटियाँ एवं पिता/पुत्र की उम्र को लेकर शंका आदि) के कारण हटाया गया था जिस का निपटारा अभी तक नहीं हुआ जिस के कारन वह लोग वोट नहीं दे पाए, वर्त्तमान में हो रहे बंगाल चुनाव के दौरान- यह सरासर गलत है|

इसी संदर्भ में महासभा ने एक पर्चा भी जारी किया है, ताकि लोगों को इन खतरों के प्रति जागरूक किया जा सके। अंत में महासभा ने कहा कि SIR का झारखंड पर असर बेहद गंभीर होगा, क्योंकि यहाँ आदिवासी और दलित समुदायों में दस्तावेज़ों की कमी के पर्याप्त प्रमाण पहले से मौजूद हैं। इसलिए किसी और पर निर्भर रहने के बजाय झारखंड के लोगों को स्वयं तैयार होना होगा और चुनाव आयोग पर दबाव बनाना होगा कि पूरी प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए और किसी भी नाम को जोड़ने या हटाने का निर्णय केवल ग्राम सभा या वार्ड सभा के माध्यम से ही हो। महासभा ने सभी नागरिक समाज संगठनों, सक्रिय सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सजग नागरिकों से अपील की कि वे “वोट चोरी” और SIR जैसे खतरों के प्रति सतर्क रहें, एकजुट हों और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए मिलकर आगे आएँ।


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