निजता का अनावरण

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— रामप्रकाश कुशवाहा —

साहित्यकारों की आत्मकथा का महत्त्व प्राय: दुनिया को देखने के उनके संवेदनशील नजरिए के कारण हुआ करता है। पाठकीय पूर्वाग्रह राजनीतिज्ञों के घटनाबहुल जीवन जीने की प्रत्याशा रखते हैं और कई बार सोचते हैं कि एक लेखक के पास ऐसा जिया क्या होगा कि वह उसके द्वारा लिखने और दूसरों द्वारा पढ़ने योग्य हो।

त्रेता, अभिनव पाण्डव, ब्लैक होल, अनाद्य सूक्त और राधा-माधव जैसे मिथकों पर आधारित सभ्यता विमर्श वाली लम्बी प्रबन्ध-कविताओं के यशस्वी कवि *उद्भ्रान्त* की औपन्यासिक आत्मकथा *मैने जो जिया-2* कई दृष्टियों से प्रशंसनीय तथाआत्मकथा विधा में एक नया कीर्तिमान स्थापित करने वाली रचना है। आत्म-कथा का मूल्य लिखने वाले व्यक्ति के जीवन-मूल्य में निहित होता है। यदि आत्मकथाकार महत्त्वपूर्ण है तो मान लिया जाता था कि आत्मकथा भी महत्त्वपूर्ण होगी। इस तरह किसी आत्मकथा का महत्त्वपूर्ण होना स्वयं उस आत्मकथा की गुणवत्ता पर निर्भर नहीं था। इस दृष्टि से बच्चन की आत्मकथा का महत्त्व यह है कि अपनी कविताओं की तरह आत्मकथा की लोकप्रियता से उन्होंने इस पूर्वाग्रह को तोड़ा कि आत्मकथा लिखने के लिए स्वयं ही महान और प्रसिद्ध होना जरूरी है।यद्यपि बच्चन स्वयं ही लोकप्रिय कवि के रूप में सार्वजनिक व्यक्तित्व थे लेकिन उनकी परिष्कृत शैली एवं साहित्यिक दृष्टि के कारण अपनी आत्मकथा में साहित्यिक मूल्य-सर्जना भी करते हैं।

स्पष्ट है कि साहित्यिक मूल्य वाली आत्मकथाएं कम एवं साधारण घटनाओं तथा सामान्य मनुष्यों को लेकर भी लिखी जा सकती हैं। आज हिन्दी में साहित्यकारों द्वारा लिखी गयी बहुत-सी आत्मकथाएं हैं । रामविलास शर्मा, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा से लेकर अनेक स्त्री और दलित आत्मकथाओं तक।

यह भी एक तथ्य है कि प्रारंभिक चर्चित आत्मकथाएं घटना-बहुल एवं राजनीतिक-सामाजिक महत्त्व का भी होने के कारण राजनीतिज्ञों द्वारा ही लिखी गयीं। उनमें भी महात्मा गांधी की आत्मकथा ने अपने जीवन के एकान्त गोपनीय प्रसंगों को भी सार्वजनिक अभिव्यक्ति देकर तटस्थ, ईमानदार एवं साहसिक अभिव्यक्ति का जो कीर्तिमान रचा है, हिन्दी में न होते हुए भी गांधी की आत्मकथा भावी आत्मकथा लेखकों के लिए एक प्रतिमान तो प्रस्तुत करती ही है।

उद्भ्रांत की ‘मैंने जो जिया’ आत्मकथा में भी साहसिक और तटस्थ अभिव्यक्ति की चुनौती को कई जगह स्वीकार किया गया है। अपने अपमानजनक और हीनताकारी प्रसंगों को भी पाठकों से नहीं छिपाया है। एक कृति के रूप मे उद्भ्रांत की आत्मकथा ‘जो मैने जिया’ की सबसे बड़ी विशेषता उसका औपन्यासिक ‘कथा’ होना है और सबसे बड़ी सफलता उद्भ्रांत के बहाने से कानपुर के पूरे साहित्यिक वातावरण को जिंदा कर देना है। भावुकता और सामाजिकता उद्भ्रांत के साहित्यकार व्यक्तित्व की सबसे निर्णायक एवं प्रभावी विशेषता रही है। इसी पूँजी के बल पर वे हिंदी के बहुविभाजित साहित्यिक परिदृश्य में अपना सही स्थान पाने के लिए संघर्षरत रहे हैं तथा एक साहित्यकार के रूप में अपनी आजीविका के लिए भी। अपनी पत्रकसिता और साहित्यकारिता के बल पर वे एक दिन दूरदर्शन के उपमहानिदेशक तक की ऊँचाई तक पहुंचते हैं। लेखक की यह जिजीविषा उसके विपुल साहित्य-सृजन से भी सत्यापित होती है।

उद्भ्रान्त की इस आत्मकथा का अनुभव जगत कानपुर महानगर को केन्द्र में रखकर निर्मित होता है। अन्तर्मुखी स्वभाव वाले लेखक जहाँ अपने लेखन-कर्म के साथ एकांतप्रिय जीवन जीते है युवा कवि उद्भ्रान्त पूरी शक्ति के साथ मंचसिद्ध कवियों के बीच अपनी उपस्थिति और पहचान दर्ज कराने का प्रयास करता है। एक दौर की कानपुर की साहित्यिक संस्कृति, समाज और उसकी गतिविधियाँ उद्भ्रान्त की आत्मकथा में दर्ज हैं। मंचीय काव्य-पाठों से मिले वाचिक संस्कार ने उद्भ्रान्त की कविताओं को जहाँ शैलीगत वाचिक दीप्ति दी है वहीं उनकी मुक्त छन्द वाली प्रबन्ध सर्जना को भी छान्दस प्रभाव सौंपा है। कविता की वाचिक परम्परा में सक्रिय भागीदारी और सदस्यता ही उनकी काव्यभाषा को प्रसाद परम्परा की बिम्बधर्मी विलक्षणता नहीं देती। उनकी काव्य-भाषा का आदर्श अभिधाप्रियता के साथ बच्चन, दिनकर और निराला के मिले-जुले पाठकीय प्रभावों का संश्लेष है। आत्मकथा उद्भ्रान्त के कवि के इस विकास क्रम को सत्यापित ही करती है कि उद्भ्रान्त की युवावस्था का कवि बच्चन से प्रभावित और रोमानी रहा है। यद्यपि प्रगतिशीलता का आकर्षण और नैतिक समर्थन उसे दूसरा बच्चन बनने से बचा लेता है।

स्वयं उद्भ्रांत की दृष्टि में यह एक उपन्यास की शैली में लिखी गयी आत्मकथा है। इस तरह प्रमुख विशेषता की दो बातें सामने आती हैं। यह लेखक की आत्मकथा है और इसकी विषय-वस्तु का आधार उसके जीवन की वास्तविक घटनाएँ और सूचनाएं हैं। दूसरा यह कि इस आत्मकथा को उपन्यास के रूप में लिखा गया है। इस कृति की दो विधाओं की दावेदारी महत्त्वपूर्ण है। इस तरह इसका औपन्यासिक आत्मकथा होना महत्त्वपूर्ण है। इसे ‘मैं’ शैली में भी नहीं लिखा गया है। इस आत्मकथात्मक उपन्यास में लेखक की निर्मम और निस्संग तटस्थता चौंकाती है। इस आत्मकथा की एक और विशेषता यह सामने आती है कि वह उनके कवि-व्यक्तित्व के विकास के साथ तत्कालीन साहित्यिक समय को भी भरपूर प्रकाशित करती चलती है। इसे जितना उद्भ्रांत की जीवन-यात्रा के विकास को जानने के लिए पढ़ा जा सकता है उतना ही आजादी के बाद के भारत में राजनीतिकों और नौकरशाहों के बीच पतनोन्मुख गठबंधन के लिए और उतना ही अपने पिता से भिन्न पाठ पर जाने की जोखिम उठाने वाले एक रोजगार तलाशते युवा के जोखिम उठाने वाले और जुझारू व्यक्तित्व के लिए भी। आत्मकथा निजता का अनावरण और लोकार्पण करने वाली विधा है। उद्भ्रांत ने इसे अपनी साहसिक रचनाशीलता से सिद्ध किया है।

किताब : मैंने जो जिया-2
लेखक : उद्भ्रान्त
अमन प्रकाशन, 104-ए/सी, रामबाग, कानपुर -208012 (उप्र)
दूरभाष – 0512-3590496
मूल्य : 375 रुपये (पेपरबैक)

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