— प्रकाश चंद्रायन —
बीसवीं सदी का सातवाँ दशक। किशन पटनायक 1967 का लोकसभा चुनाव हार चुके थे। अपने राजनीतिक जीवन में वे महज एक कार्यकाल के सांसद रहे। राममनोहर लोहिया की भी मृत्यु हो गई थी। लोहिया के राजनीतिक प्रयोग की संविद सरकारें अस्थिर होने लगी थीं, मानो बिना नाविक की नाव। 37 वर्षीय किशन पटनायक को समाजवादी युवजन सभा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था। युवा किशन जी सयुस के संगठन के लिए बिहार का दौरा कर रहे थे, क्योंकि 1967 के आम चुनाव और 1969 के मध्यावधि चुनाव में बिहार विधानसभा में संयुक्त समाजवादी पार्टी सबसे बड़े गैर-कांग्रेसी दल के रूप में उभरी थी। इसी क्रम में वे खगड़िया आए थे और एक गोष्ठी को संबोधित किया था। सयुस से जुड़े होने के कारण मेरा उनसे पूर्व परिचय था। उनकी कविताएँ भी मैंने कल्पना में पढ़ी थीं। नागपुर आने के बाद भी उनसे भेंट-बात होती रहती थी। विचार-भिन्नता के बावजूद वे संवाद बनाए रखते थे। वे यहाँ आते रहते थे। उनका नागपुर से विशेष लगाव था, क्योंकि उनकी उच्च शिक्षा यहीं हुई थी और अब वे देशज लोकशिक्षण और संवाद में शामिल थे।
खगड़िया की गोष्ठी में उन्होंने कुछ सूक्ष्म उदाहरण दिए थे, जिन्हें अमूमन अनदेखा किया जाता है। उस समय उपभोक्तावाद का बोलबाला नहीं था, लेकिन उन्होंने बताया था कि भारत का अतिधनाढ्य वर्ग 80 रुपये का एक आयातित साबुन इस्तेमाल कर रहा है, जबकि देश की आम जनता सनलाइट, 501, पनघट, लाइफबॉय, हमाम और लक्स का इस्तेमाल करती थी। इसे खतरे की आमद के रूप में चित्रित करते हुए उन्होंने यह भी बताया था कि दौलतमंदों की कोठियों में ऐसे शौचालय बन रहे हैं, जिनमें एक बार में चौदह लीटर पानी फ्लश होता है, जबकि देश की अधिकांश आबादी कुंडों, नदियों के किनारे और एक लोटा पानी के सहारे खुले में शौच के लिए जाती थी। इसका व्यंग्यात्मक वर्णन श्रीलाल शुक्ल ने अपने उपन्यास राग दरबारी में किया है कि रेलवे लाइन के किनारे भारत की आबादी शौच करती है। नौकरशाह शुक्ल यह तंज कर सकते थे, क्योंकि उनकी उच्च वर्गीय-वर्णीय दृष्टि को ऐसा परंपरागत अधिकार और आदत प्राप्त था। वे प्यास, पानी और शौच की जरूरत को किशन पटनायक की संवेदना से नहीं देख सकते थे। इसीलिए किशन जी ने गोरखपुर की एक गोष्ठी में राग दरबारी के बारे में कहा था कि लेखक श्रीलाल जी को गाँव से सहानुभूति नहीं है। किशन जी के विचारों में ताजगी और सूक्ष्मदर्शिता थी।
1962 के आम चुनाव में संभलपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद बने 32 वर्षीय किशन पटनायक ने लोकसभा में अपने जमीनी भाषणों से पहचान हासिल कर ली थी। उन्होंने संभलपुर क्षेत्र में अकाल और सूखे से उत्पन्न भुखमरी पर संवेदनशील और तार्किक वक्तव्य दिए थे। मेढ़कों के मरने से उस संकट को जोड़ते हुए उन्होंने उसकी भयावहता को प्रस्तुत किया था और पहली बार सदन के पटल पर महुए के फूल, बज्रमूली के दाने और सूखी इमलियों के बीज साक्ष्य के तौर पर रख दिए थे। कांग्रेसी बहुमत, जिसे लोहिया ‘आसुरी बहुमत’ कहते थे, यह सब सुनने और सहने को तैयार नहीं था, और वह भी हिन्दी में? ओड़िया भाषी किशन जी ने इसकी अगुवाई की थी। इस तरह ‘चले देश में देशी भाषा, यह है जन-मन की अभिलाषा’ को उन्होंने मूर्त रूप दिया था। वे कल्पना, जन, दिनमान, मेनकाइंड और ओड़िया पत्र-पत्रिकाओं में त्रिभाषी योगदान कर रहे थे। वैसे, तीस वर्ष की आयु में ही वे मेनकाइंड के संपादक हो गए थे।
उत्तर-लोहिया काल में समाजवादी आंदोलन निस्तेज होने लगा था। दल, नेतृत्व, नीति और संघर्ष शिथिल हो रहे थे। किशन जी लोहिया विचार मंच के जरिए सक्रिय थे। भूमिहीनों, खेतिहर मजदूरों और सीमांत किसानों की आधारभूत कार्यनीति की दिशा में सक्रियता के लिए किशन जी ने राम इकबाल और राम अवधेश के साथ भूमि-संघर्ष हेतु एक मंच बनाया था। बाद में सोशलिस्ट पार्टी ने भी भूमि मुक्ति आंदोलन किया था, जिसे सामंती प्रेस ने ‘भूमि हड़प आंदोलन’ घोषित किया था। वह सोपा का अंतिम भूमि आंदोलन था। उन सामंतवाद-विरोधी कार्रवाइयों पर मार्क्सवादी-लेनिनवादी राजनीति की पकड़ मजबूत हो गई थी। सोपा सत्ता-राजनीति में ज्यादा उलझ रही थी। दल में टूट और बिखराव भी बढ़ रहा था। किशन जी एका के लिए प्रयासरत रहते थे। जहाँ भी एकता की कोशिश होती, वहाँ वे पहुँच जाते थे, लेकिन नेतृत्व-वर्ग उन्हें प्रमुखता नहीं देता था। उन्हें बुद्धिजीवी कहकर किनारे कर दिया जाता था। लोहिया काल तक संसोपा में बुद्धिजीवियों का प्रभावी समावेश था। जन और मेनकाइंड के संपादक मंडल में उनकी खासी उपस्थिति थी। संगमनी नामक एक मंच भी बुद्धिजीवियों का था। छोटी-छोटी कार्यशालाओं, शिविरों और गोष्ठियों में कार्यकर्ता उन्हें मनोयोग से सुनते थे। शिखर और माध्यमिक नेतृत्व भी इन आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाता था। बाद में सत्ता-संरचना और चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने की महत्वाकांक्षा के कारण दूरी बढ़ी। किशन जी और अन्य बुद्धिजीवी कलकत्ता से प्रकाशित चौरंगी वार्ता के जरिए वैचारिक हस्तक्षेप करते रहे, जिसे एक प्रमुख नेता ‘बहुरंगी वार्ता’ कहकर मजाक उड़ाते थे। एक सम्मेलन में एक नेता ने किशन जी पर यह टिप्पणी की थी कि “सिर्फ तीस सदस्य बनाकर राष्ट्रीय उपस्थिति चाहते हैं?” कुछ नेता उन्हें पीठ पीछे ‘पट्टनायक’ कहकर भी मजाक उड़ाते थे। सोपा (लोहियावादी) के भागलपुर सम्मेलन में अनैतिकता दिखी, जब मामा बालेश्वर दयाल की अनुपस्थिति और बिना सहमति के उन्हें अध्यक्ष निर्वाचित घोषित कर दिया गया, जिसका लिखित विरोध मामा ने चौरंगी वार्ता में किया था। किशन जी भी इस प्रक्रिया से असहमत थे। विचारक सच्चिदानंद सिन्हा ने ‘समाजवादियों की मृत्युपीड़ा’ शीर्षक लेख में चेतावनी दी थी। अंततः 1977 में समाजवादी दल का विलोप जनता पार्टी में हो गया।
किशन पटनायक अन्य भूमिका में आए और पटना को केंद्र बनाकर सामयिक वार्ता निकालने लगे। वह एक सार्थक पत्रिका बनी। आज भी निकलती है। उस समय मैंने उनसे 1977 का लोकसभा चुनाव न लड़ने के बारे में पूछा था, तो उन्होंने कहा कि जेपी के कहने पर बीजू उन्हें कोई चुनाव क्षेत्र दे देते, लेकिन वह अनुकंपा होती। सांगठनिक तौर पर भी वे समाजवादी जन परिषद, भारत जनांदोलन, आजादी बचाओ आंदोलन, समता संगठन आदि में प्रयोगशील रहे। कर्नाटक रैयत संघ, दलित संघर्ष समिति, नर्मदा बचाओ आंदोलन, पेप्सी-कोला, एनरॉन, तवा बाँध और डंकल-विरोधी आंदोलनों तथा गंधमार्दन आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी कर उन्होंने अनेक धरातलीय प्रयोग किए। इन्हीं प्रयोगों से उनकी चिंतनपरक पुस्तक विकल्पहीन नहीं है दुनिया आई। जब विश्व-पूंजीवाद का हिस्सा बने भारत में विकल्पहीनता (टीना : There Is No Alternative) का नगाड़ा बजाया जा रहा था, तब किशन जी ने सकारात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। जब राममनोहर लोहिया ने ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’ की नीति-निर्धारण संबंधी चुनौती के साथ वंचितों को भागीदारी दिलाने का प्रयास किया, तब बाद के दशक में सामाजिक न्याय के पक्ष में किशन जी ने भारत शूद्रों का होगा पुस्तक लिखकर वैचारिक स्पष्टता रखी। वे यह भी मानते थे कि भारत में एक दोहरा व्यक्तित्व निर्मित हुआ है, जिसे वे ‘श्री आरक्षण-विरोधी जनेऊधारी कंप्यूटर विशेषज्ञ’ कहते थे और पूछते थे कि क्या इसे विविधता का समन्वय कहेंगे?
कई बार कहा जाता है कि थके हुए संसदीय साम्यवादी की शरण नेहरूवाद में होती है, तो थके हुए संसदीय समाजवादी की शरण वैदिक अध्यात्म में; लेकिन किशन जी वैदिक अध्यात्म में नहीं गए। इस संदर्भ में उन्होंने लिखा कि “मैं निरीश्वरवादी हूँ, लेकिन इसे मुद्दा बनाकर सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन खड़ा नहीं किया।” शायद उन्हें मालूम था कि निरीश्वरवादी होने के कारण आचार्य नरेंद्र देव चुनाव हार गए थे।
उन्होंने हिंदुत्व की राजनीति नामक पुस्तक में संकलित ‘भाजपा के विरोधी’ शीर्षक अपने लेख में माना था कि ये विरोधी वास्तविक नहीं हैं, क्योंकि आर्थिक मॉडल में वे भी सहभागी हैं, जबकि भाजपा सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि वर्चस्व का एक हथियार है। सच है कि किसी भी फासीवाद या सर्वसत्तावाद का नाभिनाल-संबंध केंद्रीकृत पूँजी से होता है। भारतीय राजनीति पर एक दृष्टि नामक उनकी पुस्तक राजनीति पर अनेक प्रभावों के साथ एक देशज मानक प्रस्तुत करती है। ऐसी ही एक विवेचनात्मक पुस्तक किसान आंदोलन : दशा और दिशा है, जिसमें वे कहते हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से खेती-किसानी तबाह हो चुकी है, जिसकी परिणति किसानों की आत्महत्याओं और भूमिहीनों के उठ्ठा मजदूर बनने के रूप में हुई है। इक्कीसवीं सदी का प्रारंभ ही अति-अमीरीकरण और अति-दरिद्रीकरण से हुआ है। इसके अलावा भारतीय युवाओं का अनुपयोगीकरण भी हुआ है, जबकि उसे निर्माता वर्ग होना चाहिए था।
जैसे लोहिया कुजात गांधीवादी हुए थे, वैसे किशन जी कुजात लोहियावादी की हदों को भी पार कर गए थे। उनका वैचारिक क्षितिज विस्तृत होता गया और पूर्ववर्ती खाँचा पीछे रह गया। वे अमानवीय विश्व-व्यवस्था और उससे उत्पन्न भारतीय संकटों का देशीय पाठ कर रहे थे। वादों से परे मूल और मौलिक वैचारिकी में आवाजाही कर रहे थे। किसी भी नवाचारी चिंतक की यही अंतःक्रिया होती है—चरैवेति, चरैवेति। भारत की सभी विचार-सरिणियों को इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ा है और आगे भी गुजरना होगा। यही अनिवार्य सभ्यतागत प्रक्रिया है। जैसे लोकतांत्रिक समाजवाद के आरंभकर्ताओं में नरेंद्र देव, राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के प्रयोग हैं, वैसे ही उसमें नवाचार करने वालों में किशन पटनायक, केशवराव जाधव और सच्चिदानंद सिन्हा हैं। उनका सक्रिय वैचारिक अवदान स्मरणीय है।
उन्हें याद करते हुए भोपाल गैस संहार पर लिखित उनकी लंबी कविता का अंश प्रस्तुत है, जो उनके भविष्यदर्शी चिंतन की बानगी है—
आज एक हत्या होगी / होगी निःसंदेह,
घोषणाएँ प्रसारित हो चुकी हैं।
कारनामों पर हस्ताक्षर,
एक साथ कई देशों का हुआ है।
चारों ओर सर्वसम्मति है,
दुनिया में रहने वाले अब अगुवाई कर रहे हैं।
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हमारे महाद्वीप की यह प्रथम हत्या होगी,
जिसमें खून नहीं गिरेगा
और हत्या होगी बिल्कुल स्पष्ट।
एक महायांत्रिक हत्या,
चारों ओर रहेगा सफेद।
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