प्रभाष जोशी की पत्रकारिता की भाषा – परिचय दास

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Prabhash Joshi

Parichay Das

प्रभाष जोशी की पत्रकारिता का सबसे विलक्षण पक्ष उनकी भाषा है। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को केवल समाचारों की भाषा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे विचार, संवेदना, संस्कृति और लोक-स्मृति का जीवंत माध्यम बना दिया। उनकी लेखनी में एक साथ गाँव की मिट्टी की गंध, भारतीय परंपरा की ऊष्मा, लोकतंत्र की बेचैनी और एक सजग नागरिक की नैतिक चिंता उपस्थित रहती है। वे समाचार को सूचना भर नहीं मानते थे, बल्कि उसके भीतर छिपे मानवीय अर्थों को खोजने का प्रयास करते थे। इसलिए उनकी भाषा पाठक को केवल घटना नहीं बताती, उसके अंतःकरण को भी संबोधित करती है।

उन्होंने हिंदी को कृत्रिम संस्कृतनिष्ठता या अनावश्यक अंग्रेज़ी के सहारे नहीं चलाया। उनकी भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और बोलचाल की ऊर्जा से भरपूर थी। उसमें मालवा की मिट्टी की मिठास भी थी और कबीर की फटकार भी। वे लोक-जीवन के मुहावरों, कहावतों, धार्मिक आख्यानों, महाभारत, रामायण, संत साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक स्मृतियों का ऐसा सर्जनात्मक उपयोग करते थे कि उनका लेख एक साथ समकालीन भी लगता था और कालातीत भी। भाषा उनके यहाँ सजावट का माध्यम नहीं, अनुभव की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी।

प्रभाष जोशी के वाक्य पाठक के साथ संवाद करते हैं। वे उपदेश नहीं देते, बल्कि सोचने के लिए विवश करते हैं। उनकी शैली में प्रश्न भी हैं, आत्मालोचन भी, व्यंग्य भी और करुणा भी। सत्ता की आलोचना करते समय उनकी भाषा तल्ख़ होती है, किंतु उसमें कटुता नहीं होती। वे व्यक्ति से अधिक प्रवृत्तियों पर प्रहार करते हैं। इसीलिए उनकी पत्रकारिता में नैतिक साहस दिखाई देता है, व्यक्तिगत दुर्भावना नहीं।

उनकी भाषा का एक बड़ा गुण उसका ललित स्वरूप है। संपादकीय लिखते हुए भी वे साहित्यिक गरिमा बनाए रखते हैं। उनके लेखों में बिंब, प्रतीक, प्रसंग और सांस्कृतिक संकेत सहज रूप से आते हैं। क्रिकेट पर लिखते हैं तो वह केवल खेल का विवरण नहीं रहता, बल्कि भारतीय समाज, मनुष्य के स्वभाव और जीवन-दर्शन का आख्यान बन जाता है। राजनीति पर लिखते हैं तो उसमें लोकतंत्र की आत्मा बोलती हुई प्रतीत होती है।

प्रभाष जोशी की पत्रकारिता में भाषा का नैतिक पक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे शब्दों को केवल प्रभाव पैदा करने के लिए नहीं चुनते थे, बल्कि सत्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करने के लिए उनका उपयोग करते थे। उनके लिए भाषा जनविश्वास की धरोहर थी। इसलिए वे शब्दों की गरिमा और अर्थ की पवित्रता के प्रति सदैव सजग रहे। उनकी लेखनी में भाषा और चरित्र का गहरा संबंध दिखाई देता है।

आज जब पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा तात्कालिक उत्तेजना, शोर और बाज़ार की भाषा में उलझता जा रहा है, तब प्रभाष जोशी की भाषा हमें याद दिलाती है कि पत्रकारिता का सबसे बड़ा बल विश्वसनीय शब्द होता है। उनकी शैली यह प्रमाणित करती है कि सरल भाषा भी गहन हो सकती है, लोकभाषा भी बौद्धिक हो सकती है और पत्रकारिता भी साहित्यिक ऊँचाई प्राप्त कर सकती है। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में प्रभाष जोशी की भाषा इसलिए अद्वितीय है कि उसमें विचार की गंभीरता, लोक का आत्मविश्वास, साहित्य की लालित्य-चेतना और लोकतंत्र की नैतिक बेचैनी एक साथ स्पंदित होती है।

प्रभाष जोशी की पत्रकारिता की भाषा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे कठिन राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रश्नों को भी इतनी सहजता से प्रस्तुत करते थे कि सामान्य पाठक बिना किसी कठिनाई के उन्हें समझ सके। उनकी भाषा में न कृत्रिमता थी, न विद्वत्ता का प्रदर्शन। वह जीवन से निकली हुई भाषा थी, जिसमें गाँव की मिट्टी की गंध, लोकजीवन का अनुभव और भारतीय संस्कृति की स्मृतियाँ एक साथ उपस्थित रहती थीं।

उदाहरण के लिए, यदि उन्हें सत्ता के अहंकार पर लिखना होता, तो वे यह नहीं लिखते कि “राजनीतिक शक्ति का केंद्रीकरण शासक वर्ग में जनविमुखता उत्पन्न करता है।” इसके स्थान पर वे लिखते, “सत्ता का मद ऐसा होता है कि आदमी अपने ही लोगों को पराया समझने लगता है।” पहला वाक्य शोध-पत्र का प्रतीत होता है, जबकि दूसरा सीधे पाठक के अनुभव से जुड़ जाता है। यही उनकी भाषा की शक्ति थी।

वे भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों का अत्यंत सर्जनात्मक उपयोग करते थे। यदि लोकतंत्र के अपमान की चर्चा करनी होती, तो महाभारत का स्मरण कर लिखते कि “जब लोकतंत्र द्रौपदी की तरह सभा में खड़ा कर दिया जाए, तब भीष्मों का मौन सबसे बड़ा अपराध होता है।” इस एक वाक्य में समकालीन राजनीति, भारतीय सांस्कृतिक स्मृति और नैतिक प्रश्न तीनों एक साथ उपस्थित हो जाते हैं।

उनकी शैली सदैव संवादात्मक रहती थी। वे पाठक पर विचार नहीं थोपते थे, बल्कि उसके साथ मिलकर प्रश्न उठाते थे। उदाहरण के लिए, वे लिख सकते थे, “हम पूछते हैं कि जनता ने जिस भरोसे से वोट दिया था, उसका हिसाब कौन देगा?” इस प्रकार पाठक स्वयं उस प्रश्न का सहभागी बन जाता है।

प्रभाष जोशी की भाषा में नैतिक आग्रह भी स्पष्ट दिखाई देता है। वे मानते थे कि पत्रकार का दायित्व केवल सूचना देना नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उत्तरदायी रहना भी है। इसलिए वे लिखते थे कि “पत्रकार का पहला धर्म सत्ता से नहीं, सत्य से होना चाहिए।” यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि पत्रकारिता की आचार-संहिता का सार है।

क्रिकेट पर लिखते समय भी उनकी भाषा केवल खेल का विवरण नहीं देती थी। यदि किसी बल्लेबाज़ ने धैर्यपूर्ण पारी खेली, तो वे यह नहीं लिखते कि उसने केवल सौ रन बनाए। वे कहते कि “उसने धैर्य की एक पाठशाला खड़ी कर दी।” इस प्रकार खेल जीवन का रूपक बन जाता था और पाठक आँकड़ों से आगे बढ़कर उसके मानवीय अर्थ को समझने लगता था।

महँगाई जैसे आर्थिक विषय पर भी उनकी भाषा संवेदनशील बनी रहती थी। सामान्य समाचार लिखता कि “महँगाई दर में वृद्धि हुई है।” प्रभाष जोशी लिखते, “रसोई की आग आज फिर थोड़ी महँगी हो गई है; आँकड़ों में यह केवल प्रतिशत है, लेकिन घरों में यह चूल्हे की चिंता है।” यह भाषा आँकड़ों को मनुष्य के जीवन से जोड़ देती है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि प्रभाष जोशी की पत्रकारिता की भाषा सूचना को अनुभव में, विचार को संवेदना में और समाचार को सामाजिक चेतना में बदल देती थी। यही कारण है कि उनकी भाषा केवल पत्रकारिता की भाषा नहीं रही, बल्कि हिंदी गद्य की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति बन गई। उसमें लोक की सहजता, साहित्य की लालित्य-चेतना, संस्कृति की गहराई और लोकतांत्रिक नैतिकता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

प्रभाष जोशी की पत्रकारिता की भाषा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी आत्मीयता है। वे पाठक से ऊपर खड़े होकर नहीं बोलते, बल्कि उसके साथ बैठकर बातचीत करते हैं। यदि किसी सरकार की जनविरोधी नीति की आलोचना करनी होती, तो वे यह नहीं लिखते कि “शासन की नीतियाँ जनाकांक्षाओं के प्रतिकूल हैं।” इसके स्थान पर वे लिखते, “सरकार को यह याद रखना चाहिए कि जनता पाँच साल के लिए अपनी आँखें बंद नहीं करती।” इस प्रकार साधारण-सा वाक्य भी गहरी लोकतांत्रिक चेतना का वाहक बन जाता है।

उनकी भाषा में लोकजीवन के मुहावरे और कहावतें सहज रूप से आती हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई नेता चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करे और बाद में उन्हें भूल जाए, तो वे लिख सकते थे, “चुनाव बीतते ही वादों की गठरी फिर उसी कोने में रख दी गई, जहाँ पिछली बार रखी गई थी।” यह वाक्य किसी राजनीतिक विश्लेषण से अधिक प्रभावशाली प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें लोक-अनुभव की सहजता है।

प्रभाष जोशी भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों का अत्यंत सार्थक उपयोग करते थे। यदि लोकतंत्र में नैतिक पतन की चर्चा करनी होती, तो वे लिखते, “जब द्रौपदी की तरह लोकतंत्र अपमानित हो रहा हो, तब भीष्मों का मौन सबसे बड़ा अपराध बन जाता है।” यहाँ महाभारत का प्रसंग केवल अलंकरण नहीं है, बल्कि वर्तमान राजनीति की नैतिक व्याख्या बन जाता है।

उनकी भाषा में व्यंग्य तीखा होता था, पर कटु नहीं। उदाहरण के लिए, यदि कोई मंत्री अपनी असफलता छिपाने के लिए लगातार नए बहाने बनाए, तो वे लिख सकते थे, “गलती किसी की नहीं थी, बस हर बार सच ही देर से पहुँचा।” यह व्यंग्य बिना किसी अपशब्द के व्यवस्था की विडंबना उजागर कर देता है।

वे समाचार को मानवीय संवेदना से जोड़ देते थे। यदि महँगाई पर लिखते, तो केवल आँकड़े नहीं देते। वे लिखते, “महँगाई का असली हिसाब अर्थशास्त्री की तालिका में नहीं, उस माँ की रसोई में मिलता है जो आज भी दाल में पानी बढ़ाकर परिवार का पेट भरती है।” यह भाषा पाठक के मन में सीधे उतर जाती है।

क्रिकेट पर उनकी लेखनी भी अद्भुत थी। यदि कोई बल्लेबाज़ धैर्यपूर्वक लंबी पारी खेलता, तो वे केवल यह नहीं लिखते कि उसने शतक बनाया। वे लिखते, “उसने रन कम बनाए, धैर्य अधिक रचा; जैसे हर गेंद से वह अपने भीतर के भय को हराता चला गया।” इस प्रकार खेल जीवन का रूपक बन जाता था।

उनकी भाषा में प्रश्न भी विचार जगाने के लिए होते थे। उदाहरण के लिए, किसी भ्रष्टाचार के प्रसंग पर वे लिख सकते थे, “क्या सचमुच जनता भूल जाती है, या हम ही उसे भूल जाने की आदत सिखा देते हैं?” ऐसा प्रश्न उत्तर देने के बजाय पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।

प्रभाष जोशी की पत्रकारिता की भाषा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि वह सूचना को संवेदना, तर्क को नैतिकता और घटना को जीवन-अनुभव में बदल देती थी। इसलिए उनके लेख पढ़ते समय लगता है कि कोई संपादक नहीं, बल्कि समाज का एक सजग, ईमानदार और अनुभवी नागरिक हमारे सामने बैठा है, जो शब्दों से नहीं, अपने विश्वास से संवाद कर रहा है।

प्रभाष जोशी की पत्रकारिता की भाषा का सबसे बड़ा गुण यह है कि उसमें विचार और जीवन अलग-अलग नहीं चलते। वे किसी सिद्धांत को सूखी भाषा में नहीं लिखते, बल्कि उसे ऐसे उदाहरणों के माध्यम से व्यक्त करते हैं कि पाठक स्वयं उसके अर्थ तक पहुँच जाए। उनकी भाषा में लोकजीवन, संस्कृति, राजनीति और नैतिकता एक-दूसरे में घुली हुई दिखाई देती है।

मान लीजिए किसी सरकार ने चुनाव से पहले किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया, लेकिन वर्षों बाद भी किसान संकट में है। साधारण पत्रकार लिखेगा, “सरकार अपने चुनावी वादों को पूरा करने में विफल रही।” प्रभाष जोशी की शैली में यह बात कुछ इस प्रकार व्यक्त हो सकती है, “फसल हर साल खेत में उगी, लेकिन वादे हर बार चुनावी मंच पर ही सूख गए।” यहाँ एक ही वाक्य में किसान का जीवन, राजनीति का छल और विडंबना तीनों आ जाते हैं।

यदि किसी अधिकारी की संवेदनहीनता पर लिखना हो, तो सामान्य भाषा होगी, “प्रशासन ने पीड़ितों की उपेक्षा की।” प्रभाष जोशी लिख सकते थे, “फाइलों में सब कुछ ठीक था, केवल आदमी गायब था।” यह छोटा-सा वाक्य पूरी नौकरशाही की मानसिकता पर टिप्पणी बन जाता है।

जब वे लोकतंत्र की चर्चा करते, तब भारतीय सांस्कृतिक स्मृतियों का सहारा लेते। उदाहरण के लिए, यदि संसद में स्वस्थ बहस के स्थान पर शोर-शराबा हो, तो वे लिख सकते थे, “सभा तो भर गई, पर संवाद कहीं रास्ते में ही छूट गया।” या “जब शब्द तलवार बन जाएँ, तब लोकतंत्र घायल होने लगता है।”

महँगाई पर वे केवल प्रतिशत नहीं बताते। वे लिख सकते थे, “रसोई में आज फिर दाल ने सब्ज़ी की जगह ले ली, क्योंकि बाज़ार ने जेब से पहले उम्मीद को हल्का कर दिया।” यह उदाहरण आँकड़ों से अधिक प्रभावशाली है, क्योंकि वह सीधे परिवार के जीवन से जुड़ता है।

यदि क्रिकेट में कोई खिलाड़ी कठिन परिस्थिति में टीम को बचा ले, तो सामान्य समाचार होगा, “उसने 120 रन बनाए और टीम को जीत दिलाई।” प्रभाष जोशी की शैली में यह बन सकता है, “वह बल्लेबाज़ रन नहीं बना रहा था, पूरी टीम का धैर्य क्रीज़ पर खड़ा था।” यहाँ खेल मनुष्य के चरित्र का रूपक बन जाता है।

यदि भ्रष्टाचार पर लिखना हो, तो वे लिख सकते थे, “रिश्वत की रकम छोटी थी, लेकिन ईमान की कीमत उससे भी छोटी निकली।” यह वाक्य केवल घटना का विवरण नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यबोध की आलोचना है।

यदि मीडिया की भूमिका पर प्रश्न उठाना हो, तो वे कह सकते थे, “जब अख़बार आईना छोड़कर मेकअप करने लगे, तब समाज अपना चेहरा कैसे देखेगा?” यह उदाहरण पत्रकारिता के दायित्व को अत्यंत सरल लेकिन गहरे रूप में व्यक्त करता है।

इसी प्रकार यदि जनता की चुप्पी पर लिखना हो, तो वे लिख सकते थे, “अन्याय की सबसे बड़ी ताकत अत्याचारी नहीं, दर्शकों का मौन होता है।” यह केवल टिप्पणी नहीं, नागरिक चेतना का आह्वान है।

यही कारण है कि प्रभाष जोशी की भाषा पढ़ने वाला केवल सूचना लेकर नहीं उठता, बल्कि सोचने लगता है। उनकी भाषा तथ्य को अनुभव में, समाचार को जीवन में और पत्रकारिता को नैतिक संवाद में बदल देती है। इसी विशिष्टता ने उन्हें हिंदी पत्रकारिता का अद्वितीय भाषाशिल्पी बनाया।


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