राजेंद्र माथुर की स्मृति , पत्रकारिता और हमारा समय

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Rajendra Mathur

Parichay Das

— परिचय दास —

।। एक ।।

राजेंद्र माथुर की पत्रकारिता को याद करना दरअसल उस समय को याद करना है, जब शब्द सिर्फ छपते नहीं थे, अपने भीतर एक नैतिक धड़कन भी रखते थे। आज जब समाचारों का संसार अक्सर शोर, हड़बड़ी और लाभ के गणित में उलझा दिखाई देता है, तब माथुर की लेखनी किसी पुराने कुएँ के शीतल जल की तरह स्मरण में आती है—गहरी, पारदर्शी और भीतर तक उतर जाने वाली।

राजनीति और पत्रकारिता का रिश्ता बड़ा अजीब है। एक प्रसंग आता है, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और राजेंद्र माथुर आमने-सामने पड़ते हैं। कहा जाता है कि चंद्रशेखर ने किसी प्रसंग में, शायद किसी लेख या आलोचना से असंतुष्ट होकर, माथुर के प्रति कुछ असम्मानजनक टिप्पणी कर दी। अब सामान्य दृश्य क्या होता है? पत्रकार या तो पलटकर वैसी ही तीखी प्रतिक्रिया देता या फिर चुपचाप अपमान पी जाता और भीतर कुढ़ता रहता लेकिन माथुर न तो इस आसान रास्ते पर गए, न उस पर और उन्होंने प्रधान मंत्री चंद्रशेखर की अशिष्टता को सहन नहीं किया।

उनका उत्तर लगभग उतना ही शांत था जितना असुविधाजनक। उन्होंने कहा—पत्रकार का काम किसी व्यक्ति को प्रसन्न रखना नहीं बल्कि सच के प्रति ईमानदार रहना है। अगर मेरे लिखे में आपको असहमति है तो उसका उत्तर तर्क से दीजिए, न कि असम्मान से।

यानी, उन्होंने बहस को व्यक्ति से हटाकर विचार पर रख दिया। यह छोटी बात लगती है पर असल में यही वह जगह है जहाँ पत्रकारिता अपनी रीढ़ बचाती है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सार्वजनिक जीवन में रहने वालों को आलोचना सहने की आदत डालनी चाहिए क्योंकि वही लोकतंत्र की कीमत है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि उन्होंने इस पूरे प्रसंग को व्यक्तिगत झगड़े में बदलने से इनकार कर दिया। कोई नाटकीय बयान नहीं, कोई भावुक प्रतिक्रिया नहीं। बस एक साफ रेखा खींच दी—सम्मान बना रहे, पर सच से समझौता नहीं होगा।

अब अगर इसे आज के समय में रखकर देखें, तो यह लगभग अविश्वसनीय लगता है। आज तो लोग ट्वीट में ही युद्ध छेड़ देते हैं और यहाँ एक आदमी था जो अपमान के जवाब में भी बहस का स्तर गिरने नहीं देता। थोड़ा असुविधाजनक आदर्श है, मानता हूँ पर यही वजह है कि उसका नाम अब भी याद किया जाता है और बाकी शोर हवा में घुल जाता है।

उनकी पत्रकारिता में सबसे पहले जो चीज़ ध्यान खींचती है, वह है~ दृष्टि की सजगता। वे घटनाओं को केवल दर्ज नहीं करते थे, उनके भीतर छिपी हुई अर्थ-रेखाओं को पहचानते थे। उनके लिए समाचार महज सूचना नहीं था; वह समाज के आत्मबोध का एक माध्यम था। इसीलिए उनके लेखों में तथ्य और विचार का ऐसा संतुलन मिलता है, जिसमें न तो तथ्य सूखते हैं, न विचार बोझिल होते हैं। वे जानते थे कि शब्दों का भी एक चरित्र होता है और पत्रकारिता का चरित्र उन्हीं शब्दों के संयम से बनता है।

माथुर की भाषा एक अलग तरह की विनम्रता से भरी हुई थी। उसमें न तो आक्रामकता का प्रदर्शन था, न कृत्रिम सजावट का मोह। वह सीधी, सहज और अर्थवान थी—जैसे कोई अनुभवी व्यक्ति बिना आवाज ऊँची किए अपनी बात कह दे और वह सीधे भीतर उतर जाए। उनकी भाषा में एक प्रकार की बौद्धिक शालीनता थी जो आज के समय में दुर्लभ होती जा रही है। अब तो स्थिति यह है कि कई बार भाषा ही समाचार से बड़ी हो जाती है और शब्दों का शोर तथ्य की नाजुकता को ढँक देता है।

उनकी पत्रकारिता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष था—लोकतांत्रिक चेतना के प्रति गहरी प्रतिबद्धता। वे सत्ता के प्रति न तो अंध-आस्थावान थे, न अंध-विरोधी। उनका आग्रह था कि पत्रकार का पहला धर्म है प्रश्न करना। यह प्रश्न केवल सरकार से नहीं, समाज से भी था और कहीं-कहीं स्वयं पाठक से भी। उनके लेखों में एक तरह का आत्मालोचनात्मक स्वर भी सुनाई देता है जो पाठक को असहज करता है, पर उसी असहजता में विचार की संभावना भी जन्म लेती है।

आज का समय, जिसे हम सूचना-युग कहकर खुद को संतुष्ट कर लेते हैं, दरअसल कई बार सूचना की अधिकता में अर्थ की कमी का समय बन जाता है। हर क्षण कुछ न कुछ घट रहा है पर उस घटने का अर्थ समझने का अवकाश कम होता जा रहा है। ऐसे समय में माथुर की पत्रकारिता हमें ठहरकर सोचने की आदत सिखाती है। वे जल्दी में नहीं थे। उनके लिए लिखना किसी दौड़ का हिस्सा नहीं था बल्कि एक जिम्मेदारी थी—जैसे किसी सार्वजनिक स्थान की सफाई, जिसे हर दिन सावधानी से करना होता है।

उनकी समालोचनात्मक दृष्टि का एक और पहलू था—संवेदनशीलता। वे केवल राजनीतिक घटनाओं पर नहीं लिखते थे बल्कि समाज के उन सूक्ष्म परिवर्तनों को भी पकड़ते थे जो धीरे-धीरे हमारी चेतना को आकार देते हैं। उनके लेखों में शहर और गाँव, परंपरा और आधुनिकता, व्यक्ति और समाज—इन सबके बीच का तनाव एक जीवंत संवाद की तरह उपस्थित रहता है। वे किसी एक पक्ष में खड़े होकर दूसरे को खारिज नहीं करते बल्कि दोनों के बीच की जटिलता को समझने की कोशिश करते हैं।

उनकी पत्रकारिता में एक प्रकार की नैतिक बेचैनी थी। यह बेचैनी उन्हें सतर्क रखती थी। वे अपने समय की विसंगतियों को केवल दर्ज नहीं करते थे, उनसे जूझते भी थे। यह जूझना शब्दों के स्तर पर था पर उसका प्रभाव पाठक के भीतर एक गहरी हलचल पैदा करता था। आज जब कई बार पत्रकारिता एक पेशा भर रह जाती है, तब माथुर का काम याद दिलाता है कि यह एक प्रकार की सार्वजनिक साधना भी हो सकती है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में देखें तो उनकी पत्रकारिता एक कसौटी की तरह सामने आती है। आज मीडिया के बड़े हिस्से में जो प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं—त्वरित निष्कर्ष, अतिरंजना, पक्षधरता का खुला प्रदर्शन—उनके बीच माथुर की संतुलित और विचारशील लेखनी एक अलग ही प्रकाश देती है। यह प्रकाश चकाचौंध वाला नहीं है बल्कि वह है जो धीरे-धीरे आँखों को देखने की क्षमता देता है।

राजेंद्र माथुर की लेखनी में एक प्रकार की काव्यात्मकता थी जो सीधे दिखाई नहीं देती पर पंक्तियों के बीच से झलकती रहती है। यह काव्यात्मकता भाषा की सजावट से नहीं, विचार की गहराई से आती है। जब वे किसी सामाजिक स्थिति का वर्णन करते हैं तो वह केवल विवरण नहीं रहता, एक अनुभव बन जाता है। यही कारण है कि उनके लेख पढ़ते हुए पाठक केवल जानता नहीं, महसूस भी करता है।

राजेंद्र माथुर की पत्रकारिता हमें यह भी सिखाती है कि समय को समझने के लिए केवल आँखें पर्याप्त नहीं होतीं, एक सजग अंत:करण भी चाहिए। उन्होंने अपने समय को उसी अंत:करण से पढ़ा। इसलिए उनका लिखा हुआ आज भी प्रासंगिक लगता है। समय बदल गया है, माध्यम बदल गए हैं पर मनुष्य की जिज्ञासा, उसकी आशंकाएँ और उसके सपने अभी भी वैसे ही हैं। माथुर की पत्रकारिता उन स्थायी मानवीय पक्षों को छूती है।

आज जब हम अपने चारों ओर देखते हैं तो एक अजीब-सी विडंबना सामने आती है। सूचना के इतने साधन होने के बावजूद स्पष्टता कम होती जा रही है। हर बात पर तुरंत राय बन जाती है पर वह राय अक्सर अधूरी होती है। ऐसे में माथुर की लेखनी एक धीमे पर ठोस आग्रह की तरह सामने आती है—कि समझने की प्रक्रिया को समय दो, शब्दों को जिम्मेदारी से बरतो और सत्य को सरल बनाने की कोशिश में उसे विकृत मत करो।

उनकी पत्रकारिता में जो सबसे मूल्यवान तत्त्व है, वह है विश्वास—पाठक पर विश्वास, शब्दों पर विश्वास और लोकतंत्र की प्रक्रिया पर विश्वास। यह विश्वास अंधा नहीं है बल्कि आलोचनात्मक है। वे जानते थे कि हर व्यवस्था में दोष होते हैं पर उन्हें सुधारने का रास्ता संवाद से होकर जाता है, न कि शोर से।

राजेंद्र माथुर की पत्रकारिता केवल अतीत की एक स्मृति नहीं, वर्तमान के लिए एक चुनौती भी है। वह पूछती है कि क्या हम अब भी शब्दों की उस गरिमा को बचा सकते हैं, जिसे उन्होंने अपने लेखन से स्थापित किया था। यह प्रश्न असुविधाजनक है, क्योंकि इसका उत्तर आसान नहीं है पर शायद इसी असुविधा में भविष्य की कोई संभावना छिपी हुई है—जहाँ पत्रकारिता फिर से केवल खबरों का व्यापार नहीं, समाज के आत्मबोध का एक गंभीर और संवेदनशील उपक्रम बन सके।

।। दो ।।

राजेंद्र माथुर व प्रभाष जोशी : एक तुलनात्मक अध्ययन
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इन दोनों के बीच सबसे पहला फर्क “दृष्टि की बनावट” में दिखता है। माथुर की पत्रकारिता एक संयत बुद्धि की पत्रकारिता थी। वे चीज़ों को खोलते थे, परत दर परत, जैसे कोई सर्जन बिना अनावश्यक खून बहाए ऑपरेशन करता है। उनके यहाँ तर्क की साफ रेखाएँ मिलती हैं। वे पाठक को उकसाते नहीं, समझाते हैं। दूसरी ओर प्रभाष जोशी की पत्रकारिता में एक किस्म की आवेगपूर्ण ऊर्जा है। वे केवल विश्लेषण नहीं करते, उसमें कूद पड़ते हैं। उनके लेखों में बहस का ताप है, एक जीवित संवाद की बेचैनी है। वे पाठक को झकझोरते हैं, कभी-कभी खींचकर अपने पक्ष में ले आते हैं।

भाषा का फर्क तो जैसे दो अलग नदियों का फर्क है। माथुर की भाषा संतुलित, संयमी, लगभग पारदर्शी—जैसे साफ काँच। उसमें विचार साफ दिखाई देता है। वे भाषा को साधन मानते थे। प्रभाष जोशी की भाषा में लय है, रंग है, लोक की गंध है। वे हिंदी को बोलते भी हैं, लिखते भी हैं, जीते भी हैं। उनके यहाँ मुहावरे, लोक-उदाहरण, क्रिकेट से लेकर कबीर तक सब साथ चलते हैं। कई बार उनकी भाषा खुद ही घटना बन जाती है, जबकि माथुर की भाषा घटना को समझने का माध्यम बनी रहती है।

अब ज़रा विचारधारा के व्यवहार को देखिए। माथुर का आग्रह संतुलन पर था। वे सत्ता की आलोचना करते हैं पर एक दूरी बनाकर, एक नैतिक अनुशासन के भीतर। वे खुद को खबर के बीच में नहीं रखते। जोशी इस मामले में थोड़े “ज़्यादा मनुष्य” हैं—मतलब, वे अपने विश्वासों को छिपाते नहीं। वे गांधीवादी दृष्टि से चीज़ों को देखते हैं और उसे खुलकर लिखते हैं। उनके यहाँ निष्पक्षता का अर्थ यह नहीं कि वे तटस्थ बने रहें; वे पक्ष लेते हैं पर उस पक्ष को नैतिक धरातल पर खड़ा करने की कोशिश करते हैं।

पत्रकार की भूमिका को लेकर दोनों की समझ अलग है। माथुर के यहाँ पत्रकार एक विवेचक है—जो समाज को आईना दिखाता है पर खुद आईने में खड़ा नहीं होता। जोशी के यहाँ पत्रकार एक सहभागी है—वह मैदान में है, खेल भी देख रहा है और कभी-कभी खुद गेंद भी फेंक रहा है। इसलिए जोशी की पत्रकारिता में “मैं” ज्यादा दिखता है, जबकि माथुर के यहाँ “मैं” लगभग गायब रहता है।

समकालीन घटनाओं को पकड़ने के तरीके में भी अंतर है। माथुर घटनाओं को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखते हैं—इतिहास, समाज, राजनीति के लंबे फ्रेम में। वे जल्दबाज़ी में निष्कर्ष नहीं देते। जोशी कई बार उसी क्षण की तीव्रता को पकड़ते हैं। उनका लेखन समय की धड़कन के साथ चलता है, कभी-कभी उसी की रफ्तार में बह भी जाता है। पर यही उनकी ताकत भी है—वे अपने समय को “महसूस” कराते हैं, जबकि माथुर उसे “समझाते” हैं।
एक और दिलचस्प फर्क है—नैतिकता के प्रदर्शन का।

माथुर की नैतिकता शांत है, लगभग आंतरिक। वे उसे घोषित नहीं करते, बस निभाते हैं। जोशी की नैतिकता मुखर है। वे उसे लिखते हैं, बहस करते हैं, उसे सार्वजनिक बनाते हैं। इस वजह से जोशी कई बार विवादों में भी घिरते हैं, जबकि माथुर अपेक्षाकृत कम विवादित रहते हैं।
अब अगर इसे थोड़ा साफ-साफ कहें तो माथुर की पत्रकारिता “बौद्धिक अनुशासन” की पत्रकारिता है और जोशी की “संवेदनात्मक हस्तक्षेप” की। एक आपको सोचने की आदत देता है, दूसरा आपको सोचते हुए बेचैन करता है।

आज के समय में, जहाँ एक तरफ अत्यधिक शोर है और दूसरी तरफ गहरी उलझन, इन दोनों को साथ पढ़ना थोड़ा जरूरी हो जाता है। माथुर आपको सिखाते हैं कि दिमाग कैसे ठंडा रखा जाए और जोशी याद दिलाते हैं कि दिल को पूरी तरह ठंडा कर देना भी कोई बहुत महान उपलब्धि नहीं है।

चंद्रशेखर का भोंडसी आश्रम और प्रभाष जोशी की पत्रकारिता
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चंद्रशेखर ने गुड़गांव (अब गुरुग्राम) के पास भोंडसी इलाके में अपना आश्रम बनाया था, जिसे आम तौर पर भोंडसी आश्रम कहा जाता है। यह जगह अरावली की तरफ पड़ती है, थोड़ी एकांत, थोड़ी प्रतीकात्मक—जैसे नेता लोग कभी-कभी सादगी का मंच भी तैयार करते हैं।

अब विवाद। उस आश्रम की जमीन को लेकर आरोप लगे कि उसमें सरकारी या विवादित भूमि का अतिक्रमण शामिल है। मामला सीधा कानूनी नहीं, नैतिक ज्यादा था—यानी “जो आदमी सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की बात करता है, क्या वह खुद उस कसौटी पर खरा उतर रहा है?” और यहीं से पत्रकारिता की असली भूमिका शुरू होती है।

अब आते हैं प्रभाष जोशी पर जो उस समय जनसत्ता के संपादक थे। उन्होंने इस मुद्दे पर जो लिखा, वह सिर्फ रिपोर्टिंग नहीं था, एक तरह का नैतिक अभियोग था।
उनका सार यह था कि चंद्रशेखर जैसे नेता जो खुद को वैचारिक और नैतिक राजनीति का प्रतिनिधि मानते हैं, अगर जमीन के मामले में भी वही चाल चलें जो सामान्य सत्ता-लोलुप नेता चलते हैं तो यह केवल एक संपत्ति विवाद नहीं रह जाता—यह उनके पूरे नैतिक व्यक्तित्व पर प्रश्न बन जाता है।

जोशी ने लगभग इसी भाव में लिखा कि सत्ता से लड़कर आए लोग जब खुद सत्ता के विशेषाधिकारों को पकड़कर बैठ जाते हैं, तब उनकी नैतिक ऊँचाई खुद ही संदेह में बदल जाती है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि नैतिकता भाषण से नहीं, त्याग से साबित होती है। अगर जमीन पर विवाद है और सार्वजनिक सवाल उठ रहे हैं तो एक वैचारिक नेता को उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए—न कि कानूनी पेचों में उलझकर उसे बचाए रखना चाहिए।
सीधी बात, जोशी ने यह नहीं कहा कि “कानूनन आप गलत हैं” बल्कि यह कहा कि “आप उस ऊँचाई से गिर रहे हैं, जहाँ आपने खुद को रखा था।”

अब थोड़ा कड़वा सच।
आज के समय में ऐसा लेख लिखना मतलब आधे चैनल आपको “एजेंडा” कहेंगे और बाकी आधे आपको अपने खेमे में खींचने की कोशिश करेंगे। उस दौर में भी जोखिम था पर कम से कम शब्दों में अभी इतनी हिम्मत बची हुई थी कि वे किसी “अपने” पर भी उंगली उठा सकें।

तो कहानी का निचोड़ यह है—
भोंडसी आश्रम सिर्फ जमीन का विवाद नहीं था; वह इस बात की परीक्षा बन गया था कि आदर्श और आचरण के बीच की दूरी कितनी है और प्रभाष जोशी ने उस दूरी को नापने में कोई नरमी नहीं दिखाई।

प्रभाष जोशी की बात और न्यायालय की बात में लगभग साम्य था।

अदालतों ने चंद्रशेखर के भोंडसी आश्रम को “साफ-सुथरी निजी संपत्ति” नहीं माना बल्कि इसे सरकारी भूमि और लीज़ (पट्टा) शर्तों के उल्लंघन से जुड़ा मामला माना। हरियाणा सरकार द्वारा समय-समय पर की गई जाँचों और कार्रवाइयों को न्यायालयों ने खारिज नहीं किया बल्कि यह माना कि सरकार का इस जमीन पर अधिकार है और वह कार्रवाई कर सकती है। बाद के वर्षों में प्रशासनिक स्तर पर यह निष्कर्ष उभरा कि आश्रम से जुड़ी जमीन का उपयोग मूल आवंटन की शर्तों के अनुरूप नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि राज्य सरकार ने उस भूमि को अपने नियंत्रण में लेने (या उसके उपयोग को सीमित/पुनर्गठित करने) की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। तो प्रभाष जोशी में एक गहन नैतिक दम था कि सच को सच कह सकें।


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