कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया भारत के एक महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी और समाजवादी राजनेता थे। उन्हें मुख्य रूप से चंबल क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष छेड़ने और आजादी के बाद किसानों व मजलूमों की आवाज बुलंद करने के लिए जाना जाता है। क्रांतिकारी साथी और देश के बड़े नेता उन्हें आदर से “कमांडर साहब” कहकर पुकारते थे। “कमांडर” (यह नाम उन्हें पहली बार आचार्य नरेंद्र देव ने दिया था, जिसके बाद डॉ. राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण भी उन्हें इसी नाम से बुलाने लगे)। कमांडर साहब की पत्नी का नाम सरला भदौरिया था वे भी एक प्रखर क्रांतिकारी और सांसद रहीं।
कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों से बेहद प्रभावित थे। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ एक अलग और आक्रामक रणनीति अपनाई। उन्होंने चंबल के बीहड़ों और आस-पास के क्षेत्रों को केंद्र बनाकर ‘लाल सेना’ नामक एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन का गठन किया। इस सेना के जरिए उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की नाक में दम कर दिया। उन्होंने चंबल क्षेत्र में सरकारी डाक, तार और रेलवे जैसी संचार व्यवस्थाओं को पूरी तरह ठप कर दिया। जब वे पकड़े गए, तो ब्रिटिश अदालत ने उन्हें 44 साल की कड़ी कैद की सजा सुनाई। उन्हें पैरों में भारी बेड़ियां पहनाकर अदालत लाया जाता था, लेकिन उनका हौसला कभी कम नहीं हुआ।
आजादी के बाद कमांडर साहब देश के प्रमुख समाजवादी नेताओं में गिने जाने लगे। उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर सोशलिस्ट पार्टी को मजबूत किया और किसानों व ग्रामीणों के अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष किया। वे उत्तर प्रदेश की इटावा लोकसभा सीट से तीन बार (1957, 1967 और 1977 में) सांसद चुने गए। संसद में भी उनका तेवर हमेशा बागी और जनता के पक्ष में रहता था।
1975 में जब इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल लगाया, तो कमांडर साहब ने इसका कड़ा विरोध किया। इसके परिणामस्वरूप उन्हें, उनकी पत्नी सरला भदौरिया और उनके बेटे सुधीन्द्र भदौरिया तीनों को 19 महीने जेल में काटने पड़े।
अपने पूरे जीवनकाल में (आजादी के पहले और बाद के आंदोलनों को मिलाकर) वे 52 बार जेल गए।
संसद के भीतर और बाहर वे हमेशा जनहित के मुद्दे उठाते रहे। 1970 के दशक में इटावा के बकेवर कस्बे में पुलिसिया उत्पीड़न के खिलाफ उन्होंने एक ऐतिहासिक आंदोलन चलाया, जिसे ‘बकेवर कांड’ के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा उन्होंने इटावा और चंबल क्षेत्र में शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने और आवागमन के लिए पुलों के निर्माण के लिए लंबी लड़ाइयां लड़ीं।
उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों और समाजवादी आंदोलन के इतिहास को कलमबद्ध भी किया:
नींव के पत्थर (दो खंड): समाजवादी आंदोलन पर आधारित पुस्तक।
चंबल के महानायक: उनकी आत्मकथा/जीवनी (नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित), जो चंबल के स्वतंत्रता संग्राम और उस दौर के इतिहास का एक अहम दस्तावेज है।
कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया एक ऐसे विरले नेता थे, जिन्होंने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। चाहे अंग्रेजी हुकूमत रही हो या आजाद भारत की सरकारें, जनता के हक के लिए वे कभी झुकने को तैयार नहीं हुए। चंबल और इटावा की धरती पर आज भी उन्हें एक लोकनायक के रूप में याद किया जाता है।
कमांडर साहेब की पुण्यतिथि पर शत शत नमन!
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