पिछले दस- बारह वर्षों से ‘ संविदा ‘ और ‘अतिथि शिक्षक’ जैसी शब्दावली बहुप्रचारित हो गई है । कंपनियों द्वारा कर्मचारियों की सप्लाई का भी तंत्र विकसित हो गया है । ऐसा इसलिए किया गया कि कर्मचारियों और शिक्षकों को न महंगाई भत्ता देना पड़े और न वार्षिक वृद्धि।
हर सरकार आती है और ज़ोर ज़ोर से सभाओं में चिल्लाती है कि बेरोजगारी दूर करेंगे, लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसी सरकारें न सृजित- स्वीकृत पदों को विज्ञापित करती है, न भर्ती है और न स्थायी नियुक्ति करती है । उल्टे वह इस कोशिश में लगी रहती है कि सृजित- स्वीकृत पदों को या तो ख़त्म कर दिया जाए या कम कर दिया जाए ।
संविदा और अतिथि शिक्षकों की बहाली में भी लूट मची है । बिना पैसे और पैरवी के इस नौकरी का भी ठिकाना नहीं । कुलपति हों या और कोई, बिना टके का कुछ नहीं हो रहा। जो पीढ़ी इस तरह से विकसित हो रही है, उससे बेहतरी की उम्मीद कोई क्यों करे?
युवा पीढ़ी के लिए के लिए उसकी अगली पीढ़ी ने क्या किया? उसके सामने एक ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी गई जो आपाद मस्तक भ्रष्ट है। युवा आज अगर ग़ुस्से और फ़्रस्ट्रेशन में हैं तो उसके अपराधी वे हैं जो सत्ता चला रहे हैं । युवा क्या देख नहीं रहे कि जिसके पास दिखाने वाली नहीं, छुपाने वाली डिग्री है, वह सबसे बड़े उच्च पद पर बैठा है? क्या यह युग का विपर्यय नहीं है या करुण असंगति नहीं है? इसका ख़ामियाज़ा कौन भोगेगा?
युवाओं के सामने एक ऐसी ही दुनिया है जो भटकाती भी है, भरमाती भी है, लहकाती और लुभाती भी है। लेकिन अंततः फ्रेस्टेट करती है। रीलों से मनोरंजन संभव है, लेकिन न पेट भरती है और न दैनिक जीवन की जरूरतें पूरी करती हैं । युवाओं के लिए व्यवस्था में स्पेस घटता जा रहा है ।
युवाओं के सामने फ़र्ज़ी मुद्दे पेश कर दिए जाते हैं और वे उसमें उलझने लगते हैं । वर्जिन गाय पूजनीय हैं या चौदह वर्ष बाद गौ हत्या वैद्य है या अपने – अपने घरों में गौ हत्या कर मांस का सेवन कर सकते हैं जैसे विषयों पर बहसें करना हमारा स्वभाव हो चला है । सच्चाई यह है कि गाय पर बात करने वाले ज़्यादातर नेताओं के पास गाय नहीं है, न उसने गोबर उठाया है, न गौ-मूत्र को काछा है । हाँ, गाय को राजनीति का मुद्दा ज़रूर बनाया है । टेलिविज़न पर बैठ कर देशी गाय माता है और जर्सी गाय मिथुन है। मिथुन का भक्षण सही है। गजब ग़ज़ब की बहसें चलती हैं ।
युवा पंखे से लटक कर या ज़हर खाकर जान दे रहे हैं, यह मुद्दा नहीं है । यह भी मुद्दा नहीं है कि विकसित अर्थव्यवस्था में कोई औरत बैल की जगह बैल बन कर हल खींच रही है तो क्यों? देश की जीडीपी कितनी है या विश्व अर्थव्यवस्था में वह कितने पायदान पर है, यह महत्वपूर्ण नहीं है । महत्वपूर्ण यह है कि देश के नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं भी मिल पा रही हैं या नहीं? युवाओं को क्या अंधा और बहरा समझ रखा है।
कॉलजियम के आधार पर चुने गए जज जब ऐसे युवाओं को जो छोटे- मोटे रोज़गार कर रहे हैं, कॉकरोच और परजीवी कह कर पुकारते हैं, तब युवा भड़के भी नहीं अगर वह तब भी नहीं भड़कता तो जवानी किस काम की? इस सिस्टम ने युवाओं को तुच्छ समझ रखा है। दो टके की नौकरी जज को ख़ैरात में क्या मिल गई, वह अहंकार से ऐंठना लगता है।
यह सच है कि युवाओं के सामने एक ऐसी दुनिया बिछी है जो अंध कूप की तरह है, लेकिन इस अंधे कुएँ में रौशनी झूठ से लिपटा पचहत्तर वर्षीय विवेकहीन , चंदनटीका धारी शख्स क़तई नहीं करेगा । युग के युवा ही करेंगे । हरिवंश राय बच्चन ने लिखा था- युग के युवा/ मत देख दाएँ,/और बाएँ, और पीछे,/झाँक मत बगलें,/न अपनी आँख कर नीचे;/अगर कुछ देखना है,/देख अपने वे/वृषभ कंधे/जिन्हें देता निमंत्रण/सामने तेरे पड़ा/ युग का जुआ,/ युग के युवा! तुझको अगर कुछ देखना है,/ देख दुर्गम और/ गहरी/ घाटियाँ/जिनमें करोड़ों संकटों के/बीच में फँसता, /निकलता/यह शकट/बढ़ता हुआ/ पहुँचा यहाँ है।
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