एक मर्यादा पुरुषोत्तम दूसरे लीला पुरुषोत्तम । दोनों का जीवन अप्रत्याशित घटनाओं से भरा हुआ । दोनों को दर दर भटकना पड़ा। एक को लंबे समय तक पत्नी का वियोग सहना पड़ा तो दूसरे को प्रेमिका का। सुख दोनों के हाथों में आ आ कर फिसलता रहा। तुलसीदास के शब्दों में कहूं तो ’बिधिहू न लिखी कछु भाल भलाई ’ । नियति में इन दोनों के माथे पर सुख का एक वाक्य तक नहीं लिखा।
राम और कृष्ण में मर्यादा का तात्विक भेद है। राम कभी मर्यादा का त्याग नही करते उनके लिए नियम और नीति का बहुत महत्व है। कृष्ण को विजय चाहिए इसके लिए वे झूठ तक बोल देते हैं। राम के लिए साध्य और साधन की पवित्रता सर्वोच्च है। कृष्ण के लिए अपनों का हित सर्वोच्च है, चाहे जो करना पड़े। राम अपने वचनों से कभी नहीं फिरते कृष्ण अपने वचन भंग कर देते हैं । उन्होंने प्रतिज्ञा की थी महाभारत में शस्त्र नहीं उठाएंगे पर अर्जुन को बचाने के लिए भीष्म पितामह की ओर रथ का पहिया लेकर दौड़ पड़े। द्रोणाचार्य को मारने के लिए युधिष्ठिर के मुंह से झूठ बुलवा दिया “अश्वत्थामा हतः इति नरो वा कुंजरो वा “। उन्होंने छल का सहारा लेकर अर्जुन से जयद्रथ और कर्ण की हत्या करवाई। जब तक नियम कृष्ण के हित से चलता है वह नियम का पालन करते हैं जैसे ही स्थिति उनके विपरीत होती हैं वह नियम और मर्यादा दोनों तोड़ देते हैं । कृष्ण यथार्थ इसलिए हैं क्योंकि वे बहुत गहराई से मानते हैं कि जब जीवन रहेगा तभी आदर्श की बात होगी । वनवास के आरंभ में वे कुंती और पांडवों को लाक्षागृह से बचाते हैं पर उनकी जगह एक स्त्री और पांच अनजान निर्दोष व्यक्तियों को जल जाने देते हैं । वे लीला पुरुषोत्तम हैं उनकी लीला का कोई ओर छोर नहीं है। विवाह से पहले कर्ण के जन्म की जो गुप्त बात कुंती युधिष्ठिर और अर्जुन से नही बता पाई उसे सहजता से कृष्ण को बता दिया। सोचता हूं क्यों ?
बेबीलोन के सम्राट हम्बुरावि ने 1750 ईसा पूर्व में दुनिया का पहला व्यवस्थित कानून बनाया । हम्बुरावी संहिता का महत्वपूर्ण आधार है टिट फॉर टैट। जैसे को तैसा । यानी अगर आप समझते हैं कि आप मुझसे चालाक हैं, तो आगे से अपना ध्यान रखिएगा। कृष्ण इस संहिता से हजारों वर्ष पहले इस सिद्धांत का प्रमाण दे चुके थे। वे महाभारत युद्ध से पहले धृतराष्ट्र की सभा में पांडवों का संधि प्रस्ताव लेकर खड़े हुए। जब तक सभा शांत है कृष्ण मैत्री की बात करते हैं । जैसे ही दुर्योधन उग्र हुआ कृष्ण अपना विराट रूप दिखाते हैं ।दिनकर ने लिखा –
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, इसमें कहाँ तू है।
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।
कृष्ण जो भी करते हैं पूरी शिद्दत से करते हैं। बिना किसी की परवाह किए अपने मन का करते हैं।देवराज इंद्र को चुनौती देते हैं तो गोवर्धन पर्वत को ही अपनी उंगली पर उठा लेते हैं।
माखन खाते हैं तो छक कर। प्रेम करते हैं तो खुद को राधा के रंग में रंग लेते हैं। राधा से एक पल की भी दूरी बर्दाश्त नहीं करते । सूरदास का यह पद कितना प्रीतिकर है :–
अपनी भुजा स्याम भुज ऊपर, स्याम भुजा अपने उर धारिया
यौं लपटाइ रहे उर अंतर मरकत मनि कंचन ज्यों ज़रिया ।
मिलन के मधुर पलों में राधा और कृष्ण अपने-अपने हाथों से एक दूसरे के शरीर को बांधकर ऐसे जकड़े हुए हैं जैसे सोने के कंगन में मणि जड़ दी जाती है। कृष्ण जिस भी भूमिका में रहें उन्होंने उसका सार्थक निर्वाह किया । श्याम सुंदर जब तक गोकुल में रहे उन्होंने किसी गोपी को दुख का अनुभव तक नहीं होने दिया । कृष्ण से वियोग के बाद उद्धव को अपना दर्द बताते हुए गोपियां कहती हैं कि हे उद्धव, गर्म हवा का झोका क्या होता है, कान्हा के रहते हम तो यह भी न जान पाई। उन्होंने हम तक गर्म हवा के ताप को भी कभी आने नही दिया । ’गोकुल बसत संग गिरिधर के कबहुँ बयारि लगी नहिं ताती।’ हे उद्धव, तुम तो उनके सखा हो, तुम्हें अपना जानकर ही बता रहीं हैं कि अपनी उंगली पर समूचे पर्वत को उठा लेने वाले उस गिरधारी ने हमारे एक एक नखरे उठाए हैं । अपने रहते उन्होनें हमें किसी चीज की कमी नहीं होने दी । वे हमारे बिना बोले ही हमारी एक एक बात समझ लेते थे । क्या पता इस जीवन में हमें हमारा वह कन्हैया कब मिलेगा। ‘प्राननाथ तुम कब धौं मिलोगे सूरदास प्रभु बालसँघाती ।’
मेरा मन कृष्ण के किसी एक रूप पर आकर ठहर जाना चाहता है पर कृष्ण के व्यक्तित्व के इतने रूप हैं कि ह्रदय सबको संजो लेना चाहता है। मुरलीधर पर ध्यान लगाता हूं तो पीछे से सुदर्शनधारी मुस्कुराते हैं। माखन मिश्री खाते श्याम सुंदर पर ध्यान लगाता हूं तो कुरुक्षेत्र के कृष्ण याद आते हैं। गोपियों के वस्त्र चुराते कन्हैया को देखकर रुकता हूं तभी द्रोपदी की लाज बचाते केशव याद आते हैं। रूक्मिणी के साथ राज सिंहासन पर बैठे कृष्ण को प्रणाम करने के लिए मस्तक नवाता हूं तभी पीछे छूट गई राधा के अश्रु याद आते हैं । यशोदा पर ध्यान लगाता हूं तो देवकी छूट जाती है। नंद को याद करता हूं तो वासुदेव छूट जाते हैं। द्वारका को पकड़ता हूं तो वृंदावन छूट जाता है। मुकुट पर ध्यान लगाता हूं तो मुरली छूट जाती है। तुम्हारे कितने रूप हैं केशव।
प्यारे माखनचोर को जन्मदिन की बधाई।
– चित्तरंजन कुमार सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी इलाहाबाद विश्वविद्यालय ।
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