— मनीषा कुमारी —
NEWS LENS INDIA एवं समता मार्ग के तत्वावधान में आयोजित वैचारिक गोष्ठी में उच्च शिक्षा की वर्तमान स्थिति, उसकी गुणवत्ता, समानता और भविष्य की दिशा को लेकर एक विशेष परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें देश के वरिष्ठ शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शिक्षा व्यवस्था के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों पर विस्तार से अपने विचार रखे।
परिचर्चा में प्रो. आनंद कुमार, प्रो. सुखदेव सिंह, प्रो. शशि शेखर, डॉ. जयंत जिज्ञासु और सुधीर गंगोत्रा ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन रणधीर कुमार गौतम ने किया। उन्होंने परिचर्चा में शामिल वक्ताओं का परिचय देते हुए उनके शिक्षा, समाज और सार्वजनिक जीवन में योगदान को रेखांकित किया।
शिक्षा केवल रोजगार नहीं, राष्ट्र और समाज के भविष्य का प्रश्न-
प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि शिक्षा का प्रश्न किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के वर्तमान और भविष्य दोनों से जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार भारत में शिक्षा का इस्तेमाल लंबे समय तक औपनिवेशिक मानसिकता के निर्माण के लिए किया गया और इसी कारण राष्ट्रीय आंदोलन के साथ राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन भी विकसित हुआ।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद देश में उच्च शिक्षा के संस्थानों का व्यापक विस्तार हुआ। उनके अनुसार स्वतंत्रता के समय भारत में लगभग 17 विश्वविद्यालय थे, जबकि आज विश्वविद्यालयों की संख्या लगभग 900 से अधिक पहुंच गई है। हालांकि, उनके विचार में संस्थानों की संख्या बढ़ने के साथ शिक्षा की गुणवत्ता में उसी अनुपात में सुधार नहीं हुआ।
भाषा और शिक्षा में असमानता-
प्रो. आनंद कुमार ने उच्च शिक्षा में भाषा के प्रश्न को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी के प्रभुत्व के कारण भारतीय भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के सामने उच्च शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अवसरों की असमानता बनी हुई है। उन्होंने हिंदी, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, बंगला, कन्नड़ और उड़िया सहित भारतीय भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि भाषा के आधार पर शिक्षा व्यवस्था में एक प्रकार की सामाजिक असमानता दिखाई देती है।
शोध और शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश का सवाल-
प्रो. आनंद ने उच्च शिक्षा के साथ शोध को भी शिक्षा व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी जैसे देशों में शिक्षा के साथ उच्चतर शोध पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाता है, जबकि भारत में शोध को अपेक्षित महत्व और संसाधन नहीं मिल पाए हैं।
उन्होंने शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कोठारी आयोग से लेकर कस्तूरीरंगन आयोग तक की सिफारिशों का उल्लेख किया और कहा कि शिक्षा में पर्याप्त निवेश का प्रश्न लंबे समय से उठता रहा है। उनके अनुसार वर्तमान उच्च शिक्षा संकट को तीन प्रमुख आयामों—शिक्षा की अंतर्वस्तु, शिक्षा के अवसर और शिक्षा के खर्च—के संदर्भ में समझना आवश्यक है।
शिक्षा की गुणवत्ता को कैसे मापा जाए? –
प्रो. सुखदेव सिंह ने शिक्षा की गुणवत्ता को केवल डिग्री या संस्थागत विस्तार के आधार पर मापने के बजाय उसके सामाजिक और मानवीय परिणामों से जोड़ने की बात कही। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बेहतर मानव का निर्माण करना है—ऐसा व्यक्ति जिसकी कार्यकुशलता बढ़े और जो एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में समाज के साथ बेहतर व्यवहार कर सके।
उन्होंने कहा कि यदि शिक्षा के विस्तार के बावजूद समाज में विभाजन बढ़ रहे हों और विद्यार्थियों की वास्तविक कुशलता में कमी दिखाई दे, तो शिक्षा की दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक है।
निजीकरण और शिक्षा के व्यवसायीकरण पर सवाल-
प्रो. सुखदेव सिंह ने शिक्षा के निजीकरण के परिणामों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि निजीकरण के पीछे यह तर्क था कि उद्योग और कॉरपोरेट क्षेत्र शिक्षा में योगदान देंगे, लेकिन उनके अनुसार व्यवहार में शिक्षा स्वयं एक उद्योग के रूप में विकसित होती दिखाई दे रही है।
उन्होंने निजी विश्वविद्यालयों में फीस, शिक्षकों के वेतन, छात्रावास और अध्ययन सामग्री से जुड़े खर्चों का उल्लेख किया। उनके अनुसार कई संस्थानों में शिक्षा से जुड़े विभिन्न माध्यमों से आय अर्जित की जा रही है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता और उसके सार्वजनिक उद्देश्य पर प्रश्न उठते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि जब किसी संस्थान की आय का प्रमुख स्रोत विद्यार्थियों से मिलने वाली फीस हो, तो अधिक से अधिक विद्यार्थियों को प्रवेश देने का दबाव शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
शिक्षक नियुक्तियों में पारदर्शिता की आवश्यकता-
प्रो. शशि शेखर ने उच्च शिक्षा में शिक्षकों की नियुक्ति को एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि केंद्रीय, राज्य और निजी विश्वविद्यालयों में संसाधनों और शिक्षा की गुणवत्ता में काफी अंतर दिखाई देता है।
उनके अनुसार शिक्षक नियुक्तियों में पारदर्शिता और योग्यता को प्राथमिक आधार बनाया जाना चाहिए। उन्होंने विश्वविद्यालयों में चयन प्रक्रिया के दौरान उम्मीदवारों के मूल्यांकन और चयन समिति की कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने नियुक्तियों में राजनीतिक अथवा अन्य प्रकार के प्रभाव की शिकायतों का भी उल्लेख किया।
पाठ्यक्रम और वैज्ञानिक दृष्टिकोण-
प्रो. शशि शेखर ने पाठ्यक्रम को उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण आधार बताया। उनके अनुसार ऐसा पाठ्यक्रम होना चाहिए जो विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करे और उन्हें वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करे।
उन्होंने पाठ्यक्रम में होने वाले बदलावों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पाठ्यक्रम निर्माण में वैज्ञानिक शिक्षा और आलोचनात्मक एवं रचनात्मक चिंतन को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि मनुष्य का निर्माण करना भी है।
निजीकरण, सामाजिक न्याय और रोजगार का प्रश्न-
परिचर्चा में निजीकरण के सामाजिक न्याय पर प्रभाव का प्रश्न भी उठा। वक्ताओं ने इस बात पर चर्चा की कि यदि उच्च शिक्षा की लागत लगातार बढ़ती है तो आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यमवर्गीय परिवारों के विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच कठिन हो सकती है।
चर्चा में यह भी कहा गया कि शिक्षा को केवल रोजगार या बाजार की जरूरतों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। ज्ञान, नागरिकता, सामाजिक चेतना और मानवीय विकास भी शिक्षा के महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं।
तकनीकी शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चुनौती-
सुधीर गंगोत्रा ने तकनीकी एवं ऑनलाइन शिक्षा तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते प्रभाव पर अपनी बात रखते हुए शिक्षा के मूल उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का लक्ष्य केवल कौशल विकास नहीं, बल्कि मनुष्य का निर्माण होना चाहिए।
उन्होंने तकनीकी शिक्षा में केवल प्रस्तुतियों और औपचारिक डिग्री पर निर्भरता की आलोचना करते हुए कहा कि विद्यार्थियों में वास्तविक विषयगत समझ और व्यावहारिक क्षमता विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण पर भी चिंता जताई और कहा कि शिक्षा को केवल पैसे कमाने का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
शिक्षा में नैतिकता और शिक्षक की भूमिका-
चर्चा में शिक्षा के नैतिक पक्ष पर भी विशेष जोर दिया गया। सुधीर गंगोत्रा ने कहा कि पहले शिक्षक और विद्यार्थी के संबंधों में शिक्षा के प्रति जिम्मेदारी और सामाजिक मूल्य अधिक प्रमुख थे। उनके अनुसार आज शिक्षा के साथ जुड़े विभिन्न पक्षों—शिक्षक, विद्यार्थी, प्रशासन और समाज—में मूल्यों के क्षरण का प्रश्न दिखाई देता है।
उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल आर्थिक सफलता प्राप्त करना नहीं है। धन अर्जित करना जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष हो सकता है, लेकिन शिक्षा का पूरा उद्देश्य इसे नहीं बनाया जा सकता।
शिक्षा और लोकतांत्रिक नागरिकता
प्रो. आनंद कुमार ने शिक्षा के व्यापक सामाजिक उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कहा कि शिक्षा व्यक्ति के चरित्र, व्यक्तित्व, नागरिकता, राष्ट्र और मानवता के निर्माण में भूमिका निभाती है। इसके साथ शिक्षा व्यक्ति के लिए आजीविका और करियर का आधार भी तैयार करती है।
उन्होंने शिक्षक और विद्यार्थी के बीच विश्वास के संबंध को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार जब विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने के बाद रोजगार और भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करता है, तो शिक्षक-विद्यार्थी संबंध में भी तनाव पैदा होता है।
विश्वविद्यालय परिसरों में संवाद और लोकतांत्रिक वातावरण-
प्रो. आनंद कुमार ने विश्वविद्यालय परिसरों में संवाद और लोकतांत्रिक वातावरण को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े संकट का समाधान केवल प्रशासनिक निर्णयों से नहीं हो सकता। इसके लिए शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक के बीच संवाद आवश्यक है।
उन्होंने शिक्षा के व्यवसायीकरण और राजनीतिकरण को गंभीर प्रश्न बताते हुए कहा कि शिक्षक और विद्यार्थी यदि मिलकर शिक्षा के सवालों पर संवाद और सार्वजनिक बहस को आगे बढ़ाएं, तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में दबाव बनाया जा सकता है।
समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए सार्वजनिक समर्थन
प्रो. सुखदेव सिंह ने गुणवत्तापूर्ण और समान शिक्षा के लिए बेहतर कार्य वातावरण तथा पर्याप्त वित्तीय समर्थन की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि सरकारी संस्थानों में संसाधनों की कमी और निजी संस्थानों में बढ़ती फीस—दोनों ही परिस्थितियां शिक्षा की समान पहुंच के लिए चुनौती हैं।
उन्होंने शिक्षा संस्थानों के वित्तीय संसाधनों को शिक्षा के उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके अनुसार विश्वविद्यालयों को केवल आय और लाभ के मॉडल से नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित और शैक्षणिक उद्देश्यों के आधार पर संचालित किया जाना चाहिए।
विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और बाहरी हस्तक्षेप
चर्चा में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का प्रश्न भी सामने आया। प्रो. सुखदेव सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालयों को अकादमिक स्वतंत्रता के साथ काम करने की आवश्यकता है और वित्तीय संसाधनों के माध्यम से होने वाले बाहरी हस्तक्षेप से उनकी स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की स्वतंत्र भूमिका और चयन समितियों की जिम्मेदारी पर जोर दिया। उनके अनुसार शिक्षक और प्रोफेसर केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि शैक्षणिक संस्थान की नैतिक और बौद्धिक शक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
समान अवसर के लिए समावेशी प्रवेश नीति जरूरी-
सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित विद्यार्थियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने के सवाल पर चर्चा करते हुए वक्ता ने कहा कि विश्वविद्यालय को वास्तव में समावेशी बनाने के लिए केवल नारे पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ठोस नीतियों की आवश्यकता है।
उन्होंने ऐसे विद्यार्थियों के लिए विश्वविद्यालयों में अवसर सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया जो दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों, सामाजिक रूप से पिछड़े इलाकों या भाषायी कठिनाइयों से आते हैं। उनके अनुसार प्रवेश नीति बनाते समय ग्रामीण पृष्ठभूमि, भाषायी कठिनाई और लैंगिक वंचना जैसे विभिन्न पहलुओं को समग्र रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिए, ताकि विश्वविद्यालय पूरे भारत की सामाजिक विविधता का प्रतिनिधित्व कर सके।
समान शिक्षा की शुरुआत स्कूली स्तर से
चर्चा में यह महत्वपूर्ण बात सामने आई कि विश्वविद्यालयों में वंचित विद्यार्थियों को अवसर देने के साथ-साथ स्कूली शिक्षा में भी समानता सुनिश्चित करना आवश्यक है। डॉ जयंत जिज्ञासु ने कहा कि यदि विद्यार्थी स्कूली स्तर पर पर्याप्त अवसर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रह जाते हैं, तो विश्वविद्यालय में पहुंचने के बाद शिक्षकों के अतिरिक्त प्रयासों के बावजूद उनकी शैक्षणिक कठिनाइयों को दूर करना हमेशा संभव नहीं हो पाता।
उन्होंने समान शिक्षा के पुराने सामाजिक नारे का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा की समानता का आधार मजबूत सरकारी और स्कूली शिक्षा व्यवस्था में होना चाहिए।
भाषा स्वराज और मानसिक स्वराज का प्रश्न
परिचर्चा में भाषा के प्रश्न को सामाजिक समानता और आत्मविश्वास से जोड़ा गया। डॉ जिज्ञासु ने राममनोहर लोहिया के ‘मानसिक स्वराज’ और ‘भाषा स्वराज’ की अवधारणाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं में शिक्षा के अवसरों को मजबूत किए बिना विश्वविद्यालयों में आने वाले विद्यार्थियों की असहजता को दूर करना कठिन है।
उन्होंने कहा कि अंग्रेजी में सहज न होने वाले विद्यार्थी कई बार अपनी वास्तविक समझ और प्रतिभा के बावजूद विश्वविद्यालयी वातावरण में आत्मविश्वास की कमी महसूस करते हैं। इसके विपरीत, अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने वाले समाजों के उदाहरण बताते हैं कि मातृभाषा में शिक्षा आत्मविश्वास और बौद्धिक स्वतंत्रता को मजबूत कर सकती है।
विश्वविद्यालय का मूल उद्देश्य ज्ञान की खोज-
विश्वविद्यालय की प्रकृति पर चर्चा करते हुए डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के एक विचार का उल्लेख किया गया कि विश्वविद्यालय मूलतः शिक्षकों और विद्यार्थियों का ऐसा समुदाय है जो ज्ञान को आगे बढ़ाने और उसके प्रसार के लिए मिलकर काम करता है।
इस संदर्भ में यह विचार रखा गया कि विश्वविद्यालय को किसी संकीर्ण उद्देश्य से संचालित होने के बजाय सत्य और ज्ञान की स्वतंत्र खोज का स्थान बने रहना चाहिए। शिक्षक और विद्यार्थी दोनों इस बौद्धिक समुदाय के समान रूप से महत्वपूर्ण अंग हैं।
शिक्षा और नैतिक जिम्मेदारी
चर्चा में डॉ. जाकिर हुसैन के एक पुराने वक्तव्य का संदर्भ देते हुए शिक्षा को देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी से जोड़ा गया। डॉ जिज्ञासु के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी और नैतिक शक्ति का विकास भी है।
उन्होंने कहा कि समाज में राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर पर नैतिक शक्ति के क्षरण की चिंता शिक्षा व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार आत्मोन्नति और नैतिक विकास के बिना कोई भी शिक्षा व्यवस्था स्वस्थ मनुष्य के निर्माण में पूरी तरह सफल नहीं हो सकती।
रोजगार के दबाव के बीच आलोचनात्मक चिंतन की चुनौती-
21वीं सदी के विद्यार्थियों के सामने रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया। इस संदर्भ में चर्चा हुई कि उच्च शिक्षा मेंक्रिटिकल थिंकिंग, स्वतंत्र विचार और मानवीय मूल्यों को किस प्रकार मजबूत किया जाए।
प्रो. शशि शेखर ने कहा कि रोजगार का निर्माण करना मुख्यतः सरकार की आर्थिक नीतियों और रोजगार सृजन से जुड़ा प्रश्न है। शिक्षा और रोजगार के बीच बेहतर संबंध आवश्यक है, लेकिन शिक्षा को केवल रोजगार की जरूरतों के अनुरूप ढालते हुए मनुष्य और नागरिक के निर्माण के उद्देश्य को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।
अगले दस वर्षों के लिए विश्वविद्यालय सुधार की प्राथमिकताएं-
परिचर्चा के अंतिम चरण में सभी वक्ताओं से पूछा गया कि आने वाले दस वर्षों में भारतीय विश्वविद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए उनकी प्रमुख प्राथमिकताएं क्या होंगी।
शिक्षा और समाज के बीच संबंध मजबूत हो-
प्रो. सुखदेव सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय शिक्षा का समाज से मजबूत संबंध होना चाहिए। शिक्षा और ज्ञान समाज से अलग-थलग रहकर प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकते।
उन्होंने विश्वविद्यालयों और नागरिक समाज के बीच संवाद तथा सहभागिता को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार विश्वविद्यालयों की सामाजिक भूमिका और संस्थागत क्षमता को मजबूत करने में समाज के साथ निरंतर संपर्क उपयोगी हो सकता है।
अकादमिक समुदाय को दबावों का सामना करने की क्षमता विकसित करनी होगी-
प्रो. सुखदेव सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालयों के भीतर अकादमिक समुदाय को राजनीतिक और वित्तीय दबावों का सामना करने की क्षमता विकसित करनी होगी। उनके अनुसार शिक्षक और शिक्षाविद अपने आचरण से विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक और जिम्मेदार नागरिकता का उदाहरण दे सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकारों को यह समझना होगा कि उच्च शिक्षा संस्थानों को कमजोर करके समाज के दीर्घकालीन हितों को नुकसान पहुंच सकता है। उनके अनुसार शिक्षा सुधार के लिए एक व्यापक और समन्वित प्रणालीगत एजेंडा आवश्यक है।
विश्वविद्यालयों में लोकतांत्रिक वातावरण की रक्षा-
डॉक्टर जिज्ञासु ने विश्वविद्यालयों में ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया जिसमें लोकतांत्रिक और अकादमिक स्थान सुरक्षित रहें तथा प्रतिभाशाली युवा अपने सपने देखने और उन्हें पूरा करने की क्षमता बनाए रखें।
उन्होंने शिक्षा को संस्थान निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखने की बात कही। उनके अनुसार विश्वविद्यालयों को मानव मुक्ति और सशक्तिकरण की व्यापक परियोजना के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
सरकार संसाधन दे, अकादमिक निर्णयों में हस्तक्षेप न करे-
प्रो. शशि शेखर ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए एक स्पष्ट सिद्धांत पर जोर दिया—सरकार को शिक्षा संस्थानों के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए, लेकिन अकादमिक निर्णयों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शिक्षा से जुड़े निर्णय शिक्षाविदों, शिक्षकों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों को लेने चाहिए। उनके अनुसार अकादमिक स्वायत्तता उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है।
‘खुला दाखिला, सस्ती शिक्षा, लोकतंत्र की यही परीक्षा’-
परिचर्चा के समापन चरण में प्रो. आनंद कुमार ने उच्च शिक्षा के लिए दो प्रमुख प्राथमिकताओं को रेखांकित किया। उन्होंने 1960 के दशक के एक पुराने नारे—“खुला दाखिला, सस्ती शिक्षा, लोकतंत्र की यही परीक्षा”—का उल्लेख करते हुए व्यापक पहुंच और सस्ती शिक्षा को महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने शिक्षा की स्वायत्तता पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा को शिक्षकों और विद्यार्थियों को अधिक स्वतंत्रता के साथ संचालित करने का अवसर मिलना चाहिए। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो कि कौन बेहतर शिक्षा और बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराता है। इस प्रक्रिया में समाज की भी सकारात्मक भूमिका होनी चाहिए।
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