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कौटिल्य शब्द मीमांसा

by Rajendra Rajan
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— कविता वाचक्नवी —

कुटिल होने के कारण आचार्य चाणक्य को कौटिल्य कहा जाता है” – यह कथन आज जब विशाखदत्त के संस्कृत नाटक ‘मुद्राराक्षस’ के हिंदी रूपान्तरण (रांगेय राघव जी द्वारा) के सन्दर्भ के साथ पढ़ने में आया, तो रहा नहीं गया और मुझे लिखना पड़ा कि जिस किसी ने ऐसा लिखा है उसका भाषा से परिचय प्राथमिक स्तर का है। संस्कृत में बहुधा सम्बोधन, विशेषण आदि नाम के रूप में भी आते हैं। जैसे पृथा का पुत्र पार्थ और कुन्ती का पुत्र कौन्तेय, जह्नु की पुत्री जाह्नवी, वचक्नु की पुत्री वाचक्नवी इत्यादि। ऐसे कई हजार उदाहरण हैं। किन्तु जिस प्रकार यहाँ कौटिल्य की व्युत्पत्ति बताई गई है, वह बताने वाले की अल्पमति प्रमाणित करता है। क्योंकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द की एक मूल धातु होती है। तथा प्रत्येक धातु से सैकड़ों-हजारों (सकारात्मक-नकारात्मक अर्थात्मक ) शब्द बनते हैं। इसी प्रक्रिया को अपनाने की संस्तुति हमारे संविधान में शब्दनिर्माण के सन्दर्भ में की गई है। अस्तु।

तो संक्षेप में कहना हो तो कौटिल्य शब्द कुटिल से नहीं अपितु कूट (नीति) से आया है। अर्थात् जो कूटनीति का विशेषज्ञ है वह कौटिल्य, न कि जो कुटिल है वह कौटिल्य। दोनों में धरती और आकाश का अन्तर है। आचार्य चाणक्य चन्द्रगुप्त मौर्य के महामन्त्री तथा नन्द वंश के संहारक थे।

और रही बात विशाखदत्त के संस्कृत नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में एक द्वारपाल पात्र द्वारा कौटिल्य के आगमन पर ऐसा कहने की, तो नाटक में किसी पात्र के मुँह से कुछ कहा जाना सैद्धान्तिक नहीं होता, व न ही लेखक के विचार। वह पात्र के मनोभाव व्यक्त करने के लिए होता है। जैसे तुलसी का ढोर गँवार, या किसी नाटक में रावणदल के मुँह से राम को कायर कहना या पत्नी की रक्षा में असमर्थ कहना आदि। किसी पात्र के संवाद द्वारा शब्द की व्युत्पत्ति सिद्ध नहीं होती। भले ही कृति तुलसी की हो या विशाखदत्त या रांगेय राघव की। यदि कृति की माँग है कि पात्र वहाँ कटूक्ति करे, तो लेखक उसे शब्द देगा ही। पात्र द्वारा की गयी कटूक्ति को भाषा की सैद्धान्तिकी या नीति अथवा सामाजिक सैद्धान्तिकी से सिद्ध नहीं किया जा सकता। वे उस पात्र के राग-द्वेष जनित निजी विचार होते हैं। उनको प्रमाण मान कर चाणक्य को कुटिल कहने लगना बहुत ही दुखद एवं अशोभनीय है। और अनुचित तथा अशुद्ध तो है ही।

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1 comment

suresh pant September 24, 2023 - 2:38 PM

कूट और कौटिल्य दोनों की धातु अलग-अलग हैं। कौटिल्य कुट् से है और कूटनीति वाला कूट कूट् धातु से। व्युत्पत्ति की दृष्टि से सुविधानुसार घालमेल करना भाषा के लिए हानिकारक है।

√कुट् (वक्रीभावे) + बाहुलकात् इलच् > कुटिल:। = टेढ़ा, crooked .
कुटिल का भाव कौटिल्य।

√कूट् + घञ् > कूट:। बहु अर्थी है। कूटनीति के संदर्भ में कूट का अर्थ छल, छद्म, झूठ, फरेब आदि।

कूट से कौटिल्य नहीं बनेगा।

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