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सत्यजित राय और उनका सिनेमा

by Rajendra Rajan
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 – कुमार विजय –

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म डे आ’इल मेक अ ग्रेट फिल्म! सत्यजित राय ने 1948 में कभी अपने मित्र चिदानंद दासगुप्ता से कहा था। तब उन्होंने इसे मजाक समझकर हँस दिया था लेकिन राय गंभीर थे। हालांकि, अभी तब तक उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘पथेर पांचाली’ शुरू नहीं की थी। इसे तमाम प्रतिकूलताओं के बीच पांच वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद 1955 की गर्मियों में पूरा होना था। (मैरी सेटन, पोर्टेट ऑफ ए डायरेक्टर सत्यजित राय)

किसी फिल्मकार को, उसकी पहली ही फिल्म के लिए एक वैश्विक पहचान हासिल हो जाए और वह विश्व के महानतम फिल्मकारों- अकिरा कुरोसावा, जान रेनुआं, फेलिनी, सेरेजेइ ऐंजेस्तेइन, इंगमार बर्गमैन, ह्यूस्टन आदि- की लीग में शुमार कर लिया जाए, ऐसा बिरले ही होता है। लेकिन सत्यजित राय के साथ यही हुआ। उनकी पहली फिल्म ‘पथेर पांचाली’ ( पथ का गीत) के पहले अमरीका और फिर इंग्लैंड में प्रदर्शन के साथ पहली बार दुनिया की नजर भारतीय सिनेमा पर पड़ी। 1956 में ‘कॉन्स फिल्म समारोह’ में फिल्म को ‘बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट ‘ का अवार्ड मिला। इसके बाद आयीं इस त्रयी की ‘अपराजितो’ और ‘अपूर संसार’ सरीखी फिल्मों ने पश्चिमी फिल्म समारोहों में दर्जनों बड़े अवार्ड हासिल किये।

पश्चिमी दुनिया में मिली व्यापक स्वीकृति और सराहना ने फिर उन्हें पीछे मुड़कर देखने का अवसर नहीं दिया। बंगाल में मिली स्वीकृति के बाद तो ब्रिटिश विज्ञापन कंपनी ‘कीमेरे’ की  नौकरी वह पहले ही छोड़ चुके थे, जहां वह विजुअलाइजर से आर्ट डायरेक्टर बना दिए गए थे। विज्ञापन कंपनी का काम उन्हें गैर-रचनात्मक और अपमानजनक लगता था। इसके बाद राय एक के बाद एक अलग-अलग पृष्ठभूमि पर और भिन्न आस्वाद वाले कथानकों पर कंचनजंघा, नायक, जलसाघर, तीन कन्या, चारुलता सरीखी संवेदनशील फिल्में बनाते गए।
अपने चार दशक से भी लंबे फिल्म कॅरियर में छोटी बड़ी तीन दर्जन फिल्में बनाईं, जिनमें अनेक उल्लेखनीय कथात्मक फिल्मों के साथ कई वृत्तचित्र और लघु फिल्में भी शामिल हैं।

पथेर पांचाली का एक दृश्य

राय की समृद्ध फिल्मोग्राफी को देखें तो वह कथ्य के लिहाज से विविधता और फार्म के लिहाज से पर्याप्त प्रयोगशीलता के कायल रहे हैं। उन्होंने कभी अपने को दोहराने की कोशिश नहीं की। ऐसी अपनी फिल्मों के लिए उन्होंने ज्यादातर कथानक बांग्ला साहित्य से लिये। इसमें भी उनकी वरीयता में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध की कहानियां रही थीं। बांग्ला साहित्य में रुचि और उससे लगाव उन्हें विरासत में मिला था। प्रारंभ से ही फिल्मों में गहरी रुचि होने के कारण ऐसी कहानियां, जिन्हें वह फिल्मा सकते थे, हमेशा उनकी नजर में बनी रहीं। विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय और रवीन्द्रनाथ ठाकुर समेत अनेक बांग्ला साहित्यकारों की कहानियां, उनकी औपन्यासिक कृतियां वह बराबर पढ़ते रहते थे। कुछ तो इस कारण भी कि कई कृतियां उनके पास रेखांकन के लिए भी आती थीं और वह स्वयं भी लेखक थे।
प्रसंगवश, यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि अपनी पहली फिल्म के लिए ‘पथेर पांचाली’ का ही चयन उन्होंने क्यों किया? इसका जवाब उन्होंने फिल्मकार श्याम बेनेगल को, राय पर बनी डाक्युमेंट्री ‘राय द मास्टर्स’ में कुछ इन शब्दों में दिया कि ‘मैं इस किताब से भलीभांति परिचित था क्योंकि एक विशेष संस्करण के लिए मैंने इसका रेखांकन तैयार किया था। रेखांकन बनाने के लिए पढ़ते वक्त मुझे लगा कि शुरुआत के लिए यह विषय अच्छा है। उसमें मुझे चाक्षुष  और भावनात्मकता के लिहाज से कई विषिष्टताएं दिखी थीं, जो फिल्मी जादू रचने में सहायक होती हैं।’

राय की इस फिल्म के साथ कुछ अन्य दिलचस्प तथ्य जुड़े हैं। मसलन इस फिल्म के लिए कोई विधिवत पटकथा नहीं लिखी गयी थी। राय ने कुछ छिटपुट नोट्स लिख रखे थे, जिनमें कैमरा एंगिल और सीन को लेकर संक्षिप्त निर्देश थे। साथ ही उपन्यास के प्रसंगों पर कुछ रेखांकन फ्रेम थे, जो उन्होंने दृश्यों के तौर पर रेखांकित किये थे। एक तरह से 30-35 रेखांकनों की यह एक विजुअल स्क्रिप्ट थी, जो उन्होंने फिल्म के संभावित निर्माताओं को दिखाने के लिए तैयार की थी। फिल्म के संवाद भी वही थे, जो विभूतिभूषण ने उपन्यास में लिखे थे। बाकी सब कुछ निर्देशक राय के दिमाग में था।

फिल्म के चरित्रों की भूमिकाओं का निर्वाह भी एक-दो पेशेवर कलाकारों को छोड़कर, अनौपचारिक और शौकिया लोगों ने किया था। इतना ही नहीं, न तो फिल्म के कलानिर्देशक बंशीचंद्रगुप्त ने इससे पहले कला निर्देशक के रूप में काम किया था, न इसके सिनेमैटोग्राफर सुब्रतो राय ने कभी मूवी कैमरा हैंडिल किया था। वह स्टिल फोटोग्राफर थे और मूवी कैमरे को लेकर बहुत नर्वस थे। वस्तुत: कैमरामैन के अचानक दक्षिण भारत में व्यस्त हो जाने के कारण यह अवसर उन्हें मिला था और राय ने उनपर भरोसा जताकर उनका डर दूर कर दिया था। ये राय के कैमरा एंगिल वाली आँखों का ही कमाल था कि फिल्म के रिलीज होने पर उसके शॉट्स बहुत सराहे गये।

‘पथेर पांचाली’ के साथ यह संयोग भी जुड़ा है कि वह राय की पहली फिल्म बनी। दरअसल, राय पहली फिल्म रवींद्रनाथ ठाकुर की औपन्यासिक कृति पर केन्द्रित ‘घरे बाइरे’  बनाना चाहते थे, जो अंतत: 1984 में बनी और उनकी फिल्मोग्राफी में 31वें स्थान पर शुमार हुई। यह फिल्म 19वीं सदी की शुरुआत में भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा बंगाल को दो प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित करने की कोशिशों के प्रतिरोध में उभरे उग्र आंदोलन की पृष्ठभूमि में उभरती एक प्रेमकथा है। फिल्म की प्रमुख भूमिकाओं में सौमित्र चटर्जी, विक्टर बनर्जी और स्वातिलेखा चटर्जी हैं।

सत्यजित राय की फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत उनकी एक सार्वभौमिक अपील है। शायद यही कारण है कि उनकी फिल्मों को भारत से कहीं ज्यादा सराहना और बाजार यूरोपीय देशों और अमरीका में मिला। यह अपील उनकी फिल्मों में प्रदर्शित उन मानवीय अनुभवों और मूल्यों से बनी है, जिनकी तलाश में राय बांग्ला भाषा, उसके साहित्य, उसकी संस्कृति और परिवेश के बाहर भी निकले हैं। हमेशा हिन्दी में अपने को असहज बताने वाले राय ने सत्तर-अस्सी के दशक में प्रेमचंद की ‘शतरंज के खिलाड़ी’  तथा ‘सद्गति’ जैसी संवेदनशील कहानियों के सहारे भी अपने को अभिव्यक्त करने की कोशिश की। उनकी फिल्मों में भारतीयता का भी एक आग्रह रहा है। सत्यजित राय की यह खासियत रही है कि अपनी फिल्मों में उन्होंने अपने विश्वासों और आग्रहों और समझ को लेकर कभी समझौता नहीं किया। न ही आलोचनाओं और विवादों की कभी परवाह की।

इन तत्त्वों को उनकी तमाम फिल्मों- चारुलता, देवी, अशनि संकेत, अभिज्ञान, महानगर, जन-अरण्य, सद्गति, प्रतिद्वंन्द्वी, गणशत्रु, आगंतुक आदि- में पहचाना जा सकता है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी राय वस्तुत: फिल्मकार ही बनना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए लंबी तैयारी भी की थी। अपनी फिल्मशैली और उनपर अन्य महान फिल्मकारों के प्रभावों को लेकर सत्यजित राय ने कभी स्वीकार किया था कि वह अवचेतन तौर पर अपनी तमाम रचनात्मकता के जरिए जाँ रेनुआ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते रहे हैं, जिन्होंने उन्हें सबसे ज्यादा प्रेरित-प्रभावित किया। इसी के साथ उन्होंने इतालवी नवयथार्थ के प्रतिनिधि विटोरिया डि सिका को भी याद किया था। उल्लेखनीय है कि राय पहली बार जाँ रेनुआ के संपर्क में 1950 में आए जब वह कोलकाता में अपनी फिल्म ‘द रीवर’ बना रहे थे और विटोरयो डि सिका की ‘बाइसिकल थीव्ज़’ देखने के बाद ही फिल्मकार बनने का उनका निश्चय और पुख्ता हो गया था।

 

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