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कविता बोल रही है हमारे वक्त का सच : योगेंद्र यादव

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मैं कोई कवि नहीं हूँ। कवि सम्मेलनों का श्रोता भी नहीं। काव्य की साहित्यिक आलोचना सी मेरा दूर-दराज़ का भी रिश्ता नहीं है। बस...

मणिमाला जी की कविता!

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एक हजार में बोलो तुम क्या-क्या ख़रीदोगे? कहो जी तुम क्या-क्या सुनो जी तुम क्या-क्या मोदीजी तुम क्या क्या ख़रीदोगे...? यहाँ तो हर चीज़ बिकती है... ये नौकरी के सपने ये...

आपातकाल और साहित्य

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— परिचय दास — आपातकाल की मानसिकता में साहित्य एक ऐसी अंतर्धारा की तरह है, जिसमें समय की भयावहता, अभिव्यक्ति की घुटन, और सत्ता के...

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