अरुण कमल की छह कविताएं 

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1. ज़िन्दाबाद (एक दिन लाहौर में)

यहाँ शहीदों को कोई नहीं जानता
यहाँ शहीद-ए-आज़म को कोई नहीं जानता
यहाँ शहीद-ए-आज़म भगत सिंह को कोई नहीं जानता
न वो पुराना लाहौर जेल
न वो पास का चौक
न रावी का किनारा न म्यूजियम
न ट्रकों के ड्राइवर

मेरा रोम रोम काँप रहा है
ऐसा भी हो सकता है देश में कल? मेरे भी देश में?

ओ मेरे बच्चे
अगर तू जिन्दा रहना चाहता है तो उस महान मौत को याद रख
अगर तू मौत को हराना चाहता है तो उस महान अमरता को याद रख
अगर तू अपने नाती-पोतों के साथ बूढ़ा होना चाहता है
तो उस बाँकी हैट वाले नौजवान को याद रख
याद रख कि तेरी जिन्दगी उसी की बख्शीश है
और ये हवा उसका वरदान

मेरा रोम रोम काँप रहा है
मैं आधी रात को जोर जोर से गरजना चाहता हूँ कंठ खोल—
शहीदेआजम अमर रहें!
इंक्लाब ज़िन्दाबाद! इंक्लाब ज़िंदाबाद!

2. बहादुर शाह ज़फ़र की मज़ार पर

(एक दिन यांगोन में)

रंगून शहर से बाहर एक सुनसान सी जगह है
जहाँ कुछ दरख्त हैं घने
कुछ मेमने, एक चरवाहिन लड़की
और दो गज ज़मीन से ज्यादा कुछ ऊँची जगह
यार के कूचे से बहुत दूर
अपने वतन की मिट्टी से बहुत दूर

शायद ही इतना दुख किसी ने भोगा—
एक नक्काशीदार रूमाल के नीचे कटे हुए सिर,
शायद ही इतना प्यार किसी ने पाया—
इतने हाथों ने एकसाथ पहनाया ताज;
हर वो जगह वतन है तुम्हारा जहाँ तुम हो
हर वो गली गली है यार की जहाँ आवाज है तुम्हारी

तुम्हारी लड़ाई ख़त्म हुई ज़फ़र
पर हमारी तो अब भी जारी है
तुमने बस एक बार देखे कटे हुए सिर
हम तो देखते हैं रोज रोज
तुम्हारा तो यार भी था कहीं
हमारी तो बस एक गली है वीरान

दो हजार इक्कीस भी अट्ठारह सौ सत्तावन है।

3. अमृत महोत्सव

तुम सब सभासद श्रेष्ठीजन जो चख रहे हो अमृत
तुम जो छक रहे हो भोज अमृत पंक्तिबद्ध
याद करो उन वीरों को जिन्होंने अपने कंठ में धर लिया था हलाहल
याद करो उन योद्धाओं को जिन्होंने विष पिया था तुम्हारे लिए
एक ग्रास उनके लिए भी जिन्होंने अमृत कलश फूटने से बचाया इतने साल

तुम जो अमृत पी रहे हो—
अमृत भी एक नशा है—
तुम जो अमर हो याद रखो कि यह कलश सिर्फ तुम्हारा नहीं था
कि करोड़ों करोड़ जन ने अभी देखा भी नहीं वो अमृत कलश
जो खड़े हैं बाहर इस महामहोत्सव से बहिष्कृत
भूलो मत कि समुद्र में अभी भी विष है अथाह

4. जेल के अंदर वार्तालाप

तुम यहाँ क्यों आये
क्योंकि मैं बोल रहा था
और तुम
क्योंकि मैं सुन रहा था
और वह
क्योंकि वह सोच रहा था
और वो
क्योंकि वो रात भर जगता था
और वो लड़की उधर
वो? वो हँस रही थी
और वो वृद्धा
वो रो रही थी
और वह वीरवर
वह लिख रहा था
और वह सरवर
वह पढ़ रहा था
और वो उधर
क्योंकि उसकी देह में अभी भी साँस थी
और वो
उसके मरने में देर हो रही थी
और ये छोकरे
क्योंकि वे सड़क पर खेल रहे थे
और ये
क्योंकि इनके कपड़े काले थे राजा की शोभायात्रा में
और ये
ये कवि हैं व्याधे को शाप दे रहे थे
और ये इतने सारे लोग इतने लोग
क्योंकि वे देख रहे थे
तो बाहर कौन है
बाहर अब है कहाँ?

5. कुछ सूक्तियाँ

किसी को ठीक ठीक जानना हो तो पता करो
वह आलोचना किसकी करता है

किसी सरकार को जानना हो तो पता करो
अमीर और कितने अमीर हुए

किसी को ठीक ठीक पहचानना
हो तो
उसके दुश्मनों को जानो

किसी की चालाकी पकड़नी हो तो
उससे हवा और पानी पर बात करो

अगर सब अपने घरों से बाहर आ जाएँ तो
सरकार अपनेआप गिर जाएगी

जो तुमसे चंदा माँगे तो
तुम भी उससे चंदा माँगो

जब पैसे कम हों तो ख़रीदने के पहले रुको और पूछो
इसके बिना काम चल सकता है या नहीं

मेमने को अपने में मिलाने का सबसे उम्दा नुस्खा है
मारो और खा जाओ

6. पुकार

आवाज मेरी यदि कभी डूबती सी दूर से आती लगे
तब समझना मैं कहीं पर घिर गया हूँ
बँहड़ अपने यूथ से वन में बहुत भीतर;
या लहर कोई ले गयी है लोभ देती दूर अपने क्रोड़ में
और मैं पानी के तल से हँकारता हूँ;
रात भर घुटती हुई छटपटाती देह अंतिम
साँस को भी पीसती बदल देगी
खून सनी एक पुकार में टू ट ती

ड्राइंग : प्रयाग शुक्ल 

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