गांधी के बारे में कुछ गलतफहमियाँ

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नारायण देसाई (24 दिसंबर 1924 - 15 मार्च 2015)

— नारायण देसाई —

(महात्मा गांधी सार्वजनिक जीवन में शुचिता, अन्याय के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष और सत्यनिष्ठा के प्रतीक हैं। उनकी महानता को दुनिया मानती है। फिर भी गांधी के विचारों से मतभेद या उनके किसी कार्य से असहमति हो सकती है। लेकिन गांधी के बारे में कई ऐसी धारणाएं बनी या बनायी गयी हैं जिन्हें गलतफहमी ही कहा जा सकता है। पेश है गांधी जयंती पर यह लेख, जो ऐसी गलतफहमियों का निराकरण करता है। गांधी की छत्रछाया में पले-बढ़े और उनके सचिव मंडल का हिस्सा रहे स्व. नारायण देसाई का यह लेख गुजराती पत्रिका ‘भूमिपुत्र’ से लिया गया है। नारायण भाई ने गांधी की बृहद जीवनी भी लिखी है।)

जिसने सार्वजनिक जीवन में पाँच-छह दशक बिताया हो उसके बारे में कुछ-न-कुछ भ्रांतियाँ हो सकती हैं। जिसने दुनिया के सामने अपनी किताब खुली रखी हो, उसकी जीवन-पुस्तक के अलग-अलग भाष्य होना और इसमें गलत निष्कर्ष निकाला जाना भी संभव है। कुछ गलतफहमियाँ ऐसी हैं जिन्हें सही मायने में गलतफहमी नहीं कहा जा सकता। मतभेद या विरोध, ईर्ष्या या द्वेष आदि के कारण जान-बूझ कर फैलायी गयी बातों को गलतफहमी के बजाय अफवाह या दुष्प्रचार कहना ज्यादा सही होगा। पर इस तरह के प्रचार के पीछे भी कुछ गलतफहमी हो सकती है ऐसा मानकर हम इसे भी भ्रांतियों में शामिल कर सकते हैं।

गांधीजी के बारे में भ्रांतियाँ पैदा करने में खुद गांधीजी की कलम भी जिम्मेवार रही है। अपनी भूलों को गांधीजी राई का पर्वत बनाकर पेश करते थे और दूसरा कोई कहे उससे पहले ही जोर-शोर से अपनी भूल कबूल करते थे। ऐसी स्वीकारोक्तियों के कारण भी गांधीजी के बारे में गलतफहमियाँ फैली हैं। उनसे किसी तरह की अपेक्षा रखनेवाले व्यक्ति की अपेक्षा अगर पूरी न हुई, तो उस निराश व्यक्ति ने जो भड़ास निकाली हो वह भी गलतफहमी फैलने का सबब बन गयी।

क्या गांधीजी ने कुटुंब के प्रति अन्याय किया?

गांधीजी के बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने अपने कुटुंबीजनों के प्रति अन्याय किया;उनका खयाल नहीं रखा या उनकी जैसी मदद करनी चाहिए थी, नहीं की। यह बात अधिक-से-अधिक किसी के संबंध में लागू होती है तो उनके ज्येष्ठ पुत्र हरिलाल के संबंध में। हरिलाल ने गांधीजी के साथ बातचीत में और उन्हें लिखे गये पत्रों में भी इस बारे में अपनी नाराजगी जतायी थी। हरिलाल की मुख्य शिकायत यह थी कि गांधीजी ने उन्हें पढ़ाया नहीं और आगे बढ़ने के लिए विलायत जाने का मौका था तो वह उन्होंने अपने पुत्र के बजाय दूसरे नौजवानों को दे दिया।

हरिलालभाई जब पढ़ने लायक हुए तब गांधीजी ठाठ-बाट की जीवन शैली से सादगी की तरफ मुड़ रहे थे। बाल-शिक्षा की बाबत भी वह नये ढंग से सोचने लगे थे। अपने विचारों के अनुसार गांधीजी ने दूसरे बेटों को तो आश्रमी शिक्षा ही दी। पर हरिलालभाई को वह मंजूर नहीं थी। उन्होंने हिंदुस्तान में रहकर पढ़ना पसंद किया। लेकिन वह मेधावी विद्यार्थी नहीं थे, तीन-तीन बार प्रयास करने पर भी वह मैट्रिक पास नहीं कर सके। बड़ा बेटा इस तरह की शिक्षा हासिल करे, यह गांधीजी को पसंद नहीं था। फिर भी उन्होंने हरिलाल को भारत रहकर पढ़ने की छूट दी थी। (तब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में थे) इस बीच हरिलाल का ब्याह हो गया, जिसमें गांधीजी के राजकोट में रहनेवाले सारे बड़े-बुजुर्ग शामिल हुए थे। बेटे का इतनी जल्दी ब्याह होना गांधीजी को अच्छा नहीं लगा था। पर उन्होंने इसे बर्दाश्त कर लिया।

उसके बाद हरिलालभाई दक्षिण अफ्रीका आए। वहां के सत्याग्रहों में खूब उत्साहपूर्वक भाग लिया। लेकिन फिनिक्स आश्रम की जीवन शैली उन्हें ज्यादा रास नहीं आती थी। इंग्लैंड में रहनेवाले गांधीजी के एक मित्र ने फिनिक्स के किसी नौजवान को इंग्लैंड में पढ़ाने का खर्च उठाने का जिम्मा लिया था। हरिलालभाई को लगता था कि गांधीजी उन्हें ही विलायत भेजेंगे, पर गांधीजी ने वैसा नहीं किया। गांधीजी की शर्त थी कि जो लड़का विलायत जाय वह एक निर्धारित अनुशासन में रहे और वहाँ से लौटकर फिनिक्स आश्रम में काम करे। पहले-पहल जिस विद्यार्थी को विलायत भेजा गया वह तबीयत खराब रहने के कारण वापस आ गया। फिर तो हरिलालभाई को उम्मीद थी कि अब उनका ही नंबर आएगा। लेकिन इस बार भी गांधीजी ने एक अन्य नौजवान को पसंद किय़ा। सत्याग्रह के चलते जेल में बैठे हरिलालभाई को यह नागवार गुजरा और आखिरकार उन्होंने अफ्रीका छोड़ने का निश्चय कर लिया। उनकी पत्नी और बच्चे अफ्रीका में ही रहे और वे जब तक वहाँ रहे, गांधीजी ने उनके रहने-खाने का सारा खर्च उठाया।

भारत जाने पर हरिलालभाई कुछ काम-धंधे की तलाश में लग गये। पर कई जगह कोशिश करने पर भी कहीं स्थिर नहीं हो सके। इस बीच उनकी पत्नी की मौत हो गयी। उसके बाद हरिलालभाई की मानसिक स्थिति बहुत बिगड़ गयी। अपने पिता की तरह वह भी आत्म-सम्मान वाले थे। स्पष्टवक्ता और कुटुंबप्रेमी थे। लेकिन किसी काम-धंधे के साथ अपनी पटरी नहीं बिठा सके। इसी बीच उन्हें दारू की लत लग गयी और यह लत उन्हें एक घने अंधकार में ले गयी। इस दरम्यान पिता-पुत्र में परस्पर प्रेम तो था, पर दोनों का रहन-सहन एकदम अलग था। हरिलालभाई ने अपना धंधा जमाने के लिए कर्ज लिया, पर वह कर्ज चुका नहीं सके, जिससे गांधीजी बहुत व्यथित हुए। गांधीजी तब तक अपनी सारी संपत्ति विसर्जित कर चुके थे, पर अपना पुत्र लिया हुआ कर्ज न चुकाए, यह उनके लिए असह्य वेदना का विषय था।

गांधीजी एक-दो बार हरिलालभाई को अपने पास आश्रम में लाने में सफल हुए थे। पर अपनी कुछ आदतों के कारण हरिलालभाई को आश्रम में रहना असंभव मालूम पड़ता था। इसलिए वह आश्रम छोड़कर चले गये। इस बीच गांधीजी को बदनाम करने में अपनी कामयाबी माननेवाले लोगों ने हरिलालभाई को दारू वगैरह का लालच देकर धर्म परिवर्तन करा दिया। हरिलाल कुछ समय बाद फिर धर्म परिवर्तन करके हीरालाल के रूप में रहने लगे। पर गांधीजी से दूर, लगभग गुप्तवास में। कभी-कभार मिल जाते, तो गांधीजी और कस्तूरबा उन्हें वापस अपने साथ आकर रहने के लिए समझाते। पर यह समझाना-बुझाना बेकार गया। हरिलालभाई के बच्चों को गांधीजी ने अपने आश्रम में रखकर बड़ा किया। इस प्रकार यह संबंध परस्पर स्नेह का होते हुए भी अलग-अलग जीवन शैली का था। गांधीजी यह मानते थे कि अपनी जीवन शैली या सिद्धांत की बाबत वह कोई ऐसा अपवाद कर ही नहीं सकते।

गांधीजी ने अपने पुत्र के साथ अन्याय किया, यह कहनेवाले लोग गांधीजी को अपने मापदंड से मापते हैं। यदि गांधीजी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके हरिलाल के लिए कुछ सुविधा कर दी होती, तो यही आलोचना करनेवाले लोग उन पर पक्षपात करने का आक्षेप लगाते!

यह भी कहा जाता है कि परिवार में अन्य किसी के प्रति गांधीजी ने अन्याय किया हो, तो वह कस्तूरबा थीं। उनकी आत्मकथा में पतित्व शीर्षक से लिखे प्रकरण के अलावा यह प्रसंग भी आता है कि दक्षिण अफ्रीका में पंचम जाति के साथी का मूत्रपात्र साफ न करने पर कस्तूरबा को गांधीजी ने घर से निकल जाने को कह दिया था। यह प्रसंग खुद गांधी ने दुनिया को बताया है। कस्तूरबा दूसरों के तो मूत्रपात्र साफ करने के लिए तैयार हों, पर दलित का मूत्रपात्र साफ करने में हिचकिचाएँ यह गांधी के लिए असह्य था। यह सही है कि उन्होंने आवेश में आकर कस्तूरबा को बाहर का दरवाजा दिखाया, लेकिन जब कस्तूरबा ने उन्हें यह भान कराया कि यह तो दोनों के लिए लज्जा का विषय होगा, गांधी फौरन समझ गये और फिर वैसा कोई कदम उन्होंने नहीं उठाया।

गांधीजी के जीवन के साथ-साथ कस्तूरबा के भी जीवन का सतत विकास होता रहा। गांधीजी जो काम बुद्धिपूर्वक करते, उसे कस्तूरबा श्रद्धापूर्वक करतीं। कोई साठ बरस के दांपत्य में जहाँ कस्तूरबा ने गांधीजी का पूरा साथ दिया, वहीं गांधीजी ने भी कस्तूरबा को स्नेह-आदर दिया। सिद्धांत की खातिर कुटुंबीजनों के कष्टों को नजरअंदाज करना गांधीजी के लिए कोई विचित्र बात नहीं थी। उनकी बड़ी बहन रलियातबेन छुआछूत की भावना से उबर नहीं पायी थीं। गांधीजी उनका आदर करते थे, मिलने पर पाँव भी लगते थे, पर उनके लिए अपवाद करके, आश्रम की ‘स्पर्श भावना’ के साथ समझौता करने को तैयार नहीं हुए।

प्यारेलाल ने लिखा है कि गांधीजी के अन्य तीन पुत्रों को भी जिंदगी के किसी-न-किसी दौर में यह मलाल रहा कि वे प्रचलित शिक्षा हासिल नहीं कर सके। पर प्यारेलाल यह भी बताते हैं कि बाद में तीनों में वंचना का यह भाव दूर हो गया था। तीनों के मन में पिता के प्रति प्रेम, गर्व और भक्ति का भाव था।

गांधीजी की कुटुंब-भावना व्यापक होते-होते क्षितिजव्यापी हो गयी थी। इसलिए उनके मन में यह आता ही नहीं था कि जिनसे खून का रिश्ता है उनके साथ, दूसरे परिवारों की बनिस्बत, विशेष संबंध रखें।

(जारी)

गुजराती से अनुवाद – राजेन्द्र राजन

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