जेपी व लोहिया की विरासत का वाहक बनता किसान आंदोलन

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— डॉ सुनीलम —

ल समाजवादी चिंतक और भारतीय समाजवादी आंदोलन के प्रणेता डॉ.राममनोहर लोहिया की 54वीं पुण्यतिथि थी। परसों 11 अक्टूबर को लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 119वीं जयंती थी। जेपी और लोहिया दोनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। दोनों ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर योगदान किया, दोनों ही लाहौर की जेल में कैद रहे। अंग्रेजों ने उन्हें लाहौर की उसी काल कोठरी में रखा था, जहां शहीद भगत सिंह को रखे जाने के बाद फांसी दी गयी थी। दोनों ही गांधीजी के अत्यधिक नजदीक थे। जेपी की पत्नी प्रभाजी ने तो लंबा समय गांधीजी के आश्रम में बिताया था। इसलिए गांधीजी जेपी को दामाद की तरह मानते थे।

दोनों समाजवादी नेताओं को गांधीजी के हस्तक्षेप के बाद रिहा किया गया। जबकि सभी कांग्रेसियों को पहले ही अंग्रेजों ने छोड़ दिया था। दोनों ने अन्य समाजवादियों के साथ मिलकर नासिक जेल में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन की योजना बनायी थी तथा 100 समाजवादियों ने मिलकर 17 मई 1934 को पटना के अंजुमन इस्लामिया भवन में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया था, जिसके संगठन मंत्री जेपी बनाये गये थे।

युवावस्था में विदेश में पढ़ाई करते हुए दोनों लेनिन के नेतृत्व में हुई रूसी क्रांति से प्रभावित थे तथा मार्क्सवादी विचार को मानते थे लेकिन बाद में यूरोप के समाजवादी पार्टियों, लेबर पार्टियों के नजदीकी संपर्क में रहने के चलते बहुदलीय प्रणाली तथा लोकतंत्र को लेकर दोनों ने रूस के कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था को लेकर तमाम सवाल उठाने शुरू कर दिये थे। आजादी के आंदोलन के दौरान दोनों समाजवादी नेताओं का अहिंसा के प्रति अत्यधिक आग्रह नहीं था। जेपी ने आजाद दस्ता बनाया था तथा डॉ लोहिया तमाम भूमिगत कार्रवाइयों में शामिल हुए थे। नेपाल में राणाशाही के खिलाफ भी हिंसात्मक कार्रवाई की गयी थी।
लेकिन गांधीजी के प्रभाव में आने से दोनों अहिंसावादी हो गये थे।

दोनों का गांधीजी के साथ अटूट रिश्ता रहा लेकिन दोनों ही गांधीजी के साथ निजी मुलाकातों में तथा कांग्रेस कार्यसमिति और सम्मेलनों में गांधीजी के प्रस्ताव पर तमाम सवाल उठाते रहे। हालांकि अंततः हर मुद्दे पर गांधीजी के साथ रहे। दोनों ने देश के विभाजन का विरोध किया था तथा दोनों ही गांधीजी के हिंदू मुसलमानों के बीच शांति और सद्भाव कायम करने के प्रयासों में शामिल रहे।
दोनों समाजवादी नेताओं की किसान और गांव की भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर लगभग एक ही समझ थी। दोनों चौखंबा राज तथा सशक्त पंचायत व्यवस्था के पक्षधर थे। आजादी के पहले जब लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा का गठन किया गया तब सहजानंद जी के साथ जेपी और लोहिया दोनों मौजूद थे। दोनों ही नेताओं ने जमींदारी प्रथा के विरोध में तथा किसानों की कर्जा मुक्ति के लिए काम किया। जिस तरह औद्योगिक वस्तुओं के मूल्य तय किये जाते हैं उसी तरह किसानों को भी मूल्य मिले यह सवाल वे आजादी के पहले और बाद में भी उठाते रहे।

जेपी और लोहिया दोनों ही नेताओं ने जनता के बीच जागरूकता पैदा कर लोक शक्ति के निर्माण तथा विकेंद्रीकृत समाजवादी व्यवस्था कायम करने को अपने जीवन का उद्देश्य माना।

परसों जेपी की जयंती के अवसर पर जब बिहार आंदोलन की बात दिनभर अलग-अलग कार्यक्रमों में सुन रहा था तथा लेखों में पढ़ रहा था तब मुझे बार-बार यह लग रहा था जैसे संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में चल रहा वर्तमान किसान आंदोलन बिहार आंदोलन को दोहरा रहा है।

डॉ राममनोहर लोहिया ने सप्त क्रांति के विचार को प्रतिपादित करते हुए कहा था कि दुनिया में सात किस्म के अन्याय लगातार चलते हैं जिनको समाज में सतत रूप से चुनौती दी जाती है। हमारा लक्ष्य इन सात अन्याय के खिलाफ लड़ाई को तेज करना होना चाहिए। संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन ने यही किया है। उसने लगातार कॉरपोरेटीकरण और बाजारीकरण से पैदा हो रही विषमता को चुनौती दी है। किसान आंदोलन ने सभी जातियों और धर्मों को जोड़कर जाति और धर्म की संकीर्णताओं से समाज को ऊपर उठाने का प्रयास किया है। किसान आंदोलन में नर-नारी समता का भाव स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। संयुक्त किसान मोर्चा सुनियोजित तौर पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रयासरत है।

डॉ लोहिया ने समाज में हिंसा के खिलाफ शांतिपूर्ण सत्याग्रह के सिद्धांत को शामिल किया था। आज इस सिद्धांत का प्रयोग किसान आंदोलन बेहतरीन तरीके से कर रहा है। ”हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा”, ”मारेंगे भी नहीं, मानेंगे भी नहीं” जैसे समाजवादी नारों को अमलीजामा पहनाने का काम किसान आंदोलन कर रहा है।

जेपी और लोहिया दोनों ने अपने जीवनकाल में राजनीति की दिशा बदलने में कामयाबी हासिल की थी। दोनों ने सरकारें भी बदलीं लेकिन वे सरकार के माध्यम से होनेवाले परिवर्तन की सीमाओं को भी भली-भांति पहचानते थे।

जेपी और लोहिया दोनों ने ही राजनीति में नैतिकता को उच्च स्थान दिया था। आज किसान आंदोलन जब 320 दिन पूरे कर रहा है, तब उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका नैतिक बल ही है। गांधी-लोहिया-जयप्रकाश की संकल्प शक्ति और वैचारिक स्पष्टता के साथ आंदोलन जिस मुकाम पर पहुंचा है, उसमें जीत मिलना तो तय है परंतु उसे आजादी के आंदोलन, जेपी के लोकतंत्र बहाली आंदोलन तथा देश के तमाम आंदोलनों से सबक लेने की जरूरत है ताकि उन गलतियों को दोहराया न जाए, जिनके चलते आजादी तो मिली परंतु आजादी के आंदोलन के उद्देश्य पूरे नहीं हो सके तथा समाजवादियों को विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री तक के पद तो मिले लेकिन समाजवादी व्यवस्था कायम नहीं हो सकी। दोनों समाजवादी नेताओं की निडरता और संकल्प शक्ति के साथ-साथ सत्ता के उपयोग की समझ और संपत्ति के प्रति अपरिग्रह के भाव से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। जेपी और लोहिया दोनों ही सरकारें बदलने के तौर-तरीकों की सीख भी देते हैं।

फिलहाल किसान आंदोलन का वैचारिक आधार कॉरपोरेट विरोधी, सांप्रदायिक कट्टरता के खिलाफ तो है ही, किसान आंदोलन 3 किसान विरोधी कानून रद्द कराने, बिजली संशोधन बिल वापस कराने तथा एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी से बढ़कर लोकतंत्र, संविधान और देश बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। यह लड़ाई जेपी और लोहिया ने जीवनभर लड़ी थी।

संयुक्त किसान मोर्चे ने कल स्वतंत्रता सेनानी व समाजवादी चिंतक लोहिया को याद किया, जिन्होंने कहा था, सड़कें सूनी हो जाएंगी तो संसद आवारा हो जाएगी, और जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं। दोनों नारों को अमली जामा पहनाने का काम संयुक्त किसान मोर्चा शिद्दत से कर रहा है।

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