स्त्रीवादी दर्शन और नयी दुनिया की चाहत

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— मंथन —

हले तो शब्दावली से ही शुरुआत करें। फेमिनिज्म और फेमिनिस्ट को हिन्दी में क्या कहें। कुछ लोग सोचेंगे अनावश्यक बाल की खाल निकालना शुरू। नहीं, ऐसा नहीं। सटीक शब्दावली चुनना भी एक सामाजिक-वैचारिक काम है। शब्दों और मुहावरों में  मानसिकता, मान्यता, संस्कार या पूर्वाग्रह निहित हो सकता है, होता है। और हम सब जानते हैं कि औरतों के खिलाफ, औरतों की अस्मिता और गरिमा को नकारने,आहत करनेवाले शब्दों, मुहावरों, चुटकुलों और कहावतों की भरमार है। ऐसी शब्दावलियों को नकारना, बदलने के लिए दबाव डालना महिला आंदोलन का एक अभिन्न हिस्सा रहा है। अभी हाल ही में क्रिकेट में जेन्डर न्यूट्रल शब्द बैटर को अपनाने का फैसला हुआ है।

फिर से मूल बात पर आएँ। नारीवाद, महिलावाद, स्त्रीवाद जैसे शब्द चलन में हैं। औरत शब्द के साथ जोड़कर ऐसा शब्द नहीं बनाया गया है। औरत शब्द में शायद वह बात लोगों को नहीं लगती जो वे चाहते हैं। कहीं यहाँ भी कोई गहरे पैठा अनावश्यक, अनुचित शब्द-संस्कार तो  नहीं। सबसे ज्यादा मेरी नजर में नारीवाद शब्द का उपयोग होता है। नारी शब्द नर शब्द से जुड़ा हुआ है। यह नर शब्द का पूरक नहीं, नर शब्द पर आधारित है। या कहें पूरकता/पारस्परिकता से ज्यादा निर्भरता का रिश्ता है। औरत-मर्द  में पारस्परिकता तो होनी चाहिए, लेकिन समानता या मुक्ति की शर्त है स्वंतत्रता या स्वायत्तता, आत्मनिर्भरता। स्त्री-पुरूष समानता, स्त्री की निर्णायकता के दर्शन की शब्दावली तो ऐसी नहीं ही होनी चाहिए कि उसमें यह धुँधला हो, पुरूष पर निर्भरता ज्यादा मुखर हो। इसीलिए ज्यादा सटीक शब्दावली होगी, स्त्रीवादी या महिलावादी दर्शन।

स्त्रीवाद की चर्चा में एक शब्द आना ही है, पितृसत्ता। पितृसत्ता का ध्वंस स्त्रीवाद का एक अपरिहार्य लक्ष्य है। हमें इस शब्द पर भी पुनर्विचार करना चाहिए। क्या यह पूरी स्त्रीविरोधी सत्ता को पूरी तरह व्यक्त कर पाता है। क्या यह पुरुषों की सर्वव्याप्त सत्ता का समानार्थी बन सकता है। मेरी राय में नहीं। यह सही लेकिन अधूरी, आंशिक सच्चाई जाहिर करता है। बचपन में पिता, शादी के बाद पति तथा पति की मौत के बाद पुत्र की अधीनता के बहुचर्चित नियति-निर्देशसूत्र को भी प्रतिध्वनित नहीं करता। अगर किसी महिला का पिता अज्ञात या नामौजूद हो, कोई बच्ची अनाथ हो, दो स्त्रियाँ स्वतंत्र सहजीवी रिश्ते में हों तो उन पर वैयक्तिक रूप से किसी सत्ता का आरोपण नहीं रहता। वंश परम्परा, पहचान, गोत्र परंपरा, आनुवंशिक सम्पत्ति का स्वामित्व यानी परिवार के पूरे निर्णय और संचालन की शक्ति पिता में केन्द्रित होती है, इतना कहा जा सकता है।

सत्ता और शोषण का आरोपण केवल परिवार में ही नहीं सिमटा होता। और परिवार में भी, हिन्दू परिवार में तो जरूर  पुत्री का  गोत्र और वंश तथा व्यावहारिक रूप से आनुवंशिक सम्पत्ति में हिस्सेदारी पिता से तय नहीं होती। इस कारण पितृसत्ता की जगह पुरुषसत्ता की शब्दावली ज्यादा सही और अर्थपूर्ण है। जबतक और ज्यादा सटीक शब्दावली नहीं बने या मिले, पुरुषसत्ता की शब्दावली का ही उपयोग होना चाहिए।

स्त्रीवाद का जन्म ही समता, स्वतंत्रता, न्याय का सपना देखनेवाली विचारधाराओं की विफलता से हुआ। जितनी भी क्रांतियां हुईं, जितने भी सपने देखे गये, जितने भी नये ढाँचे गढ़े गये उनमें स्पष्ट रूप से औरतों के हिस्से की, औरतों के हक की जगह बहुत कम है। अभूतपूर्व और ऐतिहासिक मानी जानेवाली उपलब्धियों में भी आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक क्षेत्रों में लैंगिक हिस्सेदारी की खाई बनी रही। दुनिया बदलने, दुनिया की पुनर्रचना की महान घटनाओं ने भी अपने लैंगिक अधूरेपन से यह जाहिर कर दिया कि स्पष्ट स्त्रीवादी दर्शन और निर्णायक सहभागी हस्तक्षेप के बिना स्त्री- पुरुष समता या समतापूर्ण लैंगिक विविधता हासिल नहीं होनेवाली। विश्व की सही पुनर्रचना नहीं होनेवाली।

जिस तरह पूंजीपति समाजवाद का सपना नहीं देख सकता, भावुक आवेग या  दुर्लभ अपवादात्मक समतानिष्ठा से देख भी ले तो समाजवाद नहीं ला सकता , ब्राह्मण सामाजिक समता जातिमुक्ति का सपना देख और साध नहीं सकता, उसी तरह पुरुष भी कभी भी स्त्री- पुरुष समता का लक्ष्य हासिल नहीं कर सकते। इस अर्थ में दुनिया बदलने, फिर से गढ़ने की अनिवार्यता स्त्रीवाद की पहली और बुनियादी प्रेरणा है। स्त्रीवाद किसी भी वैश्विक रचना, पुनर्रचना के औचित्य परीक्षण का पैमाना भी है।

दुनिया चाहे जितनी बदली हो, सहूलियत और साधनों से भर गयी हो, अभी भी औरतों की जान, औरतों की गरिमा, औरतों की अपनी चाह की कोई परवाह नहीं करता। कभी-कभी तो बदलती दुनिया औरत के लिए ज्यादा निर्मम, अन्यायी और अत्याचारी हो जाती है। 2014 के बाद का बदलता भारत औरअमरीका के साम्राज्यवाद से मुक्ति की साँस लेता अफगानिस्तान औरतों के लिए ज्यादा जानलेवा हो गया है।

आजादी और लोकतंत्र के स्वप्नधाम अमरीका में अभी हजारों-लाखों औरतों को गर्भपात के हक की रक्षा और विस्तार के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। धर्म की रक्षा के लिए खून बहाना पवित्र समझने, हत्या और वध का फरक रचनेवाले जीवन के मर्म मासिकधर्म के खून की संभावना मात्र से अपवित्र महसूस कर रहे हैं। शायद ही दुनिया का कोई कोना मिले, जहाँ हर पैमाने पर समाज सचमुच इंसानी हो, जहाँ स्त्री-समाज पर पुरुष की कोई मनमानी न हो।

आज तो स्त्रीवाद का विस्तार हुआ है। थर्ड सेक्स की पहचान की स्वीकृति, एलजीबीटीक्यू समूह की आकांक्षा और हक की वैधता की दावेदारी, लैंगिक विविधता  के प्रति खुली सहजता स्त्रीवादी आंदोलन की संवेदनशीलता का हिस्सा बनता गया है।

दैनिक भास्कर के 3 अक्टूबर के अंक में संसद में महिलाओं की भागीदारी के कुछ आंकड़े आए हैं। इसमें कहा गया है कि रवांडा की संसद में 61. 3 फीसद महिलाएं हैं।  अभी हाल ही में आइसलैंड के चुनाव में संसद के लिए 47.6 फीसद महिलाएं चुनी गयीं। क्यूबा की संसद में 53.4 फीसद , निकारागुआ में 50.6 फीसद और यूनाइटेड अरब अमीरात में 50 फीसदमहिलाएं संसद में हैं। यानी चार-पाँच देशों को छोड़कर कहीं भी महिलाएं 40 फीसद से ज्यादा उच्च विधायी राजनैतिक प्रतिनिधित्व में नहीं हैं। इन संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी भी महिलाओं की निर्णायकता का पूरा पैमाना नहीं है। यह कह सकते हैं कि वहाँ के समाज में महिलाओं को राजनीतिक भूमिका देने के प्रति खुलापन और गतिशीलता है। ध्यान दें यूएई में 50 फीसद महिलाएँ संसद में हैंफिर भीमहिला अधिकारों और महिलाओं को हासिल आजादी के मामले पर यूनाइटेड अरब अमीरात कहीं से भी सकारात्मक नहीं माना जाता। किस संसद में सांसदों के कितने अधिकार हैं, संसद की पूरी निर्णायक राजनीति में क्या भूमिका है, इससे ही इन महिला सांसदों के राजनीतिक प्रभाव का आकलन होगा। दशकों की माँग और हंगामे के बाद, संसद में बिल पेश होने के बाद भी आज तक महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण अपने भारत में नहीं मिला है इस सच्चाई को भी साथ ले लें। इन सबसे दुनिया में राजनीति में महिलाओं की स्थिति की एक झलक मिल जाती है।

आमतौर पर राजनीति या सरकार के फैसले समाज के फैसलों से, संस्कृति की मान्यताओं से ज्यादा उदार होते हैं।  संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकारों के साथ-साथ स्त्री अधिकारों की भी घोषणा की है। लेकिन इन अधिकारों का अमल ना होने पर वैश्विक स्तर पर देशों के द्वारा  संयुक्त रूप से क्या न्यूनतम कार्रवाई अवश्य होगी, इसपर स्पष्ट प्रावधान सुनने-जानने को नहीं मिलता। संयुक्त राष्ट्र की संरचना में स्त्री निर्णायकता और भागीदारी कितनी होगी, इसपर कुछ साफ-साफ नहीं दिखता। हमें दुनिया की पुनर्रचना में स्त्रीवाद की भूमिका को चिह्नित करते वक्त संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक  मंचों पर स्त्री अधिकारों के पक्ष में क्या-क्या बातें होनी चाहिए, इसपर अवश्य ध्यान देने की जरूरत है। इस संदर्भ में कई माँगें हो सकती हैं। जैसे सभी देशों में स्त्री और पुरुष की अनिवार्यत: समान प्रातिनिधिक  भागीदारी हो। पूरे संयुक्त राष्ट्र की संरचना में स्त्रियों की पुरुषों के समान भागीदारी हो। स्त्रियों के संदर्भ में कोई भी फैसला हो तो स्त्री सदस्यों की सहमति के बिना ना हो। स्त्रियों को एक गुट के रूप में  प्रतिकूल फैसलों को रोकने का अधिकार हो। पाँच-छह देशों के वीटो अधिकार से ज्यादा जरूरी इस तरह के वंचित समुदायों के प्रतिनिधियों के वीटो  अधिकार हैं। अफगानिस्तान जैसी परिस्थिति पर कोई न कोई फैसला हो, जहाँ खुलेआम कानूनी या हुक्मरानी तरीके से महिला अधिकारों को धार्मिक कारणों से नकारा जा रहा है। ऐसे फैसलों पर रोक लगाने, कम से कम उनकी निंदा करने, उनसे असहयोग करने, उन्हें अमान्य करने, महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में सीधा हस्तक्षेप करने का कोई न कोई स्वरूप विकसित करना ही चाहिए।

स्त्रीवादी जीवन दृष्टि पर, स्त्री-पुरुष समानता पर, समतापूर्ण लैंगिक विविधता पर आधारित वैश्विक पुनर्रचना सिर्फ राजनीतिक-शासकीय स्तर पर नहीं होगी। इसके लिए सांस्कृतिक पुनर्रचना भी जरूरी होगी। यहाँ आते ही एक बेहद जटिल स्थिति से हमारा सामना होता है। हमारी सारी बातें अभिजनी, राजनीतिक लगने लगती हैं। एक ओर हम नयी समता संस्कृति के स्त्रीवादी सृजन की बात कर रहे हैं। स्त्रियों को नयी संस्कृति के पहलकारी रचनाकार के रूप में सक्रिय देखना चाहते हैं। दूसरी ओर महिलाओं को पुरानी विषमतावादी पुरुषसत्तात्मक संस्कृति के रक्षक और अनुपालक के रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा है। समाज की अधिसंख्य महिलाएं इसे खुशी-खुशी निभाती दिख रही हैं। पुरानी पुरुषवादी संस्कृति के संरक्षक से औरतों को नयी  स्त्रीवादी संस्कृति के सर्जक के रूप में कैसे बदलें- यह एक बड़ी माथापच्ची की माँग करता है। इसपर कुछ व्यावहारिक सोचना-करना काफी जरूरी है। हमें साबित करना है, महिला-मनों में बैठाना है कि स्त्रीवाद  अभिजन आकांक्षा और दृष्टि नहीं है। एक-एक स्त्रीजन की जिन्दगी की जरूरत है। और आज से ही कदम दर कदम इसे हासिल करने की दिशा में चलना संभव है।

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