सांप्रदायिक ताकतों की फितरत

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— मुनेश त्यागी —

भी तरह की साम्प्रदायिक ताकतें वैसे तो अपने अपने धर्म की बातें करती हैं। पर असल में ये ताकतें धर्म की कम, अधर्म, अंधविश्वास और धर्मान्धता की बातें ज्यादा करती हैं। इनकी सोच और दृष्टिकोण एकदम अवैज्ञानिक हैं। इन्हें तर्क, विवेक, विश्लेषण, आलोचना और समालोचना से कोई मतलब नहीं है। वैज्ञानिक संस्कृति में, वैज्ञानिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार प्रसार में इनका कोई यकीन नहीं है।

साम्प्रदायिक ताकतें, दूसरे धर्मों से नफरत करना सिखाती हैं। दूसरे धर्मों के खिलाफ हिंसा का जहर उगलती हैं और नफरत फैलाती हैं। इस मायने में इन तत्त्वों को धार्मिक ताकतें नहीं कहा जा सकता। यह ताकतें सांप्रदायिक सद्भाव और सांप्रदायिक सौहार्द की दुश्मन हैं, गंगा जमुनी तहजीब इनको पसंद नहीं आती, ये हिंदू मुस्लिम एकता को तोड़ कर जनता का बुरा चाहती हैं, उसको खंड खंड करना चाहती हैं। इनमें बौद्धिकता एकदम गौण होती है। ये ताकतें बौद्धिकता की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं क्योंकि इनकी बातों में तर्क, विश्लेषण और विवेकशीलता का कोई स्थान नहीं है। उनकेे आकाओं ने जो कह दिया बस वही सच है। इसके अलावा सब झूठ है।

हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक तत्त्वों में ब्राह्मण बनियों का वर्चस्व है। इन्हें विचारक नहीं प्रचारक चाहिए। हिंदुत्ववादी ताकतें मनुस्मृति को अपना आदर्श मानती हैं और भारत के संविधान में इनका कोई विश्वास नहीं है। यही हाल इस्लामिक सांप्रदायिक ताकतों का भी है, इनका भी देश के संविधान में कोई विश्वास नहीं है।

सांप्रदायिक ताकतें जातिवाद में विश्वास करती हैं। ये ताकतें सांप्रदायिक तनाव भड़काने में लगी रहती हैं, पर यह ध्यान रखती हैं कि इसकी कीमत उनके अपने लोगों को न चुकानी पड़े। फसाद का काम ये औरों से करवाना चाहती हैं। अपने बच्चों को इनसे बचाए रखती हैं। इनमें से अधिकांश लोग अपने बच्चों को अच्छे अच्छे स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, जबकि दूसरों के बच्चों को फसाद और हिंसा में झोंक देना चाहते हैं।

ये ताकतें कट्टर मानसिकता का विकास करती हैं, मनुष्य को कट्टरपंथी और हिंसक बनाती हैं। मनुष्य विवेकशील और तर्कशील बने, यह इन्हें गवारा नहीं। ये ताकतें शूद्रों को, एससी-एसटी को, ओबीसी को सामाजिक न्याय के लिए संगठित नहीं होने देना चाहतीं। इसीलिए इन तबकों को वे बेकार के झगड़ों में उलझाये रखने की कोशिश करती हैं। इन्हें यह डर सताता है कि अगर ये तबके बराबरी और न्याय के लिए संगठित होकर संघर्ष करेंगे तो इनकी सत्ता नहीं रहेगी, इनके न्यस्त स्वार्थ पूरे नहीं होंगे। सब प्रकार की सांप्रदायिक ताकतें साम्राज्यवाद की पोषक हैं।

जनता द्वारा भुगती जा रही बुनियादी समस्याओं….रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा स्वास्थ्य, रोजगार, असुरक्षा जैसी समस्याओं से इन्हें कुछ लेना देना नहीं है। ये ताकतें शोषण, अन्याय, भेदभाव, असमानता, अन्याय, भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ नहीं लड़ना चाहतीं, सही मायने में आतंकवाद से भी नहीं लड़ना चाहतीं, छोटे-बड़े और ऊंच-नीच की मानसिकता से भी नहीं लड़ना चाहतीं, इनका खात्मा करने को तैयार नहीं हैं, बल्कि इनको कायम रखना चाहती हैं।


उपरोक्त समस्याओं का समाधान सभी प्रकार की सांप्रदायिक ताकतों के एजेंडे में नहीं है। सांप्रदायिक ताकतें पूर्ण रूप से सामंतवादी, पूंजीवादी, साम्राज्यवादी और उदारीकरण की नीतियों की अलंबरदार हैं, उनकी बगलगीर हैं, उनको बढ़ाना चाहती हैं, उनका खात्मा नहीं चाहतीं। आज ये इन्हीं नीतियों का पालन कर रही हैं और पूरी जनता को नव साम्राज्यवाद का गुलाम बनाने पर आमादा हैं।

वर्तमान में हम देख रहे हैं कि ये सांप्रदायिक ताकतें जनविरोधी नीतियों पर चल रही हैं। इनका जन-विरोधी रवैया यहां तक पहुंच गया है कि इन्होंने किसानों और मजदूरों पर गुलामी के कानून थोप दिए हैं। इसे थोपना ही कहा जाएगा क्योंकि ये कानून भले किसानों और मजदूरों के हित के नाम पर बनाए गए हों, ये किसानों और मजदूरों की मर्जी के खिलाफ बनाये गये, और उनके तमाम विरोध के बावजूद इन कानूनों को वापस नहीं लिया जा रहा है।

इन तत्त्वों का समानता, न्याय, आजादी, संविधान, कानून के शासन, जनतंत्र, गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों में कोई यकीन नहीं है। दुनिया में जो ये आधुनिकतम विचार हैं, उनमें इन तत्त्वों का कोई विश्वास नहीं है। इनका आधुनिक भारत के निर्माण में ना कोई यकीन है और ना ही कोई योगदान है।

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