जीत का जश्न और आगे की फिक्र : जोगिन्दर सिंह उग्राहाँ

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खिरकार वह दिन आ गया जिसके लिए लाखों किसान बड़े धीरज और दृढ़ संकल्प के साथ डेढ़ साल से तमाम तरह की तकलीफें उठा रहे थे। उनकी सबसे प्रमुख माँग स्वीकार कर लिये जाने का एलान खुद प्रधानमंत्री ने किया। उनकी इस घोषणा को देश के किसानों ने बड़े ध्यान से सुना और किसानों के संघर्ष से सहानुभूति रखनेवाले अन्य तमाम मेहनतकश तबकों ने भी काफी उत्सुकता दिखाई। और वातावरण जय-घोष से गूँज उठा, भावनाएँ हिलोर मारने लगीं, जीत का जश्न मनाया जाने लगा। जिन व्यक्तियों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी उनके चेहरे आंदोलनकारी किसानों की आंखों के आगे सजीव हो उठे। उनकी शहादत को याद किया गया और उनके प्रति श्रद्धा अर्पित की गयी। देश के मेहनतकश तबकों ने अपनी एकता और इस संघर्ष की बुलंदी का जश्न मनाया, जिस संघर्ष ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे।

लेकिन प्रधानमंत्री ने तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने की घोषणा का जो तरीका अख्तियार किया उससे एक बार फिर उनकी फासिस्ट व जन-विरोधी मानसिकता का ही पता चलता है। उन्होंने न सिर्फ मंत्रिमंडल की बैठक बुलाने की कोई जरूरत नहीं समझी बल्कि इकतरफा घोषणा करके आंदोलन के नेतृत्व को भी नजरअंदाज किया। इस विशाल जन आंदोलन की सबसे प्रमुख माँग मान लिये जाने की घोषणा करने से पहले कायदे से उन्हें किसान आंदोलन के नेतृत्व से बात करके सर्वसम्मति बनानी चाहिए थी। लेकिन इस तरह के प्रयास करने के बजाय उन्होंने मोदी है तो मुमकिन है वाली पहले से अपनी गढ़ी हुई छवि को ही चमकाने की कोशिश की। यह एक ऐसी छवि है जिसके आधार पर मोदी ने दूसरों की राय को हमेशा दरकिनार किया है, यह ऐसी छवि है जिसने असहमति की हर आवाज को अनसुना किया है और जनता की न्यायसंगत तथा वाजिब माँगों के प्रति बेरुखी दिखाई है। यह एकदम अलग बात है कि संघर्षशील जनता के लिए इस उपलब्धि का अर्थ बदला नहीं जा सकता।

प्रधानमंत्री ने देश के नाम अपने संबोधन में तीन कृषि कानूनों के तहत कृषि के कारपोरेटीकरण को सही ठहराने की कोशिश की। उन्होंने इन कानूनों को देश के सारे किसानों का समर्थन हासिल होने का दावा किया, और इन कानूनों का देशभर में व्यापक विरोध उनकी निगाह में बस मुट्ठीभर किसानों का विरोध था। दरअसल, अपने संबोधन में उन्होंने दुनिया की साम्राज्यवादी कंपनियों और बड़े कारपोरेट घरानों से माफी माँगी, इस बात के लिए कि वह इन कानूनों के बारे में जनता को बरगलाने में कामयाब नहीं हो सके। इसी के साथ उन्होंने अपनी यह प्रतिबद्धता दोहरायी कि वह उसी रास्ते पर चलते रहेंगे जिस पर वह चल रहे थे।

तथाकथित सुधारों की खातिर जीरो बजट खेती और कृषि के विविधीकरण जैसे विचार दोहराये गये। प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद कृषिमंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने भी अपने एक बयान में कृषि को लेकर पहले के रुख को ही दोहराया और कहा कि इसके लिए वैकल्पिक उपाय तलाशने की कोशिश की जाएगी। यहाँ तक कि एमएसपी पर प्रस्तावित समिति भी इन वैकल्पिक उपायों के दायरे से बाहर नहीं होगी। जब कारपोरेट हितों के प्रति समर्पण इतना गहरा हो तो यह आसान जीत नहीं हो सकती और इस जीत पर पानी फिर जाने का खतरा हर वक्त मँडरा रहा है। तीन कृषि कानूनों को निरस्त किये जाने के एलान-भर से हमारे खेतों और फसलों पर छाया संकट दूर नहीं हुआ है। यह सिर्फ वक्त की बात है कि संकट में डालने के वैसे ही प्रयास फिर किये जाएंगे।

आंदोलन के दौरान भी सरकारी खरीद से भागने का सरकार का रवैया कायम रहा है। तीनों कानूनों के निरस्तीकरण के लिए जो तकनीकी भाषा इस्तेमाल की गयी उसके छिपे अर्थ पर गौर करने की जरूरत है ताकि हम समझ सकें कि किसानों के हितों पर कुठाराघात करने के लिए परदे के पीछे किस तरह के कुचक्र रचे जा रहे हैं। सरकार का इरादा इसी बात से जाहिर है कि उसने अभी अपने इस दावे को छोड़ा नहीं है कि प्राइवेट मंडी बनाकर वह किसानों को आजादी देना चाहती है।

सरकार की अब भी यही कोशिश रहेगी कि वह किसानों की मौजूदा जीत को उसकी तार्किक परिणति तथा मुकम्मल जीत न बनने दे, ऐसी जीत न बनने दे जो किसानों के हितों को आगे बढ़ाने में सहायक हो। सरकार हमारी माँगों को नजरअंदाज करना चाहेगी, एमएसपी और पीडीएस पर गारंटी, यहाँ तक कि कोई ठोस आश्वासन देने से भी बचना चाहेगी। और वह किसान नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को मुकदमों में फँसाये रखेगी।

लिहाजा, यह वक्त का तकाजा है कि सतर्क रहकर सरकार के इन इरादों को नाकाम किया जाए और लंबित माँगों को मनवाने के लिए दृढ़ता से संघर्ष जारी रखा जाए। संघर्ष का झंडा उठाये रखा जाए जब तक कि तीनों कानूनों के निरस्तीकरण का प्रस्ताव संसद से पास नहीं हो जाता, एमएसपी और पीडीएस की गारंटी नहीं हो जाती तथा बिजली बिल, प्रदूषण बिल, मुकदमों की वापसी और मुआवजे से जुड़ी माँगें मान नहीं ली जातीं। हमें सरकार के उन कदमों के प्रति सतर्क रहना होगा जो अनाज की खरीद में कारपोरेट को घुसाने के लिए उठाये जा सकते हैं। इस तरह के प्रयास नए कानून बनाकर या प्रशासनिक आदेश के जरिये या चोर दरवाजे से किये जा सकते हैं।

यह तय है कि सरकार ने कृषि को कारपोरेट के हवाले करने का जो रास्ता चुना है उससे वह बाज नहीं आएगी। इसलिए सतर्क रहने और एकता बनाये रखने के साथ ही इन मुद्दों पर जनता को जागरूक करना होगा। अगर माँगों को लेकर स्पष्टता नहीं होगी तो सरकार उनकी बाबत गलतफहमी फैलाने या उन्हें कुचलने में कामयाब हो जाएगी। तीनों कानून रद्द होने की खुशी के माहौल में अन्य मुद्दे भुलाये नहीं जाने चाहिए।

बेशक इस संघर्ष का पहला दौर हम जीत गये हैं। लेकिन मंडियों में फसलों का वाजिब दाम हासिल करने और मेहनतकश जनता की खातिर पीडीएस के जरिये भोजन का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए लंबा संघर्ष चलाना पड़ सकता है। ऐसे संघर्ष के लिए पहले से ज्यादा मजबूत और दीर्घकालीन एकता की जरूरत है। संघर्ष की आग तब तक जलाये रखनी होगी जब तक जीत की घोषणा हकीकत में नहीं बदल जाती। पहली जीत के जश्न में बड़े सरोकार हमारी नजरों से ओझल नहीं होने चाहिए।

(countercurrents.org से साभार)

अनुवाद – राजेन्द्र राजन

जोगिन्दर सिंह उग्राहाँ भारतीय किसान यूनियन (उग्राहाँ) के अध्यक्ष हैं और संयुक्त किसान मोर्चा के प्रमुख नेताओं में से एक हैं।

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