गांधी के विरोधी : दूसरी किस्त

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नारायण देसाई (24 दिसंबर 1924 – 15 मार्च 2015)

— नारायण देसाई —

रबन बंदरगाह पर हुए विरोध-प्रदर्शन में आगे-आगे रहे दो व्यक्ति बोअर युद्ध के समय गांधीजी की हिंदुस्तानी एंबुलेंस टुकड़ी के साथ-साथ ही चल रही गोरी टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। दोनों ने हिंदुस्तानियों की बहादुरी की तथा सेवा-भावना की गांधीजी के सामने काफी प्रशंसा की थी। बरसों बाद जब गांधीजी हमेशा के लिए दक्षिण अफ्रीका छोड़कर भारत आने के लिए निकले तब उन्हें डरबन बंदरगाह पर विदा करने के लिए आए लोगों में इन नेताओं के अलावा वे भी शामिल थे जिन्होंने दस साल पहले यह कहा था कि गांधी के मुँह पर डामर पोत देना चाहिए या उसे डरबन के समंदर में डुबा देना चाहिए।

दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के मुख्य विरोधी थे जनरल यान क्रिश्चियन स्मट्स, वहाँ की सरकार के प्रधानमंत्री। तीन बार गांधीजी को उनकी जेल का मेहमान बनना पड़ा था। स्मट्स दो बार समझौता वार्ताओं में अपनी कही हुई बात से मुकर गये थे। गांधीजी जब हिंदुस्तानियों का मसला लेकर इंग्लैंड गये तब जनरल स्मट्स भी वहीं थे और गांधीजी के विचारों से ब्रिटिश मंत्रिमंडल के सदस्य प्रभावित न होल जायं, यह देखने की उन्होंने खास एहतियात बरती थी। एक बार तो वह हिंदुस्तानियों पर लगाये गये तीन पाउंड के कर को रद्द कर दिया जाएगा, यह गोखले के सामने कबूल कर उससे मुकर गये। लेकिन गांधीजी अपने सत्याग्रही साथियों को समझाते रहते थे कि ऐसी बातों की बाबत हमें सावधान जरूर रहना चाहिए, पर सत्याग्रही का धर्म है मनुष्य पर विश्वास रखना, दूसरा पक्ष बीस बार दगा करे तो हमें इक्कीसवीं बार भी उस विश्वास करना चाहिए और फिर भी विश्वासघात हो तो हमारे पास उसके विरुद्ध सत्याग्रह का हथियार तो है न!

दक्षिण अफ्रीका के आखिरी सत्याग्रह ने अनुमान से कहीं ज्यादा बड़ा रूप धारण किया। हजारों गिरमिटियों के कूच की अगुआई करते हुए गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया। दो बार कूच को अनुशासनबद्ध करने के लिए उन्हें जमानत पर छोड़ा गया, पर तीसरी केस चलाकर उन्हें सजा दी गयी। रोज-रोज सत्याग्रहियों के जत्थे पकड़े जाते थे। आंदोलन और भी मजबूत बनता जाता था। उन्हीं दिनों दक्षिण अफ्रीका में रेल कर्मचारियों ने अपनी कुछ माँगों को लेकर हडताल की। उन कर्मचारियों ने गांधीजी को कहलाया कि आप अपना आंदोलन तेज कीजिए, हम अपना आंदोलन तेज करते हैं। दोतरफा दबाव आएगा तो सरकार को झुकना ही पड़ेगा। गांधीजी ने उस समय अपने सत्याग्रहियों को समझाया कि विरोधी जब मुश्किल में हो तब उस पर वार करना, यह सत्याग्रह के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। रेल हड़ताल चलने तक हम सत्याग्रह मुलतवी रखेंगे, उसके बाद फिर से चालू करना क्या हमें नहीं आता?

इस तरह सत्याग्रह कुछ दिन स्थगित रहा। फिर बाद में वह दुगुने वेग से चला। इस लड़ाई में आखिरकार समझौता हुआ और तीन पाउंड का कर तथा और गैर-ईसाई विधियों से हुए विवाहों को अमान्य करनेवाला कानून रद्द कर दिया गया। समझौते की शर्तों पर हस्ताक्षर होने के बाद जनरल स्मट्स के मंत्री ने गांधीजी से कहा, “आप पर हमें गुस्सा तो बहुत आता था। आप हिंसा करते तो आपको कुचल डालने में हमें देर न लगती। लेकिन क्या करें? गुस्सा भी किस तरह निकालें? आपने तो, हम मुसीबत में थे तब हमारी मुश्किलों का खयाल कर आंदोलन स्थगित कर दिया था! आप पर वार भी कैसे किया जाय?”

गांधीजी जब दक्षिण अफ्रीका छोड़कर भारत रहने के लिए चले गये तब तो जनरल स्मट्स ने राहत की साँस ली होगी। पर जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे वह गांधीजी को अधिक-से-अधिक समझते गये। 1931 में जब गांधीजी गोलमेज परिषद में भाग लेने के लिए इंग्लैंड गये तब जनरल स्मट्स ने एक अँग्रेज अधिकारी से कहा था कि आप गांधी को सिर्फ अपने पैमाने से मत नापो, यह तो संत-कोटि का आदमी है। उसे नापने का पैमाना अलग है।

गांधीजी जब जनरल स्मट्स की जेल में थे तब उन्होंने जेल में अपने हाथ से बनायी हुई सैंडल उन्हें भेंट के तौर पर भेजी थी। स्मट्स ने उसे आभारपूर्वक स्वीकार करके गांधीजी को कुछ पुस्तकें पढ़ने के लिए भेजी थीं। जब दुनिया-भर में गांधी शताब्दी मनायी जा रही थी तब जनरल स्मट्स ने उक्त सैंडल की जोड़ी जोहानिसबर्ग के राष्ट्रीय संग्रहालय को भेंट करते हुए कहा था किपहले कुछ साल तो हर गरमी में यह सैंडल घर में पहनता था, पर बाद में  मुझे लगा कि इस आदमी के पगचिह्नों पर पग रखने की मेरी काबिलियत नहीं है। इसलिए मैंने इसे भावी पीढ़ियों के लिए इसे सँभालकर रख दिया था। अब मैं सोचता हूं कि यह हमारे परिवार की ही संपत्ति न मानी जाय। यह समूची मानवजाति की संपत्ति है। लिहाजा, इसे सँभालकर रखने के लिए मैं राष्ट्रीय संग्रहालय को सौंपता हूँ।

आज सैंडल की वह जोड़ी जोहानिसबर्ग के संग्रहालय के मुख्य खंड में ऐसी जगह रखी गयी है कि सबका ध्यान खींचे। संग्रहालय का यह खंड जब खोला गया तब उसके प्रचार-पोस्टर में गांधीजी के बड़े-से चित्र के साथ छपा था- सत्याग्रह के जन्मस्थान जोहानिसबर्ग में जरूर पधारिए।

आजादी की लड़ाई के समय ऐसे बहुत-से अँग्रेज अधिकारियों से गांधीजी का पाला पड़ा था जिन्होंने उनका सख्त विरोध किया। अपना पक्ष रखते हुए गांधीजी कभी कोताही नहीं करते थे, पर वैसा करते हुए उनके मन में जरा-भी कड़वाहट नहीं रहती थी। मौका मिले तो वह उनके साथ व्यक्तिगत तौर पर नजदीकी साधने का प्रयास भी करते थे। राजकुमारी एलिजाबेथ के विवाह के समय गांधीजी ने माउंटबेटन के साथ, जो दूल्हे के सगे थे, नवदंपति के लिए अपने हाथ से काते सूत को दोहरा करके बट देकर चाय की टेबल पर इस्तेमाल किया जाने लायक खादी का टुकड़ा भेंट किया था। इस छोटे-से उपहार से राजकुमारी काफी प्रभावित हुई थी। उसे विवाह के समय मिले उपहारों में खादी के इस टुकड़े को ऐसी जगह रखा गया था कि वह खास ध्यान खींचे। उसने इस भेंट को काफी जतन से सँभालकर रखा भी था। विवाह के सात साल बाद किसी मेहमान के सामने इस प्रसंग की बात करते हुए एलिजाबेथ ने कहा था, देखो, तुमको कुछ दिखाती हूँ। यह कहकर वह उठकर गयी और थोड़ी देर में पास के कमरे में सँभालकर रखी गयी वस्तुओं में से यह गांधी-उपहार लेकर आ गयी थी।

गोलमेज परिषद के समय जब काफी अँग्रेज हाकिम यह दलील दे रहे थे किहमें तो आपको जल्दी-से-जल्दी स्वतंत्रता देनी है, पर आप क्या पूरी तरह स्वतंत्रता के लायक हो गये हैं? आपके लिए यह अभी दूर है!’ तब एक से अधिक बार गांधीजी ने महादेव देसाई, देवदास गांधी, मीराबहन और प्यारेलाल को समझाकर कहा था कितुम क्या समझते हो कि ये लोग हमें ठगने के लिए ऐसी दलील देते हैं। ये लोग सचमुच ऐसा ही मानते हैं। दोष इनका नहीं है। इनके जो प्रतिनिधि भारत में बैठे हैं वे लोग सतत इन्हें अपने मतलब की ही जानकारी देते हैं। इसलिए उनकी बात को ये ईमानदारी से कहते हैं, समझकर हमें अपनी बात इन्हें समझानी चाहिए। विरोधियों की बात एकदम झूठी साबित न हो जाय तब तक गांधीजी उसे ईमानदारी से कही हुई बात मानकर चलते थे। इसके कारण दूसरे पक्ष को गांधीजी अपनी बात काफी उत्कटता से समझाते थे और अपने को गलत नहीं माना यह जानकर विरोधी भी गांधीजी की बात सुनने-समझने के लिए मानसिक तौर पर अनुकूल हो जाता था।

यहाँ एक दूसरा मुद्दा भी उल्लेखनीय है। कई ऐसे राजनीतिज्ञों से गांधीजी का पाला पड़ता था जो उनके संपर्क में आने से बचना चाहते थे। गांधीजी के कुछ प्रशंसक तो यहाँ तक मानते हैं कि विरोधी यह समझकर गांधीजी से दूर-दूर रहते थे कि उनके मन में यह संदेह रहता था कि गांधी अपना निजी प्रभाव डालकर उनसे कोई काम करा लेंगे! जो हो, पर इतना तो स्वीकार करना पड़ेगा कि ऐसे मामलों में गांधीजी विरोधी व्यक्ति या समूह को अभिमुख करने में ज्यादा सफल नहीं हो सके थे। कई बार तो यह समझकर अपना काम किये जाते थे कि समय विरोधी व्यक्ति के हृदय में प्रवेश करने का मौका देगा।

इस तरह गांधीजी को इरादतन न माननेवालों में एक विन्स्टन चर्चिल थे। चर्चिल एक संवाददाता के रूप में गांधीजी से दक्षिण अफ्रीका में मिले थे। उसके बरसों बाद स्वराज के दावेदार के रूप में गांधीजी और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के समर्थक के रूप में चर्चिल जगविख्यात हो गये थे। गोलमेज परिषद के समय जब गांधीजी इंग्लैंड गये तब उन्होंने चर्चिल से मिलने की उत्सुकता दिखाई थी, पर चर्चिल ने उस बात को कोई तवज्जो नहीं दी। हां, विन्स्टन चर्चिल के बेटे रेन्डोल्फ चर्चिल गांधी से एक पत्रकार के रूप में मिलने के लिए आए थे। उन्होंने गांधीजी से एक ऐसा प्रश्न पूछा जो संभवतः उनके पिता का भी रहा हो सकता है। अलबत्ता यह सिर्फ अनुमान का विषय है। रेन्डोल्फ ने गांधीजी से पूछा, इस गोलमेज परिषद में अगर आपकी स्वराज की माँग न मानी जाय तो आप क्या करेंगे?’ गांधीजी ने ठंडे मन में जवाब दिया, सत्याग्रह। लेकिन इस बार पिछली बार की तुलना में ज्याद कष्ट सहने की तैयारी के साथ करूँगा। गांधीजी यह मानते थे कि मन में कड़वाहट रखे बिना अगर बोलें तो अप्रिय सत्य भी कहा जा सकता है।

(जारी)

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