स्वाधीन भारत की उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ

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— अरमान अंसारी —


जादी
, स्वतंत्रता, स्वाधीनता, स्वराज, अलग-अलग नामों से हम देश की उस परम उपलब्धि को जानते हैं जिसके लिए देश के हजारों  स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना बलिदान दिया था। उनके अमर त्याग के बाद आज़ादी रूपी फल की प्राप्ति हुई। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में आज इस बात के आकलन की जरूरत है कि इन 75 वर्षों में हमने क्या पाया और साथ ही वे कौन-कौन सी चुनौतियाँ हैं जो हमारे राष्ट्र के समक्ष उपस्थित हैं। जब हम उपलब्धियों का जिक्र करते हैं तो हमारा सरोकार निश्चित रूप से स्वाधीनता आंदोलन के दरम्यान देखे गये सपनों से है।

दरअसल, गुलाम राष्ट्र ने अपनी गुलामी के दरम्यान बहुत सारे सपने देखे थे। उन सपनों की पूर्ति के लिए स्वतंत्रता सेनानियों ने तमाम तरह की परेशानियों को खुशी-खुशी स्वीकार किया। हमारा पूरा स्वतंत्रता संग्राम, सम्पूर्ण भारतीय समाज की एकता के साथ लड़ा गया। आजादी के साथ-साथ विभाजन की विभीषिका भी साथ आयी। भारत से  विभाजित होकर पाकिस्तान का एक अलग राष्ट्र के रूप में उदय हुआ। विभाजन हमारे आज़ादी के आंदोलन और तत्कालीन नेतृत्व की सबसे बड़ी नाकामी थी। इन तमाम घटनाक्रम के बावजूद देश और उस समय के सम्पूर्ण नेतृत्व ने एक ऐसे देश की कल्पना की जिसकी बुनियाद किसी जाति और धर्म के आधार पर नहीं होगी। देश के सभी नागरिकों को समान नागरिक माना गया, उन्हें समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व के मूल्यों के आधार पर उनके साथ व्यवहार किया जाएगा।

आज़ादी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक, हमारे संविधान को मानना चाहिए। दरअसल, संविधान एक ऐसा पवित्रग्रंथ है जिसे देश के सभी नागरिकों ने समान रूप से स्वीकार किया है। संविधान ने अपनी प्रस्तावना में ही अपने सारांश की अभिव्यक्ति कर दी थी। आजादी की दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि लोकतंत्र को एक झटके में अपनाया जाना और पूरी राजनीतिक, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सभी नागरिकों की कानूनी रूप से समान भागीदारी सुनिश्चित करना रहा है।

यह काम यूरोप और अमेरिका में भी नहीं हो सका था। अमेरिका में तो महिलाओं को वर्षों  तक मतदान के अधिकार नहीं दिये गये थे। लेकिन भारत ने यह काम एक झटके में कर दिया। सम्पूर्णता में हम इन तमाम बातों को भारत नामक संकल्पना’ (आइडिया ऑफ इंडिया) कह सकते हैं। इस प्रकार भारत की संकल्पनाकी अभिव्यक्ति भारत का संविधान करता है।

संविधान के द्वारा जिस प्रकार के भारत की परिकल्पना की गयी थी उसके अनुरूप संस्थाओं का निर्माण सरकारों द्वारा किया गया। इनमें योजना आयोग से लेकर साहित्य अकादेमी तक आर्थिकसामाजिक-सांस्कृतिक विकास के लिए बनी संस्थाओं को गिनाया जा सकता है। दरअसल, किसी भी लोकतांत्रिक देश की सफलता ही स्वायत्त संस्थाएँ होती हैं। यह बात लगभग निर्विवाद रूप से स्वीकार की जाती है। संस्थागत उपलब्धियों के अलावा दूसरी उपलब्धियाँ भी रही हैं। देश निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर हुआ है। आजादी के समय हमारे लिए भोजन की समस्या थी, किसानों ने इस चुनौती को स्वीकार किया, आज हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन चुके हैं। लेकिन गलत विकास नीति के चलते, खेती-किसानी पर गंभीर संकट आ गया, जिसके कारण किसानों की आत्महत्या बढ़ी है। आज भी कृषि सेक्टर हमारे लिए एक प्रमुख चुनौती बना हुआ है।

आज़ादी के बाद देश ने मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल अपनाया। कुछ सेक्टरों में सार्वजनिक धन से भारी उद्योगों को बढ़ावा दिया गया। वहीं उत्पादन के कुछ क्षेत्रों को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए आरक्षित किया गया। इससे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन हुआ और बड़े उद्योगों की नींव मजबूत हुई। हालांकि यह स्थिति बहुत दिनों तक कायम नहीं रह सकी। आज़ादी के चौथे दशक बाद देश ने भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण का रास्ता अपनाया। कल तक उत्पादन का जो क्षेत्र लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए आरक्षित था, उन क्षेत्रों का दरवाजा भी क्रमशः बड़े उद्योगों के लिए खोल दिया गया। परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ी। आर्थिक असमानता भी तेजी से बढ़ी।

देश में सैकड़ों विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने प्रवेश किया। हजारों करोड़ का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश देश में आया। रोजगार जिस ढंग से बढ़ना चाहिए नहीं बढ़ा। थोड़ा बहुत रोजगार जिस दिशा में बढ़ा उसकी संख्या बहुत कम थी और एक खास तरह की योग्यता वाले अभ्यर्थियों के लिए ही सुलभ हो पायी। हालाँकि इस वैश्वीकरण की कुछ उपलब्धियाँ भी रही हैं। हमारे देश में शिक्षा, तकनीक, विज्ञान और संचार आदि में बदलाव देखे गये। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) आदि ने कुछ कीर्तिमान भी बनाया। इसरो के केंद्र से स्वदेशी उपग्रहों के साथ-साथ विदेशी उपग्रह भी अंतरिक्ष में भेजे गये। इससे देश में बहुत सारी सेवाओं का विस्तार हुआ।

सामाजिक सुरक्षा को मजबूत आधार देने के लिए सरकारों द्वारा कई तरह के कार्यक्रम चलाये गये। पोषण के लिए मध्याह्न भोजन, समन्वित बाल विकास योजना, नारी शक्ति के विकास के लिए किशोरी शक्ति जैसी योजनाएँ चलायी गयीं। श्रमिक को कानूनी अधिकार मिले इसके लिए राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून बने। हालांकि इसकी आलोचना भी हुई। इसमें कानूनी रूप से साल में मात्र सौ दिनों तक ही रोजगार की गारंटी दी गयी है। देश को कुपोषण से मुक्त किया जाय इसके लिए गरीबों को चिह्नित कर उन्हें खाद्य सुरक्षा दी गयी। इसके तहत अंत्योदय जैसे कार्यक्रम चलाये गये, जिससे बेहद सस्ता अनाज गरीबों को उपलब्ध कराया गया।

आलोचकों का मानना है कि गलत विकास के नीतियों के कारण संसाधनों का केंद्रीकरण हुआ है। इससे गरीबी बढ़ी है। लोग भोजन के लिए सरकार पर निर्भर हुए हैं तो यह सरकार की नाकामी है। वहीं खादी और ग्रामोद्योग आयोग को संशोधित कर लघु ग्रामीण उद्योगों के जरिये ज्यादा से ज्यादा रोजगार सृजन पर बल दिया गया। देश में असंगठित क्षेत्र के लोगों को सामाजिक सुरक्षा से लैस करने के लिए कई कार्यक्रम चलाये गये। अपनी उपलब्धियों के रूप में हम उपरोक्त तमाम मुद्दों को गिना सकते हैं।

इन तमाम उपलब्धियों के अलावा देश के सामने बहुत सारी चुनौतियाँ आज भी मौजूद हैं। इनमें एक बड़ी चुनौती सभी बच्चों को समान स्कूल प्रणाली के आधार पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की चुनौती है। वर्तमान में ऐसा देखा जा रहा है कि जिस बच्चे की जिस प्रकार की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि है उस बच्चे को उसी के अनुरूप शिक्षा और करियर मिल रहा है। यह एक लोकतांत्रिक और लोक कल्याणकारी राज्य के लिए शर्म की बात है।

यह लोकतंत्र और उसके मूल्यों  के लिए गंभीर चुनौती है। शिक्षा संबंधी चुनौती स्कूली स्तर पर सीमित नहीं है, बल्कि उच्चशिक्षा के स्तर पर भी यह चुनौती हमारा पीछा कर रही है। राज्यों के कॉलेज और विश्वविद्यालय बच्चों की तुलना में कम हैं, जो हैं वे लगभग शिक्षक विहीन स्थिति में हैं। कुछ-कुछ यही स्थिति केंद्रीय सरकारों द्वारा संचालित कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की भी है।

ऐसी स्थिति में इन शैक्षिक संस्थानों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उम्मीद कैसे की जाए। यही कारण है कि देश का एक भी विश्वविद्यालय, दुनिया के बेहतरीन 200 सौ विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल नहीं है। हमारे पड़ोसी देश चीन के लगभग एक दर्जन विश्वविद्यालय इस सूची में शामिल हो चुके हैं।

 अरसे से कुल सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की माँग की जाती रही है। लेकिन आज तक किसी सरकार की यह हिम्मत नहीं हुई कि वह जीडीपी का 6 फीसद शिक्षा पर खर्च कर सके जबकि इसकी माँग शिक्षा के संबंध में बनी विभिन्न समितियों ने की है। हाल के वर्षों में देखा गया है कि सरकार लगातार शिक्षा पर होनेवाले खर्च को बढ़ाने के बजाय कम रही है, यह चिंता का विषय है।

दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं है जो बिना सम्पूर्ण शिक्षा के विकसित हुआ हो और जहाँ भी यह उपलब्धि हासिल की गयी है, वहाँ सरकारी व सार्वजनिक धन से संचालित होनेवाली शिक्षा प्रणाली के माध्यम से हुई है। जबकि भारत में लगातार सार्वजनिक धन से संचालित होनेवाले स्कूल-कॉलेज कम हुए हैं, विद्याथियों की संख्या की तुलना में नये नहीं खुले हैं। आज जो मौजूद हैं वे शिक्षक-कर्मचारी व संसाधन विहीन स्थिति में हैं। इनसे किसी प्रकार की अकादमिक गुणवत्ता की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

आज भी देश में जातिवाद, क्षेत्रवाद, नक्सलवाद, अलगाववाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, लैंगिक भेदभाव व्याप्त है। आज भी 68 करोड़ लोग बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। गरीब और अमीर के बीच खाई तेजी से बढ़ी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य फैमली सर्वे के अनुसार अफ्रीका के बाद भारत के बच्चे दुगुने कुपोषण के शिकार हैं। इसके कारण बहुत सारे  बच्चों का शारीरिक विकास नहीं हो पाया है। कुपोषण की वजह से शिशु मृत्यु दर में लगातार इज़ाफा हो रहा है। प्रति हजार पर 37 बच्चों की मौत हो जाती है, जो बचते हैं उनमें कुछ बच्चों को बहुत गंभीर बीमारी भी हो जाती है। भारत में गर्भवती माताओं  की मृत्यु दर में कमी नहीं हुई है, हर दो घण्टे में एक माँ की मृत्यु हो जाती है। देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव तो है ही, वहीं डॉक्टरों की भी भारी कमी है।

महिलाओं पर होनेवाले अत्याचार में कोई कमी नहीं हुई है, भले चाहे जितने कड़े कानून क्यों न बने हों। आज भी लैंगिक असमानता और भेदभाव में कोई कमी नहीं आयी है। आज भी पाँच साल से कम उम्र के लड़कों की तुलना में लड़कियों की मृत्यु दर ज्यादा है। आज भी देश में बाल श्रमिकों की संख्या काफी है और यह संख्या कम होने के बजाय बढ़ रही है। इसका अर्थ है कि ये बाल श्रमिक स्कूल के दायरे से बाहर भी हैं। यह संख्या शिक्षा अधिकार कानून को भी मुँह चिढ़ाती नजर आती है।

न्याय के मामले में भी भारत फिसड्डी साबित हुआ है। पूरी न्यायिक प्रक्रिया इतनी महँगी और जटिल है कि आम आदमी को न्याय मिल पाना बहुत ही मुश्किल है। सस्ता न्याय कैसे मिले इस दिशा में सरकार कुछ करती नज़र भी नहीं आ रही है। वहीं पर्यावरण संबंधी मुद्दे पहले की तुलना में और गंभीर हुए हैं। देश के बहुत सारे शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हो चुकें हैं। स्वयं देश की राजधानी लगातार गंभीर प्रदूषण की चपेट  में रह रही है।

देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है लेकिन संसद के कामकाज का समय पहले की तुलना में घटा है। सांसदों के आचरण में जन समस्याओं को लेकर कोई गंभीरता नहीं दीखती। पूरी चुनावी व्यवस्था जटिल और महंगी हो गयी है। कोई साधारण नागरिक चाहे तो भी चुनाव लड़ने के अपने  राजनीतिक अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व और भागीदारी महत्त्वपूर्ण चीज होती है। आम आदमी की दृष्टि से इन दोनों स्तरों पर भारत फिसड्डी साबित हुआ है। ऐसी स्थिति में हमें आगे बढ़ना है तो जनता के साथ-साथ राजनेताओं को भी अपने आचरण में व्यापक बदलाव करने होंगे। लोकतांत्रिक संस्थानों को भी अपनी स्वायत्तता को सुनिश्चित करते हुए, सच्चे अर्थों में व्यापक जन भागीदारी को सुनिश्चित करना होगा। देश-समाज और उनकी समस्याओं के प्रति गंभीर होना होगा।

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