जनविरोधी नीतियों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल

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— गौतम मोदी —

भी 23 मार्च को पूरे देश ने भगतसिंह, सुखदेव, और राजगुरु की शहीदी को नमन किया। भाजपा के नेतागण और मोदी सरकार के मंत्री भी इसमें पीछे नहीं रहे। यह संघ परिवार की इतिहास को मिथक बनाने और अपनी असलियत छुपाने की कोशिश का हिस्सा है। ऐसे में यह और भी जरूरी हो जाता है, कि हम उन परिस्थितियों को भी याद करें जिनकी वजह से भगतसिंह और साथियों ने कुर्बानी दी। असेंबली हॉल में धमाके के बाद फेंके गए पर्चे में भगतसिंह ने लिखा था कि सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक (पब्लिक सेफ्टी बिल) और औद्योगिक विवाद विधेयक (ट्रेड्स डिस्प्यूट्स बिल) की आड़ में मजदूरों और उनके नेताओं पर दमन बढ़ाने की जो तैयारी सरकार कर रही है और जनता की आवाज कुचलने के लिए लाए जा रहे अखबारों द्वारा राजद्रोह रोकने का कानून (प्रेस सेडिशन एक्ट) के खिलाफ यह कदम उठाया जा रहा है। अंग्रेज घुसपैठियों के लिए यह धमाका एक चेतावनी थी कि जनता जाग रही है, कानून का सहारा लेकर लोगों का शोषण नहीं चलनेवाला।

हम आज एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जब भगतसिंह का पर्चा उतना ही प्रासंगिक है जितना तब जब 93 साल पहले इसे लिखा गया था।

पिछले तीन साल में पूर्ण बहुमत वाली दक्षिणपंथी सरकार ने एक ओर जहाँ मजदूर वर्ग को कोरोना महामारी के दंश से अपनी जान बचाने के लिए पूरी तरह से ‘आत्मनिर्भर’ छोड़ दिया था, ‌वहीं दूसरी ओर 4 लेबर कोड बिना किसी चर्चा या ‌विमर्श के आनन-फानन पारित कर दिए। इन 4 लेबर कोड में जिन कानूनों का संशोधन किया गया है उनमें औद्योगिक विवाद अधिनियम और ट्रेड यूनियन कानून भी शामिल हैं। यह मजदूरों के यूनियन बनाने और अपनी पसंद की यूनियन का सदस्य बनने के मौलिक अधिकार पर सीधा हमला है। जगजाहिर है कि भाजपा सरकार कानूनों में यह संशोधन अपने पूँजीपति आकाओं को रिझाने के लिए कर रही है क्योंकि कर्ज में माफी, टैक्स में भारी छूट और जल-जंगल-जमीन की मनमानी लूट करने देने पर भी भाजपा सरकार ‌विदेशी और देशी निजी पूँजी को निवेश करने के लिए प्रेरित करने में पिछले लगभग 8 सालों के अपने कार्यकाल में पूरी तरह से विफल रही है। इसलिए भाजपा सरकार ने अब पूँजी को लुभाने के लिए मजदूरों की श्रमशक्ति पर निशाना साधा है।

भाजपा सरकार सोचती है कि मजदूरों को गुलाम बनाकर और आँकड़ों का हेर-फेर कर ‘ईज आफ डूईंग बिजनेस’ जैसी लफ्फाजी से देश की आर्थिक स्थिति सुधारी जा सकती है। सच्चाई यह है कि महामारी शुरू होने से पहले ही बेरोजगारी अपने 45 साल के सबसे बुरे स्तर पर थी। महामारी के कारण दुनिया भर में आयी आर्थिक गिरावट ने मजदूर वर्ग का जीना मुहाल कर दिया है। बुरी आर्थिक नीतियों के कारण गए सालों में रोजगार के नए अवसर बनना तो दूर की बात है, सरकार ने खाली पड़े पदों पर भी सालों से नियुक्तियाँ नहीं की हैं।

कोरोना काल में जिन आशा, आँगनवाड़ी, सफाईकर्मी और अन्य कर्मचारियों को अत्यावश्यक सेवा प्रदाता कहा गया, जिन पर फूल बरसाये गए आज उनसे ठेके पर, कौड़ियों के मोल काम करवाया जा रहा है। स्थायी नौकरी और बेहतर मजदूरी की माँग करने पर उनपर लाठियाँ बरसायी जा रही हैं।

ग्रामीण क्षेत्र में लोगों का एकमात्र सहारा मनरेगा है, उसमें भी इस साल के बजट में 34 प्रतिशत की कटौती कर दी गयी है। ऐसा तब हो रहा है जब शहरों से वापिस गाँव लौटने पर मजबूर प्रवासी मजदूरों का एक बड़ा तबका मनरेगा पर आश्रित है और पिछले साल का करोड़ों रुपयों का भुगतान होना बाकी है।

आय न होने और महंगाई बढ़ने के कारण देश की अर्थव्यवस्था गर्त में चली गयी है। इस स्थिति से उबरने के लिए जरूरी है कि लोगों को सुरक्षित, स्थायी नौकरी मिले। जब लोगों के पास खर्च करने को पैसे होंगे तभी बाजार में माँग बढ़ेगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होेंगे। यह तभी संभव है जब सरकार अपनी मुद्रास्फीति नीति बदले, सामाजिक सुरक्षा पर अपना खर्च बढ़ाए ताकि पैसा सीधा लोगों की जेब तक पहुँचे। लेकिन भाजपा सरकार की नीतियाँ इसके बिलकुल विपरीत हैं। पैसा उगाहने के लिए सरकार ने भविष्यनिधि पर मिलनेवाली ब्याज दर में कटौती कर दी है, जिससे अनिश्चितता और बढ़ गयी है। सरकारी उपक्रमों जैसे कि भारतीय बीमा निगम आदि में विनिवेश की तैयारी चल रही है, या फिर उन्हें निजी कंपनियों को औने-पौने दाम पर बेचा जा रहा है। रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डे, बंदरगाह, बैंक आदि का लगातार निजीकरण हो रहा है।

जिन पूँजीपतियों को सरकार सार्वजनिक संपदा बेच रही है वे सरकारी बैंक के कर्जदार हैं। राजनीतिक दबाव में इन पूँजीपतियों का कर्ज माफ करने के कारण सरकारी बैंक दिवालिया होने के कगार पर पहुँच गए हैं।

इतिहास बताता है कि जब-जब आर्थिक संकट गहराता है, दक्षिणपंथी ताकतें सर उठाती हैं। भारत का भी यही हाल है। सत्तासीन पार्टी आर्थिक संकट से ध्यान भटकाने के लिए देश को सामाजिक संकट के कुएं में धकेल रही है। लोगों के बीच धार्मिक विद्वेष बढ़ाया जा रहा है, लगातार लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो रहा है जिसमें देश की कार्यपालिका और न्यायपालिका भी सरकार का साथ दे रही है। देश के निराश, हताश व बेरोजगार युवा वर्ग को नफरत की अफीम चटाकर हिंसा के लिए प्रेरित किया जा रहा है। मेहनतकश जनता को जाति, धर्म, प्रांत, भाषा आदि के आधार पर भड़का कर आपस में लड़ाया जा रहा है।

बहुसंख्यक धार्मिक सम्मेलन और चुनावी मंचों से निरंकुश भड़काऊ भाषण दिए जा रहे हैं, संघ परिवार के पुरुषप्रधान और हिन्दुत्ववादी सोच का खुलकर प्रचार किया जा रहा है। इसका प्रतिकूल परिणाम साफ दिखने लगा है, मुस्लिम किशोरियों को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है, उनके पहनावे को निशाना बनाकर उनपर हमले किए जा रहे हैं, महिलाओं की प्रतिभागिता श्रम बाजार में लगातार घट रही है। जनता के हक की बात करनेवाले लोगों को आतंकवादी और देशद्रोही बताकर उन पर केस चलाए जा रहे हैं। मजदूर और उनके यूनियन इन फर्जी मामलों से अछूते नहीं हैं। ट्रेड यूनियन अधिकार लोकतांत्रिक अधिकारों संग गुंथे हुए हैं। यदि लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन जारी रहा तो मजदूरों के अधिकार भी सुरक्षित नहीं रहेंगे।

वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा है कि देश को आजादी का अमृत काल मनाने की तैयारियाँ करनी चाहिए। आजादी से अब तक का यह सबसे अंधकारमय काल होगा जब देश बेरोजगारी, भुखमरी, अशिक्षा और वैमनस्य की चपेट में होगा। मजदूर वर्ग को अमृत काल नहीं द्रोह काल की तैयारी करनी होगी। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा 28-29 मार्च 2022 को आम हड़ताल का आह्वान मजदूर विरोधी कानूनों और लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल है। न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव इस जंग में मेहनतकश वर्ग के हर लड़ाके के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है और भगतसिंह की कही बात को दोहराता है कि– एक युद्ध जारी है और यह युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक चंद शक्तिशाली लोगों का मेहनतकश जनता के संसाधनों पर कब्जा खत्म नहीं हो जाता।

(workersunity.com से साभार)

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