‘न्यू इंडिया’ में ‘सीवर’ से सफाईकर्मियों की मौत का बढ़ता ग्राफ

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र नागरिक को गरिमामय जीवन मुहैया कराना लोकतंत्र में सरकार का दायित्व होता है। लेकिन आज जब हम रात-दिन ‘न्यू इंडिया’ का डंका पीटते नहीं थक रहे हैं, तब भी सीवर में सफाईकर्मियों के दम तोड़ने की खबरें लगातार आती रहें तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।

‘न्यू इंडिया’ में सफाईकर्मियों के जीवन के साथ खिलवाड़ बदस्तूर जारी है। हाल में देश की राजधानी दिल्ली में दो दिन में 6 सफाईकर्मियों की जान सीवर ने ले ली। इसी दौरान बीकानेर (राजस्थान) और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से करीब 200 किमी दूर, पुणे शहर में सैप्टिक टैंक को साफ करने के दौरान 4-4 मजदूरों की दम घुटने की वजह से दर्दनाक मौत हो गयी। लखनऊ में भी सीवर साफ करने उतरे 2 कर्मियों की मौत हो गयी। ये कर्मी 3 घंटे सीवर लाइन में फंसे रहे। यही नहीं, सीवर में मौतों (हत्याओं) का यह सिलसिला अंतहीन हो चला है। देश की बात करें तो पाँच दिनों में 16 लोग सीवर में घुसने से दम तोड़ चुके हैं या यूं कहें कि घुसाकर मार दिए गए।

खबरों के मुताबिक, पिछले एक हफ्ते में देश भर में 16 लोगों की सीवर में मौत हो गयी। इनमें दिल्ली में 6, यूपी में 4 (लखनऊ व रायबरेली में 2-2) तथा हरियाणा (नूंह) में 2 लोग मारे गए। दिल्ली में 2 लोगों की मौत दिल्ली जल बोर्ड सीवर प्लांट कोंडली में हुई। इनके नाम नीतेश (25) और यश देव (26) हैं। ये मोटर ठीक करने सीवर प्लांट में बिना सुरक्षा उपकरण के उतरे थे। सीवर में जहरीली गैस होती है। संभावना यही है कि गैस की चपेट में आकर ये लोग अचेत होकर नीचे गंदे पानी में गिर गए और दम घुटने से इनकी मौत हो गयी। यह घटना 30 मार्च की है। दिल्ली की दूसरी घटना 29 मार्च की है जहाँ संजय गाँधी ट्रांसपोर्ट नगर में सीवर में फंसे 4 व्यक्तियों की मौत हो गयी। रोहिणी के ई-ब्लाक में एमटीएनएल के केबल की मरम्मत चल रही थी। सीवर में टेलीफोन और बिजली के तार थे। मरम्मत के लिए 15 फीट गहरे सीवर में पहले बच्चू सिंह व पिंटू गए। फिर जब बहुत देर तक कोई हलचल नहीं हुई तो ठेकेदार सूरज साहनी भी सीवर में उतर गया लेकिन वह भी बाहर नहीं आया। इसी दौरान वहाँ से गुजर रहा ई-रिक्शा चालक सतीश फँसे लोगों को निकालने के लिए सीवर में उतरा पर वह भी बाहर नहीं आया। सीवर की जहरीली गैस ने चारों को अपनी चपेट में ले लिया था।

डीसीपी बीके यादव ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि सीवर में घुसने के दौरान इन लोगों के पास जरूरी सुरक्षा उपकरण नहीं थे। इनके पास ऑक्सीजन सिलेंडर व बॉडी प्रोटेक्टर होने चाहिए थे। बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर में उतरना मौत को बुलावा देना है। ऐसे में जो इन्हें बिना सुरक्षा उपकरणों के उतारता है वह इनकी मौत (हत्या) का जिम्मेदार होता है। एमएस (मैनुअल स्कवेंजर) एक्ट 2013 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी को सीवर में घुसने के लिए बाध्य करता है तो उसके लिए जेल और जुर्माने दोनों का प्रावधान है। पर दुखद है कि प्रशासन के ढुलमुल रवैये के कारण इन हत्याओं के जिम्मेदार व्यक्ति को सजा नहीं मिलती। पुलिस लापरवाही की धारा 304ए के तहत केस दर्ज करती है और बाद में मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। इस तरह की मौतों के प्रति सरकार खुद लापरवाह है। सरकार को पता है कि एमएस एक्ट 2013 और सुप्रीम कोर्ट के 27 मार्च 2014 के आदेश के तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर में नहीं उतारा जा सकता। इमरजेंसी हालात में भी बिना सुरक्षा उपकरण के किसी को सीवर में उतारना दंडनीय अपराध है। जहाँ तक संभव हो सीवर के अंदर किसी भी कार्य के लिए मशीनों की सहायता ली जानी चाहिए। जब तक प्रशासन इन मौतों को गंभीरता से नहीं लेगा, दोषी लोगों को कड़ी सजा नहीं देगा तब तक भविष्य में भी इस तरह की वारदात होती रहेंगी। अतीत में भी इस तरह की घटनाएँ हुई हैं।

राजधानी दिल्ली की बात करें तो 26 मार्च 2021 को पटपड़गंज इंडस्ट्रियल एरिया में सीवर सफाई के दौरान दो लोगों की मौत हो गयी थी। 10 सितंबर 2018 को मोती नगर स्थित सोसाइटी के सेप्टिक टैंक की 5 लोगों की जान गयी थी। 12 अगस्त 2017 को शाहदरा में सीवर सफाई के दौरान दो भाइयों की मौत हो गयी थी। 6 अगस्त 2017 को जहरीली गैस की वजह से लाजपत नगर में 3 सफाई कर्मचारियों की मौत हो गयी थी। इस तरह सीवर के अंदर मौतों का अंतहीन सिलसिला जारी है। अब जब देश की राजधानी दिल्ली में ऐसी वारदातें हो रही हैं तो देश के अन्य भागों की क्या बात करें। एमएस एक्ट का राजधानी में ही कार्यान्वयन नहीं हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना की जा रही है। इसके कार्यान्वयन के लिए राज्य के जिले का जिला अधिकारी जिम्मेदार होता है। सीवर के अन्दर किसी को घुसाने से पहले स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेनी होती है। फिर ये लोग प्रशासन की अनुमति क्यों नहीं लेते। नियम यह भी है कि जब भी किसी को इमरजेंसी स्थिति में सीवर में घुसाया जा रहा हो तो वहाँ कार्यस्थल पर सरकार का सम्बंधित विभाग का अधिकारी मौजूद हो। उसका काम है कि बिना सुरक्षा उपकरणों के किसी व्यक्ति को सीवर में न घुसने दें। ऐसे में कानून उल्लंघन के लिए उन्हें दंडित किया जाना चाहिए।

सफाई कर्मचारी आंदोलन के एक आँकड़े के अनुसार अब तक 2000 से अधिक लोग सीवर-सेप्टिक टैंकों में जान गंवा चुके हैं पर प्रधानमंत्री इस पर कुछ नहीं बोलते। संसद और विधानसभाओं में इन पर चर्चा नहीं होती। क्या सरकार असंवेदनशील हैं। क्या ये जान-बूझकर लोगों की हत्या करना नहीं है? क्या इन्हें रोकने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए? क्या सीवर-सेप्टिक टैंको में इंसान की बजाय मशीनों से काम करवाना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? क्या सरकार चाहे तो इस तरह होने वाली मौतों को रोका नहीं जा सकता है? रोका जा सकता है, बस राजनैतिक इच्छाशक्ति और मुद्दे के प्रति संवेदनशीलता होनी चाहिए। कारण यह भी है कि इनमें जान गँवाने वाले गरीब आम आदमी होते हैं जो थोड़े से पैसे के चलते जान जोखिम में डालने को तैयार हो जाते हैं।

खैर, कहने को देश में स्वच्छता मिशन का शोर है, लेकिन इसका उद्देश्य केवल शौचालय निर्माण करने तक ही सीमित होकर रह गया है। सरकार स्वच्छ भारत मिशन की फ्लैगशिप योजना के तहत शौचालय निर्माण के लिए हजारों करोड़ रुपए खर्च कर रही है, लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण सीवरकर्मियों की सुरक्षा आज भी अधर में झूल रही है। खास है कि 17 सितंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने मैला ढोने और बिना किसी यंत्र के सीवेज चैंबर की सफाई के मामले में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि दुनिया में ऐसा कोई दूसरा देश नहीं है जो लोगों को मरने के लिए गैस चैंबर में भेजता हो। कोर्ट ने कहा था कि आजादी के 70 वर्ष बाद भी जातीय शोषण व्यवस्था कायम है। आखिर सफाईकर्मियों को मास्क और ऑक्सीजन सिलैंडर जैसे सुरक्षा यंत्र क्यों नहीं दिए जा रहे? यही नहीं, देश में 6 दिसंबर, 2013 से हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम लागू होने के बाद हाथ से सीवर और सैप्टिक टैंक की सफाई प्रतिबंधित है। कानून कहता है कि सभी स्थानीय प्राधिकरणों को हाथ से मैला उठाने की व्यवस्था खत्म करने के लिए सीवर और सैप्टिक टैंकों की सफाई हेतु आधुनिक तकनीकें अपनानी होंगी। लेकिन दुर्भाग्य कहा जाएगा कि कानून बनने के बाद कई राज्यों में मैनुअल स्कैवेंजर्स की संख्या बढ़ गयी है।

सरकारी रुख देंखे तो 22 मार्च को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्यमंत्री रामदास अठावले ने बताया कि बीते 5 सालों में भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान 325 सफाईकर्मियों की मौत हुई है। आँकड़ों के मुताबिक सफाईकर्मियों की सबसे ज्यादा मौतें उत्तर प्रदेश और उसके बाद दिल्ली में हुई हैं। देश में सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य यूपी में इस दौरान 52, तो महज दो करोड़ की आबादी वाले राज्य दिल्ली में 42 सफाईकर्मियों की मौत हुई है। सांसद वांगा गीता विश्वनाथ, ए राजा, वाईएस अविनाश रेड्डी और कोथा प्रभाकर रेड्डी के लोकसभा में सफाईकर्मियों की मौत और मुआवजे से संबंधित सवाल के लिखित जवाब में 22 मार्च को रामदास अठावले ने बताया कि 2017 में 93, 2018 में 70, 2019 में 118, 2020 में 19 और 2021 में 24 सफाईकर्मियों की मौत हुईं। यह मौतें सिर्फ 22 राज्यों में हुई हैं। राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश में 5 सालों में 52, दिल्ली में 42, तमिलनाडु में 40, हरियाणा में 35, महाराष्ट्र में 30, गुजरात में 28, कर्नाटक में 26, पंजाब में 17, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और आंध्र प्रदेश में 13-13, तेलांगना में छह, चंडीगढ़ में तीन, ओडिशा और बिहार में दो-दो, केरल, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में एक-एक, वहीं उत्तराखंड, पुंडुचेरी, त्रिपुरा और गोवा में कोई मौत नहीं हुई है।

अब आँकड़ों में खेल देंखे तो केंद्र सरकार ने मृतकों के जो आँकड़ें जारी किए हैं वो राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (एनसीएसके) के आँकड़ों से अलग हैं। आरटीआई के जरिए, आयोग ने 2020 में 3 साल में काम के दौरान मरे सफाई कर्मियों का आँकड़ा जारी किया था। समाचार एजेंसी पीटीआई को मिले जवाब के मुताबिक 2019 में 110, 2018 में 68 और 2017 में 193 लोगों की मौतें हुईं हैं। 2017 में जहां राज्य मंत्री अठावले सिर्फ 93 सफाईकर्मियों की मौत का जिक्र करते हैं वहीं राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग 193 बताता है। यानी पूरे 100 कम। दूसरी तरफ 2018 में अठावले दो मौत ज्यादा बताते हैं वहीं 2019 में दोनों के बीच आठ मौतों का अंतर है। दरअसल सफाई के लिए आधुनिक मशीनों की सुविधाएं नहीं होने व ज्यादातर जगहों पर अनुबंध की व्यवस्था होने से सफाईकर्मियों की मौतें हो रही हैं।आयोग के अनुसार, बीते 3 वर्षों में जो 375 मौतें हुई है उनमें सबसे ज्यादा 50 मौतें उत्तर प्रदेश में हुई हैं। दिल्ली, तमिलनाडु व हरियाणा में 31-31 और महाराष्ट्र में 28 सफाईकर्मियों की मौत हुई। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग, केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की ही संस्था है। यानी एक ही संस्थान से दो-दो आँकड़े जारी किए गए हैं जो सरकारी गंभीरता के स्तर को दर्शाते हैं।

इसके अलावा भी मध्यप्रदेश जैसे कुछ बड़े राज्यों के आँकड़े हैरान करते हैं। केंद्र सरकार द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक मध्यप्रदेश में 5 सालों में सिर्फ एक सफाईकर्मी की मौत हुई है। यह मौत 2019 में हुई थी जबकि अलग-अलग समय में मीडिया में छपी खबरें सरकार के इस दावे पर सवाल खड़े करती हैं। मोदी सरकार के मुताबिक 2021 मध्यप्रदेश में किसी भी सफाई कर्मी की मौत नहीं हुई है। वहीं एनडीटीवी ने 14 दिसंबर 2021 को एक रिपोर्ट में बताया था कि भोपाल में सीवेज टैंक में उतरने से दो लोगों की मौत हो गयी थी।

यही नही, एक सर्वे के अनुसार सीवर की सफाई में लगे लोगों में से 49 फीसद को सांस संबंधी और 11 फीसद से अधिक को त्वचा संबंधी परेशानियाँ हो जाती हैं। गटर/सीवर साफ करनेवाले 90 फीसदी सफाई कर्मचारियों की 60 की उम्र से पहले ही मौत हो जाती है। उनके पास कोई उपकरण नहीं होता, जिससे पता लगाया जा सके कि सीवर में जहरीली गैस है या नहीं। ऐसे में ये हादसों के शिकार हो जाते हैं और अगर हादसों से बच जाते हैं तो इनके शरीर में बीमारियाँ घर कर जाती हैं जिससे ये भरी जवानी में ही मौत के शिकार हो जाते हैं। अब एक तरफ सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत बजट आवंटन बढ़ा रही है तो वहीं, दूसरी ओर मैनुअल स्कैवेंजरों के पुनर्वास को 2013-14 में सरकार ने 570 करोड़ रुपए का बजट आबंटित किया था, जिसे वर्ष 2017-18 में घटा कर सिर्फ 5 करोड़ कर दिया।

विचारणीय है कि जहाँ देश महाशक्ति बनने जा रहा है और हम रात दिन ‘न्यू इंडिया’ का राग अलापते नहीं थक रहे हैं, तकनीकी विकास में हम चाँद पर पहुँच रहे हैं, वहीं इन सफाईकर्मियों की सीवर में मौतें रोकने का बंदोबस्त हम नहीं कर पा रहे। इन सीवर सफाईकर्मियों को इस काम से मुक्त करने की जितनी जरूरत है, उतनी ही इनके लिए काम का पुनर्वास सुनिश्चित करने की भी दरकार है। साथ ही सैप्टिक टैंक में होनेवाली इन दर्दनाक मौतों की रोकथाम के लिए यांत्रिक उपायों, मसलन सकर मशीन जो मल को सबमर्सिबल पंप के माध्यम से खींच कर बाहर निकालती है, को उपयोग में लाने की आवश्यकता है। इस काम के लिए रोबोट की मदद भी ली जा सकती है। याद रहे स्वच्छता मिशन का अंतिम लक्ष्य तब तक अधूरा है, जब तक देश में सार्वजनिक स्वच्छता के कार्यों में लगे नागरिकों के जीवन में आधारभूत परिवर्तन लाकर उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अनुभव नहीं कराया जाता। अन्यथा ‘न्यू इंडिया’ का तमगा कोरी कल्पना ही होगा।

(‘सबरंग इंडिया’ से साभार)

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