स्वतंत्रता आंदोलन की विचारधारा – मधु लिमये : आठवीं किस्त

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मधु लिमये (1 मई 1922 - 8 जनवरी 1995)

न्याय प्रणाली में परिवर्तन

न 1857 के विद्रोह के बाद भारत में अंग्रेजों की हुकूमत सीधे इंग्लैण्ड की सरकार के हाथ में चली गयी। कुछ वर्षों बाद इंग्लैण्ड की रानी को हिंदुस्तान की साम्राज्ञी घोषित किया गया। ब्रिटेन द्वारा नियुक्त गवर्नर जनरल वायसराय कहलाने लगा। हिंदुस्तान के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के जरिये हिंदुस्तान की अंग्रेजी हुकूमत पर ब्रिटेन की संसद की निगरानी कायम की गयी।

अंग्रेजी प्रशासन से केवल हमारी अर्थव्यवस्था में ही नहीं, हमारे सामाजिक ढाँचे में भी बहुत बड़ा परिवर्तन आया। कानून और विधि के क्षेत्र में नए विचार प्रचलित हुए। हिंदू राजाओं और मुगल बादशाहों के जमाने में अपराधों की व्याख्या और न्याय वितरण परंपरागत कानूनों के तहत किया जाता था। प्रारंभ में अंग्रेजों ने यहाँ की कानून व्यवस्था में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं किया। प्रारंभिक चरण में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों में वंशवाद की भावना नहीं थी। अंग्रेजी शासक यहाँ के वरिष्ठ वर्गों के प्रतिनिधियों के साथ घुलमिल जाते थे। यहाँ तक कि उनके कई रस्मों-रिवाजों को भी उन्होंने अपना लिया था। वे हिंदुस्तानी ढंग का खाना खाने लगे थे, हिंदुस्तानी ढंग का जीवन बिताने लगे थे। यहाँ तक कि हिंदुस्तानी महिलाओं के साथ नाता-रिश्ता तक कायम करने लगे थे। यानी आनुवांशिक अभिमान और रंगभेद को अनदेखा कर देना जहाँ उनके व्यवहार का एक सकारात्मक रूप था, वहाँ अंग्रेज अधिकारियों में व्याप्त भष्टाचार और रैयत का शोषण करना उसका नकारात्मक रूप था। यहाँ पर धन बटोरने का उनको जो भी अवसर मिलता था, उसका वे भरपूर फायदा उठाते थे। कार्नवालिस के जमाने तक अंग्रेजों के जितने अधिकारी भारत में आए उनमें अधिकांश भ्रष्ट थे। रिश्वत लेना, मासूम लोगों को लूटना, उपहार लेना, निजी व्यापार के नाम पर लूट मचाना जैसे सारे काम वे करते थे।

परन्तु धीरे-धीरे जैसे-जैसे इंग्लैण्ड में परिवर्तन आने लगे, इंग्लैण्ड के राजनीतिक जीवन में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का बोलबाला कम होने लगा, नैतिकता और धार्मिकता से ओतप्रोत नए-नए मध्यम वर्ग के लोग सरकारी नौकरियों में भरती होने लगे, वैसे-वैसे हिंदुस्तानी शासन में मौजूद व्यापक घूसखोरी उनको खलने लगी। 19वीं शताब्दी के पहले हिस्से तक इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट सीमित मताधिकार पर आधारित थी। चुनाव में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार था। कई चुनाव क्षेत्र इने-गिने मतदाताओं के होते थे और चुनाव क्षेत्रों की खरीद-फरोख्त होती थी। कुछ चुनाव क्षेत्र में सिर्फ एक या दो मतदाता थे। एक अरसे से कुछ परिवार अपने सदस्यों को हाउस ऑफ कामन्स में भेजना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते थे।

इंग्लैण्ड में आधुनिक लोकतंत्र का प्रारंभ 1832 में रिफार्म एक्ट से होता है। पहले तो साधारण जनता को मतदान का अधिकार ही नहीं था। वहाँ व्यापारियों, कारखानेदारों और वकील आदि लोगों का जो मध्यम वर्ग था, उनको पहली बार मतदान का अधिकार 1832 में मिला। इसके बाद कुछ श्रमिकों को। महिलाओं को तो मतदान का अधिकार इंग्लैण्ड में पहले महायुद्ध के बाद हासिल हुआ था और तभी वहाँ सही माने में बालिग मताधिकार की स्थापना हुई। भारत में जैसे-जैसे अंग्रेजी शासन का शुद्धिकरण होने लगा, वैसे-वैसे अंग्रेज अधिकारी वंशवाद से प्रेरित होने लगे। उनमें अभिमान जाग्रत हुआ। भारतीयों और अंग्रेजों के बीच जो खाई उत्पन्न हो गयी थी, उसके बाद वह दिन-प्रतिदिन गहरी होने लगी। 18वीं शताब्दी के अंत में वारेन हेस्टिंग्ज आदि पर महाभियोग लगाकर इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट द्वारा उसकी जाँच करवायी गयी थी। उसका असर नये अंग्रेज अधिकारियों पर हुआ और अंग्रेजी प्रशासन में उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार समाप्त सा हो गया।

अंग्रेजी शासन ने सबसे पहला परिवर्तन दंड व्यवस्था में किया। प्राचीन भारतीय दंड व्यवस्था मनुस्मृति पर आधारित थी। इसमें अपराध और अपराधियों को दिये जानेवाले दंड की व्यवस्था जाति और वर्ण के आधार पर निश्चित की गयी थी। जैसे यदि ब्राह्मण, शूद्र को मार डाले तो उसको फाँसी की सजा कदापि नहीं दी जा सकती थी, मृत्युदंड की तो बात ही छोड़ दीजिए। लेकिन शूद्र या अतिशूद्र यदि वरिष्ठ जातियों के सदस्यों के साथ छेड़खानी भी कर लें– हत्या तो कल्पना से परे की चीज थी– तो उनका म़त्युदंड़ तक हो जाता था। जाति और जन्म के आधार पर ऊँच-नीच, भेद-भाव बरतना हमारी दंड व्यवस्था का आधार था। मुसलमानों के जमाने में आपराधिक कानून की व्यवस्था मुसलिम शरीयत के अनुसार थी। यानी किसी भी काजी की अदालत में अगर कोई गैर-मुसलमान किसी मुसलमान के खिलाफ कोई गवाही देता था तो उसकी गवाही प्रमाणित नहीं मानी जाती थी, उसके आधार पर कोई निर्णय नहीं होता था।

वारेन हेस्टिंग्ज ने 1772 में जो सिविल कानून लागू किया था, उसकी 33वीं धारा के अनुसार विवाह, उत्तराधिकार, धार्मिक रस्मो-रिवाज और संस्थाओं के बारे में मुसलमानों के व्यवहारों का नियमन कुरान के अनुसार और हिंदुओं के व्यवहारों का शास्त्रों के आधार पर किया जाएगा, ऐसा निश्चित किया गया था। (इंट्रोडक्शन एण्ड एप्लीकेशन ऑफ इंग्लिश लॉ : सर कोर्टनोई इलबर्ट) लेकिन उपरोक्त मामलों में जहाँ वादी-प्रतिवादी हिंदू और मुसलमान होते थे या इनके अलावा किसी धर्म के होते थे तो सवाल उत्पन्न होता था कि जायदाद के बारे में किस कानून के अनुसार न्याय हो? इसके बारे में यह नियम बनाया गया था कि ऐसे मामलों में निर्णय न्याय और विवेक बुद्धि से किया जाएगा। इसके अतिरिक्त कानून के कई क्षेत्र ऐसे थे कि जिनमें हिंदू-मुसलमान विधि-व्यवस्था से कोई रोशनी नहीं मिलती थी। जैसे संविदा विधि (लॉ ऑफ कांट्रैक्ट)। उसी तरह ऐसे भी मामले उत्पन्न होते थे जिनमें परंपरागत कानून प्रक्रिया और दंड-व्यवस्था अंग्रेज मजिस्ट्रेटों की नैतिकता की कल्पना से मेल नहीं खाती थी।

अंग्रेजों के सामने और एक समस्या थी कि हिंदुओं और मुसलमानों के अलावा ईसाई, पारसी आर्मीनियन, यहूदी आदि के लिए कौन-सी व्यवस्था अपनायी जाए? जब तक उसके लिए कोई विधि-व्यवस्था तय नहीं की गयी थी। धर्म-परिवर्तन करनेवाले हिंदू और मुसलमानों को जायदाद के अधिकार से वंचित कर दिया जाता था। ऐसे लोगों के हितों की रक्षा करने के लिए विलियम बेंटिक के जमाने में एक व्यवस्था की गयी थी और धर्म-परिवर्तन करनेवालों को संरक्षण दिया गया था।

भारतीय परंपरागत कानून में कुछ प्रावधान ऐसे थे जो अंग्रेज शासकों के ईसाई कोड के अनुरूप नहीं थे। दंड के तौर पर किसी का कोई शरीर का अवयव काट देना, पत्थरों से मारना, गैर-मुसलमानों की गवाही को प्रमाणित नहीं मानना, या ब्राह्मणों को विशेषाधिकार देना जैसी सारी कल्पनाएँ अंग्रेज शासक मानने के लिए तैयार नहीं थे। इन सभी कारणों को लेकर नयी दंड संहिता कायम करने का अंग्रेजों ने विचार किया।

इंपीरियल गजेटियर में कहा गया है : भारत में अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कानून अंग्रेज विधि के संहिताकरण (कोडीफिकेशन) का अत्यधिक सफल प्रयोग है। विश्व की विभिन्न संहिताओं में सबसे बढ़िया भारतीय दंड संहिता है। इसमें आपराधिक व्यवस्था के सारे क्षेत्रों को अंतर्भूत कर लिया गया है। गजेटियर कहता है कि इसकी गुणवत्ता का सर्वोत्तम सबूत यह है कि चालीस वर्षों के बाद भी इसमें अधिक संशोधन या स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं पड़ी है। इसकी नींव तो इंग्लैण्ड में जो दंड व्यवस्था अस्तित्व में है, उसी पर रखी गयी है। लेकिन आत्मरक्षा का जो व्यापक अधिकार इंग्लैण्ड के लोगों को प्राप्त है, वह भारतीय दंड-व्यवस्था के तहत नहीं दिया गया है। इसमें पौर्वात्य देशों की परंपरा के अनुसार व्यभिचार को आपराधिक कानून के तहत कार्यवाही के लिए उपयुक्त समझा गया है और मृत्युदंड इंग्लैण्ड की तरह अनिवार्य न बनाकर, मृत्युदंड या उससे कम दंड देने का अधिकार अदालत को दिया गया है।

इन अंग्रेजी आपराधिक कानूनों से हमारे यहाँ सामाजिक स्थिति में मौलिक परिवर्तन आया। समाज के विभिन्न वर्गों और वर्णों में समानता इस कानून का आधार थी। यह व्यवस्था हरिजन और ब्राह्मण में कोई फर्क नहीं करती थी, न हिंदू, न मुसलमानों में। इस तरह परंपरागत हिंदू और मुसलमान समाज का जो संवैधानिक तथा कानूनी ढाँचा था उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन के बीज डाले गए।

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