जून में श्रम-बल में आयी 1 करोड़ लोगों की कमी – सीएमआईई

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— रिचर्ड महापात्र

8 जुलाई। मॉनसून जब अपने दूसरे महीने के दूसरे सप्ताह में पहुंच चुका है, तो देश में सबसे ज्यादा रोजगार देनेवाले और खाद्य उत्पादक यानी कृषि क्षेत्र में संभावित मंदी के परेशान करनेवाले संकेत दिखाई दे रहे हैं।

पिछले साल के इसी समय की तुलना में सात जुलाई तक खरीफ की बुआई में 15 फीसदी की कमी आई है। कुल मिलाकर किसानों ने 63 लाख हेक्टेयर खेतों में बुआई नहीं की। निरर्थक गतिविधियों के चलते जून के पहले दो सप्ताहों में बुआई धीमी गति से हुई है। एक सामान्य सीजन में अब तक खरीफ की मुख्य फसल धान को नर्सरी से लेकर खेत में रोप दिया गया होता।

पौधों को रोपना, खेती खासकर धान की फसल का ऐसा चरण होता है, जिसमें मजदूरों की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है। बुआई की धीमी प्रगति पहले से ही देश में बेरोजगारी की समग्र हालत को दर्शा रही है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक और सीईओ महेश व्यास ने जून में बेरोजगारी परिदृश्य के अपने विश्लेषण में गंभीर नतीजों की ओर इशारा किया है।

रोजगार की स्थिति पर सीएमआईई का नवीनतम आकलन जारी करते हुए उन्होंने लिखा – ‘जून के पहले पखवाड़े में बारिश सामान्य से 32 फीसदी कम थी। इसके चलते खेतों में मजदूरों की मांग में कमी आई होगी। जून में कृषि क्षेत्र में करीब 80 लाख रोजगार कम हुए, इनमें ज्यादातर पौधे रोपने से जुड़े थे।’

खरीफ के इस चरण के दौरान ज्यादातर रोजगार पौधारोपण करनेवाले मजूदरों या फिर पौधों को नर्सरी से लानेवाले मजूदरों के लिए ही होता है। सीएमआईई का कहना है कि इस साल जून के दौरान इस काम में केवल 40 लाख लोग जुड़े, जो 2021 और 2020 में इसी महीने के दौरान इस काम से जुड़नेवालों की तुलना में कम है।

कुल मिलाकर पूरे देश में बेरोजगारी की जो हालत है, उसे सीएमआईई ने अपने आकलन में दिखाया है। इसके मुताबिक, लोगों ने नौकरी की तलाश करना छोड़ दिया है या फिर वे श्रम-बाजार से बाहर चले गए हैं। ऐसा तब होता है जब नौकरी की तलाश करने वाला इतना हतोत्साहित हो चुका होता है कि उसे नौकरी मिलने की कोई उम्मीद नहीं रहती और वह नौकरी की तलाश करना छोड़ देता है। श्रम-बल को नौकरी की तलाश में लगे लोगों के कुल योग के रूप में परिभाषित किया गया है।

जून में रोजगार की तलाश करनेवालों की तादाद एक करोड़ कम हो गई। सीएमआईई ने कहा, ‘जहां इस महीने 1.3 करोड़ लोगों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी, वहीं बेरोजगारों की गिनती में केवल तीस लाख लोगों का इजाफा हुआ। बाकी लोग श्रम-बाजार से बाहर चले गए। नतीजे के तौर पर जून 2022 में श्रम-बल में एक करोड़ लोगों की कमी आई।

हालांकि जून में हुई यह हालत खतरे की घंटी इसलिए है क्योंकि यह 1.3 करोड़ रोजगार पूरी तरह से ग्रामीण क्षेत्रों के थे और उसमें भी इनमें से ज्यादातर कृषि क्षेत्र के थे।

खेती से ज्यादा मजदूरी से होती है किसान की आमदनी

यह क्या साबित करता है? पहला कि सबसे बड़े नियोक्ता, कृषि क्षेत्र में रोजगार घट रहा है। इसलिए इसका ग्रामीण आय पर समग्र प्रभाव पड़ेगा। दूसरा- देरी से बुआई और कृषि से संभावित कम आय का मतलब यह होगा कि किसान फसल में जितना पैसा लगाएगा, उतना उसे वापस नहीं मिलेगा और वह कर्ज में डूब जाएगा। आमतौर पर किसान बीज लेने, मजदूर रखने और खेत को तैयार करने जैसे कामों के चलते बुआई के समय सबसे बड़ा निवेश करते हैं। तीसरा और सबसे परेशान करनेवाला तथ्य यह है कि किसान की आमदनी खेती से ज्यादा मजदूरी से होती है।

सबसे ज्यादा प्रभावित हुए खेतिहर मजदूर

खेती के पांच महीने के सीजन में जून को सबसे ज्यादा कमाई वाला महीना माना जाता है। इस बार, जून में खेती के मजदूरों के अवसरों में कमी आने से मजदूर कुछ भी नहीं कमा सके हैं। इसका खेती से होनेवाली उनकी कुल आय पर भी असर पड़ेगा।

सीएमआईई का ताजा आंकड़ा दर्शाता है कि जून में कम बुआई से खेतिहर मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। उसके मुताबिक, ‘जब कृषि क्षेत्र में समग्र रूप से नौकरियां घटीं तो किसानों के रूप में काम करनेवालों की तादाद में 18 लाख लोगों की वृद्धि हुई। कृषि क्षेत्र में रोजगार में आई गिरावट, खेतिहर मजूदरों के बीच थी।

इसका मतलब यह हुआ कि गांव में रहने के चलते ही ज्यादातर लोगों ने खेती की। खेतों में मजदूरों को लगाने की बजाय उनमें से कई लोगों ने अपने आप काम किया। ऐसा मजदूरी का खर्चा बचाने या महज खुद को व्यस्त रखने के लिए किया गया।

मनरेगा में काम मांगने वालों की तादाद बढ़ी

श्रम-बाजार में आए इस खालीपन को इस तथ्य की रोशनी में देखा जा सकता है कि जून में मनरेगा में काम मांगने वालों की तादाद अप्रत्याशित स्तर तक बढ़ गई। डाउन टू अर्थ ने दर्ज किया कि जून में 3.1 करोड़ लोगों ने इस योजना में काम मांगा जबकि मई में ऐसा करनेवालों की तादाद तीन करोड़ थी।

मनरेगा में काम मांगनेवालों की बढ़ी तादाद यह दिखाती है कि बाहर कहीं और काम न मिलने की वजह से असंगठित मजदूर अपने गांवों में ही रुके हुए हैं। हालांकि, जैसा कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के सरकारी आंकड़े बताते हैं- ग्रामीण मजदूरी का यह कार्यक्रम भी काम की मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं है।

गांवों के श्रम बाजार की बहाली फिलहाल पूरी तरह से मानसून की प्रगति और खासतौर से बुआई की तेज प्रगति पर निर्भर करती है। जैसा कि खबरें मिल रही हैं- कई राज्यों में बुआई अभी शुरू ही हुई है क्योंकि जून में बारिश में कमी के दौर के बाद किसान मानसून में प्रगति की बाट जोहते हैं।

हालांकि जुलाई और अगस्त में मानसून कई ‘विराम’ भी लेने लगता है। जैसा कि पिछले कुछ सालों में हुआ। खबरों के मुताबिक, मानसून के इन विरामों की वजह से बड़े स्तर पर फसल चौपट हुई। अगर इस बार भी मानसून का बर्ताव वैसा ही रहता है तो फिर क्या होगा?

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