आलोचना की उजली सुबह

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— राजकिशोर राजन —

मुक्तिबोध प्रत्येक मनुष्य की छाती में हीरा देखने की कोशिश में थे. मुक्तिबोध जो है, उससे बेहतर दुनिया देखने की कोशिश में थे. मुक्तिबोध क्षुद्रता के स्थान पर उद्दातता देखने की कोशिश में थे. मुक्तिबोध ऐसे कवि हैं जिनके ऊपर ठोस अकादमिक बहस होती रही और मुक्तिबोध को आम जन से काटा जाता रहा.

मुक्तिबोध पर अपूर्वानन्द की आलोचना पुस्तक पढ़ते हुए हम मुक्तिबोध पर कोई अकादमिक आलोचना नहीं पढ़ते अपितु मुक्तिबोध के संग-साथ चलते हैं; यह अलग बात है कि इस प्रक्रिया में कहीं न कहीं आलोचक भी अपने आप को लिख रहा होता है।

मुक्तिबोध को जानने-समझने के लिए निरंतर प्रयास किए जाते रहे हैं क्योंकि महज 47 वर्षों की उम्र पाने वाले मुक्तिबोध ने जैसा जीवन जिया और लिखा वह अभूतपूर्व था। इनके ऊपर लिखा अधिकांश आलोचनात्मक लेखन उबाऊ और आतंकित करने वाला रहा और ज्यादातर यह हुआ कि आलोचकगण मुक्तिबोध पर लिख-लिख स्वयं वैतरणी पार करते रहे वहीं मुक्तिबोध हिन्दी पाठकों के बीच लगातार कठिन काव्य के प्रेत के रूप में समादृत होते रहे। जिन्होंने मुक्तिबोध पर लिखा उन्हें मुक्तिबोध से अधिक अपनी चिंता थी सो किताबें तो आती रहीं पर मुक्तिबोध की कभी आँख दिखती तो कभी नाक, मुक्तिबोध कभी पूरे का पूरा नहीं दिखे। हिन्दी आलोचना ने चाहे-अनचाहे मुक्तिबोध के साहित्य के साथ ऐसा व्यवहार किया जिससे न केवल हिन्दी के आम पाठक अपितु कवि-लेखक भी मुक्तिबोध को प्रणाम कर उनसे कन्नी काटने लगे, उनमें जुड़ाव के स्थान पर अलगाव पैदा हुआ जैसे कि मुक्तिबोध किसी कवि का नहीं बल्कि किसी पहाड़ का नाम है। एक ऐसा पहाड़ जहां पानी का नामोनिशान नहीं है। बहुत कम कृतियाँ हैं जहां मुक्तिबोध हाड़-मांस के इंसान के रूप में उपस्थित हैं।

एक पाँव रखता हूँ तो सौ राहें फूटती हैं
मैं उन सब पर से गुजर जाना चाहता हूँ .

यह मुक्तिबोध ही थे जिन्हें मनुष्य और मनुष्यता से अजहद प्यार था परंतु संजीदा तरीके उन्हें जाना-समझा नहीं गया; इस पुस्तक में मुख्य रूप से उन्हें हृदय से समझने का प्रस्ताव है। यूं तो इस पुस्तक में मुक्तिबोध के जीवन, काव्य, दृष्टिकोण पर अभिनव स्थापनाएं हैं जो अलग से विमर्श का विषय है और उन पर अलग से विचार करने की आवश्यकता है। आलोचक ने स्वयं स्वीकार किया है –मुक्तिबोध को पिछले 60 साल से पढ़ा जा रहा है तथा धीरे-धीरे उन्हें पढ़ने का तरीका परिपक्व हुआ है। जब लिखना शुरू किया था तब महसूस किया था कि खुद मैं कितना बदल गया हूँ लेकिन अपने अतीत के प्रति जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकता। मुक्तिबोध को समझने-समझाने के क्रम में अपूर्वानन्द ने मुक्तिबोध द्वारा लिखित डायरी, पत्र आदि को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करते हैं और फिर अपनी बात रखते हैं, यह निश्चित ही पाठकों के बीच भरोसा पैदा करता है।

अपूर्वानंद

पुस्तक की शुरुआत मुक्तिबोध द्वारा नेमि बाबू को लिखे पत्र के माध्यम से होती है, इस अध्याय के अंतर्गत मुक्तिबोध ने जो बात कही है उससे स्पष्ट होता है कि वे आज के समाज को गहराई से समझते हैं, चूंकि यह समाज पूंजी से परिचालित है और विवेकशून्य है। यहाँ बहुमत के आधार पर निर्णय होते हैं और बहुमत निस्संदेह मूर्खों का है।मुक्तिबोध मनुष्य की मूल चिंता से जुड़े साहित्यकार हैं तभी उन्हें भलीभांति पता है आज का समाज मनुष्य से नहीं अपितु भेड़ों से बना है। अब बुद्धिमान/गुणवान व्यक्ति पैदा करना समाज का लक्ष्य नहीं है क्योंकि इस देश में भेड़ें चाहिए ताकि ताकतवर पशु (सत्ताशीन) उनका आसानी से शिकार करते रहें।

मुक्तिबोध के विचारों को ले आलोचक मीमांसा करता है और उसे स्पष्ट करता है इससे मुक्तिबोध के मानवीय सरोकारों से हम वाकिफ तो होते ही हैं साथ ही अपने समय के चाँद का टेढ़ा मुंह भी देखते हैं। यह पुस्तक हिन्दी आलोचना में एक स्पेस देती है कि हम भी एक आदमी की हैसियत से चीजों को देख सकें तथा उसका मूल्यांकन कर सकें। मुझे पता नहीं अपूर्वानन्द जी ने कविताएं लिखीं है या नहीं परंतु इस पुस्तक की रचना एक कविहृदय व्यक्ति ही कर सकता है।

इस पुस्तक की रचना एक नए क्षितिज की तलाश है और हो सकता है हिन्दी में आगे इसे बढ़ाया जाए; आप यूं भी कह सकते हैं कि अब तक एक कवि या कविता ही आलोचक के पास गई है परंतु जब कभी आलोचक कवि/कविता के पास गया है कुछ अच्छा हुआ है। इसमें नए धान की खुशबू है तो बेहतर कल का आगाज भी। आलोचना के रचना तक पहुँचने की इस यात्रा को आलोचक ने साकार किया है। इसमें न उन्होंने अकादमिक लाइन की परवाह की न अपने समानधर्मा आलोचकों की, न कोई निष्कर्ष दिया न किसी विचारधारा से प्रेरित होकर लिखा, न इसे मुक्तिबोध की सम्यक आलोचना कह गुड़ गोबर किया। हम यह कह सकते हैं कि अगर आलोचना का मकसद समग्र मानवीय समाज है तो उसके लिए पोथी किसी बड़े काम की चीज नहीं है। इस किताब से हिन्दी में एक नई शुरुआत हो सकती है क्योंकि जड़ आलोचना का अब समय नहीं रहा।

किताब : मुक्तिबोध की लालटेन
लेखक : अपूर्वानन्द
प्रकाशन : सेतु प्रकाशन, सी-21, नोएडा सेक्टर 65, पिन-201301
setuprakashan@gmail.com
मूल्य : 395/-
प्रथम संस्करण -2022

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